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Friday, June 05, 2009

सौराष्ट्र के किसान पक्षियों के लिए ज्वार बोते हैं, फलों के वृक्षों पर फल छोड़ते हैं !

आज के स्वार्थी जमाने में यह बात चौंकाने वाली लगती है परन्तु यह है सच। १ जून के टाइम्स औफ इन्डिया में सौराष्ट्र के किसान पक्षियों के लिए ज्वार बोते हैं का समाचार तो है ही परन्तु फल वाली बात तो मेरी देखी हुई है।


सौराष्ट्र के किसानों ने यह महसूस किया कि जबसे उन्होंने कपास, मूँगफली व गन्ने जैसी फसलें लगानी शुरू की हैं पक्षियों की संख्या घटती जा रही है। सो जोडिया तालुके के किसानों ने एक नया समाधान ढूँढ निकाला है। ये हर खेत में ज्वार या बाजरे की दो पंक्तियाँ केवल पक्षियों के लिए लगाते हैं। इसे ये भगवान नो भाग (भगवान का भाग) कहते हैं। राजू बाला और उसके जैसे बहुत से किसानों ने यह करना शुरू किया है।


यह शुरुआत पक्षियों व पर्यावरण के लिए वरदान सिद्ध होगी। फोरेस्टर वी डी बाला का कहना है कि उनका 'नवरंग नेचर क्लब' गाँव गाँव में 'राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत' का संदेश दे रहा है। उन्हें आशा है कि इस मानसून में १०,००० किसान ऐसा करेंगे।


समाचार सच होगा इसका अनुमान आप मेरे सौराष्ट्र प्रवास के अनुभवों से लगा सकते हैं। लगभग साढ़े नौ वर्ष पहले जब मैं पोरबन्दर के पास रहने आई तो पहले ही दिन कामवाली से कहा कि ओटे पर बहुत चींटियाँ हैं जरा गीले कपड़े से पोछ दो। तो वह बोली यह तो जीव हत्या होगी। पंखा चला दो चींटियाँ चली जाएँगी।


कुछ समय बाद जब चीकू पकने लगे तो माली तोड़ तोड़कर देता रहा। फिर बंद कर दिया। मैंने पूछा कि भाई क्या बात है चीकू नहीं तोड़ते। वह बोला कि खत्म हो गए। मैंने दिखाया कि दो पेड़ों पर अभी तो ३०-४० चीकू लगे हुए हैं। वह बोला कि वे तो चिड़ियों के लिए छोड़े हैं वे थोड़े ही तोड़ेंगे। ‍‍मैं अपने स्वार्थीपन पर लज्जित थी और उसके बड़प्पन पर खुश। ध्यान रहे, चीकू मुझे जरा भी पसन्द नहीं और घुघूत जी को मधुमेह के कारण मना हैं, सो लगभग सभी माली, कामवाली, ड्राइवर आदि को ही बाँटे जाते थे।


एक और बात जो मैंने यहाँ देखी वह यह कि सब्जी मंडी आदि में गाय, बकरी आदि घूमते हैं, उन्हें सब्जियों पर मुँह मारने से रोकते तो हैं परन्तु कभी पीटते नहीं। कई बार मेरे सामने ही गाय पूरी की पूरी यहाँ बहुत मंहगी मिलने वाली फूल गोभी लेकर चलती बनी परन्तु डंडा उसे कभी नहीं पड़ा।


बहुत से घरों के सामने सीमेन्ट की छोटी छोटी हौदियाँ सी बनी होती हैं। गृहणियाँ उनमें गाय के लिए खाना डालती हैं।


मुझे गाय भैंस का सड़क पर घूमना तो पसन्द नहीं परन्तु ये सब बातें यहाँ के लोगों का पशु पक्षी प्रेम अवश्य दिखाती हैं। शायद तभी भारत भर में गिर का जंगल ही एक सुरक्षित जंगल है जहाँ सिंहों की संख्या बढ़ रही है घट नहीं रही। जबकि सिंह प्रायः मालधारियों व गाँव वालों के पशु खा जाते हैं। सरकार मुआवजा तो देती है परन्तु कभी कोई उनका शिकार नहीं करता। जितने भी शिकार हुए वह मध्यप्रदेश के कटनी से आए शिकारियों ने ही किए और वे पकड़े भी गए।


शायद यही कारण है कि मैं अपनी बस्ती तक में मोरों को नाचते और नील गायों व कभी कभी हिरणों को भी घूमते देख सकती हूँ। एक बार तो लगभग बीस फुट की दूरी पर बाघ को भी बस्ती में देखा। मैंने यहाँ व पहले जहाँ पोरबन्दर के पास रहती थी वहाँ आज तक साँप निकलने पर उसे मारते हुए नहीं देखा। सच तो यह है कि हमें बताया गया है कि कम्पनी के मालिक लोगों ने साँप मारने को मना कर रखा है।


तो कुछ तो विशेष है सौराष्ट्र के लोगों में!


घुघूती बासूती