मंगलवार, मार्च 06, 2012

हम तो बस शिकायत करेंगे और जिस दिन मॉनीटर चुनना होगा उस दिन स्कूल ही नहीं जाएँगे!


आज सुबह मेरे घर में जो नवयुवती, उसे शमा कह लेते हैं, झाड़ू कटका करती है, मुझसे 'यह वोट क्या होता है' के बारे में पूछने लगी। प्रायः वह मुझसे प्रश्न पूछती रहती है। अपने घर में वह भोली और कुछ मन्द बुद्धि मानी जाती है। न वह काम करने अकेली आती जाती थी न अपने लिए स्वयं सोचती थी।  शायद इसीलिए उसके घर में उसे कुछ भी समझाने सिखाने के स्थान पर 'इसे कुछ पता नहीं है, यह अकेले आ जा नहीं सकती' कहकर काम चला लिया जाता है। शायद जीवन में पहली बार उसने मुझमें एक ऐसा व्यक्ति पाया जो यह मानकर नहीं चलती कि इसे समझाने का क्या लाभ या कि यह अकेले आ जा नहीं सकती। अब भी उसका भाई उसे छोड़ने आता है किन्तु वह वापिस अकेली चले जाती है।

जब उसने मेरा काम करना शुरु किया तब वह पगार भी नहीं गिन सकती थी। १६०० रुपए बिना उसके गिने उसे कैसे दूँ समझ ही नहीं आ रहा था। आखिर मैंने उसे बैठाया और उससे पूछा कि एक हाथ की उंगलियाँ गिनो कितनी हैं। अब दूसरे हाथ की। अब एक पैर की। अब ये सब मिलाकर कितनी हुईं? उसने पन्द्रह बता दीं। अब उसे कहा कि दूसरे पैर की एक और उंगली भी जोड़ लो तो। और वह हाथ पैर की उंगलियाँ गिन मुझे सोलह उत्तर दे पाई। तब मैंने उसे पाँच सौ के तीन नोट गिनवाए और समझाये कि कैसे वे पाँच सौ और पाँच सौ दस सौ और पाँच सौ १५ सौ होते हैं और अब इसमें एक सौ और मिला दें तो सोलह सौ हो गए़।

अपने पैसे गिन पाने पर वह बहुत खुश हुई और तब से मुझसे तरह तरह के प्रश्न पूछती रहती है। उसने मुझे कल से पैसों के लेनदेन के बारे में सिखाने को कहा है ताकि वह सब्जी आदि खरीद सके। मैं उसे यह समझाने में सफल रही हूँ कि कभी न कभी उसे अपना जीवन स्वयं जीना होगा और यदि शादी की तो अपना घर स्वयं चलाना होगा।

आज उसने मुझसे पूछा कि यह वोट क्या होता है और क्यों होता है। सब वोट की बात करते हैं और आज माँ के साथ उसे वोट डालने भी जाना है किन्तु पता नहीं यह होता क्या है और क्यों डालना होता है। यह नहीं है कि वह पढ़ी लिखी नहीं है। वह दसवीं फेल है या कहिए नवीं पास है। सो मैंने उससे पूछा कि तुम्हारी कक्षा में मॉनीटर होता था। बोली हाँ। कैसे बनाया जाता था? कौन चुनता था? वह सोचती रह गई। शायद भूल गई थी। मैंने कहा कि तीन तरीके हो सकते हैं। एक तो कि अध्यापक किसी भी छात्र को मॉनीटर बना दे, या जो बच्चा परीक्षा में प्रथम आया उसे बना दिया जाए या फिर तुम सारे छात्र मिलकर मॉनीटर चुनते और अध्यापक केवल यह ध्यान रखता कि चुनाव सही ढंग से हो रहा है। किसका चुना मॉनीटर तुम्हें पसन्द आता? वह जो तुम्हें पसन्द हो व जिसे तुमने चुना हो या जिसे अध्यापक ने चुना हो या जो प्रथम आया हो?

थोड़ा और समझाने कि तुम्हारे चुनने का अर्थ हुआ कि अध्यापक तुम सबसे पूछता कि बताओ तुम्हें किसे मॉनीटर बनाना है उसका नाम दो। आशा खड़ी होकर कहती उमा को। रमेश कहता लता को और विजया कहती गणेश को। बस तीन ही नाम आते। अब अध्यापक तुम सबसे एक एक पर्ची में उमा, लता या गणेश जिसे भी मॉनीटर बनाना चाहो उसका नाम लिखने को कहते। फिर किसके नाम की अधिक पर्चियाँ हुईं गिनी जातीं और जिसे अधिक पर्चियाँ या कहो वोट मिलते वह मॉनीटर होता।

शमा झट से बोली यही तरीका बेहतर है। मैंने उससे यह पूछा कि यदि तुम्हें तीनों में से कोई पसन्द न होता तो? वह बोली फिर क्या करती मम्मी जी? किसे चुनती मैं? मैंने कहा कि यह हो सकता है पर्ची लेने से मना कर देतीं या खाली पर्ची जमा करा देतीं या तीसरा तरीका होता कि तुम्हें जो पसन्द है उसका नाम तुम दे देतीं और यदि वह मान जाता तो तीन की जगह चार बच्चे मॉनीटर बनने के लिए खड़े होते। और यदि वह मना कर देता तो तुम उमा, लता या गणेश में से जो सबसे कम बुरा लगता उसे चुन लेती। या फिर जिस दिन मॉनीटर चुनना होता उस दिन स्कूल ही नहीं जाती।

अब उसे चुनाव या कहिए जनतन्त्र की बात समझ आ गई थी। अब वह मुझसे पूछने लगी कि यह पाल्टी क्या होती है। कोई कहता है इस पाल्टी को वोट दो कोई उस पाल्टी को। कैसे समझ में आएगा कि किसे देना है। मैंने कहा कि जो पार्टी अच्छा काम करती हो उसे और उसमें भी यदि जो आदमी या औरत खड़े हुए हैं वह काम करने वाले हों। अब वह एकदम से बोली हाँ, जो हमारा काम करवाए उसे। मैंने कहा हमारा नहीं, सार्वजनिक काम। मेरे घर का फर्श टूट जाए तो उसे ठीक नहीं करवाएगा परन्तु यदि सड़क टूट जाए तो उसे ठीक करवाए। सड़क पर तुम भी चलोगी और मैं भी और लोग भी।

वोट किसी को इसलिए नहीं देते कि वह हमारा रिश्तेदार है, या हमारी जात वाला है, या हमारे धर्म का है बल्कि इसलिए कि वह ईमानदार है, सबके हित में काम करता है, लोगों की समस्याएं सुनकर दूर करने की कोशिश करता है। फिर कहा अब तुम जाओ तुम्हारी माँ चिन्ता करने लगेगी। कल उसे बताकर आना कि तुम्हें पैसे का हिसाब सीखना है तो देर हो जाएगी।

वह तो चली गई और तबसे मेरे मन में मेरी ही कही बातें घूम रहीं हैं। उसे समझाते हुए मेरे अपने विचार काफी साफ हो गए और मुझे स्वयं को समझ आने लगे। समझ आया कि यदि उमा, लता या गणेश में से कोई पसन्द न होता तो मैं कौन सा विकल्प चुनती? जिस दिन मॉनीटर चुनना होता उस दिन स्कूल ही नहीं जाती? यही विकल्प तो हम मध्यम वर्गीय व शिक्षित लोग चुनते आए हैं।

जबकि अपनी समझ व जीवन के अनुभवों ने हमें लोगों को अंक देना भी सिखा दिया है। हम लगभग हर समय लोगों का आँकलन ही तो करते रहते हैं। मन ही मन उन्हें अंक या श्रेणी ही तो देते रहते हैं। हम जानते हें कि कैसे अंक देने हैं, कसौटी क्या होनी चाहिए। जैसे दल की विचार धारा=५० अंक, उम्मीदवार का चरित्र (याने नैतिकता, ईमानदारी आदि) काम के प्रति निष्ठा व लगन, योग्यता, नेतृत्व के गुण आदि को ५० अंक। यदि हम जाकर फूल सज्जा के लिए अंक दे सकते हैं, किसका गाजर का हलुवा सबसे अच्छा बना भी अंक देकर बता सकते हैं तो क्यों न हम यही तरीका उपयोग कर अपने यहाँ के सभी उम्मीदवारों का भी आँकलन कर लेते हैं और फिर सबसे अच्छे या सबसे कम बुरे को चुन लेते? क्यों नहीं हम अपनी पसन्द के व्यक्ति को खड़ा करते या फिर दल पसन्द होने पर भी यदि किसी बेईमान या गलत व्यक्ति को या फिर परिवार के किसी भी अनुभवहीन व्यक्ति को खड़ा किया गया है तो उसे वोट न देकर दल को यह तो जतला दें कि यदि तुम किसी भी ऐरे गैरे को लाओगे तो हम इसे अपना अनादर मानकर उसे हरवा ही देंगे।

अगले दिन शमा आई और बोली कि आपने जो कहा था वह मैंने माँ को बताया, माँ ने कहा कि जो अपने लिए कुछ न कर पाए वह हमारे लिए क्या करेगा? किसी दादा या शक्तिशाली को जिताने से कल वह हमारे लिए भी कुछ करने की स्थिति में होगा। सो सिटिज़न कैन्डिडेट तो उन्होंने फेल कर दिया।

मेरे जैसे वोट देने नहीं गए। मेरा तो वोट ही नहीं था। जब तक हम इस जगह आए तो मतदाता सूचियाँ बन चुकी थीं। यह भी सच है कि मैंने भागदौड कर कोई कोशिश भी नहीं की।

मैं, मेरे मित्र, और शायद शमा, शमा की माँ सदा ईमानदार नेता चाहते हैं, हर सम्भव अवसर पर राजनीति में कितना भ्रष्टाचार है कहते नहीं थकते। किन्तु जैसे ही अवसर आता है कि अभ्रष्ट या ईमानदार, मेहनती, समाजसेवा की भावना रखने वाले को चुनने का तो हम या तो आलस कर जाते हें या बाहुबली, अमीर, येन केन प्रकारेण पैसे जमा करने वाले को यह सोच चुन लेते हैं कि वह शायद कुछ टुकड़े हमारी तरफ भी फेंक दे और ईमानदार को यह सोच वोट नहीं देते कि हा, यह तो हमारे जैसा ही है, कोई रौब नहीं, कोई पैसा नहीं, यह क्या खाकर हम पर राज करेगा? हमपर तो राज या तो जमाने से राज करते परिवार का सदस्य  करेगा या फिर कोई नया बाहुबली करेगा।

सो सिटिज़न कैन्डिडेट हार जाते हैं। हम जमाने से 'इनमें से कोई नहीं चाहिए' चुनने का अधिकार चाहते रहे हैं तो जब हम लीक से हटकर बिना किसी घराने के वरदहस्त वाले, साफ सुथरे उम्मीदवार पर मोहर लगाते हैं तो हम एक तरह से सभी मुख्य राजनैतिक दलों को यही तो बताते हैं कि जो उम्मीदवार तुमने खड़े किए हैं हमें 'इनमें से कोई नहीं चाहिए'। किन्तु नहीं हमें कोई बदलाव नहीं चाहिए,जो है वही चलने देंगे हाँ हम व्यवस्था की बुराई अवश्य करेंगे। हम बस शिकायतें कर सकते हैं,जो बदलाव चाहते हैं वह नहीं लाएँगे। और इस हम में मैं भी शामिल हूँ।

घुघूती बासूती

नोटः यह लेख मुम्बई नगरपालिका के चुनाव के समय शायद १६‍या१७ फरवरी को लिखा था। उस समय समय की कमी व आलस के चलते ठीक ठाक कर पोस्ट नहीं किया और अब लगा कि उत्तर प्रदेश की चर्चा जोरों पर है तो अब ही पोस्ट कर देती हूँ।

घुघूती बासूती



9 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया है। बस ये सिटिजन केंडिडेट, समझ न आया। यह कहाँ से आएगा? क्या वह भी बाहुबली न हो जाएगा? या वह भी अपना घऱ भऱने के लिए उन लोगों के हित न साधने लगेगा जिन लोगों के हित अभी ये बाहुबली या अन्य लोग साध रहे हैं?
    मुझे उस का उपाय केवल यह लग रहा है कि जो लोग बदलाव लाना चाहते हैं वे संगठित हों, ऐसे संगठन में जिस में जनतंत्र हो। उम्मीदवार जनतांत्रिक रीति से चुना जाए। यदि उम्मीदवार चुने जाने के बाद पथभ्रष्ट हो तो संगठन उसे वापस बुला सके। वापस बुलाने का निर्णय संगठन जनतांत्रिक रीति से करे। ऐसी अनेक बातें हो सकती हैं। ये सब सुधार केवल तभी हो सकते हैं जब एक संघर्षशील जन संगठन का निर्माण स्वयं जनता के बीच से हो।

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  2. अरविन्‍द केजरीवाल जी क्‍यों याद आ रहे हैं?

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    रंगों की बहार!
    छींटे और बौछार!!
    फुहार ही फुहार!!!
    रंगों के पर्व होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!!

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  4. अगर यहाँ की अधिकाँश जनता पढ़ी और ढंग से पढ़ी होती तो ये स्थिति न आती. कम लोग पढ़े हैं और जो ऐसे लोग हैं वो बाक़ी को पट्टी पढ़ाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं.

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  5. रोचक प्रस्तुति ....स:परिवार होली की हार्दिक शुभकानाएं.......

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  6. चुनाव व गिनती बहुत ही ढंग से समझायी है आपने..

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  7. कितनी अच्छी तरह समझाया है....
    किसे चुना जाए यह तो एक विकट प्रश्न है....उस दिन स्कूल ही ना जाएँ...ये भी गवारा नहीं...और ये भी पता होता है...जिसे चुनने जा रहे हैं...वो कभी जीत नहीं पायेगा..

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  8. रोचक प्रस्तुति| रंगों के पर्व होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  9. जब हम दूसरों को समझाते हैं तब स्‍वयं को भी समझ आता है।

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