Monday, October 08, 2007

इन्तजार

आँखों में नींद नहीं
है किसका इन्तजार
मन में चैन नहीं
क्यों हूँ बेकरार
कोई भी तारा नहीं
क्यों है अन्धकार?
न कहीं है चन्द्र मेरा
न उसकी कहीं प्रभा
बादलों ने यूँ मानो
ढका है आकाश को
ढक दिया है जैसे
मेरे ही मन आकाश को ।
शायद चन्द्र यों छिपा
बचने को मेरे प्रश्न से
जानता है प्रति निशा
होगा उसका मुझसे
मेरी बाट तकती आँखों
व मेरे प्रश्नों से सामना ।
जानता वह नहीं यह
बंदी वह फिर भी रहेगा
चाहे कितना वह भाग ले
मेरे मन में जब बस गया
तो कैसे वह मुझसे दूर है
बंद मेरी आँखों में चन्द्र है ।
नित पूछूँगी वही प्रश्न उससे
चाहे कितना भी वह टाल दे
बादलों को मैं बोल दूँगी अब
ना उसको यों परदे में छिपा
लुका छिपी तो बहुत हो गई
अब कुछ अपना उत्तर भी बता ।
सोचती हूँ चन्द्र से क्या
कोई और भी कभी करता
इतने सारे अन्तस के प्रश्न
या मैं ही हूँ इक बांवरी
जो नित जिज्ञासा लिए
करती रहती हूँ इन्तजार ।
घुघूती बासूती

8 comments:

  1. सोचती हूँ चन्द्र से क्या कोई और भी कभी करता
    इतने सारे अन्तस के प्रश्न या मैं ही हूँ इक बांवरी
    जो नित जिज्ञासा लिए करती रहती हूँ इन्तजार।
    सुंदर छवियां, कोमल भावनाएं। पढ़कर अच्छा लगा।

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  2. सुंदर!! बड़े दिन बाद आपकी कोई कविता दिखी!!

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  3. इंतजार की माया ही ऐसी है। जार-जार हो जाता है तन-मन।

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  4. "या मैं ही हूँ इक बांवरी"
    इतना तो यकीन है कि आप अकेली नहीं है।
    सुंदर कविता।

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  5. या मैं ही हूँ इक बांवरी
    जो नित जिज्ञासा लिए
    करती रहती हूँ इन्तजार
    वाह मेम बहुत दिनों के बाद आपको पढ़ा है आज बहुत अच्छा लगा

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  6. Beautiful ..
    to wait & watch for the outcome so lucid and crafted.

    Abhi

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  7. बहुत खूब

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  8. अति सुंदर. पहली बार पढ़ा आप को. रचना बहुत अच्छी लगी. भविष्य में आपकी रचनायें ज़रूर पढ़ना चाहूंगा.

    मीत

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