Thursday, June 16, 2011

महिलाओं के लिए चौथा सबसे खतरनाक देश भारत!

हम उस देश के वासी हैं......
१. जहाँ स्त्री जीवित जलाई जाती है।
२. जहाँ स्त्री गर्भ में मारी जाती है।
३. जहाँ स्त्रियों की ऑनर किलिंग की जाती है।
४. जहाँ स्त्री पर तेजाब डाला जाता है।
५. जहाँ स्त्री की तस्करी की जाती है।

मेरा भारत महान, इन्डिया शाइनिंग, ऊँची विकास दर और न जाने क्या क्या कहते हम थकते नहीं हैं। किन्तु थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की कानूनी समाचार सेवा ट्रस्ट लॉ ने जो सर्वे करवाया उसके अनुसार महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश हैं...

१. अफगानिस्तान
२. कोन्गो
३. पाकिस्तान
४. भारत
५. सोमालिया

इस सर्वे में घरेलू हिंसा, महिलाओं के प्रति आर्थिक भेदभाव से लेकर एसिड हमलों को आधार बनाया गया है. इस सर्वेक्षण के तहत पांच देशों के 213 जेंडर मामलों के जानकारों से सवाल पूछे गए. इसके तहत उनसे खतरनाक का मतलब, स्वास्थ्य सुविधाओं, यौन हिंसा, हिंसा, सांस्कृतिक या धार्मिक तथ्यों से जुड़े सवाल पूछे गए.


'भारत का चौथा नंबर मुख्य तौर पर कन्या भ्रूण की हत्या और मानव तस्करी के कारण है. 2009 में तात्कालीन गृह सचिव मधुकर गुप्ता ने कहा था कि हर साल 10 करोड़ लोग खासकर महिलाओं और लड़कियों की तस्करी की जाती है. यह बात इतनी आम है लेकिन सरकार और पुलिस के चंगुल से बच जाती है.

भारत के केंद्रीय जांच ब्यूरो सीबीआई का अंदाज है कि 2009 में 90 फीसदी तस्करी देश में ही हुई और देश में करीब 30 लाख यौनकर्मी हैं जिनमें अधिकतर बच्चियां हैं.

यौन कर्मियों के अलावा मजदूरी, जबरन विवाह के मामले भी शामिल हैं. और आंकड़ें कहते हैं कि इस तरह के अवैध काम करने के वालों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई नहीं की जा रही है।'

हम सब जानते हैं कि यह सब हमारे देश में होता है। स्त्री भ्रूण हत्या जैसी नई प्रथा का जन्म हमारे ही देश में हुआ है। प्रायः यह सोचा जाता है कि विज्ञान मनु्ष्य को समझदार बनाता है, रुढ़ियाँ तोड़ता है, लोगों की आँख खोलता है। किन्तु हमारे देश में तो धड़ल्ले से विज्ञान का दुरुपयोग स्त्री भ्रूण हत्या के लिए किया जाता है। पहले स्त्री शिशु हत्या होती थी जिससे परिवार के हाथ खून में रंग जाते थे। किन्तु अब हमने एक साफ सुथरा तरीका ढूँढा है। हस्पताल जाओ, भ्रूण का लिंग पता लगाओ और स्त्री हो तो हत्या वहीं डॉक्टर से करवाओ। न जन्म देने तक उसे झेलो और न जन्म के बाद मारने का लफड़ा।

किन्तु यह मानव तस्करी वाली बात विशेषकर उसके आँकड़ें हजम करने कठिन हैं। यदि ये आँकड़े सही हैं तो कहा जा सकता है कि हर बारह में से एक भारतीय बेचा खरीदा जाता है। क्योंकि यह मुख्यतः स्त्रियों के साथ होता है व स्त्रियों की जनसंख्या यदि ५८.६ करोड़ मानकर चलें तो यह मानना कि उनमें से १० करोड़ या यदि यह भी मान लें कि इसमें से एक करोड़ तस्करी लड़कों की होती होगी तो भी ५८.६ करोड़ स्त्रियों में से ९ करोड़ की तस्करी होती है मानना काफी कठिन है। इसका अर्थ हुआ कि १५.३५ प्रतिशत स्त्रियों की तस्करी होती है। किन्तु यह बात असम्भव सी लगती है। मुझे लगता है यह लाख, करोड़ और मिलियन बिलियन को मिलाकर बोलने के कारण है। अचानक हम मिलियन बिलियन में बात करने लगे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि 2009 में तात्कालीन गृह सचिव मधुकर गुप्ता ने जब कहा था कि हर साल 10 करोड़ (१०० मिलियन ) लोग खासकर महिलाओं और लड़कियों की तस्करी की जाती है तो कहीं वे १०० लाख तो नहीं कह रहे थे। वैसे भारतीय १०० लाख नहीं १ करोड़ सोचता है। 'In 2009, India's Home Secretary Madhukar Gupta had remarked that at least 100 million people were involved in human trafficking in India, according to the survey.' कहीं ऐसा तो नहीं है कि १ करोड़ लोग बेचे खरीदे नहीं जाते बल्कि कुल मिलाकर १ करोड़ लोग बिकते, बेचते खरीदते हैं व इस धंधे से जुड़े हैं।

जो भी हो, यदि ये आँकड़े कुछ गलत भी हों, तो भी दस बीस प्रतिशत कम करके भी कहें तो भी इन आँकड़ों व संसार में स्त्रियों के लिए इतनी खतरनाक जगह होने के लिए हमें लज्जा तो आनी ही चाहिए साथ साथ 'यत्र नारी पूजयन्ते' वाली सुभाषित को भी बदल 'जहाँ नारी गर्भ में ही मारी जाती हो' जैसी कोई नई सुभाषित रचनी चाहिए। साथ साथ अपने जीवित होने व बेचे खरीदे न जाने को भी अपना सौभाग्य मानना चाहिए।

घुघूती बासूती

35 comments:

  1. आंकणों में कमी बेशी हो सकती है परंतु निष्कर्ष एक नज़र देखने पर ठीक ही दिखते हैं। शर्मिन्दा हूँ, पर आश्चर्यचकित नहीं। इतनी विकराल समस्या को किस प्रकार हल किया जाये, जनान्दोलन, शिक्षा, विधि-विधान, किसका कैसा प्रयोग किया जाये, इस पर गहन चिंतन हो और हल को जन-सहयोग से पर पूरी कडाई से लागू किया जाये।

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  2. (१) देश की उम्र में साल १९४७ नहीं आया होता तो हम तीसरे नंबर पर होते !
    (२) वैसे जो सत्य हर दिन नंगी आँखों से दिखता हो उसके लिए आंकड़ों की ज़रूरत भी क्या है !
    (३) मैंने आपसे पहले भी कहा है कि २०५० के आस पास स्थितियां इसके उलट होने लग जायेंगी तब तक अंडर करेंट को महसूस करिये और उसके साथ बने रहने का यत्न कीजिये !

    शुभकामनायें !

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  3. आँकड़ों में गड़बड़ है। लेकिन फिर भी स्थिति वाकई बहुत बुरी है। हमारी पुलिस कभी भी अपराधों को रोकने के उद्देश्य से काम नहीं करती, वह केवल शिकायतें निपटाती है। उसे इस लायक कभी बनाया ही नहीं गया, कोशिश भी नहीं की गई।

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  4. स्थिति खतरनाक तो है लेकिन मैं कभी भी ऐसे आंकडों पर विश्वास नहीं करता। बात महिलाओं के लिये खतरनाक देश की है। कहां खतरनाक है भारत महिलाओं के लिये? एक भारतवासी महिला होने के नाते आप बताइये। किसी विदेशी ने जो बोल दिया, क्या वो पत्थर की लकीर हो गई?

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  5. दुर्भाग्यपूर्ण है, जनसंख्या अधिक होने के कारण आंकड़े बड़े लग रहे हैं।

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  6. leejiyae
    neeraj jat ji ko yae sthitii samanya lag rahee haen aur gavaah bhi aap ko hi banaa rahey haen

    aur pandey ji ko aakdae jansakhyaa kaa dosh lag rahey haen


    ek baat haen mam

    as of now its becoming difficult to find a paid domestic help to do house cleaning and household jobs

    jaldi hi "biwi " ek rare comodity hogii

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  7. स्थिति बहुत भयावह है. बात यह है कि हम लोग दोहरे-तिहरे और न जाने कितने हरे स्टैंडर्ड वाले लोग हैं. अपनी बहन के प्रेमी को गोली से उड़ाने वाले और दूसरे की बहन को छेड़ने वाले, बदतमीजी करने वाले और दोनों ही स्थितिओं के लिये ढ़ेरों कुतर्क हमारे पास हैं.

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  8. आंकड़ो पर यकीन हो न हो लेकिन आकलन दुरूस्त है। प्रत्यक्ष दिखता है कि स्थिति भयावह है। सुबह अखबार पढ़ो तो अखबार चीखता है, बाहर निकलो तो निगाहें चीखती हैं। बैठो, बतकही करो, लोगों की बातें सुनो तो मानसिकता झलकती है। हालात को जान-बूझ कर भी शर्मिंदगी महसूस न करना शर्मनाक है।

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  9. आंकड़ों का प्रतिशत कम ज्‍यादा हो सकता है लेकिन जिस देश में एक भी महिला के साथ अपराध भाव हो तब भी दुखद है। यत्र पूजयन्‍ते वाले सूत्र भी तभी बनते हैं जब इस देश को आवश्‍यकता होती है। अर्थात यह खराब स्थिति आदिकाल से ही है। इसी कारण हमारे महर्षि समाज को सुधारने के लिए ऐसे सूत्रों की रचना करते हैं, जिससे समाज कुछ सुधर जाए। लेकिन यह समाज सुधरता ही नहीं है। दुख तो तब होता है जब पढा-लिखा तबका भी कन्‍या भ्रूण हत्‍या जैसा पाप करता है।

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  10. आंकड़े भरोसेमंद नहीं हैं , स्थति भी बहुत अच्छी तो नहीं

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  11. पश्चिम से आने वाले आंकड़े अविश्श्नीय ही नहीं बल्कि देश को ग्लोबल मार्केट में बदनाम करने की साजिश भी है यद्यपि अपराध किसी भी किस्म का हो, होना ही नहीं चाहिए.

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  12. मै नहीं मानती इन सारे आकड़ो को सब झूठ है ये सब हमारे देश की महान , महानतम सभ्यता, संस्कृति,परंपरा रीती रिवाज आदि आदि को बदनाम करने के लिए कुछ आधुनिक और पश्चिमी सभ्यता वाले लोग की चाल है हमारे देश में तो नारी को पूजा जाता है हम नारी के देवी मानते है उन्हें लक्ष्मी मानते है और लक्ष्मी को कभी अपने घर से बाहर नहीं जाने दिया जाता है उस पर दुसरे बुरी नजर डाल सकते है जो हमारे घर की इज्जत के लिए ठीक नहीं है , कभी कभी पूजा करते समय घर में लक्ष्मी न देने वाली देवी के कपड़ो में आग लगा जाये तो उसे आप दहेज़ हत्या का नाम न दे | और कन्या भ्रूण हत्या जैसी कोई चीज नहीं होती है ये सब प्राकृतिक होता है आज कल प्रकृति ही लड़कियों को कम जन्म दे रही है तो इसमे समाज का क्या दोष है या मान भी लिया की कुछ लड़किया मर रही है तो आप को बता दू की हम जिस देश में रहते है वहा काफी पुरानी परम्परा है लड़कियों द्वारा बलिदान देने की यदि लड़किया अपने परिवार के भले के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे रही है तो उसे सम्मान की नजर से देखना चाहिए न की पाप की नजर से | हम सभी भारतीयों को अपने देश के सम्मान के लिए आगे आना चाहिए और इस तरह के सभी पश्चिम द्वारा चलिए जा रहे दुष्प्रचारो का विरोध करना चाहिए जितना ऊँचा स्थान हमारे देश में नारी का है और विश्व में कही नहीं है ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला........ ..........................

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  13. .
    .
    .
    अजी ऐसा कुछ नहीं है... हम आंचल और पायल के देश हैं... नवरात्र में कन्या पूजन करते हैं और विवाह के समय पात्र वर को कन्यादान भी... नारी तो गृहलक्ष्मी है हमारी... यह सब विदेशियों की चाल है...ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला ब्ला....................(यह ब्ला ब्ला अंशुमाला जी से साभार लिया गया )




    ...

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  14. महिलाओं की स्थिति खराब है इसमें कोई शक नहीं, मगर आँकड़े सही नहीं लग रहे.

    शेष तो शायद ही कोई कन्या हो जो भेदभाव से बच जाती हो...

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  15. Strre bhrun hatya ko leke sthiti bahut kharab hai,lekin taskaree ko leke itni buree maloom nahee hotee!Haan! Dahez bhee ek chinta ka vishay hai.

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  16. सही आंकड़े तो रेड लाइट एरिया में जाने वाले बता सकते है जहा पर सेवा करने के लिए छोटी छोटी कन्याये (हिन्दुस्तानी,बंगलादेशी या नेपाली) उपलब्ध होती है.

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  17. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी है!

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  18. प्रत्यक्ष दिखता है कि स्थिति भयावह है।

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  19. ये देश हैं वीर जवानों का
    अलबेलो का मस्तानो का
    इस देश का यारो क्या कहना
    यहाँ मरती हैं बस
    बहू , बेटी और बहना

    जब देश ही वीर जवानों का हैं तो बाकी कहने को क्या रह जाता हैं !!!
    रह गयी बात आकड़ो की तो १ , १०० , १००० , १०००० महज गिनती हैं ,

    हां इस का जिम्मेदार समाज हैं जिसमे नारी और पुरुष दोनों है

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  20. देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान............. हालत आज भी वही हैं जो वर्षों पहले थे, आंकड़े होते ही भयावह हैं,
    विचारणीय पोस्ट हेतु आभार..............

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  21. आंकड़े इस से कम भी होते, हमारे देश का स्थान बीसवां भी होता ...फिर भी...शर्मनाक ही होती ये स्थिति...
    अभी बहुत वक़्त लगेगा सुधार में...हमारा देश सिर्फ महानगरों और शहरों से ही नहीं बना....जब तक सुदूर गाँव की महिलाओं की स्थिति में बदलाव नहीं आ जाता...हमारे सर शर्म से झुके ही रहेंगे.

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  22. आंकड़े भले ही कम ज्यादा हों ..पर समस्या तो है ..हांलांकि आज लोंग बेटी होने पर भी खुश होते हैं पर ऐसे लोगों का प्रतिशत बहुत कम है ..

    साथ साथ अपने जीवित होने व बेचे खरीदे न जाने को भी अपना सौभाग्य मानना चाहिए।.. हर परिवार में ऐसी स्थिति नहीं है ..

    इस कमी को दूर करने के लिए शिक्षा का प्रचार प्रसार ज़रूरी है ..

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  23. नारी की दुर्दशा का केवल रोना रो कर काम नहीं चलेगा | बदलाव की कोशिश करनी होगी | बदलाव आयेगा नारी को आत्म निर्भर बनाने पर - आर्थिक, शारीरिक, मानसिक रूप से | इन तीनों रूप से आत्म निर्भर होने पर स्वतः ही नारी सामाजिक रूप से आत्म निर्भर हो जायेगी |

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  24. इक्‍कीसवीं सदी में सफर करते हुए हमने दो उपलब्धियां हासिल कर ली हैं। पहले भ्रष्‍ट देशों की टॉप लिस्‍ट में शुमारी और फिर अब यह लिस्‍ट। जहां तक कन्‍या भ्रूण हत्‍या का सवाल है, यह समस्‍या मुख्‍यत: दो कारणों की वजह से है, हमारी पुरातन सामाजिक मान्‍यता के अनुसार बेटा ही वंशबेल को आगे बढ़ाता है। दूसरा कारण है दहेज प्रथा जिसकी महिमा से आज एक एक शादी में लाखों रुपये व्‍यय किये जा रहे हैं। अब तो न जाने कितना लेन देन शादियों में गुप्‍त रूप से किया जाने लगा है।

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  25. जो मनुष्य को मनुष्य की तरह देख सकते हैं और सूचना को देशी विदेशी कह कर नहीं बोँटते, उनके लिए नीचे की लिंक-

    http://www.boingboing.net/2011/06/18/richard-dawkins-sex.html

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  26. 'मैं' हिन्दू 'ब्राह्मण परिवार' में जन्म लेने के नाते, किसी उम्र में पहुँच पढ़ कर कि 'ब्राह्मण वो है जो ब्रह्म को जाने', हिन्दू मान्यता के विषय में जानना आवश्यक समझा...

    और इस खोज से 'मैंने' पाया कि भारत में कहीं भी 'माया' शब्द का प्रयोग अक्सर सुनने को मिलता था, और 'क्षीर-सागर' / 'सागर' मंथन की कहानी भी बहुत प्रचलित है, जिसमें (सांकेतिक भाषा में) हमारे सौर मंडल की अमरत्व प्राप्ति को चार चरणों में दर्शाया गया है - दोनों 'राक्षशों' (स्वार्थी) और 'देवताओं' (परोपकारी) के मिले जुले प्रयास से, बृहस्पति की देखरेख में जो हमारे सौर मंडल का एक सदस्य ग्रह है (और हिन्दू-मान्यता अथवा 'सनातन धर्म' के अनुसार चार युग भी दर्शाए जाते आ रहे हैं)... किन्तु काल-चक्र को अमरत्व प्राप्ति के चरम स्तर से, यानि सतयुग से उल्टा कलियुग की ओर चलते दर्शाया गया है, वो भी एक बार नहीं अपितु १०८० बार ब्रह्मा के एक दिन में जो चार अरब वर्ष से अधिक माना गया, और आज हमारी पृथ्वी/ सौर-मंडल की आयु साढ़े चार अरब आंकी गयी है ! अर्थात वर्तमान यदि कलियुग अथवा 'घोर कलियुग' माना जाये (जब मानव छोटा हो जाता है, और आज चार वर्षीय शिशु भी वो कर रहे हैं जो 'हमारे समय' में २० वर्षीय करते थे) तो शायद अनुमान लगाया जा सकता है की 'हमें' आज वो दृश्य देखने को मिल रहा है जो सागर-मंथन के आरंभिक काल में था! यानि तब तक स्त्री को उसका उच्चतम स्थान प्राप्त नहीं हुआ था - जो उसने सतयुग के अंत में देवताओं के अमरत्व मिलने के पश्चात पाया... वैसे हिन्दू-मान्यतानुसार कलियुग की एक यही अच्छाई मानी है की यह सतयुग को फिर से सही समय आने पर लौटा लाता है :)

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  27. थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की कानूनी समाचार सेवा ट्रस्ट लॉ ने जो सर्वे करवाया उसके अनुसार महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश हैं...

    १. अफगानिस्तान
    २. कोन्गो
    ३. पाकिस्तान
    ४. भारत
    ५. सोमालिया

    - फिलहाल उत्तर प्रदेश में जिस तेजी से महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं वही रफ़्तार रही तो हम पहले स्थान पर आ जायेंगे | वैसे यह जान कर आत्मग्लानि हुई कि हम टॉप -५ में हैं |

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  28. यकीन नही हो रहा इन आंकड़ों पर.स्थिति इतनी भयावह नही जितनी बताई जा रही है.हमारे यहाँ आज भी लडकियां,औरते रात को आ जा सकती है.चैन खींचने जैसी वारदाते होने का डर जरूर रहता है बाकी लडकिया या औरते इतनी सीधी साड़ी भोली भाली भी नही रही कि उनके साथ किसी तरह का 'अन्याय' हो और वो चुप रहे.
    इतनी ज्यादा संख्या में लोग गम तो नही होते न्?फिर बिना परिवार की सहमती के इतने मेल्स,फीमेल्स का बेचा जाना ....हजम नही होता कुछ.हाँ एक भी व्यक्ति खरीदा या बेचा जाता है,अन्याय का शिकार होता है तो यह किसी भी देश के लिए शर्मनाक बात है.

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  29. dear ghughuti ji chinta ka vishya he.aap janti he pur bharat me kaha sabse jyada ladkiya garbh me maari jati he? Rajasthan me. Betiya parivar ki prathistha jyada hoti he aur ek insaan kam. kam se kam rajasthan me ye hi theory kaam karti he.

    post achhi lagi.

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  30. खराब तो है मगर ऐसी...हम्म!! अफसोसजनक!!!

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  31. aapka lekh padh kar vastav me bahut bahut hiachha laga .ham nariyon ki dasha ka sateek chitran kiya hai aapne .aapka sampurn lekh bahut hi sashakt v prabhav-shali hai.
    aapke vivichar jankar man me bahut hi achha laga.kash!aapki tarah sabhi log sochte to kam se kam is bhayavah sthiti me kuchh to kami aa sakti .
    bahut bahut badhai
    poonam

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  32. क़ानून के बाबजूद इसे धत्ता बताते यह आंकड़े शासन के लिए ही नहीं बल्कि हम सभी के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं!

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  33. आपके जन्म दिन की बधाई के लिए पाबला जी ने पोस्ट भेजी थी। अतः आपके ब्लॉग पर गया और दो पुरानी पोस्ट पढ़ीं। एक, और नहीं बस और नहीं तथा महिलाओं की तस्करी में भारत चौथे स्थान पर।

    भारत कई मामले में एक नंबर पर है परंतु उसका ज़िक्र नहीं किया जाता या हम नकारात्मक बातों को ही उछालते हैं। नकारात्मक बातों को उछालकर व्यक्ति दूसरों को कठघरे में खड़ा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता है। होना यह चाहिए कि हर व्यक्ति जिसके सामने ऐसी कोई घटना सामने आए उसके विरोध में कुछ कार्रवाई करे। मूक दर्शक बन कर उसमें आहुति न डाले।

    नारी समाज का आधार है जिसके बिना समाज अधूरा है। उसी प्रकार पुरुष के बिना नारी अधूरी है। टकराव शाश्वत है। इसे टाला नहीं जा सकता है परंतु कम किया जा सकता है। समाज में समरसता और सौहार्द्र बनाए रने का प्रयास ही किया जाए उसे विघटित करने का बीज न बोया जाए।

    आज दहेज़ और धन लोलुपों ने विवाह जैसी पवित्र संस्था को कलुषित कर दिया है। पढ़ा-लिखा, संभ्रांत और शिष्ट कहलाने और दिखने वाले युवक शादी के समय चुपी साधकर पिता द्वारा दहेज़ का माँग में सहयोग करते हैं। यदि पिता दहेज़ विरोधी है तो दहेज़ नहीं लेगा और पुत्र उसका खुलकर विरोध भी नहीं करेगा परंतु पत्नी के साथ दुर्वयवहार करेगा। इस प्रलृत्ति से लड़ने की आवश्यकता है।

    हमारे यहाँ नारी व्यापार ग़रीबी और अशिक्षा का परिणाम है। बाकी जगह कोई और कारण हो सकता है। अतः इन दोनों के उन्मूलन में कोई योगदान किया जा सके तो वही श्रेयस्कर होगा।

    आप अच्छा लिखती हैं। बधाई।

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  34. भारतमें तो थोडा अच्छा है . कई गल्फ और अफ़्रीकां मुल्क पे तो और ख़राब है . इसलिए भारत चौथा नहीं बल्कि बहुत निचे होना चाहिए . (टुटा-फूटा ब्याकरण पे क्षमा-प्रार्थी )

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  35. apni bahu,betiyo maa ki izzat to bhatrt me sabhi karte hai, par jab ghar se bahar jate hai to ye bhul jate hai ki jise wo pareshan kar rahe hai ya comments pass kar rahe hai wo bhi to kisi ki behan , beti hogi jo cheej hame apne liye pasand nahi wo hum oro ke sath kyo karte hai ./.?????

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