सोमवार, मार्च 03, 2008

आज आई है मेरी बारी

फिर क्यों आज मुझे
लोगों की यह निष्ठुरता,
उनकी यह तटस्थता
बहुत खल रही है ?


कैसे हो सकता है
मनुष्य इतना निर्दयी
कैसे नहीं पिघलता
हृदय किसी का ?


कैसे ये जा रहे हैं
छोड़ मुझे यूँ जमीं पर
क्यों कोई नहीं है आता
करने मेरी सहायता ?


जानता हूँ मैं ये कि
कभी मैं न था रुका
न दी थी लिफ्ट मैंने
कहीं कभी किसी को ।


क्या अपराध मुझसे
हो गया है इतना बड़ा
कि आज गिर कर यहीं
जान मुझे है देनी ?


यूँ ही बहा रुधिर तो
क्या अब कभी भी
मुलाकात पत्नी, बच्चों
से फिर न होगी ?


कल ही की तो बात है
देखी थी एक दुर्घटना
कहती रही थी बिटिया
गाड़ी जल्दी रोको ।


मैंने कहा था उसको
हमें है जाने की जल्दी
कोई और रोक लेगा
चिन्ता मत करो तुम ।


शायद ये ही शब्द
दोहरा रहे हैं ये सब
आज भी है मुझे जल्दी
कोई आओ मुझे बचाओ।


हस्पताल मुझे ले जाओ
आज जो बच गया तो
तटस्थ न कभी रहूँगा
निष्ठुर न मैं बनूँगा ।


शायद कोई रुक रहा है
शायद ये मुझे बचा ले
शायद पत्नी, बच्चों से
ये सज्जन मुझे मिला दे ।


ये हस्पताल पहुँचा दे
कुछ और न भी हो तो
मृत्यु होने पर मेरी
घर मेरे खबर करा दे ।


घुघूती बासूती

15 टिप्पणियाँ:

जोशिम ने कहा…

दुर्घटना ही हैं - ताकि सनद रहे ? [- पहले वे आए ... और अंत में कोई न बचा ?] - खूब - मनीष

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia ने कहा…

हस्पताल मुझे ले जाओ
आज जो बच गया तो
तटस्थ न कभी रहूँगा
निष्ठुर न मैं बनूँगा ।


हमेशा की तरह सशक्त अभिव्यक्ति। ये चार पंक्तियाँ विशेष रूप से पसन्द आयी। आपकी कविताओ की शुरु की पंक्तियाँ पढकर कयास लगाना पडता है कि आगे क्या होगा। राज मध्य मे खुलता है और अंत तक हम आपके फैन हो जाते है।

Lavanyam - Antarman ने कहा…

घुघूती जी ,

साचा ! जो भी ऐसे अवसर से गुजरा है, ऐसी ही भावनाएं आती होंगीं उनके मन में !

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

सर्वोत्म संदेश लिए, आज की आवश्यकता।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

मनोभावों का बढ़िया चित्रण किया है आपने!

परमजीत बाली ने कहा…

आप की रचना मॆ छुपा संदेशसचमुच कचॊटता है कही भीतर। हमारा व्यवाहर ऐसा ही तो है कि हम सोचते हैंकोई ओर मदद कर लेगा।अच्छी रचना है।

मैंने कहा था उसको
हमें है जाने की जल्दी
कोई और रोक लेगा
चिन्ता मत करो तुम ।

ajay kumar jha ने कहा…

ghughuti jee,
saadar abhivaadan. bilkul alag andaaz mein bilkul alag baat keh daalee aaj aapne . hamein pasand aayaa.

mamta ने कहा…

जब इंसान ख़ुद उस स्थिति मे होता है तब समझता है। बहुत ही प्रभावशाली ।

anitakumar ने कहा…

बहुत ही बड़िया कविता है। शहरी जीवन में अकसर होती सड़क दुर्घटना पीड़ीत का मार्मीक चित्रण्…।बधाई

Jitendra Chaudhary ने कहा…

हम सभी, जीवन की इस दौड़ मे किसी भी पचड़े से बचते है, लेकिन शायद इस बचने के चक्कर मे हम इंसानियत ही भुला बैठते है।

शहरी जीवन की एक कड़वी सच्चाई का सजीव चित्रण करती यह कविता, हम सब के लिए एक सबक है।

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

aaj hi jab bitiya ko tilk laga kar board exam ke liye bhejne ke baad office ke liye chali to raste me ek bachchhi ko jo exam dene ja rahi thi kisi motercycle vale ne thokar maar di aur palat kar bhi nahi dekha.... bada mushkil tha us behosh bitiya ko apni attachment vali byke par le jana fir bhi koshish ki to 50 metre ki duri par ek sajjan car se lene aa gaye...din bhar ankh ke aage us bachchhi ka cgehara ghum raha hai

mehek ने कहा…

samajik sandes deti bahut sundar kavita.

Udan Tashtari ने कहा…

यह कविता नहीं है..एक उम्दा यथार्थ...एक सशक्त भाव की शब्दा्भिव्यक्ति. ब्धाई.

Harihar ने कहा…

ये हस्पताल पहुँचा दे
कुछ और न भी हो तो
मृत्यु होने पर मेरी
घर मेरे खबर करा दे ।

बहुत संवेदनशील बात लिखी

Kavi Kulwant ने कहा…

बहुत अच्छा लिखती है आप..
http://kavikulwant.blogspot.com