यह लेख मुम्बई हमलों के दौरान लिखा था। कल अरुण जी का लेख ‘शीला जी आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं’ पढ़कर याद आ गया सो पुराना होने पर भी पढ़ ही लीजिए। अरुण ने इसे प्रासंगिक बना दिया है।
जब मुम्बई का ताज जल रहा था तब मैं रंगों पर भी कान लगाए हुए थी । भय था कि अब कौन सा रंग बैन करना होगा । दुर्भाग्य से हम स्त्रियों के कपड़े रंग बिरंगे होते हें । जब किसी रंग पर बैन लगता है, प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष में ही सही, कुछ साड़ियाँ पेटी में डालनी पड़ती हैं । कुछ दिनों से मेरे पास दो तीन साड़ियाँ जो गलत रंग की थीं (यहाँ यह साफ कर दूँ कि वे मैंने नहीं खरीदी थीं, मुझे परिवार वालों से उपहार में मिली थीं ) बहुत दुख के साथ मैंने छिपा दी थीं । जमाना खराब है, कोई कहने लगे कि चिड़ियाएँ भी गलत रंग पहन कर अपनी आतंकी मंशा दिखाने लगी हैं । फिर गलत राज्य में भी रहती हूँ। और तब तो मेरी जान ही निकल गई जब टी वी पर कई बार बताया गया कि आतंकवादी मेरे राज्य से आए थे । परन्तु कुछ घंटों के बाद कहा गया कि वे पड़ोसी देश से आए थे । मेरी जान में जान आई । वैसे भी यदि सरदार पटेल न होते तो शायद इस राज्य का यह हिस्सा पड़ोसी देश में ही होता । मैं प्रतीक्षा करती रही कि कोई कहेगा कि गुजरात का नाम बार बार लेने की आदत पड़ जाने के कारण गलती से मुँह से निकल गया । परन्तु ऐसा किसी ने नहीं कहा ।
मुझे भगवान पर कुछ विशेष विश्वास न होते हुए भी कभी कभार 'हे भगवान' कहने की आदत थी। आजकल कहते कहते रुक जाती हूँ क्योंकि कोई यह न कहे कि भगवा..न के बहाने गलत रंग को याद कर रही है । अब लगता है कि यह सब इसी तरह चलता रहा तो शायद खाकी रंग ही सुरक्षित रह जाएगा । जिस द्रुत गति से नए नए रंग के आतंक निकल रहे हैं आकाश से इन्द्र धनुष भी बैन करना होगा । परन्तु आज अभी तक आतंक का रंग नहीं बताया है । मैं प्रतीक्षा में हूँ जानने की । वैसे यदि सांकेतिक भाषा समझूँ तो आग का रंग भी तो हो सकता है और वह अग्नि भगवा..न का रंग याने वही पुरानी दो तीन साड़ियों का रंग ही है । चलो अच्छा ही हुआ । मेरा मन नई किसी भी रंग, खाकी भी नहीं, की साड़ियाँ खरीदने का नहीं है । जमाना वैसे भी मंदी का है ।
चलते चलतेः
गुजरात में एक दल की जीत का कारण शायद यहाँ का प्रसिद्ध आम 'केसर' भी है। इसका नाम बदल कर 'बेरंग' जैसा कुछ रख देना चाहिए। वैसे कुछ लोगों को जानकर संतोष होगा कि इस वर्ष ये आम भी चुनावों के परिणामों की तरह नाराज हैं। केसर आम इस वर्ष फला ही बहुत कम। मेरे बगीचे में इसके दो वृक्ष हैं और दोनों में केवल दो दो आम लटके हुए इस रंग की दुर्दशा की कहानी सुना रहे हैं।
घुघूती बासूती
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Thursday, June 04, 2009
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