Wednesday, June 03, 2009

हम में से कितने श्रवण कुमार के माता पिता बनना चाहेंगे?

मैं तो कदापि नहीं। सोचिए आप स्वस्थ या अस्वस्थ हैं, दृष्टि वाले हैं या दृष्टिहीन, गरीब या अमीर, कुछ भी क्यों न हों, क्या आप चाहेंगे कि आपका लाडला या लाडली(बराबरी का जमाना है तो ढोने का अधिकार भी चाहिए ही चाहिए!) आपको कंधे पर लादे यहाँ से वहाँ घूमे? वह तो महापुरुष,त्यागी,पुण्यात्मा हो सकता है किन्तु आप? आप तो महा स्वार्थी,निष्ठुर व अधम ही होंगे। कोई कैसे व क्यों अपनी संतान के कंधों पर बैठकर संसार घूम सकता है, चाहे वह तीर्थयात्रा का ही पुण्य काम हो। लक्ष्य से भी अधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य पाने का साधन,उसको पाने के लिए अपनाया रास्ता व उस रास्ते को आपने कैसे पार किया, होता है। क्या इन सभी मापदंडों पर श्रवण कुमार के माता पिता खरे उतरे थे?


यदि संतान को माता पिता को उठाकर स्नानगृह,पाखाने या हस्पताल ले जाना पड़े तब तो तर्कसंगत भी है और सराहनीय भी। वैसे प्रायः ऐसी स्थिति आने तक संतान भी युवा नहीं रह जाती वह स्वयं वृद्ध हो चुकी होती है या वृद्धावस्था की कगार पर खड़ी होती है।


मैं आज तक समझ नहीं पाई कि जिन युगों की हम दुहाई देते हैं उन्हीं युगों में यदि राम सा आज्ञाकारी पुत्र था तो दशरथ सा बिना सोचे समझे वरदान देने वाला पिता भी और कैकई सी माँ भी। ययाति सा अपने पुत्र से यौवन माँगकर और अधिक समय तक भोग विलास की कामना करने वाला पिता भी। अब इस पिता के व्यवहार को आप कैसे उचित ठहराएँगे? यदि भीष्म पितामह सी संतान थी तो अपने बेटे के त्याग को अपना अधिकार समझ जीवन के सुख भोगने वाला उसका पिता भी था।


हमारी पीढ़ी के कितने माता पिता अपने बच्चों को कष्ट देकर सुखी रहने का स्वप्न भी देख सकते हैं? मैं तो नहीं। दाल रोटी व सिर पर छत के लिए यदि उनपर आश्रित रहना पड़ा, उन्हें कष्ट देना पड़ा तो समझा जा सकता है परन्तु अपने विलास या अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए तो कतई नहीं।


मैं यह नहीं कह रही कि माता पिता को सुखी जीवन जीने का अधिकार नहीं है परन्तु यदि यह अधिकार अपनी संतान के सुखी जीवन के अधिकार को छीन कर लिया गया है तो क्या यह सही है?


श्रवण कुमार की तो धारणा ही गलत है। उससे भी अधिक गलत श्रवण कुमार के माता पिता बनने की इच्छा रखने की।


टिप्पणी में सबसे पहले हाँ या ना या विस्तार में मेरे प्रश्न 'क्या आप श्रवण कुमार के माता पिता बनना चाहेंगे' का उत्तर अवश्य दीजिए।


ताऊ के 'कलयुगी श्रवण' को पढ़ने के बाद बचपन से मन में आता यह प्रश्न आज आपके सामने है।


घुघूती बासूती

23 comments:

  1. उपनिषद कहते हैं संतान माता-पिता का पुनर्जन्म हैं। तो कौन माता-पिता अपने पुनर्जन्म के लिए श्रवण का जीवन चाहेगा?

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  2. सच कहूँ तो आपने हमारे भावों को शब्द दे दिए...लेकिन आपके प्रश्न का उत्तर टिप्पणी देना सम्भव नहीं...उसके लिए पोस्ट ही तैयार करनी होगी...

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  3. प्रभू से यही प्रार्थना है कि कभी किसी पर बोझ न बनना पड़े।

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  4. चलिए हम भी आप के साथ हो लिए.

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  5. कतई नहीं.

    मुझे तो यह तर्क भी गलत लगता है कि बचपन में माता-पिता ने बहुत कष्ट सहे इसलिए उनकी सेवा करो. माता-पिता की सेवा सही है, मगर संतान के लिए कष्ट सहे इसलिए? संतान के लिए तो ये भी कष्ट सह ही रहें है. देखना है तो यह देखो कि माता-पिता ने अपने माता-पिता की सेवा की या नहीं.

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  6. संजय भाई से सहमत.

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  7. मै भी नही.....

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  8. बच्चों से मुझे ऐसी कोई अपेक्षा ( श्रवण कुमारवत पुत्र पुत्री ) नहीं है ! ये उन्हें तय करना है की वे क्या बनते हैं !

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  9. आपने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, इसलिए अन्य भी ऐसा ही करें तो निश्चित ही आपने अपने कर्तव्य निस्वार्थ भावना से नहीं निभाये और स्वार्थवश किये गये कृत्य का परिणाम तो जुऐं की श्रेणी में आता है-जीते-हारे -वो नियति.

    -बस इतना ही जान लें.

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  10. इस दुनिया मै कोई भी समझदार मां बाप कभी नही चाहेगा कि वो अपने बच्चो पर बोझा बने, श्रवण कुमार की बात थोडी देर बाद, लेकिन कितने ही मां बाप है जो अपने स्वार्थ के लिये अपने बच्चो को श्रवण नही कुछ ओर ही बना लेते है, जेसे इकलोती कमाऊ लडकी को कई मतलबी मां बाप खोना नही चाहते, ओर उस के जीवन से ....
    ओर भी बहुत से उदाहरण है, बोझ कोई नही बनाना चाहता, लेकिन अगर मां बाप बुढापे मै बच्चो पर आश्रित हो तो उस समय क्या बच्चो का फ़र्ज नही बनता कि वो श्रवण की तरह से नही लेकिन कम से कम मां बाप की थोडी बहुत देख भाल तो करे ?
    या फ़िर उनकी सारी ज्यादाद अपने नाम कर के उन्हे दर दर की ठोकरे खाने के लिये छोड दे, बात बात पर उन्हे बेइज्जत करे, उन्हे गंदी गंदी गालिया दे, कुत्तो से भी बुरा व्यबहार उन के संग करे, श्रवण बेटा किसी को नही चाहिये, लेकिन राबण भी किसी को नही चाहिये.
    बाकी यह सब तो कहानियां ही है,कोन चाहेगा जवान बेटा सारा दिन घर बेठा रहे, या फ़िर नाकारा रहे,सिर्फ़ मां बाप को ढोये????

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  11. I do not want a "devdaas for lover or husband" and neither a son like "shrawan Kumar".

    I think the key and concepts related to these mythological stories should be seen in the context of "Feudal Society" where the women and children, subjects, servants and even younger siblings were seen not as an individuals but the property of the Patriarch.

    Human society have traveled a long distance and have evolved into "individualistic society" or say approaching to a society where every individual will have equal importance and new relations have to be invented based on equality, mutual respect and freedom.

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  12. सर्व प्रथम तो आपको बधाई जो आपने एक ऐसा प्रश्न पूछा ,जिस कहानी को सदियों से संस्कार के रूप में घुट्टी में पिलाया जाता रहा है ,इसका उत्तर आसान नही लगता क्योकि हम सभी इससे बचना चाहते है |
    लेकिन फ़िर भी कोशिश कर रही हुँ उत्तर देने का -श्रवण कुमार के माता पिता जैसा मै कभी नही बना चाहूंगी \हमने अपना संसार बनाया बच्चे आए उनकी परवरिश की उसमे हमे अपार सुख मिला संतोष मिला ,हमने अपना जीवन जी लिया अब उनका संसार है हम अपनी छोटी छोटी मह्त्वकशो के लिए उनकी उन्नति में क्यो बाधक बने ?

    फ़िर युगों से चली आ रही इन कहानियों में कितनी सत्यता है ? हम तक पहुचते पहुचते इनका पहले क्या रूप था ?और आज क्या हो गया हम आँख मूंद कर विश्वास नही कर सकते |
    shobhana chourey

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  13. तात्कालिक जवाब है नहीं

    उसके बाद यह कहा जा सकता है कि विचारधारा खतम नहीं होती, मात्र व्यवस्था बदल जाती है।

    श्रवण कुमार की विचारधारा रखने वाले, कतई ज़रूरी नहीं कि पुरातन समय की व्यवस्था का पालन करें, वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के हिसाब से हर संजीदा इंसान अपने बुजुर्गों को मान देता है।

    किंतु अपनी (श्रवण) संतान का दोहन करने वाले आज भी समाज में बहुतेरे हैं -जैसे कि दहेज लेने वाले

    आगे कुछ कहने की ज़रूरत है क्या …?

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  14. आपने बडा सटीक प्रश्न किया है. अब मैं अपनी निजी सोच इस बारे मे इस तरह पाता हुं.

    आज समाज मे पुरी तरह ना तो श्रवण बचे हैं और ना उनके माता पिता. आज किसी के पास भी समय नही है.

    माता पिता भी श्रवण नही चाहते और श्रवण भी ऐसे माता पिता नही चाहेंगे.

    लेकिन श्रवण का उदाहरण आज जिस संदर्भ मे लिया जाता है..अगर दुसरे ना लेते हों तब भी मैं तो कम से कम इसी रुप में इस शब्द को देखता हुं.

    श्रवण से आशय सिर्फ़ एक ऐसे पुत्र/पुत्री से है जो अपने बुढे अशक्त मां बाप को सहारा दे सके.

    और जो लोग शारीरिक रुप से तीर्थ करवाने की चेष्टा को श्रवण होने से जोडते हैं वो गलत हैं.

    उस समय मे कोई साधन अपंग लोगों के लिये नही थे आज तो सब साधन है. आज केदारनाथ के दर्शन भी हैलीकाप्टर से हो सकते हैं.

    मेरा मुख्य सोच है वृद्धावस्था मे मां बाप की देखभाल.

    मेरे एक परिचित हैं जिन्होने अपना सब कुछ लगा कर बेटे को उंचा अफ़सर बनाया और आज जीवन की सांझ मे उनको वृद्धावस्था मे दिन कटने पड रहे हैं. तो श्रवण का उल्लेख किस तरह हुआ है? यह शायद थोडा बहुत स्पष्ट अवश्य हुआ होगा.

    रही बात इस संदर्भ मे ययाति आदि की तरह इस्तेमाल होने की. तो यकीन जानिये मैं निजी रुप से तो ययाति की विचारधारा से बिल्कुल भी सहमत नही हूं.

    रामराम.

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  15. भूल सुधार :

    ययाति आदि की तरह इस्तेमाल होने की.

    को

    ययाति आदि की तरह इस्तेमाल करने की.
    पढा जाये.

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  16. दिनेश जी से सहमत १००%

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  17. काफ़ी दिग्गजों ने इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं, अतः टिप्पणी देने में थोड़ा डर सा लग रहा है. खैर, मेरे विचार में श्रवण कुमार का माता-पिता कोई भी नहीं बनना चाहेगा, मगर श्रवण कुमार सी संतान हर कोई पाना चाहेगा. यहाँ पर मैं यह स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि श्रवण कुमार के माता-पिता से मेरा अभिप्राय ऐसे माता-पिता से है जो अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए अपनी संतान का इस्तेमाल करते हैं जो केवल अनुचित ही नहीं अपितु निंदनीय है, वहीँ श्रवण कुमार सी संतान का तात्पर्य माता-पिता की निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाली संतान से है. हर संतान को अपने माता-पिता की निस्वार्थ भाव से सेवा करनी ही चाहिए खासतौर पे वृद्धावस्था में; मातृ देवो भव, पित्र देवो भव वाली हमारी संस्कृति कम से कम हमें इतना तो सिखाती ही है.......वहीं माता-पिता को भी अपना सम्बन्ध संतान से निस्वार्थ भाव से रखना चाहिए, उनको अपनी अंधी इच्छाओं की पूर्ति का साधन नहीं बनाना चाहिए. ध्यान दीजिये स्तिथि एक है पर भाव दो हैं:

    १. श्रवण कुमार के माता-पिता : निंदनीय
    २. श्रवण कुमार सी संतान : प्रशंसनीय

    कुल मिलाकर यदि माता-पिता और संतान के रिश्ते के बीच में ये स्वार्थ नाम का शब्द ना ही आये तो अच्छा होगा........मेरा तो यही मानना है.......

    साभार
    हमसफ़र यादों का.......

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  18. श्रवण कुमार का पिता बनने का तो सवाल ही नही उठाता क्योंकी मैने विवाह ही नही किया है,लेकिन मां(पिता जी अब रहे नही)के लिये जरूर श्रवण कुमार बनने की कोशिश करूंगा।वैसे बचपन मे बहुत शैतान होने के कारण हर साल होली मे मुझे एक ही टाईटल दिया जाता था वो था श्रवण कुमार्।

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  19. मैं तो कभी भी अपने बच्चों को श्रवण जैसा नही चाहूंगा। मैं अपने माता-पिता का ख्याल इसलिये रखता हुं कि मुझे इसमें खुशी मिलती है, और उनकी सेवा करना मेरा स्वभाव है। ना कि इसलिये कि मेरे माता-पिता ने अपने माता-पिता की सेवा की है। मुझे अपनी खुशी के साथ माता-पिता और बच्चों की खुशी का भी ध्यान रहता है।

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  20. अपने बच्चों से ज़रूरत से ज्यादा अपेक्षा करना भी ठीक नहीं है.....सहमत हूँ मैं आपके विचारों से!

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  21. आपने बहुतों के नाम लिए...उनमे से एक श्रवन कुमार भी हैं...

    मैं सम्पूर्ण मानव समुदाय को दो भागों में बांटकर देखती हूँ....
    एक वो जो संतान को जन्म देकर भी माता पिता नहीं बन पाते,ममत्व और अपने कर्तब्य का भली भांति पालन नहीं कर पाते.....ययाति ,शांतनु तथा अनेक असंख्य ऐसे उदहारण हैं...

    दुसरे ,वो हैं जो ममत्व और कर्तब्य परायणता के मिसाल होते हैं....ऐसे लोगों की भी धरती पर कमी नहीं...

    स्वार्थी माता पिता यदि आज्ञाकारी कर्तब्यनिष्ठ संतान की कामना करें,तो अव्वल तो यह संभव नहीं क्योंकि उनके ही संस्कार यदि उनकी संतानों में रहे तो बस अभिभावक मन के लादू मन ही मन फोड़ते रह जायेंगे...और यदि कभी सुसंयोग से ऐसा हुआ की सुसंस्कारी संतान मिल भी गया उन्हें और उन्होंने उसका दोहन करना आरम्भ किया तो ऐसे लोग भी कुख्याति को अवश्य प्राप्त करते हैं...

    मुझे नहीं लगता की श्रवन के माता पिता इस श्रेणी में आते हैं...श्रवन कुमार का पूरा परिवार तो प्रेम वात्सल्य और कर्तब्य परायणता की मिसाल हैं...संभवतः आप विस्मृत कर बैठीं की यदि श्रवन कुमार ने लाचार माता पिता की सेवा की थी ,संचार माध्यमो के अभाव में बहंगी पर बैठा उन्हें तीर्थाटन कार्य था तो श्रवन के निधन की सूचना पा उनके माता पिता ने भी अपने प्राण त्याग कर दिए थे....

    आज यदि श्रवण और उनके माता पिता अमर हैं तो इसलिए की वे स्नेह और बलिदान के मिसाल हैं.....

    आवश्यकता है अभिभावक और संतान दोनों ही कर्तब्यनिष्ठ प्रेम सौहाद्र का पाठ ऐसी कथानकों से पढ़े सीखे और संसार को सुन्दर बनायें..

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  22. इस नए नजरिये से कभी सोचा न था. ताऊ की टिपण्णी बड़ी भली लगी. और मुझे एक बात समझ में आती है वो ये कि ज्यादातर कहानियाँ गुरु, माता-पिता हो चुके लोगों ने ही लिखी है ! तो वो इसे अपने नजरिये से लिखते होंगे. ठीक वैसे ही जैसे कई किताबें ब्राहमणों ने लिखी. तो उन्होंने अपने भलाई वाली बात खूब लिखी ! और श्रवण कुमार जैसे आदर्श प्रतीकात्मक ज्यादा हैं... जो हमेशा अच्छी सीख देते हैं.

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  23. श्रवण कुमार के माता और पिता का नाम यदि किसी को ज्ञात हो तो किरपया पोस्‍ट भी करे तथा साथ ही मुझे 9950856150 पर सूचित करे

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