Wednesday, February 27, 2008

तेरा मन इक छवि

पता भी नहीं चला कब मैं तुझसे
और तू मुझसे जुड़ गया
कुछ तरंगें उठीं तन मन से मेरी
कुछ तरंगें उठीं तन मन से तेरी
सुनीं तो जलतरंग सा बज गया ।
तू अपनी डगर
मैं अपनी डगर
को चल पड़ी ।
जब भी कोई बाधा आई
याद हमने इक दूजे को कर लिया ।
चेहरे को तेरे नहीं
मैंने देखा ध्यान से
पर मानस पटल पर
तेरा मन इक छवि
बन छप गया ।
घुघूती बासूती

12 comments:

  1. कविता पढ़कर जलतरंग सी बज उठी कानो में। सुंदर और भाव-प्रवण चित्रण।

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  2. सुंदर और निश्छल कविता।

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  3. तू अपनी डगर
    मैं अपनी डगर
    को चल पड़ी ।
    जब भी कोई बाधा आई
    याद हमने इक दूजे को कर लिया ।

    sachcha rishta aisa hi hota hai shayad...!

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  4. purani yaden taza karne ka sukriya.

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  5. waah,bahut sundar...please kuch din apne in rangon ko panno par bikherte rahhiyega bahan.Bada achcha laga.
    ranjana

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  6. ghughuti jee,
    saadar abhivaadan. do logon ke beech jo sootra bante hain unmein shaayad aise hee jazbaat hote hain.

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  7. हृदय से निकले उदगार, सीधे हृदय को छू गये।
    बधाई।

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  8. क्या बात है!!

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  9. जब भी कोई बाधा आई
    याद हमने इक दूजे को कर लिया
    …बहुत ही सुन्दर पंक्ति है।

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  10. बहुत प्यारी ।

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