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Monday, February 13, 2012

यह डे, वह डे, किस डे, हग डे, वर्ल्ड मैरिज डे, वैलेन्टाइन डे

बचपन में पिताजी को सुबह पूजा के समय पंचांग खोलकर तिथि देखते देखती थी। एकादशी या पूर्णिमा हुई तो उपवास होता था। माँ भी प्रायः सुबह ही उनसे कहती थीं कि देखिए तो रक्षाबन्धन/ हरेला/ होली/ दीवाली/ वसन्त पंचमी/ भिटौली/ श्राद्ध या नवरात्रियाँ कब हैं। ये या अन्य ऐसे विशेष दिन मनाने की तैयारी जो करनी होती थी। कुछ विशेष खरीददारी, कुछ पकवान बनाने, घर में एँपण देने, किसी ननद को मनी और्डर भेजना होता, तो कभी मंदिर में सीदा देना होता, पंडित जी को घर बुला खाना खिलाना होता, बेल पत्र तोड़ने होते, उनपर शिव नाम लिखना होता, जौं बोने होते या कम से कम एक रूमाल तो हल्दी में रंगना होता। कभी पिताजी को और भी लम्बी पूजा करनी होती या फिर मंदिर जाना होता।

बीच बीच में यदि डाक से किसी को किसी त्यौहार की भेंट भेजनी होती तो माँ भी पंचांग खोल बैठ जातीं।

फिर हम बड़े हुए। स्कूल कॉलेज की छुट्टी डायरी में दी होती और वह हमारा पंचांग हो गया। विवाह पश्चात बच्चों की डायरी या फिर कैलेन्डर में दर्ज लाल दिन पंचांग का काम कर देते। एक दो सहेली पंचांग वाली होतीं तो उनसे पूछ लेती। महिलामंडल के रजिस्टर में भी त्यौहार के दिन लिख दिए जाते ताकि उन दिनों का कोई कार्यक्रम न बना लिया जाए। पति का कारखाना तो ३६५ दिन चलता सो हर दिन एक सा होता। दीवाली हो या दशहरा या राखी या वसन्त हर दिन ठीक उसी समय काम पर जाना। रविवार कुछ देर से जैसे नौ साढ़े नौ बजे कामपर जाकर मनाया जाता। हाँ, होली के दिन सुबह काम पर नहीं जाते थे़ सबको मिलकर होली जो खेलनी होती थी।

मुम्बई आई तो वीकेन्ड क्या होता है समझ आया। शनिवार, रविवार छुट्टी और त्यौहारों की आठ छुट्टियों की सूची साल के आरम्भ में ही हाथ आ जाती और मैं बड़े यत्न से उन्हें कैलेन्डर पर गोला लगाकर व त्यौहार का नाम लिख चिन्हित करने लगी। चाहे पति को ये छुट्टियाँ ५९ पार करने के बाद ही मिलने लगी हों, उमंग तो मुझमें बच्चों सी ही है। आखिर हमारे घर में भी छुट्टियाँ मनने जो लगीं हैं।

किन्तु अब भी बात नहीं बनी। शाम होते या रात होने के बाद या पति के सो जाने के बाद नेट पर जाने पर फेसबुक पर भ्रमण करने पर पता लगता है कि आज तो किस डे, हग डे, वर्ल्ड मैरिज डे थे़। आज क्या, बारह बज चुके तो विलायती अंदाज में कल ही हो चुका मानो। अब क्या जगाकर किस डे, हग डे, वर्ल्ड मैरिज डे मनाए जाएँ? किसी जमाने में सोए हुए में होली मनानी आरम्भ कर दी जाती थी।

कई दिन से सोच रही थी कि इतनी वस्तुएँ, व्यक्ति, भावनाओं, सम्बन्धों, समस्याओं को जब मनाना हो तो ३६५ दिन तो कम ही पड़ते होंगे। यदि मातृ दिवस मनाना है तो क्या दादी या बुआ को नाराज किया जा सकता है? यदि स्त्री दिवस तो फिर पुरुष और हिजड़ा दिवस भी तो मनाना होगा। सो सोच रही थी कि या तो हर दिवस को दशक में एक बार आना चाहिए या फिर हर घंटा ही नियत कर दिया जाए १२ फरवरी को दोपहर एक बजे बाल घंटा तो दो बजे पैर घंटा, तीन बजे प्रेम घंटा तो चार बजे विष वमन घंटा!

आज गूगल करके ढूँढा तो पाया कि सच में एक एक दिन में कई दिवस हैं आप अपना दिवस चुन लीजिए, गिलहरी दिवस मनाना पसन्द करेंगे या गधा दिवस!

अब सोचती हूँ कि जैसे पिताजी सुबह पंचांग देखते थे मैं कम्प्यूटर खोल गूगल को नमस्कार कर उसमें उस दिन के सारे दिवस देख अपनी पसन्द के चुन लूँ और पति के दफ्तर जाने से पहले उनके साथ मिल वह दिवस मना लूँ। यदि मूड अच्छा हो तो पति को ही चुनाव करने देकर उनकी पसन्द का दिवस मना लूँ। यदि कोई भी मन भावन न हो तो अपने मन से अचार दिवस, पापड़ दिवस या भुनी मिर्च दिवस या फिर पति से झगड़ा दिवस ही मना लूँ। यदि बढ़िया रहा तो आप सबको भी बता दूँगी और आप चाहें तो आप भी वह दिवस मना सकते हैं। आखिर कब तक यूरोप अमेरिका के मसाला विहीन दिवस मनाएँगे? वैसे मैं आपको फरवरी के विभिन्न दिनों की ही नहीं, सप्ताह भर मनाए जाने वाले...उत्सव व इस महीने भर मनाए जाने वाले उत्सवों के नाम की लिंक भी दे रही हूँ। जो चाहें वह दिन मनाइए। यह फरवरी उत्सव सूची है।

आज है शुभ पुरुष दिवस! ओह वह तो बीत ही चला है सो चलिए..
शुभ इम्पलोयी लीगल अवेयरनेस डे/
शुभ गेट ए डिफरेन्ट नेम डे/
शुभ मेडली इन लव विद मी डे/
शुभ क्लीन आउट युअर कम्प्यूटर डे !

और यदि यह लेख कल १४ को पढ़ें तो आपके पास सत्रह दिवस हैं मनाने को और यदि पंचांग खोलेंगे तो एक आध और भी मिल सकता है। यह तो कुछ भारत के मतदाताओं सा हाल हो गया। कितने दल, कितने प्रत्याशी! जो चाहो चुन लो किन्तु आपका हाल वही रहेगा। खैर, फिलहाल तो आप कल वेलेन्टाइन डे ही मना लीजिए। शुभ वेलेन्टाइन डे!

घुघूती बासूती

शब्दार्थः
भिटौली=चैत के महीने में बहनों को भेंट भेजी जाती है जो प्रायः मनी और्डर से ही जाती है।
हरेला= नवरात्रियों में पूजा के पास ही टोकरी या बर्तन में जौं बोए जाते हैं।
एँपण= कुमाऊँ में पिसे चावल के घोल से दी जाने वाली अल्पना या रंगोली।