सोमवार, जुलाई 21, 2008

पैन्ड्युलम

एक बहुत लम्बे समय से
पैन्ड्युलम का सिरा
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
इस छोर से उस छोर तक
उस छोर से इस छोर तक
आता और जाता,जाता और आता
अधिक समय बीच में रहता
कम समय छोरों पर जाता।
दोनों छोर हैं अतिरंजित
एक छोर रंगा उमंगों से
दूजा रंगा है काला मातम सा
बीच का हिस्सा है शेष जीवन
नकारा सा, रंगविहीन
ना काला, ना रंगीन।
क्या नहीं होगा बेहतर
किसी एक सिरे पर रहना?
चाहे काले या रंगीन
क्योंकि वहाँ जीवन है
भावनाएँ हैं,
या तो है घोर निराशा
या फिर रंगों की मादकता
पंखों की उड़ान
हिरणी सी चंचलता
बिजली की सी चपलता
प्यार की महक
विरह की हूक
कोयल की कूक
या फिर घुघुति की घूर घूर
उदास और व्यथापूर्ण
व्यग्र और व्याकुल।
वहाँ नहीं है
बीच की धरती का ठंडापन
मौत सा सन्नाटा।
करुण चीख
मृत्यु की सह्य है
परन्तु नहीं उसका सन्नाटा
उसके ठंडे हा्थ आकर
पलपल लपेटते हुए।
मृत्यु ग्राह्य है परन्तु
पलपल मरना और मरकर जीना
नहीं कभी होता रुचिकर।
अकाल काल का आना
आकर ले जाना
सहा जा सकता है
परन्तु यूँ अधमरा
जीना पर न जीना
मरना पर न मरना।
क्यों नहीं पैन्ड्युलम जाकर
एकबार अन्तिम छोर पर ले जाता
और वहीं सदा के लिए अटकाता?
परम सुख या परम दुख
खौलना या हिम सा जमना
क्या नहीं बेहतर है यूँ
बस केवल गुनगुने पानी सा
बना रहने से?
ऐसा पानी
ना जिसमें कभी उबाल आए
ऐसा पानी
ना जिसमें कभी जमाव आए।
हाँ, पहुँचना है
अनुभूति के शिखर पर
पैन्ड्युलम के अन्तिम सिरे पर।

घुघूत बासूती

15 टिप्पणियाँ:

vijay gaur ने कहा…

पिछले दो दिन पहले आपकी एक पोस्ट देखी थी, कुछ कहना नही हो पाया उस पर. इस कविता में भी वैसे ही भावों की छाया दिखायी दे रही है, लेकिन इसमें सवाल है. और उस भाव से बाहर निकलने की छटपटाहट भी. शुभकामनायें.

डा० अमर कुमार ने कहा…

जीना पर न जीना
मरना पर न मरना।
क्यों नहीं पैन्ड्युलम जाकर
एकबार अन्तिम छोर पर ले जाता
और वहीं सदा के लिए अटकाता?






अभिभूत हूँ..
पर मेरे पास तो इतने ख़ूबसूरत शब्द भी नहीं हैं, इसे व्यक्त करने को !

Udan Tashtari ने कहा…

परम सुख या परम दुख
खौलना या हिम सा जमना
क्या नहीं बेहतर है यूँ
बस केवल गुनगुने पानी सा
बना रहने से?

--बहुत भावपूर्ण - अद्भुत. बधाई.

Rama ने कहा…

मृत्यु ग्राह्य है परन्तु
पलपल मरना और मरकर जीना
नहीं कभी होता रुचिकर।

शानदार ...

Gyandutt Pandey ने कहा…

तकनीकी तौर पर मुझे सबसे नीचे की अवस्था सबसे रोचक लगती है - जो अंतत सबसे स्थिर होनी है; पर दोलन की अवस्था में सबसे अस्थिर और सबसे ज्यादा गति वाली होती है।

Lavanyam - Antarman ने कहा…

सशक्त अभिव्यक्ति जीवन का सत्य उजागर हुआ है कविता मेँ -
आपके लेखोँ के साथ कविता भी पढवातीँ रहियेगा
स्नेह,
-लावण्या

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया अभिव्यक्ति है।

परम सुख या परम दुख
खौलना या हिम सा जमना
क्या नहीं बेहतर है यूँ
बस केवल गुनगुने पानी सा
बना रहने से?

संजय बेंगाणी ने कहा…

sundar

Rachna Singh ने कहा…

as always beautiful composition of words and emotions

Neelima ने कहा…

गहरी प्रश्नाकुलता झलक रही है ! सुन्दर कविता !

अनुराग ने कहा…

कभी गुलज़ार की इसी विषय पर लिखी एक त्रिवेणी पढियेगा .....आपकी कविता बेहद सुंदर है ...गहरे अर्थ समेटे हुए है अपने आप में

Rajesh Roshan ने कहा…

बहुत ही सुंदर. भावपूर्ण कविता

pallavi trivedi ने कहा…

achchi kavita...samajhne ke liye do baar padha. achchi lagi.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

ऐसा पानी
ना जिसमें कभी उबाल आए
ऐसा पानी
ना जिसमें कभी जमाव आए।
हाँ, पहुँचना है
अनुभूति के शिखर पर बेहद दिल को अभिभूत कर लेने वाली सुंदर रचना

मीनाक्षी ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना जो जीवन दर्शन के प्रति चिंतन करने को बाध्य करती है....
परम सुख या परम दुख
खौलना या हिम सा जमना -----
दोनों ही चरमावस्था...अति...
क्यों न थोड़ा सुख, थोड़ा दुख हो....
गुनगुना पानी जैसा जीवन जिसे आसानी से
गहराई तक महसूस किया जा सकता है....