Friday, May 15, 2009

बच्ची को भूल गए ! (इतना क्यों कुढ़ती हूँ ? भाग २)

कुछ वर्ष पहले की बात है। हमारी बस्ती में किसी की बिटिया के जुड़वा बच्चे हुए, एक लड़की और एक लड़का। दो बच्चों को वह अकेली पाल नहीं सकती थी। सो कौन सा बच्चा नानी के पास रहा होगा यह अनुमान कोई भी भारतीय लगा सकता है। अधिकतर लोग कहेंगे कि एक को तो नानी के पास रहना ही था तो यदि लड़की को रखा गया तो क्या गलत हुआ। मैं केवल इस निर्णय के आधार को जानना चाहती हूँ। क्या यह निर्णय बच्चों के जन्म के समय के भार को देखकर किया गया कि कौन बच्चा कमजोर है और किसे माँ के दूध से वंचित रखा जा सकता है ? क्यों सदा ऐसे निर्णय लड़कियों के विरुद्ध जाते हैं ।


खैर जैसा कि होना था लड़की ही नानी के पास रही। वह कुछ महीने की हुई जब गुजरात में भूकंप ( गुजराती में इसका बहुत अच्छा नाम है, धरतीकम्प) आया। सारा परिवार घर से बाहर भागा। कौन घर में छूट गई? वही बच्ची ! बाहर आकर उन्हें ध्यान आया कि वह तो अन्दर ही छूट गई। कोई उसे लेने अन्दर नहीं दौड़ा। मैं अपने कुत्तों को बुलाकर उन्हें साथ लेकर बाहर जा सकती थी। उन्हें छोड़कर बाहर भागने की सोच भी नहीं सकती थी तो वे उस बच्ची को कैसे भूल सके?



बाद में यह किस्सा हँस हँसकर बताया गया। मानती हूँ बताने वाली स्त्री ही थी। इसीलिए तो दुख भी अधिक हुआ और फिर वही कंडिशनिंग की बात आ जाती है। जन्म से ही (आजकल तो कोख में ही) हमें यह पता रहता है कि पुरुष जान का मूल्य अधिक है। हम इसे एक ऐसा यथार्थ मान लेते हैं कि प्रश्न ही नहीं करते। खैर, मानना होगा कि स्त्री की जान बहुत जीवट वाली होती है अन्यथा अबतक तो उसे विलुप्त हो ही जाना चाहिए था।



घुघूती बासूती
भाग १ स्त्री का मूल निवास बदल गया।

16 comments:

  1. bahut marmik ghatna hai ghatna nahi jise smaj ki kartoot kahen to sahi rahega aurat hi aurat ki bairi hai

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  2. स्त्री की जान बहुत जीवट वाली होती है अन्यथा अबतक तो उसे विलुप्त हो ही जाना चाहिए था।

    सच कहा आपने, इस्त्री की जीवटता ही उसे अभी तक बचाए हुए है...हम कितने भी आधुनिक हो जाएँ पता नहीं ये इस्त्री पुरुष के भेद वाली सोच क्यूँ हमारा पीछा नहीं छोड़ती...जब की सेंकडों ऐसे प्रमाण मिल जायेंगे जो सिद्ध करते हैं है की प्रतिकूल परिस्तिथि का जिस क्षमता से इस्त्री मुकाबला करती है वो पुरुष सोच भी नहीं सकते...
    नीरज

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  3. sadiyon से chali आ रही इस व्यवस्था को अब ख़त्म होना ही चाहिए ..........

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  4. mujhe yah lekh padh kar Jaipur me 2006 December me aaya bhukamp yaad aa gaya.. main didi ke yahan tha.. subah ke samay jab bhukamp aaya to main sabse pahle didi ki beti(jo us samay 1.5 sal ki thi) ko didi-jiju ke kamre se utha kar bahar bhaga.. aur mere pichhe-pichhe didi-jiju bhi bahar aaye.. :)
    ham bhi yah hans-hans kar hi batate hain.. :)

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  5. जुड़वाँ बच्चो का यह केस मैंने भी अपने घर में ही बहुत करीबी रिश्तेदार के घर देखा है ...लड़का माँ के साथ रहा और लड़की को दादी को पालने के लिए दे दिया गया ...लड़की दादी के पास रहते हुए घर का सारे काम भी करती रही और अपनी हर कक्षा में प्रथम स्थान भी पाती रही .. लडकियां वाकई जीवट वाली होती है ..

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  6. बच्ची स्त्री, छोड़ने वाली उसकी माँ स्त्री, पालने वाली नानी स्त्री, घर में भूलने वाली स्त्री....स्त्री ही स्त्री की दूश्मन क्यों है?

    नवजात कन्या शिशू के मूँह-नाक में मिट्टी भर कर मार दिया गया. सुन कर ही हाथ काँपने लगे ऐसा काम स्त्रीयों ने ही किया था!!!

    आपने जो लिखा है वह इस सभ्य कही जाने वाली दुनिया का सच है.

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  7. सच्चाई!!
    वास्तविक दुनिया की सच्चाई से आपने रूबरू कराया!!

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  8. आदरणीय घघूति जी.....
    मुझे गलत बात से कुडन होती है ...स्त्री -पुरुष -पशु पक्षी चाहे कोई भी सन्दर्भ हो....उपरोक्त परिवार के सन्दर्भ में मेरे मुंह की बात संजय जी ने छीन ली है ..किस परिवार की कैसी मानसिकता है ...ये तय करना मुश्किल है ....दुर्भाग्य से समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता गलत है ...फिर उपाय ????दरअसल हमें अपने भीतर अपने घर से शुरुआत करनी होगी ...अपने बच्चो को वो वातावरण देना होगा ताकि वे कल का समाज अच्छा बना सके ,आखिर बूँद बूँद से ही तो घडा बनता है
    आज के दैनिक जागरण में एक खबर है दलित शिक्षिका से छेड़छाड़ पे बवाल ....बताये दलित क्यों जोड़ा ? ये अपराध सामजिक है.....

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  9. apki post bhut ghre se sochne ke liye prerit karti hai .
    dhanywad

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  10. मैं अक्सर संजय बैंगाणी जी वाला ही प्रश्न दोहराया करता हूं. कभी कभी अपने आप से भी, पर क्या पता जवाब नही मिला आज तक? यहां भी वही दोहरा रहा हूं.

    रामराम.

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  11. Conditioning of the system to treat man as superior and woman as inferior is the root cause of all problems

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  12. वो नहीं बचेगी तो समाज को आईना कैसे दिखाएगी...वो बचेगी और हर हाल में बचेगी .. घुघूती जी

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  13. एक और उद्देश्यपूर्ण आलेख. साधुवाद की पात्र हैं आप, वाकई सच्चाई का आईना दिखा दिया आप ने. मैंने भी अपने आस-पास बेटियों की ऐसी अनदेखी के कई उदाहरण देखे हैं. इस विषय में शीघ्र ही अपने ब्लॉग पर विचार व्यक्त करूंगा.

    साभार
    हमसफ़र यादों का.......

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  14. स्त्री के साथ ये एकतरफा व्यवहार बहुत आम है...लेकिन एक कड़वा सच ये भी है की इस भेद भाव को करने में स्त्री का ही अहम् रोल रहता है....खुद के साथ सब कुछ झेलने के बाद भी वह ऐसा कैसे कर सकती है...मेरी समझ के परे है ये बात!

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  15. ये विषय बड़ा अजीब है। स्त्री को लेके समाज की दशा ऐतिहासिक और सामाजिक धरातल के आधार पे समझा जा सकता है लेकिन आज के परिपेक्ष्य में ऐसी मनोअवस्था का तर्क नही समझ में आता। मेरा मानना है की महिला वर्ग का सामाजिक औचित्य इतना है कि इसके बिना किसी भी प्रकार की प्रगति का कोई सम्भव विकल्प नही है लेकिन फ़िर भी। अगर अनुमति हो तो मेरी ४ पंक्तियाँ...

    कुछ खेल प्रकृति के ऐसे हैं जो हमें चकित कर जाते हैं
    पर फ़िर भी ऐसे मूढ़ मती हम अपने ही नियम चलाते हैं
    समय चक्र का पहिया चलता सही ग़लत का फेर बदलता
    मगर आज भी जीवन पौधा किसकी क्यारी में है पलता

    सदियों से देखी और समझी बात कि सृष्टि की नींव ये नारी है
    अब जिस डाली पे बैठे है उसे ही काटने में क्या समझदारी है?

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