कब क्या बात किसी को कुछ सामान्य असामान्य या महान करने को उकसा दे कहा नहीं जा सकता। कौन बात या व्यक्ति किस कृत्य या घटना का निमित्त बने कहा नहीं जा सकता।
एक तीन साल की बच्ची अपने द्वारा बनाए एक चित्र से एक १५९ किलो की ३५ वर्षीया अध्यापिका को इतनी जोर से झकझोर सकती है कि वह ९५ किलो वजन ही गँवा बैठे।
हुआ यह कि एक तीन साल की बच्ची ने अपनी नर्सरी कक्षा में एक चित्र बनाया। कोई विशेष चित्र नहीं था। बस चार पतली सी टाँगे व बाँहें थीं, एक सिर था और एक काफी भीमकाय सी काया सन्तरी कपड़े पहने थी। अध्यापिका लिंडा पहले तो चित्र देख मुस्काई फिर बच्ची से पूछा कि क्या यह तुम्हारी माँ है? बच्ची बोली, "नहीं मेरी माँ मोटी नहीं है। यह तुम हो। " अध्यापिका यह सुन रो पड़ी और उसने कुछ न कुछ करने की ठान ली। वह वेट वाइज़ नामक एक समूह जिसका उद्देश्य वजन सही रखना है की सदस्य बन गई। चार वर्ष में लिंडा ९५ किलो वजन कम कर ६४ किलो की हो गई है। लिंडा ने उस सत्य को उजागर करने वाले चित्र को अपने फ्रिज के द्वार पर लगा रखा है ताकि वह कभी भटक न जाए।
(लिंडा इससे पहले भी अपने डॉक्टर से अपने वजन के बारे में बात कर चुकी थी। उसकी मशीन पर उसका वजन देखा ही नहीं जा सकता था क्योंकि वह केवल १२२ किलो तक ही दिखाती थी। डॉक्टर ने कहा था कि वह कुछ वर्ष ही जी सकेगी। शल्य चिकित्सा द्वारा गैस्ट्रिक बैन्ड लगाना ही एक उपाय बचा था। और उसके वजन के साथ शल्य चिकित्सा करना भी खतरनाक था। सो उसने शल्य चिकित्सा नहीं करवाई।)
एक विशेष टेप्स का थोड़ा सा खुलासा सुन पढ़कर ही मैं टीवी के समाचार सुनना बन्दकर, चार चार समाचार पत्रों को अधिक पढ़ना बन्दकर, सरसरी नजर डाल, फिर से सिलाई मशीन, उपन्यास आदि ले बैठना शुरू कर चुकी हूँ। जिसका परिणाम हैं उधड़े, बटन निकले कपड़ों के ढेर का कुछ वैसे ही सिकुड़ जाना जैसे लिंडा का वजन व काया का सिकुड़ना, सालों से रखे नए कपड़े के टुकड़ों का जादुई रूप से वस्त्रों में परिवर्तित होना, जैसे उनका ब्लाउज, सलवार या चूड़ीदार पजामे के रूप में नया जन्म होना।
कहाँ किसी स्त्री का भारतीय मीडिया व उद्योग के दिग्गजों से वार्तालाप होना, कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर कौन बनेगा यह मंत्री या वह मंत्री तय करना (इन दोनों में कोई अन्तर है क्या?), क्या होगा कल का समाचार, क्या होगा उसका प्रारूप तय करना और कहाँ पेड़ों का कटने से बचना, कपड़ों का सिल जाना, दर्जियों के धंधे पर प्रभाव पड़ने के आसार होना? भला कैसे यह सब सम्बन्धित हो सकते हैं? असम्भव तो लगते हैं किन्तु सम्बन्ध है।
देखिए, ये टेप सुन व उनके विषय में पढ़ने के बाद मैं इस अभियान में जुटी हूँ कि घर में जो चार समाचार पत्र आते हैं वे सारे नहीं तो आधे तो बन्द किए जाएँ। एक रविवार मैंने चारों का वजन लिया था। मेरी रसोई की मशीन जो दस ग्राम तक का वजन सही दे देती है ने उनका वजन ८५० ग्राम बताया था। अब यदि सप्ताह के अन्य दिन इतना वजन न भी हो तो भी ५५० ग्राम तो हो ही जाता है। जी हाँ, मैं अभी नापकर आई हूँ। देखिए यदि हम सब समाचार पत्र लेना बन्द कर दें तो कितना कागज बचेगा और फलस्वरूप पेड़ भी। यदि समाचार पत्र नहीं होंगे तो.... कोई व्यक्ति समाचार बनाने वालों पर प्रभाव कैसे डालेगा? नहीं डाल पाएगा तो शायद कौन बनेगा .....मंत्री भी न निर्धारित कर पाए या कर पाने का प्रयास न करे। शायद कुछ कम घोटाले हों।
यदि समाचार पत्र पढ़ना बन्द करूँगी तो अपने समय के साथ कुछ तो करना पड़ेगा। शायद कपड़े सिलना शुरू कर दूँ, सो दर्जियों की रोजी रोटी पर प्रभाव पड़ेगा। शायद फिर से उपन्यास पढ़ना शुरू कर दूँ तो लेखकों पर प्रभाव पड़ेगा। यदि सोचूँ कि मनघड़न्त समाचार सुनने से बेहतर है कि मनघड़न्त कहानियाँ ही टी वी पर देखूँ तो शायद फिर से सिनेमा देखना शुरू कर दूँ। या फिर मैं स्वयं मनघड़न्त कहानियाँ लिखना शुरू कर दूँ!
यदि मेरी तरह ही कुछ और लोगों पर भी ऐसा ही प्रभाव पड़ा हो तो शायद प्रकृति व अर्थव्यवस्था पर भी कुछ प्रभाव पड़े। उस बच्ची को ही कहाँ पता था कि वह अपनी अध्यापिका लिंडा को जीवन दान दे रही है और साथ में ही जीने लायक जीवन दे रही है। टेप वाली स्त्री को क्या पता है या जानने में क्या रुचि होगी कि वह कुछ पेड़ बचाने व सलवार, पजामे सिलने का निमित्त बन रही है। और पजामा मेरे वर्षों से सोए हुए अंग्रेजी ब्लॉग को जगाने का निमित्त! हाँ, हाँ, समय हो तो मेरा पजामा ब्लॉग, नहीं, नहीं, अंग्रेजी ब्लॉग भी देख आइए। जी, लिंक भी दे रही हूँ.. चूड़ीदार पाजामाज़!
घुघूती बासूती
Showing posts with label चूड़ीदार पाजामा. Show all posts
Showing posts with label चूड़ीदार पाजामा. Show all posts
Wednesday, December 08, 2010
Subscribe to:
Posts (Atom)