Wednesday, May 05, 2010

क्या आपने कभी सुना है.........घुघूती बासूती

क्या आपने कभी सुना है कि किसी माता पिता ने अपनी प्रतिष्ठा/सम्मान के लिए अपने......
१. गंजेड़ी, नशेड़ी पुत्र की हत्या कर दी?
२.बलात्कारी पुत्र की हत्या कर दी?
३.देशद्रोही पुत्र की हत्या कर दी?
४.आतंकवादी पुत्र की हत्या कर दी?
५.हत्यारे पुत्र की हत्या कर दी?
६.घूसखोर पुत्र की हत्या कर दी?
७.बेईमान पुत्र की हत्या कर दी?
८. चोर,डाकू, जेबकतरे,अपहरणकर्ता पुत्र की हत्या कर दी?

और भी बहुत से अनैतिक कृत्य होंगे जिन्हें आप यहाँ जोड़ सकते हैं। परन्तु शायद 'मदर इन्डिया' के बाद ऐसा नहीं हुआ या दिखाया गया।

यदि माता पिता अपना सुख चैन गंवाकर, अपना पेट काटकर और भी न जाने क्या क्या करके बच्चों को बड़ा करते हैं और बच्चों का जीवन इस उपकार का बन्धक होता है तो यह उपकार तो और भी बड़ी मात्रा में पुत्र पर भी किया जाता है तो इसी अधिकार से वे पुत्र की हत्या क्यों नहीं करते? क्या इसमें भी हानि लाभ का गणित आड़े आता है? क्या हिसाब लगाया जाता है कि पुत्र कितना कमाकर देगा या मुखाग्नि देकर स्वर्ग का टिकट कटवाएगा? मातृत्व व पितृत्व भी यदि गणित में जकड़ा है तो फिर इस रिश्ते में ऐसी विशेषता रह ही क्या गई? क्यों इसकी पवित्रता का ढोल पीटा जाता है? क्यों नहीं हम यह मान लेते कि हम अपने सुख के लिए माता पिता बने ? क्या माता या पिता बनना अपने आप में काफी नहीं है? क्या उसके लिए हम कोई मूल्य चाहते हैं? यह नहीं भूला जा सकता कि चयन या विकल्प का अधिकार केवल माता पिता के पास है, संतान के पास नहीं। सो माता पिता बनना हमारी पसन्द थी, संतान बनना संतान की नहीं।
दोनों प्रश्नों के उत्तर चाहिए।

घुघूती बासूती

38 comments:

  1. Mujhe hamesha yahi laga ki,na to maa ko devi ka roop dena chahiye na pita ko bhagwanka..insaan hain,insaan hi rah jayen to bahut hai...
    Bachhonki sahi parwarish karen..sabse pahle ek achha insaan banneki shiksha den...jo apne swarth se pahle desh hit kee soche... Afsos ke yah shiksha hamare parivaron me nahi dee jati...bachhon ki pahchan unke mazhabse hone lag jati hai..Ek geet yaad aa raha hai" Tu hindu banega,na musalmaan banega,Insaan kee aulad hai insaan banega"..
    Mera ek aalekh hai,jise Gujratme hue qaumi fasadon ke baad likha tha<" Pyarki raah dikha duniyako.."kabhi fursat ho to zaroor padhen:
    http://shamasansmaran.blogspot.com
    http://lalitlekh.blogspot.com
    Kshamaprarthi hun,ki,Roman hindi me comment likha hai..

    ReplyDelete
  2. ओनर किलिंग हमारे समाज की पुरानी गलत मान्यताओं पर आधारित हैं। जो लोग समय के साथ बदल नहीं पाते वही ऐसा सोच भी सकते हैं। फिर लड़की को हमेशा समाज में लड़कों से कम ही रखा गया है । लेकिन इन धारणाओं को बदलना आवश्यक है।

    ReplyDelete
  3. "गुरु बिन ज्ञान गंगा बिन तीरथ ,पुत्र बिना परिवार नहीं है "
    बचपन में दादी के भजन की पंक्तियों पर किया गया मेरा विद्रोह आज तक जारी है , तब भी कहती थी "पुत्री बिना संसार नहीं है "
    शायद ये लड़ाई हर लड़की लडती है पर ...उम्र के साथ साथ वो भी उसी धारा में बहने लगती है

    ReplyDelete
  4. ये वो माता पिता बताएं जो पुत्र और पुत्र में भेद करते हैं -मोका जाने नाका !

    ReplyDelete
  5. shama ji,daral ji aur sonak\l ji sabki baat sahi hai aur yahi hamari kamjori hai jisse ubarna hoga hamein aur ek swasth samaj ke nirman ki neenv rakhni hogi..........aaj ek post lagayi hai 'nari ya bhogya'aur shayad kahin na kahin usmein bhi yahi kaha gaya hai magar us pa rbahas chhid gayi hai magar koi bhi manne ko taiyaar nahi haiki mansikta ke badalne se har samasya ka hal nikal sakta hai jo sanskar ghutti mein ghot kar pilaye gaye hain unhein badlane mein waqt beshak lagega magar uske liye hamein koshish to karni hi padegi na aawaz to uthani hi padegi tabhi badlaav aayega aur aise hi prashn aaj aapne uthaye hain magar kahin jawab nahi milega jab tak mansikata nahi badlegi......manti hun kafi kuch badla hai magar abhi bahut kam pratishat mein badlaav aaya hai hamein ise 100% karna hai.

    ReplyDelete
  6. कुछ नरपिचाश ऐसे भी होते हैं
    प्रश्न और भी हैं
    ऐसे में जबकि इस तरह के कृत्य से सारा जग दुखी होता है उस माता-पिता की मन:स्थिति क्या होती होगी?

    ReplyDelete
  7. bilkul sahii likha haen mam

    ReplyDelete
  8. बहुत सही प्रश्न उठा दिया है....सच ही किसी ने अपने पुत्र को नहीं मारा होगा जिसने ऐसा कोई कृत्य किया होगा...मदर इण्डिया में दिखाया गया तो वाह भी केवल चल चित्र में ही ऐसा वास्तव पिक्चर में भी दिखाया था पर उसमें भावना पुत्र को अधिक पीड़ा से बचाने की थी...
    पुत्र और पुत्री के प्रति सोच को बदलना होगा....जब परवरिश एक सी करते हैं तो एक सा ही संरक्षण भी देना चाहिए...

    ReplyDelete
  9. अर्विंद जी की टिपण्णी से सहमत है जी

    ReplyDelete
  10. आपके इस लेख से मुझे अपने पिताजी की कही हुयी बात याद आ गयी. वे अक्सर कहा करते थे कि ’हमारे समाज में लोग बच्चों को बँधुआ मजदूर समझते हैं. अपनी सारी न पूरी हुयी इच्छायें उन पर थोपना चाहते हैं, उन्हें पालने-पोसने के बदले उन्हें अपने इशारों पर चलाना चाहते हैं’
    लेकिन ये बात लड़कों के सम्बन्ध में कम और लड़कियों के सम्बन्ध में ज्यादा होती है. माँ-बाप हमेशा लड़कियों को इमोशनली ब्लैकमेल करते हैं, जबकि इसके विपरीत लड़कों से खुद ब्लैकमेल होते हैं.

    ReplyDelete
  11. बोझ बने बेटी जहाँ बेटा हो वरदान।
    वह समाज तो नर्क है खोजें सभी निदान।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

    ReplyDelete
  12. मुक्ति जी ने सही लिखा है..
    एक लड़की किन हालातों में गर्भ धारण करती है? निश्चित रूप से उसे उसके प्रेमी ने भी उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया.इसके लिये उसका प्रेमी (?) प्रियभांशु समान रूप से जिम्मेदार है जो अब घड़ियाली आंसू बहा रहा है...

    ReplyDelete
  13. मोह इसी का नाम है । अपनों के दोष औरों के गुणों से अच्छे लगते हैं ।

    ReplyDelete
  14. बिल्कुल सही लिखा है आपने.
    अपनी कमजोरी और गलतियों से हमें खुद हीं उबरना होगा।

    ReplyDelete
  15. कम ही होता है ऐसा

    प्रश्न यह है की जब आधी आबादी महिलाओं की है तो भी इस तरह की घटनाएँ क्यों होती हैं .

    कल ही समाचार पढ़ा था - दहेज प्रताड़ना से तंग आकर पति ने की आत्महत्या . पत्नी और ससुर को सजा. ऐसा भी होता है

    ReplyDelete
  16. सोचने पर मजबूर करती... बहत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट .....

    --
    www.lekhnee.blogspot.com


    Regards...


    Mahfooz..

    ReplyDelete
  17. पता नहीं कितनी बार ऐसे सवाल सर उठाते हैं....और एक सहम सी व्याप्त जाती है...जबाब सोचकर

    ReplyDelete
  18. Crazy !!

    My offspring is here because :

    - I (we) wanted her here.
    - Its a natural consequence .. social .... or biological... or whatever ...
    - I (we) simply couldn't help it.

    But in no way is she here because she desired so ....

    In so far as your other question goes, I wish someone had an answer to it.

    Great post !!

    ReplyDelete
  19. व्यक्तिगत संपत्ति सब झगड़ों की मूल है। क्यों न उसे समाप्त कर दिया जाए। पुरूष प्रधानता स्वयमेव समाप्त हो जाएगी।

    ReplyDelete
  20. sahi kaha hai aapne.jab tak ladki ke youn acharan ko apni izzat se jodkar dekhte rahenge aise apradh hote rahenge.

    ReplyDelete
  21. निरुपमा पाठक की अगर ह्त्या उसके परिवारजन ने की है, तो ये माफी के लायक अपराध नहीं है. उन्हें ज़रूर कड़े से कडा दंड मिलना चाहिए. पर ये मामला यही ख़त्म नहीं होता. स्त्री के प्रति जो दकियानूसी सोच है, वों समाज मैं बहुत व्यापक है, और वों बदलेगी तभी, जब समाज में व्यापक हलचले हो. सामूहिक चेतना में बड़े बदलाव आयें. इस तरह की स्थिति बने की स्त्री एक सम्पूर्ण मानव का दर्ज़ा पाए, और बिना पुरुष के भी एक माँ की , एक अभिभावक का सम्मान पाए. स्त्री का अविवाहित माँ बनना एक दुर्घटना हो न हो, और अगर बन भी जाय तो अपमान का सबब न हो. स्त्री के पास सिर्फ आत्महत्या, गर्भपात, और प्रायोजित शादियों से बेहतर विकल्प हो. उसी तरह विवाहित स्त्री का माँ बनना या न बनना भी सामाजिक दबाव का परिणाम न हो. माँ और बच्चे का जो सम्बन्ध है वों सिर्फ उनकी अपनी भावना से ही तय हो, और वों उनके जीवन सबसे बड़ा उत्सव हो.

    ReplyDelete
  22. जाने कौन सा पागलपन है..क्या कहें..

    बहुत सार्थक पोस्ट!१

    ReplyDelete
  23. आपकी बातों से सहमत।

    ReplyDelete
  24. @घुघूती बासूती जी , मुक्ति जी

    चलिए अच्छा ही है कम से कम आप लोगों को महिला अपराधिकरण का नया मुद्दा मिल गया । महिलाओं को लेकर आप लोगों की कलम मात्र एक तरफ ही चलते दिखती है , मैंने देखा महिलाओं को गर्मी की दोपहरी में कपड़े के नाम पर उनके शरीर पर मात्र वही भाग ढका था जो नहीं दिखना चाहिए , शरीर का उपरी भाग पूरी तरह से खुला था , आप उन महिलाओं के लिए कुछ नहीं करती , आप को पता होना चाहिए कि नेट पर आप जैसी प्रभुत्व महिलाऐं ही हैं, इससे बाहर आईये और करिए कुछ जमीनि स्तर पर जिससे नारी विकास हो सके और वह स्वावलंबन बन सके तभी वह अपने अधिकारों के प्रती सजग हो सकती है ।

    ReplyDelete
  25. स्‍वप्नदर्शी की बातों से सहमति।

    प्रश्‍न केवल एक जोड़ी मॉं बाप को उनके कुकृत्‍य की सजा देने भर का नहीं है... मामला उन संरचनाओं की पहचान का भी है जिनसे ये मॉं बाप तैयार होते हैं तथा इतना दुस्‍साहस पाते हैं कि वे अपनी संतान को मुकम्‍मल इंसान मान ही नहीं पाते सदैव मातहत रूप में ही देखते हैं। सामान्‍यत: धर्म, जाति तथा परिवार की संरचनाऍं इसके लिए उत्‍तरदायी हैं (कभी कभी राज्‍य/कानून भी इनसे आ गठजोड़ करता है) और इतना तय है कि ये केवल पीढ़ी के अंतराल का मसला नहीं है... घुघुतीजी की आधुनिकता तथा ऊपर इन युवा दोस्‍त मिथिलेश की सामंतीयता सुस्‍पष्‍ट है ही।

    ReplyDelete
  26. अरे, ये पोस्ट तो अखाडा बन गयी।
    मुझे इसमें नहीं कूदना चाहिये था।

    ReplyDelete
  27. एक तरफ़ा पोस्ट है घुघूती जी यह , मैं नेट से ही उठाकर ऐसी बीसियों खबर यहाँ कट-पेस्ट कर सकता हूँ जहां बाप ने बेटे का इन सब वजहों से क़त्ल किया हो ! बात क़त्ल की नहीं, बात है तराजू के दोनों पडलों को समान नजरिये से देखने की! माँ-बाप निसंदेह दोषी है इस जघन्य अपराध के , मगर क्या निरुपमा ने कम जघन्य अपराध किया ? मरने वाला तो बेचारा हो गया मगर जो अब जीते जी बेवजह नरक झेलेंगे, उनका ? ( हिन्दुस्तानी समाज के नजरिये से, पाश्चात्य नजरिये से मत देखिये वहाँ पहुँचने मैंने अभी १०० साल लगेंगे ) मेरी बातों को आप गलत न लें, मेरा सिर्फ कहने का आशय यह है कि औलाद का भी कुछ फर्ज बनता है, जो उसे जहां तक संभव हो, निभाना चाहिए, और जो निरुपमा ने नहीं निभाया ( अभी तक के तथ्यों का अध्ययन करने पर ) ! बुरा भला ही कहना है तो उस स्वार्थी और कायर प्रेमी को कहिये जिसने अपनी हदे तो पार कर दी मगर शादी के लिए खुलकर सामने नहीं आया !

    अंत में यही कहूंगा कि निरुपमा के माँ-बाप भी ब्लोगर थे , उन्होंने निरुपमा नाम का एक लेख लिखा था, मगर प्रकाशित करने से पहले जब उन्होंने उसे पढ़ा तो वह लेख उन्हें जचा नहीं और उन्होंने उस कागज़ को ही फाड़ डाला, बस ! ( कितना आसान लगता है न यह सब लिखना ) ...... खैर !!

    ReplyDelete
  28. एकदम सही सवाल उठाए हैं आपने.

    ReplyDelete
  29. @घुघूती बासूती जी , मुक्ति जी

    एक तरफ़ा पोस्ट है

    Mithilesh dubey से काफ़ी हद तक सहमत

    ReplyDelete
  30. एक आध घटनाएं पूरे समाज का प्रतिनिधित्त्व नहीं करती. अगर आप इसे किसी कारण बेटी (भ्रूण हत्या के अलावा) को मार देने से जोड़ कर देख रही है तो मैं सहमत नहीं हूँ. माँ-बाप अपनी संतान (बहू को मार देना आवश्य होता है) को नहीं मार सकते. बेटी हो या बेटा. वरना गलत रास्ते पर चले बेटे से सम्बन्ध तोड़ने से लेकर कानून के हवाले करने तक के उदाहरण देखे है.

    ReplyDelete
  31. क्या आपने कभी सुना है कि किसी माता पिता ने अपनी प्रतिष्ठा/सम्मान के लिए अपने......


    १. गंजेड़ी, नशेड़ी पुत्र की हत्या कर दी?

    २.बलात्कारी पुत्र की हत्या कर दी?

    ३.देशद्रोही पुत्र की हत्या कर दी?

    ४.आतंकवादी पुत्र की हत्या कर दी?

    ५.हत्यारे पुत्र की हत्या कर दी?
    ६.घूसखोर पुत्र की हत्या कर दी?

    ७.बेईमान पुत्र की हत्या कर दी?

    ८. चोर,डाकू, जेबकतरे,अपहरणकर्ता पुत्र की हत्या कर दी?

    बार-बार पुत्र शब्द की ही पुनरावर्ती क्यों ? "पुत्र " को ही सारे अलंकरणों से क्यों नवाजा गया है ? जबकि

    आज जीवन के हर क्षेत्र में महिलाएं ( पुत्री ) भी पुरुषों के कदम से कदम मिला कर चल रही हैं ?????????क्षणिक आवेश में आकर माँ ने बिरजू की हत्या कर दी क्योंकि माँ को आवेश में लाने वाला बिरजू एक पुत्र था यदि पुत्री होती तो भी हत्या निश्चित थी. क्योंकि आवेश के क्षणों में इन्सान विवेक शून्य होता है ओर ऐसे में किसी भी प्रकार का भेद कर पाना बहुत कठिन होता है या संभव नहीं है ..........

    ReplyDelete
  32. चयन या विकल्प का अधिकार केवल माता पिता के पास है, संतान के पास नहीं। सो माता पिता बनना हमारी पसन्द थी, संतान बनना संतान की नहीं।

    sarthak lekh

    ReplyDelete
  33. सवाल तो बहुत उठते हैं, लेकिन हल???

    ReplyDelete
  34. इस सन्दर्भ मे एक युवा का जलता हुआ सवाल याद आता है .." क्या हमने अर्जी दी थी अपने पैदा होने के लिये ? "

    ReplyDelete
  35. लेखिका कि मनोदशा स्पष्ट झलकती है,
    स्त्री स्त्री के नाम का हवाला देते हुए आरोप से इतर वास्तविकता से कोसो दूर का आरोप है जिस से ना ही सहमति हुआ जा सकता है और ना ही स्वीकार जा सकता है, अगर अपनी व्यक्तिगत अनुभव को लेखिका ने साझा किया तो हम इसे स्वीकार करते हैं

    ReplyDelete
  36. हमने एक शैतान बेटे को कहते सुना है "पैदा किया है तो भुगतो"

    ReplyDelete
  37. कारण कि हम आज भी पशुवत समाज में रह रहे हैं और पुरुषों में पशुबल अधिक होता है..

    ReplyDelete