कल आगाज़ पर सुरा बेसुरा में कुछ बेहद मधुर गीतों को सुन रही थी। कुछ गीत यादों में एक बहुत विशेष स्थान बना लेते हैं। इनमें से एक है ' नन्ही कली सोने चली’। मेरी आवाज सदा से बहस, भाषण, वादविवाद के लिए सही रही है, गाने के लिए कभी नहीं। आवाज कितनी ही बुलन्द क्यों ना हो, कितनी ही बेसुरी क्यों न हो, शायद ही कोई माता पिता, विशेषकर माँ हो जिसने अपने बच्चे को लोरी न सुनाई हो। सो मैं भी अपनी दोनों बेटियों को लोरी सुनाती थी। बस वे ही यादें ताजा हो गईं।
बड़ी बेटी ने अपने जीवन के पहले २५ दिन केवल दिन में सोना उचित समझा और रात में जागना। रात को ठीक ९ बजे जाग जाती थी व सुबह ६ बजे सो जाती थी। २६वें दिन से उसने अपना दिन का सोने का कार्यक्रम भी रद्द कर दिया। अब केवल एक आध घंटे को दिन में दो तीन बार सो लेती थी। यह कार्यक्रम उसने तीन वर्ष की आयु तक चालू रखा। मेरे पड़ोस में ही हमारी फैक्ट्री के डॉक्टर रहते थे जो मेरी बिटिया की इस आदत का विश्वास नहीं करते थे। दिन भर तो उनकी पत्नी , हमारी व उनकी कामवाली उसे जागते देखती थीं व कई बार वे स्वयं भी। एक रात उन्होंने कहा कि आज रात मैं भी आपके घर आकर देखूँगा कि वह कैसे नहीं सोती है। जब उन्होंने देखा कि रात के १ बजे तक भी वह नहीं सोई तो उन्होंने उसे फिनारगन या ऐसी ही कोई दवा पिलाई व उन्होंने एक उपन्यास उठाया और बेटी पर नजर रखना आरम्भ कर दिया। रात को तीन कॉफी पीकर उन्होंने स्वयं को जगाए रखा। जब सुबह के ५ बजे तक भी वह नहीं सोई तो बोले, 'भाभी अब मैं मान गया आपकी बात' और घुघूताजी, मुझे व सवा महीने की मेरी बिटिया से विदा लेकर अपने घर चले गए।
बिटिया सारी रात गोदी में रहना व चलते हुए हिलाए जाना पसन्द करती थी। डॉक्टर स्पॉक की बच्चों को पालने की पुस्तक उन दिनों बहुत प्रसिद्ध थी। परन्तु मैं कभी भी उनके तरीकों, याने बच्ची को रोते हुए तब तक के लिए छोड़ देना जब तक कि वह सो न जाए, का उपयोग नहीं कर पाई। मैं उसे सुलाने के लिए कन्धे पर उसका सिर रखकर चलते चलते थपथपाती थी और वह मुझे पीठ पर थपथपाती थी। यदि मैं गति तेज करती थी तो वह और तेज कर देती थी। मैं उसे लोरी सुनाती थी तो वह भी आआआआआ करके मुझे सुनाती थी। मेरे स्वर के साथ सदा स्वर मिलाकर ! साल सवा साल की हुई तो लोरी सुनाने को कहती और स्वयं खिलौनों से खेलती रहती। यदि सोने को कहो तो रोने लगती।
जब बड़ी बिटिया साढ़े तीन वर्ष की हुई तो छोटी बिटिया का आगमन हुआ। सोने में बहुत अधिक परेशान तो नहीं किया । उसकी सदा माँग होती ' नन्नी कली ' सुनाओ। मैं सुनाती तो वह सोने की बजाय टुकुर टुकुर मुझे देखती रहती और पूरा ध्यान रखती कि मैं कोई पंक्ति उल्टी सीधी या आगे पीछे तो नहीं गा रही, या जो पंक्ति दो बार गानी है वह एक बार में ही तो नहीं निपटा रही। एक गल्ती होने पर'नईं ऐसे नहीं'कहती। गल्ती का अर्थ होता था, एक बार फिर से शुरू से शुरू करना और ध्यान रखना कि इस बार कोई गल्ती न हो।
आज भी जब उन दृष्यों को याद करती हूँ तो बरबस हँस पड़ती हूँ। बिटिया को आश्चर्य होता है कि मैं दो थप्पड़ क्यों नहीं लगा देती थी। परन्तु गोद में छोटी सी, कोमल सी टुकुर टुकुर ध्यान से देखती व सुनती उस बच्ची पर कोई कैसे हा्थ उठा सकता था!
आज बार बार 'नन्नी कली' सुनते सुनते मैं एक बार फिर वे पल जी उठी।
घुघूती बासूती