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Wednesday, August 11, 2010

उफ़ यह अज्ञान!

अज्ञान बहुत कुछ तो हो सकता है किन्तु इतना हास्यास्पद भी हो सकता है आज जाना। अज्ञान सभी दुखों की जड़ है। अज्ञान सबसे बड़ी बीमारी है। धन से गरीब कुछ उपाय कर सकता है किन्तु ज्ञान से गरीब सिवाय ज्ञान पाने की चेष्टा के क्या कर सकता है? यह सब तो निबन्ध लिखने के लिए सही है किन्तु मेरे अज्ञान के कारण मुझे जितना कष्ट झेलना पड़ता है और उससे भी अधिक अपनी ही नजरों में जो बौनी बन जाती हूँ वह दुखद तो है ही(कम से कम मेरे लिए) साथ ही हास्यास्पद भी है।


जो लोग कम्प्यूटर युग में पैदा नहीं हुए या जिन्होंने समय रहते, याने अल्ज़ाइमर्स जैसे लक्षणों के पैदा होने से पहले कम्प्यूटर व नेट आदि के उपयोग का ज्ञान नहीं पाया वे लोग इस जीवन की दौड़ में न केवल पिछड़ गए हैं बल्कि मानसिक अपाहिज सा भी महसूस करते हैं। कम से कम मैं तो करती ही हूँ। आपको कुछ भी करना हो, कम्प्यूटर या तकनीक से जुड़ना ही पड़ता है। अन्यथा आपका मंहगा मोबाइल, कैमरा आदि सब व्यर्थ हैं। किसी जमाने में आप बिना अधिक मस्तिष्क खर्चे बैंक का काम कर लेते थे, दो चार शेयर खरीद या बेच लेते थे, फोटो खींच लेते थे। और आज, आज तो यह सब करने की भी विधि लिखनी पड़ती है। ठीक वैसे ही जैसे किसी विदेशी तामझाम वाले व्यंजन की पाक विधि लिखनी पड़ती है।


कई वर्षों से कुछ भी नया सीखना कठिन होता जा रहा है। याद तो कुछ रहता ही नहीं, सो सबकुछ निर्देश देखकर ही करती हूँ। मेरी तो डायरी ऐसे निर्देशों से भरी पड़ी है। यदि ब्लॉग लिख पाती हूँ, उसमें फोटो डाल पाती हूँ, हैडर बदल पाती हुँ, टिप्पणी में लिंक देती हूँ तो यह सब उन्हीं दिशा निर्देशों के कारण। और ये दिशा निर्देश मुख्यतया मेरे जमाताओं द्वारा लिखे या लिखवाए होते हैं, कई बार बेटियों द्वारा और कुछ मित्रों द्वारा।


पुराना हुआ यह मन नया सीखना तो चाहता है किन्तु न तो सरलता से सीख पाता है और न ही उसे स्मृति में कुछ पल ही संजोकर रख पाता है। दिनोंदिन घटती इस क्षमता को देख क्षोभ तो होता ही है साथ में मन में एक तकनीक का भय या टेक्नोफोबिया भी घर करता जा रहा है। होता यह है कि किसी भी सेवा का सबसे बेसिक भाग ही उपयोग करने लगती हूँ और उसके बेहतर किन्तु कठिन हिस्सों को छोड़ देती हूँ। मोबाइल से केवल फोन व संदेश ही देती हूँ। फेसबुक में जाकर अपनी नई पोस्ट चिपकाकर और जो जो दिखे उसे पढ़कर लौट आती हूँ।


यह सारा किस्सा ही फेसबुक का है। हुआ यह कि आज एक मित्र से बात हो रही थी। बात जन्मदिन के बधाई संदेशों पर चली। मैंने कहा कि मैं कई मित्रों को बधाई देना भूल जाती हूँ। फिर एक मित्र के जन्मदिन पर कितने सारे बधाई संदेश आए हैं इसपर बात हुई। फिर बात मेरे जन्मदिन पर आए संदेशों की हुई। मैंने कहा कि केवल तीन या चार ही तो फेसबुक पर आए थे। मुझे बताया गया कि नहीं गिनो, बहुत सारे थे । मैंने कहा नहीं हो ही नहीं सकता। कुछ छूटे भी हों तो भी पाँच सात ही होंगे। मैंने कहा कि मैं अब कैसे देखूँ। जब बताया गया कि प्रोफाइल पर जाओ। तो वहाँ जाकर मन खुशी व ग्लानि व क्षोभ तीनों से लबालब भर गया। खुशी यह कि इतने मित्रों ने बधाई भेजी थी। ग्लानि यह कि मैंने जिन तीन चार को देखा था उनके सिवाय किसी को धन्यवाद भी नहीं कहा। क्षोभ अपनी मूर्खता पर कि मैं फेसबुक का ९०% उपयोग तो जानती ही नहीं। यह तो वैसा हुआ कि बंगला खरीदकर केवल एक कमरे, रसोई, स्नानगृह तक ही अपना अधिकार सिद्ध कर पाओ। शेष घर होते हुए भी बन्द पड़ा रहे। मैं फेसबुक पर यहाँ वहाँ बिखरी तीन चार ही बधाइयाँ पढ़ पाई। यह नहीं जान पाई कि वे सब एक स्थान पर ही मिल जाएँगी।



फेसबुक पर मेरे जितने मित्रों ने मुझे शुभकामनाएँ भेजी थीं उनकी मैं बहुत आभारी हूँ और उत्तर न देने और उससे भी अधिक उनकी शुभकामनाओं को ना पढ़ पाने, उन तक न पहुँच पाने के लिए करबद्ध हो क्षमा माँगती हूँ। सारे संदेश पढ़ मैं एकबार फिर से जन्मदिन की खुशियाँ महसूस कर रही हूँ।


वैसे यह अज्ञान कितनी हास्यास्पद स्थितियाँ भी पैदा कर देता है ना!


घुघूती बासूती