Wednesday, October 17, 2007

'जब थामा नहीं हाथ'

'जब थामा नहीं हाथ'
मन कितना था,जानती हो?
यदि थाम लेती हाथ तो
दिल को भी थामना होता ,
यदि थाम लेते दिल
तो हाथ कैसे थामते ?
और यदि लड़खड़ा जाती
तो कैसे दे पाते सहारा?
मैंने तो गिरकर बारबार
स्वयं उठना सीखा है ,
माथे की हर चोट को
हँसकर भूलना सीखा है ।
किसी दिन सिर पर जैसे
बन जाता है हिमालय ,
कभी अरावली बनता है
और कभी मेरे बचपन की
शिवालक की पहाड़ियाँ ,
जिन पर मैं चढ़ती थी
आज वे मेरे सिर पर
बनती बिगड़ती हैं ,
चढ़ती हैं, उतरती हैं ।
और लोग कहते हैं
जीवन में न्याय नहीं है ।
मुझे तो न्याय ही दिखता है
जितना ऊँचा चढ़ोगे उतना ही
नीचे गिरा स्वयं को पाओगे ,
जितना लम्बे होओगे उतना ही
सिर जोर से जमीन से टकराएगा ।
घुघूती बासूती

13 comments:

  1. जितना ऊँचा चढ़ोगे उतना ही
    नीचे गिरा स्वयं को पाओगे ,
    जितना लम्बे होओगे उतना ही
    सिर जोर से जमीन से टकराएगा

    अच्छा दर्शन! ख्याल रखा जायेगा :)

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  2. लताओं सा कोमल रूप लेकर ऊचाँइयों को छूने पर गिरने का डर नहीं रहेगा. अहम लेकर ठूँठ सा बढ़ना गिराता ही नही तोड़ भी देता है.

    सारगर्भित कविता

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  3. अच्छी कविता..हमेशा की तरह.

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  4. जितना ऊँचा चढ़ोगे उतना ही
    नीचे गिरा स्वयं को पाओगे ,

    बहुत सटीक एवं भावभरी बात

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  5. बहुत ही सरल शब्दों में बहुत ही गहरी बात कही है आप ने मैम, बहुत खूब

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  6. नीचे के भाव बहुत सुंदर…………मगर यहां से समझ नहि आया………'जब थामा नहीं हाथ'
    मन कितना था,जानती हो?
    यदि थाम लेती हाथ तो
    दिल को भी थामना होता ,
    यदि थाम लेते दिल
    तो हाथ कैसे थामते ?
    और यदि लड़खड़ा जाती
    तो कैसे दे पाते सहारा?

    मेरी ही गलती है क्यूकी जानती हू, कविता समझी नही जाती महसूस की जाती है। pls dont take it otherwise

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  7. बहुत बढ़िया भावपूर्ण!!

    तो एक बात तो साबित हो रही जी कि कुछ दिन के लिए ब्लॉग से गायब रहने के बाद आप शानदार लिखती हैं।

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  8. बहुत बढिया..
    खूबसूरत विचार खूबसूरत तरीके से पेश किया गया है...

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  9. बहुत गहरी भावपूर्ण रचना है, बधाई.

    जितना ऊँचा चढ़ोगे उतना ही
    नीचे गिरा स्वयं को पाओगे ,
    जितना लम्बे होओगे उतना ही
    सिर जोर से जमीन से टकराएगा ।

    --मीनाक्षी जी ने भी बहुत सुन्दर बात कही है, वाह!!!

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  10. बेहतरीन कविता…
    अच्छे भाव उभरे हैं
    अद्भुत!!!

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  11. अच्छी अभिव्यक्ति,अच्छे भाव उभरे हैं.बधाई.

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  12. चलने वाला लडखडा सकता है, लड्खडाने वाला गिर सकता है... गिरने से चोट आ सकती है..मगर जिन्दगी का सफ़र रुकता नहीं .. हर चढाई के अन्त में एक ढलान शुरू होती है.. फ़िर ऊंचाई का गुमान व्यर्थ है..... परन्तु जो पीडा होती है वह है

    गम नहीं इस बात का कि तलवे चाटे
    मगर जो तलवे चाटे उनमें भी छेद था

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