वैसे इसका शीर्षक 'आओ डूब मरें' भी हो सकता था।
खबर है(मुम्बई मिरर,२३.१०.२०११, व ई सकाळ) कि सतारा व उसके आसपास की १५० नाकुशा व नकोशी नाम की लड़कियाँ अपना नाम बदलकर अस्मिता, एश्वर्या, कोमल, शिवानी, पूजा आदि बन गई हैं। यह 'नाम बदलो कार्यक्रम' सतारा जिले में २२.१०.२०११ को सम्पन्न हुआ।
सुनने में तो नाकुशा(नकुशा तो नहीं?)या नकोशी बुरे नहीं लगते फिर इतनी लड़कियाँ अपने नामों से क्यों नाराज थीं? क्यों उन्होंने स्वयं अपने नाम चुने और सुबह सुबह नाम बदलवाने को अपने दूर दराज के गाँवों से सतारा पहुँची?
तो सुनिए, हमारे इस स्त्रियों का आदर करने वाले देश में, देवियों की पूजा करने वाले देश में, बच्चियों को देवी का रूप मान नवरात्रियों में उनके पैर धोकर उनकी पूजा करने वालों के देश में, उनको जन्मने से रोकने के भाँति भाँति के अन्धविश्वास से लेकर व्यावहारिक से लेकर वैज्ञानिक उपाय जैसे टोटके, झाड़फूँक, तावीज,विशेष भोजन, भ्रूण हत्या,नर भ्रूण की गर्भ में स्थापना करना व न जाने कितने और तरीके अपनाए जाते हैं। ये सब तो हमने सुने हुए थे। आज एक नया उपाय पता चला। बच्ची को ऐसा नाम दे दो कि उसके बाद उस परिवार में कोई बच्ची जन्म लेने का दुस्साहस ही न करे।
जब किसी गर्भवती स्त्री ने पुत्र की आशा की हो और पुत्री हो जाए तो 'नको होती' जैसा कुछ मराठी में कहा जाता है जिसका अर्थ है, नहीं चाहिए थी। और यह लड़की नकोशी बन जाती है। नाकुशा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जो अजित वडनेरकर जी समझा सकते हैं। ये सब बच्चियाँ जानती हैं कि वे अनचाही संतान हैं।
वैसे एक बात तो माननी होगी कि ये माता पिता खुल्लमखुल्ला बता देते हैं कि तुम नहीं चाहिए थी। कितने माता पिता तो यह नहीं कह पाते और पुत्र की चाह में पुत्री जन्मने के बाद उसे अच्छा सा नाम दे जीवन पुत्र की चाहत में गुजार देते हैं। स्पष्टवादिता भी एक गुण है और बच्ची जन्म से ही कोई भ्रम नहीं पालती।
खैर,अब पन्द्रह साल की नकोशी अस्मिता बन सकती है। नाकुशा कोमल और एक अन्य उज्जवला। यह बात और है कि नए नामों के प्रमाण पत्र बनाने वाले भी उनके माता पिता से बहुत भिन्न नहीं हैं सो नकोशी अस्मिता बनते बनते स्वाति बन गई है और उसे बताया गया है चिन्ता मत करो, तुम्हारा नाम ठीक कर अस्मिता कर दिया जाएगा। अस्मिता बनना चाहने वाली नकोशी को स्कूल पसन्द है व पढ़लिखकर अध्यापिका बनना चाहती है। वह दुखी है कि नाम बदलवाने के चक्कर में स्कूल में परीक्षा भी छूटी और नाम भी अपनी पसन्द का नहीं मिला।
प्रश्नः
१.जब इन नकोशियाँ, नाकुशाओं का माँ बनने का समय आएगा तो क्या ये बेटियाँ जन्मना चाहेंगी?
२.क्या इन्हें भ्रूण का लिंग पताकर अवान्छित भ्रूण को गिराने से रोकने का समाज का कोई नैतिक अधिकार बनता है?
३. क्या कल बुढ़ापे में इनके माता पिता को इनसे भरण पोषण माँगने का अधिकार होना चाहिए?
घुघूती बासूती
यह समझ आते ही चुनौती महसूस होती होगी कुछ को कि साबित कर दिखाएं और नाम रखने वाले कहें कि हमें तुम्हारी ही जरूरत थी.
प्रत्युत्तर देंहटाएंखबर का हैडिंग देखा था तब अन्दाज़ ही नहीं था कि ज्वालामुखी की गहराई कितनी है। पूरी बात पढकर पता लगा। नहीं, उन अभिभावकों की सोच बदले बिना इन बच्चियों का जीवन कठिन ही रहेगा परंतु नकोशी नाम सुनते ही पूर्वाग्रह रखने वाले अपरिचित उससे अवश्य बच जायेंगे। रोज़-रोज़ ही ऐसी नई-नई खबरें पढकर यही लगता है कि हमें हिलाने की नहीं, कसकर झिंझोड़ने की आवश्यकता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंउत्तर:
1. कुछ तो ऐसी अवश्य होंगी जो ग़लती को सुधारना चाहेंगी
2. हत्या तो हत्या ही है, किसी रूप में भी हो।
3. ऐसे माँ-बाप तो बेटी को बोझ ही समझते होंगे, भरण-पोषण की बात शायद उन्होंने सोची भी न हो। लेकिन लगता है कि ऐसे अधिकांश परिवार निर्धन और सामाजिक-सुरक्षा विहीन होंगे। कई बार सामान्य सी दिखने वाली समस्या के पीछे असामान्य कारण छिपे होते हैं। मुझे लगता है कि समाज को सुरक्षा की भावना बढने पर भी भेदभाव में कमी आ सकती है। अमेरिका में आधी रात में भी जब लड़कियों को अकेले घूमते देखता हूँ तो यह बात सदा दिल में आती है कि हमारा भारत वापस वैसा कब होगा। (वैसे मै सातारा जिले के एक पश्चिमी ग्राम में चार महीने ग्रामीणों के बीच रहा मगर यह नाम कभी सुना हो ऐसा याद नहीं पड़ता। शायद अर्थ पता न होने की वजह से कभी दिमाग़ में रजिस्टर न हुआ हो।)
नाम बदलकर उस मानसिकता को करारा जवाब दिया है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंनई जानकारी।
प्रत्युत्तर देंहटाएंनाम बदलने से ही नहीं होगा। नकुशा नाम जिस कारण और जिस भाव से रखा जाता था, वह बदलना चाहिए। जिन्होने नाम बदला अवश्य ही वे दुबारा इसे स्थान नहीं देंगे।
हम बचपन से ही कुछ नाम सुनते आए हैं जैसे- सीमा, मनभरी, आचुकी, अन्तिमा आदि।
प्रत्युत्तर देंहटाएंहमारे यहाँ पुराने वक़्त में एक नाम मिलता था "धापू", मालवी में धापने का मतलब होता है संतुष्ट होना ये अक्सर तीसरी या चौथी बेटी का नाम होता था आजकल अन्तिमा सुनाई देता है. अब तो खैर डॉक्टरो की कृपा से इस तरह के नाम की जरुरत ही नहीं रही.
प्रत्युत्तर देंहटाएंनाम बदलना सिर्फ मनोविज्ञान ही है, कर्म नहीं बदलते .
प्रत्युत्तर देंहटाएंये खबर मैंने भी टी.वी. पर देखी थी कि कई लड़कियों ने अपना नाम नाकुशा से बदलवाकर अपने मनपसंद नाम रख लिया, लेकिन नाकुशा नाम रखे जाने के पीछे ये मानसिकता होती है, नहीं मालूम था.
प्रत्युत्तर देंहटाएंकभी-कभी मैं भी बहुत सोच में पड़ जाती हूँ कि लड़कियों को पैदा होने के बाद जिल्लत की ज़िंदगी देना ठीक है या उन्हें गर्भ में ही मार देना ज्यादा अच्छा है. क्योंकि इस तरह का जीने से इस दुनिया में ना आना ही अच्छा, लेकिन लड़कियों से कौन पूछता है कि तुम्हें क्या पसंद है-- तिल-तिलकर जीना या मर जाना.
शायद ये बहुत तल्ख़ टिप्पणी लगे, लेकिन कभी-कभी मन ऐसा ही हो जाता है.
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ ………
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।
http://tetalaa.blogspot.com/
मुक्ति, इस टिप्पणी की तल्ख़ी तो बहुत हल्की ही है। कभी कभी समझ नहीं आता कि जीवन, धर्म, समाज इतना अन्याय करता स्त्री के साथ है और दिन रात न जाने कौन सी भड़ास निकालने को गालियाँ पुरुष देता रहता है। यदि स्त्रियाँ भड़ास उतारने पर आ जाएँ तो न जाने क्या हो जाए।
प्रत्युत्तर देंहटाएंक्रोध आने के कारण स्त्री के पास अधिक हैं व क्रोधित होने का अधिकार प्रायः पुरुष के पास!
ब्लड प्रैशर बढ़ने के कारण स्त्री के पास अधिक हैं और बढ़ता प्रायः पुरुष का है।
वैसे हम अपनी भड़ास अपने से कमजोर या जिस पर हमारा वश चले उसे सताकर निकालते हैं।
मैंने ऐसे नाम कभी नहीं सुने थे सुनते (पढ़ते) से ही मन उबल पड़ा, रात भर सो न सकी। फिर हारकर उठी और यह लेख सुबह पौने चार बजे खत्म किया और पोस्ट किया। फिर भी सो न सकी। कान में नाकुशा / नकोशी शब्द ही गूँजते रहे। यदि कोई हमें अवान्छिता कहकर पुकारता? सोचा जाए तो हममें से आधी स्त्रियाँ नाकुशा / नकोशी ही हैं। यह बात और है कि माता पिता इतने ब्लन्ट नहीं थे। यदि हमारी जगह बेटा पैदा हुआ होता तो सच में क्या वे अधिक खुश न हुए होते?
आश्चर्य है कि स्त्रियाँ बचपन से ऐसे नाम सुनती आईं हैं तो उनमें आक्रोश क्यों नहीं है?
घुघूती बासूती
kya ye bhi hamre samaj ka stya hai, ki taumr nakkari hui kae sambodhit kiya jaay......!!!bhayawah saty!!!
प्रत्युत्तर देंहटाएं"GHUGHUTI BASUTI" ye shabd hamre[uttarakhand]ke pahadi kshetro me lori ke roop me gaya jata hai...bahut sundar blog nam.
sarthak post..
जी, पोस्ट दिवाली कि छुट्टियों में पढेंगे, बाकि दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार कीजिए.
प्रत्युत्तर देंहटाएंकल के चर्चा मंच पर, लिंको की है धूम।
प्रत्युत्तर देंहटाएंअपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।।
हद है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंक्या-क्या नहीं होता हमारे देश में। यह घटना सुनी नहीं थी। पढ़कर मन सच में खिन्न हुआ। हम इक्कीसवीं सदी में भी इस मानसिकता को जी रहे हैं, सोच कर ही शर्म आती है कि हम भी इस समाज के अंग हैं।
१. शायद हां।
२. इन्हें भ्रूण हत्या नहीं करनी चाहिए।
३. अधिकार क्या, ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए।
टीवी में एक धारावाहिक आता है नकुशा कहानी एक सुन्दर लड़की की है जो बदसूरत बन कर रहती है ताकि उस पर कोई बुरी नजर न डाले | अभी तक पता नहीं था की नकुशा का क्या अर्थ है हाल में ही एक ब्लॉग से पता चला | सुन कर कुछ भी आश्चर्य नहीं हुआ क्योकि हम तो उस महान देश के वासी है जहा पर लड़कियों को जन्म लेने के बाद या पहले ही मार दिया जाता है वहा बस इन नामो से लड़कियों का तुक्ष अनचाही करार देने का काम तो काफी छोटा है यहाँ तो हत्या तक करते है | नाम तो बदल गया पर क्या लोगो की मानसिकता बदली , शायद बिलकुल भी नहीं जब तक वो नहीं बदलेगी कुछ और नाकुशा जन्म लेती रहेंगी |
प्रत्युत्तर देंहटाएं21 सदी में भी यह सब सुनना दुर्भाग्यपूर्ण है ..
प्रत्युत्तर देंहटाएं.. आपको दीपावली की शुभकामनाएं !!
पञ्च दिवसीय दीपोत्सव पर आप को हार्दिक शुभकामनाएं ! ईश्वर आपको और आपके कुटुंब को संपन्न व स्वस्थ रखें !
प्रत्युत्तर देंहटाएं***************************************************
"आइये प्रदुषण मुक्त दिवाली मनाएं, पटाखे ना चलायें"
अभी तक पता नहीं था की नकुशा का क्या अर्थ है
प्रत्युत्तर देंहटाएंnow i understand
विभिन्न प्रदेशों में ऐसे नाम रखने की कुरीति रही है, साम्य यही है कि ऐसे नाम सिर्फ़ लड़कियों के ही रखे जाते थे। हालाँकि यह हर घर में नहीं होता, फ़िर भी समाज के लिये अक्षम्य है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसिर्फ़ नाम बदलने से सब कुछ नहीं होगा, लेकिन बदलाव की धारा बह रही है तो अच्छा ही है। आप पंजाब में रही हैं शायद, इस तथ्य से भी परिचित होंगी कि गुरू गोबिंद सिंह जी सिखों के नामकरण में आमूलचूल परिवर्तन लाये थे और यह भी एक कारण था कि उनके हौंसलों ने ऐसी उड़ान भरी कि एक पूरी कौम ही वीरता का पर्याय मानी जाने लगी।
अखबार में यह पढ़ा था तो क्षोभ और आशा, दोनों एक साथ महसूस हुये थे।
घुघूती जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपके मित्रों, परिजनों के साथ आपको भी पर्व की मंगलकामनायें!
तमसो मा ज्योतिर्गमय!
विडम्बनाओं,त्रासदियों और दोहरेपन से जुडी सामाजिक सच्चाईयों को चुनौती।बदलाव की बयार ऐसे ही प्रतीकों से शुरू होती है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंहे भगवान - कब बदलेंगे हम ? :(
प्रत्युत्तर देंहटाएंof course उनमे आक्रोश होगा - परन्तु ध्यान दीजिये - कि इनमे से कईयों को बचपन से सुनते हुए इतनी आदत हो जाती है कि शायद उन्हें उतना नहीं सालता जितना हमें अचानक सुन कर साल रहा है |
इसी आक्रोश के चलते ही तो नाम बदले होंगे ना ? ईश्वर करे - ऐसी मनोस्थिति बदले :(
और फिर ये हम ही हैं, जो दीपावली पर लक्ष्मीपूजन कर रहे हैं !!! अभी २० दिन पहले नवरात्री में दुर्गापूजा कर आये हैं !!!!
पुत्र की कामना हो और पुत्री आ टपके तो जरूरी नहीं कि उसके प्रति ऐसा गर्हित व्यवहार किया जाय। लेकिन अफसोस है कि हमारे समाज में अधम लोगों की कमी नहीं है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंपुत्र और पुत्री के प्रति दृष्टिकोण में अंतर आने के कारण इसी समाज ने ही पैदा किए हैं। यहाँ मैं इस मुद्दे के एक अन्य पहलू को उजागर करती एक पुरानी पोस्ट का लिंक देना चाहूंगा। कितनी संतान...
http://satyarthmitra.blogspot.com/2008/11/blog-post_14.html
केवल नाम ही नहीं मानसिकता भी बदलने की जरूरत है। खैर ये एक अच्छी शुरुआत है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंजनसत्ता, 25 अक्तूबर, 2011 का संपादकीय:
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेटियों के नाम
अगर किसी को ऐसे नाम से पुकारा जाए जिसका मतलब उसे यह अहसास दिलाना हो कि वह इस दुनिया में गैरजरूरी है तो हर बार बुलाने पर उसकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। भारत में बेटियों को लेकर ऐसी मानसिकता कोई आश्चर्य नहीं पैदा करती। महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में यह प्रथा रही है कि बेटे की उम्मीद में अगर किसी परिवार में बेटी पैदा हो जाती है तो उसका नाम ही ‘नकुशा’ रख दिया जाता है। इस शब्द का अर्थ है ‘अवांछित’। समझा जा सकता है कि किसी लड़की को परिवार, समाज या स्कूल में इस शब्द से संबोधित किए जाने पर कैसा लगता होगा। कहते हैं, नाम में क्या रखा है। लेकिन यह उदाहरण बताता है कि नाम में भी बहुत कुछ रखा है। इस रिवायत से निजात दिलाने और ‘नकुशा’ नाम की लड़कियों को दूसरा नाम देने की पहल खुद महाराष्ट्र सरकार ने की है। इसके तहत सतारा जिले के ग्रामीण इलाकों में ऐसी दो सौ अस्सी बच्चियों की पहचान की गई और उनके अभिभावकों से बात कर उनके नाम बदलने का फैसला किया गया। फिर बाकायदा एक समारोह आयोजित कर ‘नकुशा’ नाम की लड़कियों के परिवारों की पसंद के मुताबिक पूजा, नीता, आशा और ऐश्वर्या आदि नाम रखे गए। किसी को अपमानित करने वाली स्थितियों से निजात दिलाने की लगातार कोशिश एक सभ्य और प्रगतिशील समाज की निशानी है। महाराष्ट्र सरकार की यह पहल इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव, वोट की फिक्र या कई दूसरे कारणों से सामाजिक सुधारों के मामले में
सरकारें आमतौर पर कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं। यही वजह है कि परंपरा के नाम पर समाज या परिवार में ऐसे व्यवहार भी खुलेआम निबाहे जाते हैं जो मानवीय तकाजों के खिलाफ होते हैं।
दरअसल, पितृसत्तात्मक ढांचे का मनोविज्ञान इस कदर गहरे पैठा है कि बहुत सारे लोग सिर्फ इसलिए किसी परंपरा का पालन करते रहते हैं क्योंकि उसके अर्थ और असर के बारे में सोचने का मौका उन्हें नहीं मिलता। खासतौर पर अपने बच्चों के मामले में लोग आमतौर पर वैसे भेदभावपरक व्यवहार बेझिझक निबाहते रहते हैं, जिनमें बेटे को तरजीह जाती है और बेटियों को हाशिये पर छोड़ दिया जाता है। एक औसत भारतीय परिवार बेटे की चाहत पूरी करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। यह अकारण नहीं है कि देश के बहुत सारे हिस्सों में बालकों के मुकाबले बच्चियों और इसी तरह पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों का अनुपात काफी चिंताजनक हद तक गिर गया है। हरियाणा में यह आंकड़ा प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महज सात सौ चौहत्तरस्त्रियों तक पहुंच गया है। इससे तरह-तरह की सामाजिक विसंगतियां पैदा हो रही हैं। हरियाणा में लड़के के विवाह के लिए लड़की ढूंढ़ने में हो रही मुश्किल इसका सिर्फ एक पहलू है। नकुशा नाम रखे जाने का चलन भले महाराष्ट्र के एक हिस्से तक सीमित रहा है, मगर बच्चियों को अवांछित मानने की मानसिकता बहुत व्यापक है। इसलिए बड़ी चुनौती इस मानसिकता को बदलने की है। इसमें सभी सरकारों और सामाजिक संस्थाओं को तत्परता दिखानी चाहिए। महाराष्ट्र को भी देखना होगा कि उसकी पहल महज नाम का बदलाव होकर न रह जाए।
जनसत्ता, 25 अक्तूबर, 2011 का संपादकीय:
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेटियों के नाम
अगर किसी को ऐसे नाम से पुकारा जाए जिसका मतलब उसे यह अहसास दिलाना हो कि वह इस दुनिया में गैरजरूरी है तो हर बार बुलाने पर उसकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। भारत में बेटियों को लेकर ऐसी मानसिकता कोई आश्चर्य नहीं पैदा करती। महाराष्ट्र में कुछ इलाकों में यह प्रथा रही है कि बेटे की उम्मीद में अगर किसी परिवार में बेटी पैदा हो जाती है तो उसका नाम ही ‘नकुशा’ रख दिया जाता है। इस शब्द का अर्थ है ‘अवांछित’। समझा जा सकता है कि किसी लड़की को परिवार, समाज या स्कूल में इस शब्द से संबोधित किए जाने पर कैसा लगता होगा। कहते हैं, नाम में क्या रखा है। लेकिन यह उदाहरण बताता है कि नाम में भी बहुत कुछ रखा है। इस रिवायत से निजात दिलाने और ‘नकुशा’ नाम की लड़कियों को दूसरा नाम देने की पहल खुद महाराष्ट्र सरकार ने की है। इसके तहत सतारा जिले के ग्रामीण इलाकों में ऐसी दो सौ अस्सी बच्चियों की पहचान की गई और उनके अभिभावकों से बात कर उनके नाम बदलने का फैसला किया गया। फिर बाकायदा एक समारोह आयोजित कर ‘नकुशा’ नाम की लड़कियों के परिवारों की पसंद के मुताबिक पूजा, नीता, आशा और ऐश्वर्या आदि नाम रखे गए। किसी को अपमानित करने वाली स्थितियों से निजात दिलाने की लगातार कोशिश एक सभ्य और प्रगतिशील समाज की निशानी है। महाराष्ट्र सरकार की यह पहल इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव, वोट की फिक्र या कई दूसरे कारणों से सामाजिक सुधारों के मामले में
सरकारें आमतौर पर कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं। यही वजह है कि परंपरा के नाम पर समाज या परिवार में ऐसे व्यवहार भी खुलेआम निबाहे जाते हैं जो मानवीय तकाजों के खिलाफ होते हैं।
दरअसल, पितृसत्तात्मक ढांचे का मनोविज्ञान इस कदर गहरे पैठा है कि बहुत सारे लोग सिर्फ इसलिए किसी परंपरा का पालन करते रहते हैं क्योंकि उसके अर्थ और असर के बारे में सोचने का मौका उन्हें नहीं मिलता। खासतौर पर अपने बच्चों के मामले में लोग आमतौर पर वैसे भेदभावपरक व्यवहार बेझिझक निबाहते रहते हैं, जिनमें बेटे को तरजीह जाती है और बेटियों को हाशिये पर छोड़ दिया जाता है। एक औसत भारतीय परिवार बेटे की चाहत पूरी करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। यह अकारण नहीं है कि देश के बहुत सारे हिस्सों में बालकों के मुकाबले बच्चियों और इसी तरह पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों का अनुपात काफी चिंताजनक हद तक गिर गया है। हरियाणा में यह आंकड़ा प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महज सात सौ चौहत्तरस्त्रियों तक पहुंच गया है। इससे तरह-तरह की सामाजिक विसंगतियां पैदा हो रही हैं। हरियाणा में लड़के के विवाह के लिए लड़की ढूंढ़ने में हो रही मुश्किल इसका सिर्फ एक पहलू है। नकुशा नाम रखे जाने का चलन भले महाराष्ट्र के एक हिस्से तक सीमित रहा है, मगर बच्चियों को अवांछित मानने की मानसिकता बहुत व्यापक है। इसलिए बड़ी चुनौती इस मानसिकता को बदलने की है। इसमें सभी सरकारों और सामाजिक संस्थाओं को तत्परता दिखानी चाहिए। महाराष्ट्र को भी देखना होगा कि उसकी पहल महज नाम का बदलाव होकर न रह जाए।
एक वैज्ञानिक जब कुछ अज्ञात की खोज करते किसी पायदान पर चढ़ लेने के पश्चात कुछ और और पाना चाहता है तो कुछ मान्यता के साथ आगे बढ़ता जाता है, और कुछ नवीन अवश्य पा जाता है भले ही वो उसका गंतव्य न हो...
प्रत्युत्तर देंहटाएंकहते हैं ऐसे ही स्पेन से कोलंबस 'भारत' की खोज में पश्चिम दिशा में जल-मार्ग से गया तो अमेरिका की खोज कर पाया, और वेस्ट इंडीज़ में कुछ यहाँ नाखुश तत्कालीन कुली आदि कुछ भारतवासी भी पहुँच गए! और उनकी संतानें त्रिनिडाड, जमैका, आदि, नाइपौल जैसे, अपने पूर्वजों से भौतिक क्षेत्र में उच्चतर स्तर पर पहुँच गए, भले ही वो वर्तमान में भारत से नाखुश हों...
और ऐसे ही पुर्तगाल से वास्को ड गामा पूर्व दिशा में जहाज से चले तो अफ्रीका होते वो 'भारत' में केरल क्षेत्र में पहुँच गए और उस के कारण दोनों देशों के व्यापारियों को लाभ पहुंचा... आदि आदि... और अफ्रीका के कुछ गुलाम यहाँ आ संभवतः भौतिक रूप से खुश हो गए हों...
नई जानकारी।
प्रत्युत्तर देंहटाएंविचारणीय |
बुकमार्क किया |
ये जानकारी सब तक पहुंचनी चाहिए |
....लेकिन हाँ..... जिस तरह नाम रखने के पीछे ये बकवास मानसिकता निंदनीय है उसी तरह नवरात्रि पर होने वाले सम्मान और गृह-लक्ष्मी, अन्नपूर्णा, सरस्वती जैसे नामों और उपाधियों पीछे की मानसिकता सराहनीय है
प्रत्युत्तर देंहटाएंअभी तक पता नहीं था की नकुशा का क्या अर्थ है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंमानसीकता बदले!
आपके सफल ब्लॉग के लिए साधुवाद!
प्रत्युत्तर देंहटाएंहिंदी भाषा-विद एवं साहित्य-साधकों का ब्लॉग में स्वागत है.....
कृपया अपनी राय दर्ज कीजिए.....
टिपण्णी/सदस्यता के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें....
http://pgnaman.blogspot.com
हरियाणवी बोली के साहित्य-साधक अपनी टिपण्णी/सदस्यता के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें....
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आपका यह आलेख हिंदुस्तान में भी पढ़ा. आप इस लेख के माध्यम से जो जनसंदेश दें चाहती थी उसमे आप सफल रही ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंहार्दिक बधाई ....
दैनिक हिंदुस्तान में यह पोस्ट पढ़ आया. काफी मार्मिक प्रसंग उठाया है आपने. यह मनोवृत्ति बदलनी चाहिए.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपसे बतियाने की ख़ुशी काफूर हो गयी. सर्वथा निंदनीय. समाज की सोच को बदलना ही होगा.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपमें जो अतिरिक्त संवेदनशीलता है, जिसके कारण ऐसी ख़बरों को पढ़कर आप सो नहीं पातीं, उसे उन मां-बाप को बांट दीजिए जो अपनी बेटियों का ऐसा नाम रखते हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंनाम बदल कर उन्होनें अपनी अस्मिता का परिचय तो दिया है और इस बात से इनकार किया है कि वे इस दुनिया को नही चाहिये ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंमुझे नही लगता कि इनमें से कोई भी भ्रूण परिक्षण करवा के बेटी को आने से रोक देंगी ।
मां बाप को कोई हक नही रहता इस नकोशी से कुछ भी अपेक्षा रखने का ।
यह तो पहली बार पढ़ा -मगर हम आश्वस्त हो सकते हैं कि बदलाव स्पष्ट दिख रहा है !
प्रत्युत्तर देंहटाएं