Monday, July 02, 2012

वर्षा तुम जल्दी आना

यह कविता जून 12, 2007 को पोस्ट की थी। इस वर्ष वर्षा के मिजाज कुछ अधिक ही बिगड़े हुए हैं। सो बारम्बार उससे बरसने की प्रार्थना करते हुए ......

वर्षा तुम जल्दी आना
फिर से काले बादल छाए हैं
जल गगरी भर भर लाए हैं,
बादल गरजे,बिजली चमके
अम्बर दमके,धरती महके ।

प्यासी धरती, प्यासी नदिया
सूखे तरू, सूखी बगिया,
सब तेरी राह ही तकते हैं
सब जल बिन आज सिसकते हैं ।

आओ वर्षा अब तुम आओ
इस सृष्टि को तुम नहलाओ,
रंग भरो तुम फिर से जग में
उमंग जगाओ रग रग में ।

आओ जब तुम तो मैं नाचूँगी
तेरे जल में बच्ची बन मैं खेलूँगी,
छत पर इक ऐसा कोना है
वहीं पर तूने मुझे भिगोना है ।

देख नहीं कोई पाएगा
जान कोई नहीं पाएगा,
तुम और मैं फिर से खेलेंगे
तेरे संगीत पर पैर फिर थिरकेंगे ।

अबकी बार ना मैं रोऊँगी
बच्चों की याद में ना खोऊँगी,
पकड़ूँगी मैं तेरे जल के चमचम मोती
ना बोलूँगी काश जो साथ में बेटी होती ।

अकेले रास रचाऊँगी मैं
तेरे जल में खो जाऊँगी मैं,
देख तेरी और मेरी क्रीड़ा
भाग जाएगी मन की हर पीड़ा ।

अबकी ना नयनों नीर बहाऊँगी मैं
बस तेरे स्वागत में लग जाऊँगी मैं,
ना जाऊँगी यादों के गलियारों में
ना भटकूँगी फिर उन राहों में ।

बच्चों को इक पाती लिख दूँगी
तुम भी नाचो वर्षा में ये कह दूँगी,
वर्षा तुम जल्दी से आ जाना
मेरे तन मन को भिगा जाना ।

घुघूती बासूती

15 comments:

  1. इतनी प्यारी प्रार्थना सुनने के बाद बदरा बरसे बिना रहेंगे क्या?????
    झमाझम बरसेंगे.....

    अनु

    ReplyDelete
  2. सुन लिया उसने ,बस समझिये आ गई!
    सूखे कपड़े ,तौलिया सब निकाल कर रख लीजिये .
    बाद में एक कप चाय ,हो सके तो इधर भी .....

    ReplyDelete
  3. बड़ी प्यारी कविता है...इतने मन से बुलाया तो कैसे ना आतीं वर्षा रानी...
    झमाझम बरस रही हैं...अब तो :)

    ReplyDelete
  4. वाह,
    आ जाना हे वर्षा जल्दी..

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर घुघूती जी। वर्षा का इंतज़ार पिट्सबर्ग में भी हो रहा है। न होता तो भी आपके इस सुर में सुर मिलाने का प्रयास करते ही!

    ReplyDelete
  6. अब तो वर्षा रानी को आना ही पड़ेगा !!

    ReplyDelete
  7. असाढ़ जाने को है अब तो सावन से उम्मीद है।

    ReplyDelete
  8. कल हमारे यहां तो आ गयी। आपकी कविता से मुम्‍बई में भी आएगी।

    ReplyDelete
  9. वर्षा की फुहारों में समाया नवजीवन का उमंग.

    ReplyDelete
  10. काश इस सन्देश के साथ बादल उमड़ घुमड़ कर भिगो जाये इस धरा को !

    ReplyDelete
  11. लगता है यहाँ मेघों को यही कविता गाकर सुनानी पड़ेगी , मानसून पूर्व की बरखा एक दिन कुछ बूँदें बरसा कर चली गई ...देखें सावन में क्या हो ...आओ बरखा , झूमे , भीगें संग तुम्हारे !
    प्यारी- सी कविता !

    ReplyDelete
  12. मुंबई से जो खबर मिल रही है उसके मुताबिक़ आपका यह गीत -आह्वान काम कर गया है ......

    ReplyDelete
  13. अब तो बरस ही पड़ेंगे सावन ...
    सुन्दर

    ReplyDelete
  14. सुन्दर सी,प्यारी सी प्रस्तुति.

    आपके आवाहन का ही कमाल है कि
    कल हमारे यहाँ भी खूब रिमझिम रिमझिम
    बरसात हो गयी.

    ReplyDelete