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Sunday, March 29, 2009

गाय के नाम पर ही सही

गाय के नाम पर ही सही

न जाने कितने समय से हमें बताया जा रहा है कि पॉलीथीन की थैलियाँ हमारे पर्यावरण के लिए बहुत घातक हैं। परन्तु कोई भी अपनी इस जरा सी सुविधा को त्यागने को तैयार नहीं है। हरेक को सामान पॉलीथीन में ही चाहिए। अब तो हाल यह है कि आप न चाहें तो भी दाल, चावल, गेहूँ, हर वस्तु पहले से ही पॉलीथीन में पैक होकर आती है। फिर जब आप खरीददारी कर चुकें तो इस सब सामान को रखने को एक और बड़ा सा पॉलीथीन मिलता है। सब्जी वाले अलग पतली कमजोर पॉलीथीन की थैलियों में सब्जी देने को तैयार रहते हैं। मुझ जैसे लोग को अपने कपड़े के थैले आगे करते हैं उन्हें वे आश्चर्य से देखते हैं।

मुझे सुपर मार्केट्स, मॉल आदि से भी कोई समस्या नहीं है। समस्या है तो उनकी हर सामान के लिए दिए जाने वाली बड़ी बड़ी पॉलीथीन की थैलियों से ! यहाँ जाओ तो आराम से सब्जी आदि खरीदी जा सकती है। सब्जी तुलवाने के लिए डालने के लिए पॉलीथीन की थैलियों का अनन्त गोल गोल लिपटा हुआ थान सा रहता है। एक एक सब्जी के लिए निकाले जाओ, डाले जाओ। फिर जब बिल बन रहा होता है तब इनको बड़े बड़े पॉलीथीन की थैलियों में डाला जाता है। कहीं कहीं तो इन्हें गरम लोहे पर लगाकर इस तरह पैक किया जाता है कि इनका दोबारा उपयोग नहीं कर सकते।

कमी थी तो हर वस्तु पाउच में आती है। शैम्पू से लेकर, सुपारी, गुटखे तक सबकुछ। उपयोग करिए और फैंकिए। कहीं भी फैंकिए। साफ करने के लिए कौन आएगा इसकी चिन्ता मत करिए। कुछ कुछ गीता के ज्ञान के अंदाज में। हे भारतीय, तू तो बस अपना गुटखा खा और पाउच सड़क पर फैंक, सफाई की तू चिन्ता मत कर (कैंसर की भी नहीं)। खैर, कैंसर की पीड़ा तो आपका निजी मामला है किन्तु यह सड़क, यह धरती, यह तो सार्वजनिक है। इसपर तो रहम कीजिए। पाउच गरीबों के लिए शायद वरदान साबित हुए हैं। मुझे याद है कर्नाटक में यदि शनिवार को स्कूल छूटते समय दुकान पर पहुँच जाओ तो छात्र छात्राओं की भीड़ शैम्पू के पाउच खरीदने को लग जाती थी। सौ रुपए के लगभग की शैम्पू की बोतल न खरीद पाने वाले एक रुपए का पाउच तो खरीद ही सकते थे। परन्तु दुख तब होता है जब हम बड़ी बोतल खरीद सकते हैं और फिर भी पाउच खरीदते हैं। काश, ये शैम्पू भी होम्योपैथिक दवाओं की शीशियों जैसी शीशियों में मिलते। काँच का कम से कम पुनः उपयोग तो हो सकता है।

हमारे माता पिता भी तो कपड़े के थैलों में समान लाते थे। क्या अपने साथ थैली ले जाना इतना कठिन हो गया है? हम अपनी कार, स्कूटर आदि में कपड़े के थैले या पहले के घर में पड़े पॉलीथीन के थैले रख सकते हैं ताकि जब भी कुछ खरीदना हो इनका उपयोग कर सकें।

सारे शहर, गाँव पॉलीथीन की थैलियों से अटे पड़े हैं। सड़कें, नालियाँ, कूड़े के ढेर सब इनसे भरे हुए हैं। नालियों में पानी आगे नहीं सरकता। मुझे याद है कि जब एक नदी में बाढ़ आई थी तो उसके बाद आस पास की सारी झाड़ियाँ, पेड़ वनस्पति इनसे सुशोभित थे। पहले जहाँ जंगली पौधों पर फूल दिखते थे अब वहाँ पॉलीथीन की थैलियाँ दिखती हैं। बरसात का पानी नालियों, नालों से निकल नहीं पाता। पहले तो केवल भूमि के कटाव व बहाव से नदियाँ कम गहरी होती जा रही थीं अब ये पॉलीथीन की थैलियाँ और आ गईं हैं।

लाख कानून बना लें, इनकी खपत दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। राजकोट में कुछ समय पहले भी कपड़े की थैलियों का अभियान चलाया गया था। २४ दिसम्बर के टाइम्स औफ इंडिया में खबर आई थी कि पॉलीथीन के उपयोग पर रोक लगाने व कपड़े की थैलियों का प्रचार करने के लिए राजकोट नगर निगम कम दामों में सब्जी बेचने वालों व दुकानदारों को कपड़े की थैलियाँ मुहैया कराएगी। 'एश्वर्य महिला उद्योग सहकारी मंडल' पुराने व फालतू बचे कपड़ों की धुलाई कर इनसे पाँच किलो समान लायक कपड़े के थैले एक रुपए में उपलब्ध करा रहा है। परन्तु यह कितना सफल हुआ कह नहीं सकती।

हमारे देश में कुछ भला करना हो तो लोगों को विज्ञान या लोक कल्याण या पर्यावरण की दुहाई देना बेकार है। यदि किसी उद्देश्य को पाना हो तो बात को थोड़ा सा धार्मिक रंग दे दो और देखो बात बनने की सम्भावना बढ़ जाती है। अब लगता है कुछ बात बनेगी। सबको पता तो था किन्तु अब और बताया जा रहा है कि कचरे के साथ हमारी गौ माताएँ पॉलीथीन भी खा लेती हैं। इससे वे कितना पौष्टिक दूध दे पाती हैं यह तो पता नहीं किन्तु जब उनके पेट में इसकी मात्रा बढ़ती जाती है तो उन्हें कष्ट होता है। अब सैकड़ों लोगों के सामने पशु चिकित्सक ऐसी गायों का औपरेशन करके ये पॉलीथीन की थैलियाँ निकाल रहे हैं। हाल में ही एक गाय के पेट में से ३५ किलो तो दूसरी के पेट से ८० किलो पॉलीथीन व प्लास्टिक निकाला गया।(क्या यह सम्भव है?) 'श्री खिरक गौसेवा चैरिटेबल ट्र्स्ट' अब लोगों में जन जागरण फैलाएगा कि पॉलीथीन व प्लास्टिक हमारे पर्यावरण व हमारी गायों के लिए कितना हानिकारक है। अब यदि गाय के प्रति श्रद्धा के कारण ही लोग पॉलीथीन का उपयोग कम कर दें तो यह धर्म व धार्मिक भावनाओं का एक सकारात्मक उपयोग होगा। पोरबंदर व वैरावल के मछुआरे नाविक मुरारी बापू के आग्रह पर शार्क‍- व्हैल की रक्षा करने का वचन ले चुके हैं व जब ये मछलियाँ इनके जाल में फंसती हैं तो वे उन्हें स्वतन्त्र करने को अपने पचास हजार रुपए के जाल भी काट देते हैं। उन्होंने मछुआरों को बताया कि जैसे आपकी बेटियाँ गर्भावस्था में अपने मायके आती हैं वैसे ही ये मछलियाँ भी प्रजनन के लिए आपके तट पर आती हैं। उनकी बात मानने से शार्क‍- व्हैल की लुप्त होती जाति की रक्षा हो रही है। यदि 'श्री खिरक गौसेवा चैरिटेबल ट्र्स्ट'के धार्मिक प्रचार से हमारी गायों के साथ साथ हमारी धरती की भी रक्षा हो जाए तो मैं उनकी आभारी रहूँगी।

घुघूती बासूती