बृहस्पतिवार, जुलाई 05, 2012

शताब्दी बदल गई किन्तु शायद कुछ भी नहीं बदला..............................घुघूती बासूती


कभी पिछली सदी में......
सास सिन्दूर लगाने, साखा पोला पहनने को बाध्य करती थी, ससुर साड़ी पहनने को, एक पड़ोसिन चूड़ी बिछिए क्यों नहीं पहने पूछना न भूलती थी तो दूसरी मंगलसूत्र। ससुर को जीन्स, बेलबॉटम, ट्राउजर्स अश्लील लगते तो सास को स्नान करते ही बाल सूखने की भी प्रतीक्षा असह्य हो उठती और उससे पहले ही सिन्दूर न भरने पर बेटे का जीवन संकट में दिखता। सास सुबह उठते ही साखा पोला कलाइयों में हैं या नहीं देखती तो ससुर को आँचल सर पर क्विकफिक्स से फिक्स चाहिए होता और सास ससुर दोनों को आवाज का वॉल्यूम कन्ट्रोल अपने हाथ में चाहिए होता व खनकती हँसी पर बन्धन लगाना अपना अधिकार लगता। ननद को लगता कि चेहरा लीपना पोतना अनिवार्य है, आँखों को यूँ बिन लाइनर नंगा रखना असभ्य, वैक्सिंग थ्रेडिंग न करना सीधे रिजर्व फॉरेस्ट से आने का ध्योतक और ऐसी वन्य जीव को तो वापिस वहीं पहुँचा देना ही बेहतर।

आज.......
यदि वही स्त्री नर्स होती तो उसका हस्पताल गहरे काले आई लाइनर, मैरून लिपस्टिक, फाउन्डेशन क्रीम  लगाने व यूनिफॉर्म में मोतियों की माला व कान के स्टड्स भी पहनने को, भवें बनवाने, संवारने, ऊपरी होंठ के ऊपर थ्रेड करवाने, हाथ व बाँहें वैक्स करवाने को बाध्य करता। सो क्या बदला? यदि प्रोफेशनल होकर भी अन्य लोग स्त्रियों को बताएँगे कि कैसे काम के लिए तैयार होना है, कैसे बनना सँवरना है, क्या क्या पहनना है तो क्या स्त्री की स्वायत्तता खत्म हो उसका अस्तित्व पुनः दूसरों के हाथ में न आ गया? क्या पढ़लिखकर भी वह दूसरों के हाथ की कठपुतली भर न बन गई?

मुम्बई मिरर के अनुसार मुम्बई के कई बड़े निजी हस्पताल नर्सों की ग्रूमिंग के प्रति बहुत सजग होते जा रहे हैं व उन्हें समझा रहे हैं कि स्त्री के लिए साफ सुथरे या नीट एन्ड टायडी का तात्पर्य भवें संवारना, ऊपरी होंठ के ऊपर थ्रेड करवाना, हाथ व बाँहें वैक्स करवाना होता है। मरीज ठीक होकर जाते समय अपना हस्पताल का अनुभव अपने साथ ले जाता है। यदि वह अच्छा रहा हो तो वह अन्य लोगों को भी उसी हस्पताल में इलाज करवाने की सलाह देता है।

अब तक हम अच्छे अनुभव का अर्थ अच्छा इलाज, मृदु व्यवहार, समय पर सबकुछ मिलना, सहायता व सेवा को तत्पर अपने काम में निपुण स्टाफ, हस्पताल का स्वच्छ  वातावरण आदि ही मानते आए थे। किन्तु अब लगता है कि स्टाफ का सौन्दर्य बोध भी बहुत अधिक मायने रखता है।

एक बात जो समझ में नहीं आई वह यह कि स्त्री मरीज भी तो चाहती होगी कि पुरुष डॉक्टर, वार्डबॉय, टेकनिशियन या कहिए पूरा पुरुष स्टाफ भी मनमोहक लगे। क्यों न उनकी मूँछों का स्टाइल, उनकी लम्बाई, उनपर दिए गए ताव, दाढ़ी के स्टाइल, कोई विशेष कट जैसे कि वह होंठ के नीचे ठोड़ी पर बैठी दो मक्खी के नाप वाली दाढ़ी या कोई भी अन्य कट जो लगे कि स्त्रियों को भाएगा, निर्धारित किया जा सकता है। उनकी भी मैट्रोसेक्सुअल लुक हो। आज के अभिनेताओं की तरह वैक्स करी बाँहें, संवरी भौंहें क्यों न हों? कान में रिंग या स्टड हों। चश्मे वाले डॉक्टर, वार्डबॉय, टेकनिशियन चश्मा उतार कॉन्टेक्ट लेंस लगवाएँ। आखिर स्त्री मरीज भी तो हस्पताल से जब जाएँ तो अपनी सहेलियों से भी कहें कि इसी हस्पताल में जाओ।

समाज की सच्चाई तो यह है कि स्त्रियाँ कितनी भी पढ़लिख जाएँ, नौकरी करें, ढेरों पैसा कमाएँ, लोगों की जान बचाएँ, कुछ भी कर लें, समाज तो उन्हें कन्ट्रोल करने के नए नए, विचित्र या लुभावने, तर्कसंगत या अतार्किक तरीके खोजता ही रहता है।

बहुत कठिनाई से बहुत सी स्त्रियों ने बिन्दी, सिन्दूर, चूड़ियों, बिछियों, मंगलसूत्र, साड़ी आदि अनिवार्य रूप से पहनने से छूट पाई थी। पूर्ण रूप से अपने मन का पहनने करने की छूट तो बहुत दूर थी किन्तु आर्थिक स्वतंत्रता के साथ उन्हें पहनावे के मामले में भी स्वतंत्रता मिलने लगी थी।

किन्तु कन्ट्रोल फ्रीक ब्रिगेड को चैन कहाँ? जो नौकरी उन्हें मुक्त करती है वही उन्हें केवल स्त्री होने के कारण नियमों में जकड़ रही हैं। पहले बहुत से स्कूलों में अध्यापिकाओं को केवल साड़ी ही पहनने को कहा जाता था। सलवार कुर्ता तक मना था। भाग्य नियन्ताओं को साड़ी अधिक ग्रेसफुल लगती थी। फिर अचानक कन्ट्रोल फ्रीक्स को स्त्रियों की साड़ी ब्लाउज के बीच से झाँकती पीठ व पेट देख पेट दर्द होने लगा। वही साड़ी जिसके ग्रेसफुल होने पर वे भाषण देते न थकते थे उन्हें परेशान करने लगी। एकाध महिला राजनेता ने व कई स्कूलों ने पीठ व पेट दिखने से बचने का उपाय जैकेट में ढूँढ निकाला और ग्रेसफुल साड़ी को और ग्रेसफुल बना दिया। जैकेट क्यों पहनें पूछने पर वही यूनिफॉर्म दिखने, जैकेट पर स्कूल का नाम लिखे होने आदि का तर्क दे दिया। उन्हीं स्कूलों में अध्यापकों के लिए किसी जैकेट का प्रावधान नहीं किया गया।

स्वतन्त्र होने के लिए आर्थिक स्वतन्त्रता आवश्यक है अतः लड़कियाँ भी एम बी ए करने लगीं। किन्तु इन कॉलेजों में भी सप्ताह में एक दिन उन्हें साड़ी पहनने को बाध्य किया जाता है। बहुत से अन्य कॉलेज भी नियम बनाते हैं कि लड़कियाँ क्या पहनें व क्या नहीं।

अब यदि नौकरी करते समय भी वे लगभग वैसे ही बन्धनों में जकड़ दी जाएँगी जो पहले संस्कृति के नाम पर लगाए जाते थे तो क्या बदला? यदि मुझे लगाने को बाध्य किया जाए तो सिन्दूर व आइलाइनर में मुझे कोई अन्तर नजर नहीं आता। यह सब नई पैकिंग में वही पुरानी विचारधारा है जो स्त्रियों के लिए नियम बनाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती थी।

हस्पताल या किसी भी कार्यस्थल पर बातचीत करने का लहजा, तरीका, शिष्टाचार, मरीजों या ग्राहक से कैसे बातचीत व व्यवहार किया जाए यह स्त्री पुरुष सारे स्टाफ को सिखाना एक अच्छी पहल होगी किन्तु यूँ स्त्रियों पर नियम लागू करना एक खतरनाक चलन बन सकता है। देखने में ये नियम निर्दोष लगते हैं किन्तु यह स्त्री स्वायत्तता पर अतिक्रमण ही है।

घुघूती बासूती

41 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी हर बात से पूरी तरह सहमत..

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  2. सहमत हैं जी,

    समाज कुछ इस तरह से बदल रहा है कि वो कुछ भी नैसर्गिक देखना ही नहीं चाहता, हर शय खूबसूरत हो.

    जगह जगह कुकरमुत्तों की तरह उगे उनिसेक्स ब्यूटीपर्लोर इस बात की तक्सीद करते हैं.

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  3. पूरी तरह सहमत हूँ आपसे...बेहद सशक्त तरीके से आपने अपनी बात कही....

    अनु

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  4. सहज लगे, सौम्य लगे...शेष सब मन की मूर्छा है..

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  5. बहुत कुछ बदलना अभी बाकी है ..धीरे धीरे परिवर्तन होगा .यह तो प्रकृति का नियम है..
    बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति

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  6. जिसके पास भी लाठी है वह सभी को भैंस की तरह हांकना चाहता है। दूसरे की भावनायें उसके अहंकार जनित सत्य के आगे कुचल दी जाती हैं। जहाँ शिक्षा का अभाव है वहाँ लोकतंत्र सफेदपोश तानाशाह के रूप में शासन करता है।

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  7. सार्थक लेखन. हम तो सहमत हैं जी. बच के कहाँ जायेंगे!

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  8. बहुत बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  9. बहुत बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  10. सच कहा आपने सजना-धजना सबको अच्छा लगता है, पर जब यही किसी बाध्यता के तहत होता है, तो बोझ लगता है. महानगरों में तो और मुसीबत...ओरिजिनल चेहरे ही देखने को नहीं मिलते. कुछ दिन पहले मेरी डॉक्टर सहेली ने जब बताया कि मुम्बई के लीलावती में कुछ डॉक्टर सुबह पार्लर होकर अस्पताल आती हैं, तो मैं दंग रह गयी. मैं तो कभी-कभी बड़ी परेशान होती हूँ कि मेरा क्या होगा. मुझे तो मेकअप की एबीसीडी भी नहीं आती.

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  11. किसी भी कार्यस्थल पर बातचीत करने का लहजा, तरीका, शिष्टाचार, मरीजों या ग्राहक से कैसे बातचीत व व्यवहार किया जाए यह स्त्री पुरुष सारे स्टाफ को सिखाना एक अच्छी पहल होगी!
    बिलकुल यही तो ! अच्छे व्यवहार का प्रशिक्षण स्त्री पुरुष दोनों के लिए अनिवार्य होना चाहिए !

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  12. सत्य वचन! सेवा-व्यवहार और सौजन्यता तो सीखनी ही चाहिये लेकिन वस्त्र गणवेश और शृंगार की बाध्यता बिल्कुल ग़लत है।

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  13. वाह - आपने तो सब कुछ कह दिया - कुछ बचा ही नहीं कहने को :) ... ब्लॉग जगत में भी तो कहीं बुर्के, और कहीं सिन्दूर, बिछिये आदि की बातें सिखाई जा रही हैं न ?

    { आपके ब्लॉग पर पहले भी १० से अधिक टिप्पणियां कर चुकी हूँ, हर एक करते ही spam के भंवर में गिर जाती है | यदि यह वाली आप तक पहुंचे तो पुरानी वालियों को भंवरों से छुडवा दीजियेगा :) }

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  14. बाजार की अपनी भाषा, अपने मुहावरे होते हैं.

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  15. कहीं मुक्ति की यह उत्कट अभिलाषा अल्टीमेट मोक्ष का ही द्वार न खोल दे !

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  16. बहुत सही बात कही है आपने... स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण आज भी नहीं बदला है.. बस उसका रूप बदल गया है..

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  17. क्या कहे समझ नहीं आ रहा है , शायद समाज ने ये तय कर लिया है की वो अपनी सोच नहीं बदलेगा , अब अंत में एक नारी के पास यही उपाय बचाता है की वो ऐसे समाज की परवाह करना ही बंद कर दे |

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  18. ऐसे शीर्षक देखकर तो पहले ही पता चल जाता हैं क्या बात हो रही होगी.

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  19. कठिन है बेहद कठिन ...आपको लोग कितने ध्यान से देखते है ....जिन बातो को आप महत्त्व नहीं देना चाहते उसे लोग ऐसे उठाते है मानो गलती हो गई ..."आपको नहीं लगता आपके beauty पार्लर की appointment due हो गई है ", ऐसे जुमले आम हो गए है

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  20. हमारे देश में ही नहीं विदेशों में भी यही हाल है अभी कुछ दिन पहले पढ़ा था किसी अफ्रीकन महिला टी वी एंकर को बालों का स्टाइल बदलने के लिए खास सलून में भेजा गया किन्तु उसके बाद उसके सर के सारे बाल उड़ गए

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  21. आजकल तो पुरुष भी सज रहे हें। वैसे महिलाओं को यह मांग अवश्‍य करना चाहिए।

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  22. व्यव्हार ही महत्वपूर्न है ...सौंदर्य नहीं ...

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  23. शिल्पा जी,
    काफी समय से टिप्पणियाँ स्वतः स्पैम में पहुँचने लगी हैं। किन्तु मैं जब भी नेट पर आती हूँ डुबकी लगा स्पैम के भंवर के भी नीचे जा वहाँ पहुँची अमूल्य टिप्पणियों को बाहर निकाल अपने ब्लॉग पर सुशोभित कर देती हूँ। यही बात आपकी टिप्पणियों के साथ भी होती है।
    जैसे.....
    http://ghughutibasuti.blogspot.in/2012/04/blog-post_12.html में
    Er. Shilpa Mehta ने कहा…
    मन भीग आया यह पोस्ट पढ़ कर :)
    मैं छोटी थी तो माँ से कहती थी अक्सर "ममी, जब मैं बड़ी हो जाऊंगी और आप छोटी हो जोगी तब यह और तब वह ..... " क्या जानती थी की सच ही ऐसा हो जाता है | आप खुशकिस्मत हैं जो अपनी "बेटी" माँ की माँ बन पा रही हैं |
    http://ghughutibasuti.blogspot.in/2012/03/blog-post_15.html में..
    Er. Shilpa Mehta ने कहा…
    :)
    मुझे भी यह गीत कभी परेशान किया करता था - जब १३-१४ साल की होने लगी थी - और "बराबरी " का भूत सवार हुआ था | परन्तु अब -? नहीं - अब नहीं करता |
    क्यों? - क्योंकि - अव्वल तो मुझे लगता है की हम "स्वान्तः सुखाय" सजते हैं | दूसरा - यदि स्त्री "सजना" के लिए सजती है, और पुरुष स्त्री के लिए नहीं सजते - तो इसका अर्थ तो यही निकलता है की पुरुष जिस्मानी सज धज पर रीझते हैं - तो उन्हें रिझाने के लिए यह काम करना होता होगा , परन्तु स्त्रियों में ज्यादा गहराई है - वे जिस्मानी सौन्दर्य नहीं - प्रेम से ही प्रेम करती हैं - इसीलिए तो पुरुषों को उन्हें रिझाने के लिए यह सब करने की आवश्यकता नहीं पड़ती न ?
    आपकी टिप्पणियों की सदा प्रतीक्षा रहती है। आभार सहित,
    घुघूती बासूती

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  24. अरविन्द मिश्र जी, मुक्ति की यह उत्कट अभिलाषा अल्टीमेट मोक्ष तक तो बनी ही रहेगी। यूँ ही अपना नाम एक पक्षी के नाम पर घुघूती तो नहीं रखा है। घुघूती तो हर पिंजरे पर भर सामर्थ्य प्रहार करेगी ही, चाहे वह प्रहार तोड़ने में सक्षम हो या न। पिंजरे को अपनी नियति मान उसे स्वीकार तो न कर पाएगी।
    घुघूती बासूती

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  25. देवेन्द्र पाण्डेय जी, मैंने माँ से गाय के बाघ से भिड़ जाने के कई किस्से सुन रखे हैं। पहाड़ में हमारी न जाने कितनी गायों ने ऐसी वीरता दिखा या तो विजय पाई या वीरगति। यह वह अपनी बछिया या बछड़े को बचाने को करती थी।
    स्त्री भी प्रायः अपनी संतान की रक्षा हेतु लाठी वाले से भिड़ जाती है। अब समय आ गया है कि अपने अधिकारों, स्वायत्तता, आत्मसम्मान के लिए भी वह यह सब करना शुरु करे।
    घुघूती बासूती

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  26. मुक्ति, चिन्ता न करें, जहाँ हर चेहरा एक जैसा बना दिया जाता है वहाँ मौलिक चेहरे अधिक आकर्षक लगते हैं। गुलाबों के बीच खिला एक जंगली फूल बरबस अपनी तरफ ध्यान खींच लेता है।
    और अभी पार्लर क्यों जाएँ? जिस दिन चेहरे को सच में सुधार बदलाव की आवश्यकता लगेगी तब सोचेंगे अस्सी पचासी की उम्र में!
    घुघूती बासूती

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  27. "अब लगता है कि स्टाफ का सौन्दर्य बोध भी बहुत अधिक मायने रखता है।"- यह स्टाफ का सौन्दर्य बोध नहीं है-स्टाफ के सौन्दर्य के बारे में अस्पताल प्रबन्धन का बोध है-इसलिए गलत है।जो नियम दूसरे व्यक्ति से जुडे होते हैं उन्हेम मानना चाहिए।जैसे निर्धारित वक्त पर न खाने से खिलाने वाले को दिक्कत होगी।लेकिन लम्बे या छोटे बाल रखने से किसी के पेट में दर्द नहीं होना चाहिए।

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  28. Kaafi achchha hai.. Apne anubhav ke aadhaar par mere hindi blog ko bhi review pls kijiye...

    http://mynetarhat.blogspot.in/search/label/Nepura

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  29. sajana snvarna vyavhar sounyata sab apni jagah hai lekin niyamon ke nam par fir numaishi banana aur control karna afsosjanak hai..achchhi post..

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  30. अच्छी विचारणीय है आपकी प्रस्तुति.
    स्त्री पुरुष समाज के अभिन्न अंग हैं.
    जो भी नियम,कायदे क़ानून हों, वे समाज को
    सार्थक रूप से व्यवस्थित करने और सुदृढ़
    बनाने के लिए होने चाहियें.

    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

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  31. देश की सर्वोच्च सत्ता पर अप्रत्यक्ष रूप से एक स्त्री ही विराजमान हैं.देश की राजधानी की मुखिया भी एक स्त्री ही हैं.देश की राष्ट्रपति भी महिला ही हैं.कुछ समय पहले तक देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुखिया भी स्त्री ही थी.बंगाल की सत्ता पर भी स्त्री ही काबिज है जो अपने ही अंदाज में केंद्र को नचाती रहती हैं . तब भी यह कहना की स्त्रियों को बराबर का अधिकार नहीं है अटपटा लगता है. क्या इन स्त्रियों को भी कोई किसी ड्रेस कोड के लिए बाध्य कर रहा है.सिने जगत की तारिकाएँ खुद लाखों रुपैए लेकर सुन्दर बंनाने वाली क्रीमों का विज्ञापन कर लोगों को भ्रमित कर रही हैं.आप किसी नायिका से कह कर देखिये की बहन ऐसे जेवरों के विज्ञापन न करें. कोई कहीं किसी को बाध्य नहीं कर रहा.जहाँ तक संस्थाओं की बात है तो वहां पुरुषों को भी ड्रेस कोड लागू होता है.न चाहते हुए भी टाई बांधनी पड़ती है.पैजामे में खुद को सहज महसूस करने वाले को पैंट बेल्ट बांधनी होती है.मूंछ रखने की हार्दिक लालसा के होते हुए भी संस्था के आदेशानुसार सफाचट होना पड़ता है.इसे आप क्या समझती हैं?ये संस्थाओं के ड्रेस कोड होते हैं जो उन के हिसाब से निर्धारित होते हैं जिसने हजारों लोगों को तनख्वाह बांटनी है.और उसे अपना व्यवसाय कैसे चलाना है ये नियम बनाने का मौलिक अधिकार है.आप यदि वहां अपनी स्वतंत्रता को बाधित मान रही हैं तो वहां काम करना छोड़ सकती हैं.किन्तु ये आरोप जो समाज पर लग रहा है ये बहुत पुराना हो चुका है. कहीं एक आध जगह ऐसा होता हो तो पता नहीं किन्तु उन एक आध उदाहरण को आप सब पर नहीं थोप सकते.समस्याएँ सब के साथ कुछ न कुछ हैं. भारत में सदा से स्त्रियों को देवी का दर्जा प्राप्त है.

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  32. अरविन्द मिश्र जी, मुक्ति की यह उत्कट अभिलाषा अल्टीमेट मोक्ष तक तो बनी ही रहेगी। यूँ ही अपना नाम एक पक्षी के नाम पर घुघूती तो नहीं रखा है। घुघूती तो हर पिंजरे पर भर सामर्थ्य प्रहार करेगी ही, चाहे वह प्रहार तोड़ने में सक्षम हो या न। पिंजरे को अपनी नियति मान उसे स्वीकार तो न कर पाएगी।
    घुघूती बासूती

    5:29 अपराह्न
    आप पता नहीं क्यों ऐसे विद्रोही प्रवृत्ति की हैं.घुघूती एक सदा से आजाद पंछी है.क्या आप एक भी उस इंसान का नाम बता सकती हैं जिसने घुघूती को कभी कैद किया हो.उस पर तो बड़े मार्मिक गीत बनते आये हैं और इंसान ने सदा से उसे अपने दुखों का साथी माना है.ऐसा क्या है जो आप हर बात का नकारात्मक पहलु ही सदा देखने की कोशिश करती हैं?

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  33. mai is lekh se sahmat hu aur maine bhi facebook per aurto ke haq aur equality k liye 1 page banaya plz is page ko like kare aur humari help kare

    https://www.facebook.com/pages/मर्दोँ-के-लिये-हजार-कपड़ा-औरतोँ-के-लिये-साड़ी-का-एक-टुकड़ा/37909285215057

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  34. https://www.facebook.com/pages/मर्दोँ-के-लिये-हजार-कपड़ा-औरतोँ-के-लिये-साड़ी-का-एक-टुकड़ा/37909285215057

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  35. कुछ दिनों नेट से दूर रहने के बाद आज आई तो पहला काम इस पोस्ट को पढ़ने का किया...
    आपने तो जैसे मन की हर बात लिख दी..उन नर्सेज का .नीट एन क्लीन रहकर अपने काम में निपुण होना जरूरी है...या बस अपने चहरे को आकर्षक बनाना...
    अच्छा हो...ऑपरेशन थियेटर में किसी डॉक्टर के ऑपरेशन के उपकरण मांगने पर नर्स कहे..रुकिए जरा लिपिस्टक री अप्लाई कर आऊं..

    कंट्रोल फ्रीक होने की सनक की कोई सीमा नहीं...

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  36. हमारी टिप्पणी स्पैम में गयी...:(:(

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  37. हर व्यवसाय की अपनी गरिमा और दायरे होते हैं और हर स्त्री या पुरुष की खुद को दूसरों के समक्ष कैसे प्रेसेंट करूँ इसकी स्वतंत्रता तो होनी चाहिए.

    दूसरी तरफ़ ,पढ़े -लिखे , नौकरीपेशा लोगों से इतनी उम्मीद तो की जाती है कि वे जब अपने ऑफिस में जाएँ तो साफ सुथरे इस्त्री किये कपड़े पहन कर जाएँ.
    अरब देश में तो परफ्यूम लगाने पर बहुत बल दिया जाता है.किसी भी तरह की दुर्गन्ध पर ये तुरंत टोक देते हैं!चाहे वह किसी के बालों सी आती नारियल या चमेली के तेल की गंध हो!या किसी के मुंह से आती प्याज लहसुन की गंध,अगर अस्पताल अपने स्टाफ को ग्रूम करते हैं तो गलत नहीं है.यहाँ फिलिपिनो को मैं ने देखा है कितनी भी कम सेलेरी हो लेकिन वे रहती बहुत सलीके से हैं.साफ़ -सुथरी! वेळ ग्रूमड इसीलिये आप को फ्रंट जोब्स में भारतीय लड़कियों की अपेक्षा वे अधिक मिलेंगी.

    आखिर में ,खुद की साज- सज्जा ,परिस्थिति ,नौकरी और अवसर के अनुसार हो तो बेहतर.

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  38. हर व्यवसाय की अपनी गरिमा और दायरे होते हैं और हर स्त्री या पुरुष की खुद को दूसरों के समक्ष कैसे प्रेसेंट करूँ इसकी स्वतंत्रता तो होनी चाहिए.

    दूसरी तरफ़ ,पढ़े -लिखे , नौकरीपेशा लोगों से इतनी उम्मीद तो की जाती है कि वे जब अपने ऑफिस में जाएँ तो साफ सुथरे इस्त्री किये कपड़े पहन कर जाएँ.
    अरब देश में तो परफ्यूम लगाने पर बहुत बल दिया जाता है.किसी भी तरह की दुर्गन्ध पर ये तुरंत टोक देते हैं!चाहे वह किसी के बालों सी आती नारियल या चमेली के तेल की गंध हो!या किसी के मुंह से आती प्याज लहसुन की गंध,अगर अस्पताल अपने स्टाफ को ग्रूम करते हैं तो गलत नहीं है.यहाँ फिलिपिनो को मैं ने देखा है कितनी भी कम सेलेरी हो लेकिन वे रहती बहुत सलीके से हैं.साफ़ -सुथरी! वेळ ग्रूमड इसीलिये आप को फ्रंट जोब्स में भारतीय लड़कियों की अपेक्षा वे अधिक मिलेंगी.

    आखिर में ,खुद की साज- सज्जा ,परिस्थिति ,नौकरी और अवसर के अनुसार हो तो बेहतर.

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