गुरुवार, जुलाई 02, 2009

गेहूँ और घुन दोनों ही बच गए।

भारतीय संविधान की धारा ३७७, समलैंगिककता और स्त्री /पुरुष कल्याण

आज दिल्ली उच्च न्यायालय ने संविधान की धारा ३७७ से समलैंगिकों को मुक्त करके न केवल समलैंगिक पुरुष व स्त्रियों पर उपकार किया है अपितु सामान्य जनता पर भी उपकार किया है। यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तरह से जीवन जीने का अधिकार है, नहीं है तो होना चाहिए किन्तु यह उससे भी बड़ा सच है कि जब वह व्यक्ति छिपे दबे तरीके से अपनी तरह से जीवन जीने के लिए, समाज में स्वीकृति पाने के लिए, दूसरों का जीवन नारकीय बना दे तो यह दूसरे का अधिकार हनन है। शायद इतने समय तक न चाहते हुए भी बहुत से समलैंगिक मजबूरी(इस मजबूरी को बहाना या स्वार्थ भी कह सकते हैं या ढोंग भी या फिर कायरता भी, किन्तु सच यह है कि वे स्वयं पीड़ित हैं, परेशान हैं।) में विषमलैंगिक (इतरलिंगी) लोगों से विवाह कर बहुधा उनका जीवन नष्ट करते रहे हैं। हमारा समाज इन मासूमों, जिनसे समलैंगिक अपनी वस्तुस्थिति छिपाकर विवाह करते रहे हैं, की बलि का यह मूल्य चुकाकर भी अपने को समलैंगिक संस्कृति से मुक्त मान शुतुरमुर्ग की तरह अपना चेहरा रेत में छिपाए ही आत्ममुग्ध था।


कोई उस स्त्री की मनोदशा का अनुमान लगाए जो विवाह के बाद पाए कि उसका पति उसकी ओर से पूर्णतया उदास है। वह अपने में कमी ढूँढती है। (स्त्री है तो स्वाभाविक रूप से कमी उसमें ही होगी, पति में तो हो ही नहीं सकती!) वह पति को खुश रखने की हर संभव चेष्टा करती है। पति का परिवार उसके रूप, उसकी चाल ढाल, बातचीत में दोष ढूँढता है। जानना चाहता है कि क्या कारण है कि उनका राजा बेटा इस स्त्री से विरक्त है। राजा बेटा माता पिता को कभी नहीं बताता कि वह तो स्त्रियों में रुचि ही नहीं रखता, या कि जिस मित्र से कहकर उसे माता पिता ने विवाह के लिए उसे राजी करवाया था वही उनके बेटे का प्रेमी है। सो अब शुरु हो जाता है उस निर्दोष स्त्री का मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक उत्पीड़न।


सास ससुर पोते(कभी कोई पोती का मुंह देखने को बेकरार देखा सुना है?)का मुँह दिखाने की बात करते हैं,समाज पूछता है कि कब गोद भरेगी। स्त्री किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी रह जाती है। वह क्या बताए कि वे तो पति पत्नी ही नाम के हैं। पहले तो पति भी उसे ही हीनभावना देने पर तुला रहता है कि तुम मुझे आकर्षित नहीं कर पातीं। फिर देर सवेर सच सामने आता है तो यह समाज में प्रतिष्ठित पति अपनी दरियादिली बताते हुए समझाता है कि तुम साधन सम्पन्न हो, पढ़ी लिखी हो, नौकरीपेशा हो, जब चाहे तुम अलग हो सकती हो। मैंने तो तुमसे विवाह ही इसलिए किया कि तुम अत्मनिर्भर हो! किसी मुझपर आश्रित कन्या से विवाह करता तो वह अलग कैसे रह पाती? कैसे जीवन यापन करती?


सो नेकदिल मनुष्य किसी पढ़ीलिखी, कामकाजी स्त्री का हृदय छलनी कर देता है। क्यों? क्योंकि वह माता पिता को यह नहीं बता सका कि वह समलैंगिक है, क्योंकि विवाह करने से समाज उसे समलैंगिक मानने की गल्ती नहीं करेगा। तब वह चैन से अपने सम्बन्ध भी बना सकेगा और पत्नी के हाथ का पका खाना भी खा सकेगा।


सच तो यह है कि शायद वह बुरा नहीं था। वह स्वयं पीड़ित था बस अपनी लाचारी की आग में किसी अन्य का जीवन भी झुलसा गया, केवल अपनी कायरता के कारण। प्रत्येक व्यक्ति वीर नहीं होता, प्रत्येक व्यक्ति इतनी प्रताड़ना सहने का साहस नहीं जुटा सकता, न समाज के तीर झेलने के लिए सीना तानकर खड़ा हो सकता है। सो वह किसी अन्य का जीवन नष्ट कर उसका सभी रिश्तों से मोहभंग कर देता है।


मैं तो कहूँगी कि वे समलैंगिक जो अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे हम पर भी उपकार कर रहे थे। अब वे अपनी तरह का जीवन कम से कम कानून के भय से मुक्त होकर तो जी सकेंगे। साथ ही साथ अन्य समलैंगिक भी शायद खुले में आकर स्वीकार करें कि वे समलैंगिक हैं ताकि किसी स्त्री या पुरुष को इनसे विवाह के बाद इतनी हताशा हाथ न लगे।


सो समलैंगिक लोगों को भी अपनी तरह जीने का अधिकार दो। वे किसी के जीवन में हस्तक्षेप नहीं कर रहे, हम उनके में न करें।


माता पिता के लिए अपनी संतान का समलैंगिक होना स्वीकारना कठिन है। परन्तु सत्य को स्वीकारना ही सही है। उससे कब तक मुँह मोड़ सकते हो? जहाँ तक हो सके अपनी समलैंगिक संतान का विवाह किसी ऐसे व्यक्ति से न करो जिसे उसकी इस पसंद का पता न हो। अनेक माता पिता यह आशा करते हैं कि विवाह होने से संतान सामान्य हो जाएगी। हमारे समाज में तो असंतुलित मस्तिष्क वाली संतान का विवाह भी इसी आशा में कर दिया जाता है। संस्कृति की आड़ में अपने दिवास्वप्नों को पूरा करने के चक्कर में किसी अन्य व्यक्ति का जीवन नष्ट करने से हम जरा भी नहीं हिचकिचाते। हमारी आँखों पर एक ऐसा रंगीन चश्मा चढ़ा होता है कि हम सच को नहीं देखते।


दुख तो तब होता है जब समाज के प्रतिष्ठित व समझदार लोग ऐसी मूर्खता करते हैं। अब कमसे कम ऐसा कम होगा। मैं इस निर्णय से समलैंगिकों के लिए तो प्रसन्न हूँ ही परन्तु उनमें से कुछ जो समाज के दबाव में विवाह करने वाले थे और अब नहीं करेंगे और जो इतरलिंगी उनका जीवनसाथी बनने के क्रूर भाग्य से बच गए उनके लिए भी प्रसन्न हूँ। गेहूँ और घुन दोनों ही बच गए। यही न्याय है।


घुघूती बासूती

30 टिप्पणियाँ:

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

सही कहा आपने। यदि कोई आपके जीवन में हस्‍तक्षेप नहीं कर रहा है, तो उसे शान्ति से जीने दो।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Shefali Pande ने कहा…

वाकई ....हम होते ही कौन हैं किसी के जीवन को निर्धारित करने वाले ?अपना ही जीवन ठीक से काट लें , वही बहुत है .....

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बिलकुल सही कहा जी आपने ..जाने आगे क्या क्या हो ..

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत बढ़िया, सामयिक लेख जिसमें दोनों वर्गों के साथ न्याय किया है आपने ! शुभकामनायें !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप से सहमत हूँ। यह तो वयस्कों के बीच की बात है। समलैंगिक लोग सब से अधिक शिकार बच्चों को बनाते हैं। उस से भी किसी हद तक बचा जा सकेगा।

Sachi ने कहा…

कितना सुन्दर लेख!

P.N. Subramanian ने कहा…

आपकी कलम से इस सामायिक लेख को पढने में बड़ा आनंद आया. हम आपके विचारों से सहमत भी हैं. आभार.

ali ने कहा…

घुघूती जी
समलैंगिकता पर धारा ३७७ लगी रहने से भी क्या फर्क था ! आखिर कितने वर्ष हुए इस धारा को लगे हुए ? ...परन्तु समलैंगिकता का वजूद तो इंसानी वजूद जितना पुराना है , आप इतिहास उठा कर देखें सब कुछ आईने की तरह साफ हो जायेगा ! लोग समलैंगिकता के नाम पर कितनी भी नाक भौं सिकोड़ने का नाटक करें सच तो ये है कि इनमें से ज्यादातर खुद भी समलैंगिक संबंधों के शौकीन होते हैं भले ही वे ये सब छुप छुपा कर पूरा करते हों ! धारा ३७७ हटने का मतलब ये नहीं है कि लोग समलैंगिक संबंधों का खुल्लमखुल्ला प्रदर्शन करने लग जायेंगे जैसा कि शादी के नाम से विषमलिंगियों के सम्बन्ध में होता है ! ये पाखंडी समाज है , पाखंड करता ही रहेगा ! मुझे लगता है कि आप इस मामले में जरुरत से ज्यादा आशावादी हो रही हैं !

एक बात और , विषमलिंगियों के मध्य में सेक्स के प्रति अरुचि या कामअक्षमता का ये मतलब नहीं हुआ कि उसका समलैंगिक जीवन सफल होगा या उसे समलैंगिक संबंधों में रूचि होगी ही ! मेरा कहने का मतलब है कि केवल समलैंगिक सम्बन्ध बनाने वाले जोडों की संख्या न्यूनतम है ज्यादातर लोग विषमलिंगी होने के साथ ही साथ दबे छुपे ही सही ,समलैंगिक होते हैं ! अतः इस कानून का हटना सामिजिक यौन जीवन के लिए उतना सकारात्मक फलदाई नहीं होगा जितनी कि आप अपेक्षा कर रही हैं !
जरा सोचिये विषमलिंगियों के वैवाहिक जीवन की असफलता के अनेकों कारणों जैसे कामअक्षमता , विवाहेत्तर सम्बन्ध ,पारिवारिक /आर्थिक परिस्थितियां , बेमेल स्वभाव वाले जोडों के गठबंधन , व्यक्तिगत दंभ वगैरह वगैरह की तुलना में से समलैंगिकता कितना बड़ा कारण हो सकता है !
क्षमा करियेगा मुझे नहीं लगता कि धारा ३७७ हटने से लोगों की सेक्स कुंठायें समाप्त होने वाली हैं याकि विषम लिंगियों की वैवाहिक असफलताओं का अंत होने वाला है ! देश की बहुत कम आबादी है जो 'केवल समलिंगी संबंधों' के साथ जीवन जीती रही है और जियेगी !
ये सच है कि धारा 3७७ हटने से इस छोटी सी आबादी पर अपराध पंजीबद्ध होने का संकट समाप्त हो जायेगा लेकिन ज्यादातर लोग अपने सेक्स पाखंड यानि कि एक साथ 'सम और विषमलिंगी काम' जीवन में वैसे ही लिप्त रहेंगे जैसे कि पहले रहते आये हैं और नपुंसकों के साथ साथ इन कामखिलाडियों की पत्निया पीड़ित बनी रहेंगीं !

और हाँ मैं काम संबंधों ( समलिंगी और विषमलिंगी् दोनों) को मात्र जैविक धारणा मानता हूँ सामाजिक सांस्कृतिक स्वीकृतियों के बिना भी इन संबंधों को कोई माई का लाल रोक नहीं सकता !

फिलहाल खुलकर समलैंगिक होने का दावा करने वाले लोगों के सुखी दाम्पत्य जीवन और उनके सफल टेस्टट्यूब लाइक बेबियों के लिए दूधो नहाओ पूतों फलों जैसा आशीष दे रहा हूँ !

ali ने कहा…

पुनश्च : मेरी टिप्पणी में समलिंगी शब्द लेस्बियन और गे , दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है !

बेनामी ने कहा…

as always you are clear and to the point in your article
Rachna

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

kuchh had tak to theek hi hai! rahi baat yaunachar sambandhi vibhinn maamlon ki, to yeh to sadiyon se ek vivadit mamla raha hai. lekin vatsyayan bhi yahi paida huye the!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

कई लेस्बियन जोडोँ को भी देखा है भारत मेँ और यहाँ भी (USA )-
ये छिपे रहते थे
आजकल
सभी मेँ
खुलापन दीख रहा है -
सरकार नियम बनाती है
और इन्सान,
सारे नियमोँ की
ऐसी तैसी करने की युक्ति आजमाते रहते हैँ !
सच तो ये है कि,
इन्सान जैसा स्वार्थी और कोई प्राणी इस सृष्टि मेँ
है ही नहीँ ..
जब इन्सान
अपने से ऊपर उठना सीख जायेगा, तब,
ये विश्व,
'युटोपिया' बन जायेगा ..
अभी तो नहीँ ..
शायद ..
आगे कभी ..
ये सँभव हो

- लावण्या

Udan Tashtari ने कहा…

एक विचारणीय आलेख..स्वागत है आपके विचारों का. हमेशा की तरह एक सुलझा हुआ नजरिया.

Arvind Mishra ने कहा…

हाय भारत !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

"गेहूँ और घुन दोनों ही बच गए। यही न्याय है"
बहुत अच्छा सामायिक लेख....बहुत बहुत बधाई....
मगर मुझे नहीं लगता कि धारा ३७७ हटने से विषम लिंगियों की वैवाहिक असफलताओं का अंत होने वाला है..

Parul ने कहा…

मुद्दे, पर अलग-अलग नज़रिया हो सकता है सबका /आसानी से स्वीकारना मुश्किल /स्वभाव या प्रक्रति को बदला नही जा सकता ये भी सच/ .इन रिश्तों को हाय हाय कर के नकारा भी नही जा सकता..... आपका लेख ek सुलझा हुआ drashtikod saamane laataa hai घघूती जी ....shukriyaa

संजय बेंगाणी ने कहा…

समलैंगिकता के परिणाम हर बात की तरह ही महिलाएं अधिक भूगतती है. अतः समाज इसे स्वीकार कर ले तो बहुत के जीवन नर्क से निकल जाएगें.

‘नज़र’ ने कहा…

यह बहुत समझदारी भरा लेख है जो बहुत कुछ सिखाता है

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विज्ञान । HASH OUT SCIENCE

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बढ़िया लेख.

कानून को लागू करने की समस्याएं होती हैं लेकिन ऐसा हर कानून को लेकर है. ऐसे में हम आशावादी न हों, इसका कोई कारण नहीं है.

PD ने कहा…

मैं शुरू से ही कहता आया हूं.. कोई भी व्यक्ति अगर कानून के अन्दर रहते हुये और किसी भी अन्य के निजी जीवन में हस्तक्षेप किये बिना अपना जीवन गुजार रहा है तो उसे हमें प्रताड़ित करने का कोई हक नहीं है..

चाहे वो समलैंगिक हो या फिर वो लिव-इन रेलेशन में हो या फिर वो पब जाकर शराब पीने वाले युवक-युवतियां हों..

समय ने कहा…

समलेंगिकता पर प्रचलन से हटकर नज़रिया पेश करने का साहस किया है आपने।

आपकी बेबाक राय को सलाम।

hem pandey ने कहा…

समलैंगिकता प्रकृति प्रदत्त नहीं है, एक मानसिक विकृति है. उसका उपचार किया जाना चाहिए. कानूनी स्वतन्त्रता मिल जाने के बाद भी. समलिंगी अपनी इस विकृति को खुलेआम स्वीकारने में हिचकेंगे, ऐसी आशंका है.

Pragya ने कहा…

घुघूती जी, आपके स्त्री व् हमारा समाज वाले सभी लेख बहुत अच्छे लगे, दिल को छू लेने वाले, आपके लेख पढ़ते समय लग रहा था जैसा अपना मन ही लिखा हुआ पद रही हूँ.....स्त्री के मुद्दों को ले कर मैं भी बहुत सवेंदनशील हूँ, और ये सब इसलिए नहीं की मेरे साथ ज्यादतियां हुई है.....नहीं..मेरे माता पिता के लिए मैं और मेरा भाई उनकी संतान थे पुत्र और बिटिया नहीं, पति भी परमेश्वर नहीं सखा ही है......पर समाज को देखते देखते मेरे अन्दर ये कड़वाहट भर गयी है....कुटुंब, दोस्त, नाते रिश्ते पडोसी सब जगह लड़की और नियम कायदे इस हद तक गुल मिल गए हैं कि उन पर सवाल करना तो दूर गौर करना भी समाज को अजीब लगता है..... कई बार तो ऐसा हुआ कि पड़ी लिखी उदार हमउम्र स्त्रियों पुत्र और पुत्री जनम पर बहस के बाद ये सुना है कि '' लड़की होने से कोई प्रॉब्लम नहीं है.. we understand and respect girls आज कल दोनों बराबर हें,दोनों जरूरी है पर फिर भी पहला लड़का हो जाए तो टेंशन नहीं रहती..... their is no limit of brain wash and Hypocrisy

अर्कजेश ने कहा…

बहुत बढिया आलेख । एक हकीकत को उजागर किया है । सबसे महत्वपूर्ण बात जो आपने यहां कही वह यही कि न सिर्फ़ समलैंगिकों के लिये बल्कि सारे समाज के लिये यह राहत होगी ।

जितेन्द़ भगत ने कहा…

सामयि‍क लेख।

woyaadein ने कहा…

बिलकुल सीधी व स्पष्ट राय......स्तिथि स्पष्ट करने के लिए गेहूं व घुन जैसे प्रतीकों का सुंदर प्रयोग....

साभार
प्रशान्त कुमार (काव्यांश)
हमसफ़र यादों का.......

Dipti ने कहा…

बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है आपने। एक अलग नज़र से पूरी बात को देखा और दिखाया है।

kavita ने कहा…

KUMAUON kee khusbu mujhe yahan kheench laaye.....gughuti basutee...i am married to an Assamese but i love to play ghughute basutee with my kids....my daughter sings...MERI BHUR KE CHEEDE NACHULI KAFALE KI..very well....

Mahesh Sinha ने कहा…

कानून सामाजिक समस्याओं का इलाज कभी नहीं हो सकता .प्रश्न केवल यह है क्या वह पुरुष अपने परिवार को अपनी अन्तर्दशा बता पायेगा या फिर से कोई लड़की बलि की वेदी चढ़ जायेगी

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

bahut sundar blog ..kuch din poorv ..iska jikr newspaper main padha thaa ..

badhaii !!!