Monday, April 21, 2008

आह, दिल्ली का वसन्त ! दिल्ली में दूसरा दिन ।










जन्म उत्तर भारत में हुआ व अधिक बचपन व विद्यार्थी जीवन भी वहाँ ही बीता । वहाँ के फूलों, पौधों व पेड़ों का जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है । जबसे आँखें खोलीं स्वयं को प्रकृति के बीच ही पाया । वे फूल जीवन का एक हिस्सा बन गए । हर मौसम के साथ नए फूल अपने नए रूप रंग लेकर आ जाते थे । कभी सोचा ही नहीं था कि कभी ये नहीं होंगे । विवाह के बाद उत्तर भारत से नाता टूट ही गया । कभी कभार दिल्ली आना भी हुआ तो शायद गलत मौसम में, व घर से बाहर निकल फूलों की बहार देखने का अवसर नहीं मिला ।


इस बार जब दिल्ली की सड़कों पर जाना हुआ या फिर अपनी ही सोसायटी के बगीचे में तो अपने बचपन के फूलों को देख ऐसा लगा जैसे बचपन के बिछुड़े साथी फिर से मिल गए । मैं मोहित सी कार की खिड़की से नजरें बाहर टिकाए उन्हें देखते ना थकती थी । हुआ भी कुछ ऐसा कि लगभग हर दिन घर से बाहर जाना हुआ और रास्ते में कुछ ऐसे स्थान आते थे जहाँ फुटपाथ खत्म होते से ही क्यारियों में फूल बिखरे हुए थे । मन तो बस यही करता था कि वहीं रूक जाऊँ और एक एक फूल को सहलाऊँ । पूछूँ कि इतने बरस कहाँ थे । जैसे कोई बिछुड़े दोस्तों के नाम याद करता है वैसे ही मैं भी एक एक को देखकर उसका नाम याद कर रही थी । यदि कोई नाम याद ना आए तो स्वयं से नाराजगी होती थी कि कैसे भूल गई ।


रविवार को लोटस मंदिर जाना हुआ । बिटिया व उसके पति, मेरे पुत्रीवर ने कार्यक्रम बनाया कि मिम्मा (माँ )बाबा ( पिता ) को दिल्ली घुमाई जाए । सो सबसे पहले लोटस मंदिर की ओर चल पड़े । हमारे दिल्ली पहुँचने के साथ ही आँधी आ गई थी । बादल घिर आए थे व मौसम बेहद सुहावना हो गया था । सो धूप की कोई चिन्ता नहीं थी ।
मंदिर पहुँचते से ही मुझे यूँ लगा कि मैं अपने बचपन में आ गई हुँ । अब ना मुझे मंदिर की इमारत दिख रही थी ना साथ चलता परिवार ! मुझे बस और बस फूल ही दिख रहे थे । मस्तिष्क में बस यही खयाल था कि कैसे इन फूलों के बीज प्राप्त करूँ । यहाँ से वहाँ तक सब जगह क्यारियाँ ही क्यारियाँ थीं । उन पर फूल तो बस बिछे हुए थे । मुझे तो यही लग रहा था कि वे मेरे लिए ही खिले थे । मुझे हाथ पकड़कर खींचा भी जा रहा था , कि मंदिर बंद होने का समय हो रहा है । परन्तु मुझे उससे क्या ? होता है तो हो जाए , बस फूल खुले रहें । संसार का कौन सा मंदिर उनसे प्यारा हो सकता है ? बेटी बोली कि मंदिर के लिए सीढ़ियाँ हैं, तुम शायद ना चढ़ सको । मैंने खुशी खुशी हाँ में सिर हिलाया और वापिस फूलों में खो गई । घुघूता जी भी मेरे साथ एक क्यारी से दूसरी क्यारी की ओर भटकते रहे । उस समय यदि कोई मुझे तितली बना देता तो मैं हर फूल को छू पाती ।


प्रकृति ने अपनी खोई बेटी के स्वागत के लिए जैसे रंगों को उडेल उससे होली खेलनी चाही थी । बेटी तब कैसे ना उन रंगों में खोती , रंगती ? हर फूल पौधे में मुझे अपने पिताजी के कोमल परन्तु शक्तिशाली हाथों का छुअन महसूस हो रहा था । मुझे याद आ रहा था , उनका पौधे उगाना, उन्हें बड़ा करना , सूखे फूलों को हटाना व बीज बनाने के लिए संजोना । इस काम में हमारा उनकी सहायता कर बीजों के पैकेट बना उन पर नाम लिखना व सहेजना । इस बसंत पूजा के बाद उन्होंने मेरा रूमाल तो बसन्ती नहीं रंगा था परन्तु मेरा हृदय बसन्ती हो गया था ।


कॉर्नफ्लावर अपने विविध सफेद , गुलाबी व नीले रंगों में अजब छटा बिखार रहे थे । इन्हें देखे तो ३१ बरस बीत गए थे । पैंज़ी बहुत कम नजर आ रहे थे । शायद मेरी राह देखते देखते थककर व रूठकर चले गए थे। या फिर अभी उनके आने का समय ही नहीं हुआ था । बस कुछ हड़बड़ी वाले सिपाही आकर बगीचे का निरीक्षण कर रहे थे । बचपन में हम इनके चेहरे जैसे रूप के कारण इन्हें डाइन भी कहते थे । फ्लॉक्स अपने रंग बिरंगे गुच्छों में झूम रहे थे । पिटूनिया हिल हिल कर अपनी निःशब्द घंटियाँ बजाने में व्यस्त थे । मुझे लगा मैं उनमें अपने बचपन की आवाजें सुन सकती हूँ । हर क्यारी में अलग फूल थे और मुझे वे यूँ रिझा रहे थे कि मैं तय नहीं कर पा रही थी कि किस पर नजरें टिकाऊँ । मेरे अति प्रिय कार्नेशन्स व डायन्थस तो मुझे मंत्र मुग्ध कर दे रहे थे ।


दूर प्रहरी की तरह हॉलीहॉक्स के पौधे खड़े थे व अपने फूलों को अपने शरीर पर तमगों की तरह लगाए तनकर खड़े थे । फूलों की पंखुड़ियों को छोड़ इनका सारा शरीर हल्के काँटों जैसे रोयों से भरा होता है । ये दूर से ही पंगा ना लेने की चेतावनी दे रहे थे । नारंगी गार्डन नैस्टरशियम्स तो सबको लुभाने के लिए धरती पर ही बिछे जा रहे थे । उनके कमल से गोल पत्ते व अजीब सा घंटी सा आकार ना जाने कितनी यादें ताजा कर जा रहा था । लार्कस्पर भी पीछे रहने वाले नहीं थे । चाहे मुझे उनका नाम याद करने मे् काफी समय लगा परन्तु एक बार जब नाम मेरे मन की जबान पर आया तो वे मुझपर मुस्कुरा दिये। कॉक्सकूम्ब अपने मुर्गे सी कलगी पर गर्व से इतरा रहे थे । लगा जैसे कह रहे हों देखो , 'हमें वहाँ दूर उगा तो लेती हो पर जरा यहाँ हमारे अपने देश में हमारी शान तो देखो । क्या कभी वहाँ हमारी ऐसी बड़ी बड़ी कलगी देखी है ? ' वे सायद रैनेन्क्युलस ही थे जो बार बार मुझसे पूछ रहे थे कि पहचाना । परन्तु मैं मूर्ख उन्हें पहचान ही नहीं पा रही थी । शायद लोग आमतौर पर उन्हें पहचान नहीं पाते , इसीलिए रूठे व दुखी ये सकुचाए से रहते हैं व अपनी पंखुड़ियाँ पूरी नहीं खोलते हैं ।


मुझे दिल्ली पहुँचने में देर हुई थी परन्तु कुछ आखिरी गुलदाउदी (क्राइसेन्थेमम)मेरी प्रतीक्षा में जैसे रुके हुए थे । कुछ डहलिया भी अधखिले से मुझे ललचा रहे थे । एस्टर तो मुझे बचपन से ही बेहद प्यारे लगते हैं, विशेषकर सफेद एस्टर !अपने गुलाबी व नीले बैंगनी भाई बहनों के साथ ये भी खिले हुए थे । एक सड़क से गुजरते हुए कैना भी देखे । मैं तो इन्हें भूल ही गई थी । कोरल फाउन्टेन भी देखे जो हमारे गुजरात में भी लगे हुए हैं । ये फूल कुछ ही दिन के जीवन में इस तरह से इतनी खुशी कैसे लुटा सकते हैं ? साल्विया शान्त से खड़े थे जानते थे कि इतने रंगीन फूलों में वे लाल रंग के होते हुए भी प्लेन जेन ही नजर आ रहे थे । सड़क से ही मैंने किसी बाग बगीचे में नहीं, यूँ ही सड़क के किनारे के अनाम पेड़ों पर चढ़ती हुईं मॉर्निंग ग्लोरी मेरे मनभावन हल्के जामुनी रंग में अपनी पूरी ग्लोरी में खिलते और और से और ऊपर चढ़ते देखी । लगता था कि जैसे वह पर्वतारोही हो । आवारा से बोगनविलिया की बेलों में जो बहार देखी वह रोपे हुए बोगनविलिया में भी कभी नहीं देखी । वह शायद इसलिए कि यह बेल बिना पानी के ही अधिक फूलती है ।


मुझे अपने बचपन की वह आदत याद आ रही थी जब मैं पौधों को उनकी गन्ध से पहचानने का यत्न करती थी । आँख बन्द करके भी यदि किसी पत्ते को तोड़ा जाए तो उसकी गन्ध उसके नाम की चुगली कर देती थी । अब दूर से भी देखकर मेरी नाक में सब फूलों व उनके पत्तों की विशेष महक महसूस हो रही थी । अब तो बस यह पागलपन सवार था कि कहीं से सारे के सारे बीज खरीद लूँ व जाकर अपने छोटे से बगीचे में लगा दूँ । परन्तु क्या उत्तर भारत की शरद, शिशीर व वसन्त ॠतु भी किसी दुकान से पैकेट में खरीदकर ले जा पाऊँगी ?


मैंने कुछ फूलों के चित्र नेट से ढूँढकर यहाँ लगाने की चेष्टा की है । ये सब चित्र <http://www.flowerpictures.net/> के सौजन्य से हैं ।

http://www.flowerpictures.net/flower_database/h_flowers/holyhock.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/h_flowers/horned_violet.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/mn_flowers/morning_glory.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/mn_flowers/morning_glory_shrub.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/pansy.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/petunia.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/phlox_creeping.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/phlox_garden.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/rq_flowers/ranunculus.html

घुघूती बासूती

20 comments:

  1. लिखने में कुछ अशुद्धियाँ हो गईं हैं । बहुत कठिनाई से अपने ब्लॉग पर चित्र डाल पाई अतः इतना साहस नहीं हो रहा कि ठीक करने के लिए एक बार फिर से छेड़छाड़ करूँ । सो गल्तियाँ यहाँ ही सुधार रही हूँ । त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ।
    वे शायद* रैनेन्क्युलस ही थे जो बार बार मुझसे पूछ रहे थे कि पहचाना ।
    परन्तु क्या उत्तर भारत की शरद, शिशिर* व वसन्त ॠतु भी किसी दुकान से पैकेट में खरीदकर ले जा पाऊँगी ?
    घुघूती बासूती

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  2. वाकई बहुत मेहनत की है पोस्ट पर। और वसन्त है ही ऐसा विषय जिसपर लिखना/पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। चित्र बहुत जम रहे हैं!

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  3. इस बसंत पूजा के बाद उन्होंने मेरा रूमाल तो बसन्ती नहीं रंगा था परन्तु मेरा हृदय बसन्ती हो गया था ।
    Hum bhee sath hain --
    Vasant ki shubha yatra mein Ghughuti ji ..enjoy the lovely Flowrs ...
    You remember so many Names ..it is incredible.

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  4. wow so many pics of beautiful flowers,and u remember all the names to,aaj subhah to khili khili ho gayiphoto dhundhkar yaha khubsuati se lagane ke liye bahut dhanyawad,sach mann prasana o gaya.so different varities of flower,aur delhi ke basant ka varnan ek dam mast mast.

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  5. आप का पुष्प प्रेम देख विभोर हो गया हूँ. जितने सुंदर चित्र हैं उतनी ही सुंदर आप की पोस्ट है. जो इंसान फूलों से प्रेम करता है वो इश्वर के सबसे करीब होता है. मेरा एक शेर है:
    इबादत के लिए तुम ढ़ूंढ़ते फिरते कहाँ उसको
    गुलों को देख डाली पर मैं उसको सर झुकता हूँ
    नीरज

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  6. घुघूती जी, सुन्दर बहुत सुन्दर पोस्ट।

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  7. फूलों ने आपकों मंत्र मुग्ध किया और आपके शब्द-पुष्पों ने लेख ने हमको...

    बहुत सुन्दर ...

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  8. फ़ूलों की गज़ब जानकारी है आपको, साथ ही उनका खूबसूरत चित्रण करके आपने मन मोह लिया हमारा.सच दिल्ली का सबसे प्यारा मौसम होता है वसन्त.

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  9. achchha laga padh kar.. :)
    phul bhi sundar hain..

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  10. बड़ी मेहनत की मगर देखिये, कितना मीठा फल मिला. आनन्द आ गया.

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  11. ''प्रकृति ने अपनी खोई बेटी के स्वागत के लिए जैसे रंगों को उडेल उससे होली खेलनी चाही थी । बेटी तब कैसे ना उन रंगों में खोती , रंगती''

    kitni sundar baat likhi hai aapne!
    sare phoolon ke chitr itne sundar hain bas kya kahiye!
    bahut mehnat ki hogi aapne inhen dhundhne mein--
    lagta hai Blog jagat mein basant aa gaya hai!
    :)

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  12. वाकई क्या जानकारी है आपकी!
    और उपर से उतना ही मन लगा कर लिखा भी है आपने!!!

    बहुत सुंदर!!

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  13. फ़ूल बहुत अच्छे लगे ,लोटस तैम्पल के पीछे ही इस्कान टेम्पल भि है जी :)

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  14. खूबसूरत फूल...खूबसूरत पोस्‍ट

    पर बसंत...
    लोटस टेंपल का बसंत बंधुआ बसंत है, साल भर रहता है।

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  15. जितने सुन्दर फूल उतनी ही सुन्दर पोस्ट भी... हमें भी अपनी दिल्ली की याद और वहाँ बिताये पलों ने आ घेरा... बहुत-बहुत बधाई

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  16. सुंदर चित्र, बढ़िया वर्णन..

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  17. दो ब्लोग्गेर्स आजकल एक साथ फूलों को दिखा रहे है...एक देहरादून मे एक दिल्ली मे ..अजीब इतेफाक है......

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  18. बहुत खूबसूरत पोस्ट।

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