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Tuesday, April 27, 2010

टिमटिम तारा का जाना, अवकाश, शोक और बच्चों को लगा शौक

अभी अभी 'अनवरत' पर दिनेशराय द्विवेदी जी का राजकीय शोक पर लिखा लेख पढ़कर आ रही हूँ। इससे पहले 'मुसाफिर हूँ यारों' में नीरज जाट के चन्डीगढ़ पर तीन लेख पढ़े थे। मन यूँ ही चन्डीगढ़मय हो रहा था। सो मुझे अपने स्कूली दिनों के एक उस दिन की याद आ गई जब शोक मनाने के लिए स्कूल में छुट्टी हो गई थी।

मैं स्कूल में नई नई गई थी। इससे पहले बस्ती के स्कूलों में ही पढ़ी थी। ये स्कूल आठवीं तक ही होते थे और उसके बाद निकट के शहर में जाकर पढ़ना होता था। अंग्रेजी स्कूल में भी पढ़ना था और मिशनरी में भी नहीं पढ़ना था। बस्ती के शेष सारे बच्चे या तो हिन्दी स्कूल में पढ़ने जाते थे या फिर कॉन्वेन्ट में। मुझमें तब भी यह स्वतन्त्र रहने का रोग था बल्कि अब से और भी अधिक था। किसी भी धर्म, विशेषकर अन्य के धर्म के गीत गाना व कॉन्वेन्ट स्कूल का लगभग तानाशाही शासन मुझे रास नहीं आने वाला था, यह जानती थी। सो एक ऐसे स्कूल में गई जो बहुत अधिक लोकतान्त्रिक था, अधार्मिक था या कहिए जहाँ धर्म नहीं था। किन्तु यहाँ केवल दो समस्या थीं, एक तो यह कि अपनी बस में आने वाली मैं इकलौती छात्रा थी, दूसरी यह कि मुझे सुबह सुबह सवा या डेढ़ घंटे पहले स्कूल पहुँचना पड़ता था।

स्कूल गर्मियों में सुबह साढ़े सात बजे लगता था। हमारी बस के दो चक्कर लगते थे पहला सुबह साढ़े पाँच बजे जाता था और सवा छह बजे तक स्कूल पहुँचा देता था। दूसरा पौने सात बजे का होता और स्कूल साढ़े सात या सात पैंतीस पर पहुँचा देता था। ठीक साढ़े सात पर स्कूल का गेट बन्द हो जाता था। उसके बाद आने वाले पूरी असेम्बली भर सजा पाते और उनका नाम लेट लतीफों के रजिस्टर में चढ़ जाता, हर लेट आने वाले बच्चे के कारण उसके हाउस के अंक कम हो जाते आदि आदि। प्रिन्सिपल से अपनी समस्या बताने पर उन्होंने कहा कि देर से आने की वे अनुमति नहीं देंगी। कॉन्वेन्ट में पढ़ने की अनुमति मेरा मन नहीं देता था सो मैंने साढ़े पाँच की बस से जाना ही स्वीकार कर लिया।

वीरान स्कूल में इतनी सुबह जाकर अपनी कक्षा में बैठ जाना, कुछ पढ़ते रहना या बस यूँ ही स्कूल के विशाल मैदानों के चक्कर लगाना मेरे दिन का आरम्भ होता था। भय की बात कभी मन में नहीं आई। भय होता भी तो मनुष्य नाम के प्राणी से ही होता। खैर, कुछ ही दिनों में गर्मियों की छुट्टियाँ हो गईं।

गर्मियों के अवकाश के बाद का पहला दिन था। डेढ़ घंटे की प्रतीक्षा के बाद स्कूल शुरू हुआ। सभी बच्चों में इस दिन बहुत उत्साह रहता है। मैं तो अभी भी काफी नई थी सो मित्र भी नहीं ही थे। असेम्बली में केवल राष्ट्रीय भावना वाले गीत ही होते थे। प्रार्थना थी....
हम नौजवान देश के बढ़ते ही जाएँगे
हम हर कदम पर शान्ति का घर बसाएँगे।

उस दिन असेम्बली में घोषणा की गई कि एक अध्यापिका का निधन हो गया है सो मौन रखा जाएगा और उसके बाद स्कूल की छुट्टी हो जाएगी। अध्यापिका का नाम तो याद नहीं परन्तु जो नाम मेरे सहपाठियों ने उन्हें दिया था और जिसका उपयोग कर उन्होंने मुझे उनकी बातें बताईं थीं वह याद है। सब उन्हें टिम टिम तारा कहते थे। अभी छुट्टियों से कुछ दिन पहले ही उनका विवाह हुआ था। वे पिछली कक्षा में हिन्दी पढ़ाती थीं। एक कविता थी टिम टिम तारा वाली बस उसको पढ़ते समय ही बच्चों ने उनका नामकरण कर दिया था। सब बच्चे उदास थे। टन्नी तो बहुत ही अधिक उदास था। टन्नी का नामकरण टिम टिम तारा ने किया था। टन्नी नामक एक कठपुतली की कहानी पाठ्यपुस्तक में थी। हमारा टन्नी भी बहुत शैतान व अशान्त था। एक पल भी टिक कर नहीं बैठता था। सो टिम टिम तारा ने उसे कहा कि वह भी टन्नी ही है। उस दिन सब दुखी साथियों से मैंने टिम टिम तारा के बारे में विस्तार से जाना और इस बातचीत के द्वारा बहुत से छात्रों को भी जाना।

टिम टिम तारा का विवाह छुट्टियों से कुछ दिन पहले ही हुआ था। बच्चों ने 'मिस' को उपहार भी दिया था। और वे आशा कर रहे थे कि छुट्टियों के बाद देखेंगे कि मिस विवाह के बाद कैसी दिखती हैं। किन्तु छुट्टियों में ही मिस रसोई में जल गईं और मर गईं। कई जोड़ी आँखों में नमी थी। एक दो स्पष्ट रो रहे थे। यह शोक मनाने को मिली एक ऐसी छुट्टी थी जब कम ही विद्यार्थी सिनेमा का कार्यक्रम बनाते। शायद किसी ने भी नहीं बनाया। जब भी कभी शोक के लिए छुट्टी मिलती है तो मुझे वह अपनी अनदेखी मिस टिम टिम तारा याद आ जाती हैं। उस दिन दोपहर को डेढ़ बजे तक मुझे बैठकर स्कूल बस की प्रतीक्षा करनी थी। टिम टिम तारा बहुत देर तक मेरे साथ रहीं थीं।

घुघूती बासूती