रविवार, फ़रवरी 25, 2007

घुघूती बासूती क्या है, कौन है ?

घुघूती बासूती क्या है, कौन है ?
उत्तराखंड का एक भाग है कुमाऊँ ! वही कुमाऊँ जिसने हिन्दी को बहुत से कवि, लेखक व लेखिकाएँ दीं, जैसे सुमित्रानंदन पंत,मनोहर श्याम जोशी,शिवानी आदि ।
वहाँ की भाषा है कुमाऊँनी । वहाँ एक चिड़िया पाई जाती है जिसे कहते हैं घुघुति । एक सुन्दर सौम्य चिड़िया । मेरी स्व दीदी की प्रिय चिड़िया । जिसे मामाजी रानी बेटी की यानी दीदी की चिड़िया कहते थे । घुघुति का कुमाऊँ के लोकगीतों में विशेष स्थान है ।
कुछ गीत तो तरुण जी ने अपने चिट्ठे में दे रखे हैं । मेरा एक प्रिय गीत है ....
घूर घुघूती घूर घूर
घूर घुघूती घूर,
मैत की नौराई लागी
मैत मेरो दूर ।
मैत =मायका, नौराई =याद आना, होम सिक महसूस करना ।
किन्तु जो गहराई, जो भावना, जो दर्द नौराई शब्द में है वह याद में नहीं है । नौराई जब लगती है तो मन आत्मा सब भीग जाती है , हृदय में एक कसक उठती है । शायद नौराई लगती भी केवल अपने मायके, बचपन या पहाड़ की ही है । जब कोई कहे कि पहाड़ की नौराई लग रही है तो इसका अर्थ है कि यह भावना इतनी प्रबल है कि न जा पाने से हृदय में दर्द हो रहा है । घुघूती बासूती भी नौराई की श्रेणी का शब्द है ।
और भी बहुत से गीत हैं । एक की पंक्तियां हैं ...
घुघूती बासूती
भै आलो मैं सूती ।
या भै भूक गो, मैं सूती ।
भै = भाई
आलो=आया
भूक गो =भूखा चला गया
सूती=सोई हुई थी
यह एक लोक कथा का अंश है । जो कुछ ऐसे है , एक विवाहिता से मिलने उसका भाई आया । बहन सो रही थी सो भाई ने उसे उठाना उचित नहीं समझा । वह पास बैठा उसके उठने की प्रतीक्षा करता रहा । जब जाने का समय हुआ तो उसने बहन के चरयो (मंगलसूत्र) को उसके गले में में आगे से पीछे कर दिया और चला गया । जब वह उठी तो चरयो देखा । शायद अनुमान लगाया या किसी से पूछा या फिर भाई कुछ बाल मिठाई (अल्मोड़ा, कुमाऊँ की एक प्रसिद्ध मिठाई) आदि छोड़ गया होगा । उसे बहुत दुख हुआ कि भाई आया और भूखा उससे मिले बिना चला गया , वह सोती ही रह गई । वह रो रोकर यह पंक्तियाँ गाती हुई मर गई । उसने ही फिर चिड़िया बन घुघुति के रूप में जन्म लिया । घुघुति के गले में, चरयो के मोती जैसे पिरो रखे हों, वैसे चिन्ह होते हैं । ऐसा लगता है कि चरयो पहना हो और आज भी वह यही गीत गाती है :
घुघूती बासूती
भै आलो मैं सूती ।
किन्तु कहीं घुघुति और कहीं घुघूती क्यों ? जब भी यह शब्द किसी गीत में प्रयुक्त होता है तो घुघूती बन जाता है अर्थात उच्चारण बदल जाता है ।
इस शब्द के साथ लगभग प्रत्येक कुमाऊँनी बच्चे की और माँ की यादें भी जुड़ी होती हैं । हर कुमाऊँनी माँ लेटकर , बच्चे को अपने पैरों पर कुछ इस प्रकार से बैठाकर जिससे उसका शरीर माँ के घुटनों तक चिपका रहता है, बच्चे को झुलाती है और गाती है :
घुघूती बासूती
माम काँ छू =मामा कहाँ है
मालकोटी =मामा के घर
के ल्यालो =क्या लाएँगे
दूध भाती =दूध भात
को खालो = कौन खाएगा
फिर बच्चे का नाम लेकर ........ खालो ,....... खालो कहती है और बच्चा खुशी से किलकारियाँ मारता है ।
मैं अपने प्रिय पहाड़, कुमाऊँ से बहुत दूर हूँ । पहाड़ की हूँ और समुद्र के पास रहती हूँ । कुमाऊँ से मेरा नाता टूट गया है । लम्बे समय से वहाँ नहीं गई हूँ । शायद कभी जाना भी न हो । किन्तु भावनात्मक रूप से वहाँ से जुड़ी हूँ । आज भी यदि बाल मिठाई मिल जाए तो ........
वहाँ का घर का बनाया चूड़ा ( पोहा जो मशीनों से नहीं बनता , धान को पूरा पकने से पहले ही तोड़ लिया जाता है ,फिर आग में थोड़ा भूनकर ऊखल में कूट कर बनाया जाता है ।) अखरोट के साथ खाने को जी ललचाता है । आज भी उस चूड़े की , गाँव की मिट्टी की महक मेरे मन में बसी है । मुझे याद है उसकी कुछ ऐसी सुगन्ध होती थी कभी विद्यालय से घर लौटने पर वह सुगन्ध आती थी तो मैं पूछती थी कि माँ कोई गाँव से आया है क्या ? मैं कभी भी गलत नहीं होती थी । यदि कोई आता तो साथ में चूड़ा , अखरोट , जम्बू (एक तरह की सूखी पत्तियाँ जो छौंका लगाने के काम आती हैं और जिन्हें नमक के सा पीसकर मसालेदार नमक बनाया जाता है ।), भट्ट (एक तरह की साबुत दाल) , आदि लाता था और साथ में लाता था पहाड़ की मिट्टी की महक ।
वहाँ के फल , फूल, सीढ़ीनुमा खेत , धरती, छोटे दरवाजे व खिड़कियों वाले दुमंजला मकान ,गोबर से लिपे फर्श , उस फर्श व घर की चौखट पर दिये एँपण , ये सब कहीं और नहीं मिलेंगे । एँपण एक तरह की रंगोली है जो कुछ कुछ बंगाल की अल्पना जैसी है । यह फर्श को गेरू से लेप कर भीगे पिसे चावल के घोल से तीन या चार उँगलियों से बनी रेखाओं से बने चित्र होते हैं । किसी भी कुमाऊँनी घर की चौखट को इस एँपण से पहचाना जा सकता है । दिवाली के दिन हाथ की मुट्ठियों से बने लक्ष्मी के पाँव ,
जो मेरे घर में भी हैं बनते हैं । वे जंगलों में फलों से लदे काफल, किलमोड़े, व हिसालू के वृक्ष । जहाँ पहाड़ों में दिन भर घूम फिर कर अपनी भूख प्यास मिटाने के लिए घर नहीं जाना पड़ता, बस फल तोड़ो और खाओ और किसी स्रोत या नौले से पानी पियो और वापिस मस्ती में लग जाओ । वे ठंडी हवाएँ ,वह बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियाँ, चीड़ व देवदार के वृक्ष !
बस इन्हीं यादों को , अपने छूटे कुमाऊँ को , अपनी स्व दीदी की याद को श्रद्धा व स्नेह के सुमन अर्पण करने के लिए मैंने स्वयं को नाम दिया है घुघूती बासूती ! है न काव्यात्मक व संगीतमय, मेरे कुमाऊँ की तरह !
घुघूती बासूती
पुनश्च : यह पढ़ने के बाद यदि अब आप मेरी कविता उड़ने की चाहत पढ़ें तो आपको उसके भाव सुगमता से समझ आएँगें ।
घुघूती बासूती

40 टिप्पणियाँ:

Abhishek ने कहा…

वाह घुघूती बासूती जी,
बहुत अच्छा लिखा है आपने । असल मे, मै जब भी कहीं आपका कमेन्ट देखता था, मुझे बड़ा अजीब सा लगता था ये नाम कि आखिर क्या है ये घुघूती बासूती । मेरा गेस ज़्यादा से ज़्यादा गया बँगाल की ओर । सोचा शायद कोई बँगाली नाम है । आपने ना सिर्फ़ मेरी उलझन दूर कर दी वरन् इतने अच्छे से सब कुछ बयाँ किया है कि वो जीवन्त लगने लगा ।

बहुत बहुत धन्यवाद जानकारी के लिये ।

Manish ने कहा…

पहली बार आप के इलाके के बारे में मनोहर श्याम जोशी जी की पुस्तक क्याप
से जानकारी मिली थी । परिचर्चा में आपका अपनाया ये नाम सबके लिए कौतूहल का विषय होता था । हमें अपनी संस्कृति और लोकगीतों से परिचित कराने का शुक्रिया !

राजीव ने कहा…

घुघुति जी,

घुघुति का वर्णन तो पहले परिचर्चा और तरुण जी के उत्तरांचल वाले चिट्ठे पर देख था, गीत भी सुना । आपने उसका विस्तृत विवरण बड़ी सहजता से प्रस्तुत किया है - यहाँ तक कि उसके उच्चारण का भी स्पष्टीकरण। लोक कथा का भी बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुतीकरण है।
कुमाँऊं से आपका भावनात्मक लगाव सहज ही है।

कुमाँऊं और गढ़वाल अपने शांत, सुरम्य वातावरण, सीढ़ीदार खेत व निर्मल जल के संगीतमय निर्झरों के कारण - दोनों ही मेरे प्रिय स्थान रहे हैं विशेषकर कुमाँऊं में अल्मोड़ा, कौसानी और गढ़वाल में उत्तरकाशी, गोमुख तक।

आपने बाल मिठाई की याद दिला कर अच्छा नहीं किया। खैर, मुझे तो अगले सप्ताह बाल मिठाई का स्वाद मिलेगा ही।

अंत में यह याद दिला दूं कि आपसे पूछे गये प्रश्नों की प्रतीक्षा है। यदि न देखा हो तो संदर्भ लें प्रश्नव्यूह - चिट्ठे, फिल्में, पुस्तकें और वरदान

Abhijeet Kumar ने कहा…

Ghughuti, an Indian spotted dove ...a bird ..a song of love and a cry ..a relationship..a brother and a sister..a dance which is so beautiful ..and a great Kumaon touch !
Why, Ghughuti Basuti?
a question, which was always creeped in mind of many people who came through this blog so far.
twitter..
the answer, Basuti(vo suti, she was sleeping)and a cry is heard .
What makes her more beautiful is that she could be seen on a mango tree, and the mangos are always found near a source of water.peace and a silence has kept.
a pretty detail of folk colourful Kumaon.
A milestone!
The song of the mountain..Echoes everyone's heart.

उन्मुक्त ने कहा…

मैं आज इस चिट्ठे के नाम का अर्थ समझ पाया।

रजनी भार्गव ने कहा…

बहुत सुन्दर विवरण है. मेरी सहेली भी वहीं से है.
उसके घर के आगे भी लक्ष्मी जी के पाँव रचे हुए हैं.
लोकगीत बहुत अच्छे हैं.

अनूप शुक्ला ने कहा…

सारा लेख पढ़ना बहुत अच्छा लगा। आपका अपनी जन्मभूमि से जुड़ी चीजों से अनुराग, प्यार के बारे में पढ़कर मन खुश-खुश हो गया!

Udan Tashtari ने कहा…

इस विषय पर पढ़ना एक सुखद अनुभूति रहा. एक बार पहले भी आपका इस विषय में विश्लेषण परिचर्चा में पढ़ा था. आज ज्यादा विस्तार में पढ़ कर और अच्छा लगा.

संजय बेंगाणी ने कहा…

अब सही सही समझ में आया. अच्छा लेख. अपनी मिट्टी की महक में डुबे हुए शब्द.

Beji ने कहा…

घुघूती को देखा...पहाड़ों के बीच...माला भी थी...भाई उठा ही देता!!...
यह घुघूती दीदी का कोई संदेश भी लाई है शायद...

घुघूती का गीत आपके शब्दों में छलक रहा है....बहुत सुंदर !!

अभय तिवारी ने कहा…

मार्मिक है ...दिल को छू गया..

Pratyaksha ने कहा…

बहुत अच्छा लगा । अब समझ में आया घुघुती बासूती का मतलब ।

नितिन बागला ने कहा…

बहुत सुंदर एवं मार्मिक लेख ।

Shrish ने कहा…

देखा बन गई न बात। इसीलिए मैंने कहा था एक पोस्ट लिख डालिए नाम समझाने को। अब पहली बात तो ज्यादातर लोग समझ ही चुके होंगे और आगे से जो पूछे ये लिंक दे दीजिएगा। :)

पूनम मिश्रा ने कहा…

लोककथाओं की मिठास और दर्द को आपने बखूबी अपने परिचय में उतारा है.

शशि सिंह ने कहा…

सच में पहाड़ों की बात ही और है. और वहां के लोग भी ऐसे जिनकी हर दिल को छू जाये. अब देखो न आपकी ये बात भी हौले से दिल को छू गई.

अफ़लातून ने कहा…

घुघूति बासूति का समुच्चय।'परिचर्चा' में दिए गए आश्वासन की सुन्दर पूर्ति।
मेरी बेटी है प्योली(या फ्यूँली ?)।उत्तराखण्ड के लोक गीतों में उसका जिक्र भी आता है,न?लोक कथाओं में भी?

Divine India ने कहा…

सजीला वर्णन…नाम को वैसे भी आप सार्थक कर ही रही हैं नये-नये लम्हों के गीतों की छटा से…तरुन के चिट्ठे पर इसकी चर्चा पढ़ी थी तभी यह शब्द समझ में आया था किंतु भावनात्मक और अपने
अनुशासन में स्थित भावार्थ से उद्देश्य बदल जाता है…विस्तार दिया है…अच्छा लगा…।

Sunil Deepak ने कहा…

आप का परिचय पा कर बहुत अच्छा लगा.

बेनामी ने कहा…

The Ghughuti Basuti tale is an example of how things in human life appear from sources as unusual as a legend ridden singing bird in the Kumaon Himalayan hills,create their own parallels in human relations, symbomizing feelings and relations, and get embodied in a larger social psyche. I have heard a similar legend about thrush found in Shimla region of Himachal. Thrush resembles a crow in colour, but is slightly bigger than house bird, and sings long rhythmic notes beginning at 5.00 o'clock in the morning. It is known as prayer bird(Largan chipa) among Himachal's Buddhist communities, and as Khlag among others. I wonder whether this is same bird.

P.C. Bodh(pcbodh@yahoo.com)

Neha ने कहा…

Ghughuti
Basuti
Bhaiyalo
Maisuti..

read the whole post though it's in hindi.. pretty cool.. liked it.. can't say I'm surprised, anyway.. good one!

अतुल शर्मा ने कहा…

भाई बहन की बड़ी ही मार्मिक कथा लिखी है, पढ़ते पढ़ते आँखे भर आईं। यह तो मनुष्य का प्रकृति के प्रति प्रेम है जो उस चिड़िया के लिए ये लोककथा बनी। काश! भाई अपनी बहन को जगा ही देता। आपने घुघूती क‍ी व्याख्या तो की परंतु बासूती का क्या मतलब है? क्या इसका अर्थ 'बहन सोती' है?
''किन्तु जो गहराई, जो भावना, जो दर्द नौराई शब्द में है वह याद में नहीं है । नौराई जब लगती है तो मन आत्मा सब भीग जाती है , हृदय में एक कसक उठती है । शायद नौराई लगती भी केवल अपने मायके, बचपन या पहाड़ की ही है । जब कोई कहे कि पहाड़ की नौराई लग रही है तो इसका अर्थ है कि यह भावना इतनी प्रबल है कि न जा पाने से हृदय में दर्द हो रहा है ।''
वाकई इस भावना को शब्दों में नहीं समझाया जा सकता। स्त्री नानी-दादी बन जाए तब भी मायके के लिए ऐसी ही नौराई लगती है। भारत के लगभग सभी प्रांतों में बच्चों को लेकर मामा के घर जाने के गीत अवश्य होंगे। माँ बच्चे को मामा के घर जाने की बात करती है तो एक प्रकार से वह अपने मायके को ही याद करती है।
मनुष्य का बचपन जहाँ बीता हो उसकी जड़ें संभवत: वहीं होतीं हैं। वहाँ की याद आने पर जो होता है उसे बताया नहीं जा सकता। आपने जो शब्द नौराई बताया है, शायद अंग्रेजी शब्द नॉस्टेल्जिया इसी को बयां करता है। पोस्ट पढ़ के मुझे ही अपने बचपन की नौराई लगने लगी। आपने अपने अंचल का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है। आप पहाड़ों की रहने वाली हैं और अब समुद्र किनारे रहतीं है। ये तो भारत के दो छोर हो गए। आपने लिखा है कि आप वर्षों से पहाड़ों पर नहीं गई और शायद जाना भी न हो। मुझे उम्मीद है कि आप कुमाँऊ अवश्य जा पाएँगी और बार बार जाएँगी।

masijeevi ने कहा…

बहुत संभव है कि वेल्‍स या वहॉं की अन्‍य जगहों से जुड़ी संवेदनाओं की अभिव्‍यक्ति अंग्रेजी में हो भी जाए पर घुघूति बासूति की महक अपनी मिट्टी अपनी भाषा में ही हो सकती है।

'पहाड़ की हूँ और समुद्र के पास रहती हूँ । कुमाऊँ से मेरा नाता टूट गया है । लम्बे समय से वहाँ नहीं गई हूँ । शायद कभी जाना भी न हो।...'

कोई पहाड़ी कैसे ये सह पाता होगा। हम तो पहाड़ के नहीं हैं पर चार महीने में एक बार न जा पाएं तो दिल उमड़ने लगता है।

अच्‍छा विवरण

miredmirage ने कहा…

मेरे साथी चिट्ठाकारो , कैसे मैं आप सबका धन्यवाद करूँ , समझ नहीं आ रहा है । एक नए व्यक्ति को आप सबने अपने बीच सम्मिलित कर लिया । लगता ही नहीं कि मैं यहाँ अभी हाल में ही आई थी । अपने परिवार में मुझे स्थान देने के लिए व मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

antarman ने कहा…

घुघूती बासूती जी,
नमस्ते !
आपने कुमाऊँ का कितना सजीव चित्रण किया है कि पढकर मन प्रसन्न हो गया -
आपके नामवाली चिडिया की लोक कथा बहोत पसँद आई -
"काफल" के बारे मेँ भी सुना है कि, एक दूसरी चिडिया बोलती है, " काफल पाक्यो मैँ ना चाख्यो "
मेरे पापा जी कविवर सुमित्रानँदन पँत के घनिष्ट मित्र रहे और कुमाँऊ, अल्मोडा को बम्बई मेँ रहते हुए भी अक्सर याद किया करते थे और कहते थे कि," मैँ महानगर मेँ रहते हुए ऊब गया हूँ पहाडोँ पर जाना चाहता हूँ "
- अल्मोडो कौसानी और कुमाँउ उन्के सबसे प्रिय स्थल रहे --
आपका ये लेख पढकर उनकी भावना समझ रही हूँ
बधाई ! लिखती रहेँ
http://antarman-antarman.blogspot.com/
ये मेरी नूतन प्रविष्टीयाँ अवश्य देखियेगा और आपकी बहुमूल्य टिप्पणी भी बोल्ग पर रखने की कृपा करेँ -
स - स्नेह
--लावण्या

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

आप को एंव आपके समस्त परिवार को होली की शुभकामना..
आपका आने वाला हर दिन रंगमय, स्वास्थयमय व आन्नदमय हो
होली मुबारक

Tāpas ने कहा…

लेख पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा...
और आपके नाम का अर्थ भी स्पष्ट हो गया..
अनुमान ज़रूर लगाया था कि "घुघुति बासुती" के पीछे कुछ खास रहस्य अवश्य छिपा होगा...

महेश चन्र्द जोशी ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है,

मीनाक्षी ने कहा…

आनन्द चरम सीमा पर है आज आपका यह भावपूर्ण लेख पढ़कर. अभय तिवारी जी के ब्लॉग की सैर कर रही थी जिनके कारण यहाँ तक आ सकी.
सच में आपका नाम काव्यात्मक और संगीतमय है . अब मैं 'उड़ने की चाहत' पढने जा रही हूँ .

swapandarshi ने कहा…

Thanks Ghughutiji, aapne mera anurodh rakhaa. kuch aur bhee likhe, kumaoun ke lokgeeton ke baare me

वीनमाण्डु ने कहा…

प्रिय घुघूति जी, आप का ब्लाग पढ कर बहुत खुशी हुई। मैं मूल रूप से मध्य नेपाल के गुल्मी जिले से हूँ, जो कहीं से भी भारतीय सीमा से नहीं लगता है, मगर फिर भी मैंने प्रस्तुत कविता अपने बचपन से ही अपनी दीदीयों से सुना हुआ है। नेपाली भाषा में भी बस कुछेक ही शब्दों की हेरा-फेरी के साथ ये लोक गीत सैकडौं सालों से पूरी की पूरी रची बसी है। देश अलग हों क्या फरक पडता है, लोक कथाएं, शब्द-शब्दावलीयाँ, मुहावरों में घुलते हुए, उलझते हुए, भाषाओं की नदीयों में बहते-डुबकियाँ लगाते हुए नदीयाँ दूर दूर तक निकल जाते हैं।
भारत हमारा पौराणिक काल से मित्र राष्ट्र रहा आया है। सो भाषिक समानताएँ तो होंगी ही। परन्तु ये नदीयाँ इतनी छोटी नही हैं। आपको ये जानकर ताज्जुब होगा कि नेपाली भाषा में कानूनी क्षेत्र के अधिकांश शब्दावली अरबी और फारसी से भारत के विभिन्न भाषाओं की लम्बी यात्रा पूरी करके आ पहुँचे हैं। टर्किश में बजार, साबुन, किताब, नहर और तराजू जैसे हजारों यात्री शब्दों की भरमार है। जो शताब्दियों से हिन्दी और नेपाली सहित अनेक भाषाओं में घुल-मिल गए हैं। इनको यहाँ से भी दूर दूर तक निकल विश्व यात्रा करना है।

indscribe ने कहा…

Shukria. Aakhir-kaar mystery solve ho gayee. Bohat arsay se ham bhii is udhed bun mein the...

govind ने कहा…

Ghughuti ka bahut achchha varnan kiya hai. Ek jaankaaree aur-
Darasal Ghughuti maidaanon men Fakhta naam se jaani jaatee hai.
Aap Ghughuti ko Paharee Fakhtaa kah sakte hain.
Maine anek baar Fakhtaa aur Ghughuti men antar khojne ki koshish kee. Donon ek jaise hain. Ek hi antar hai- Ghughuti kaa gaan marmik hota hai, jabki fakhta ko kabhi gaate hue naheen sunaa.
Govind Singh Kholia

DR.M.Upreti ने कहा…

Respected Ghughuti Basuti ji,

Aapake Blog aur uske content ke liye dhanyvad. बहुत सुन्दर. बहुत अच्छा लिखा है.

Ek Nivedan hai:


Harmar Pahad (formerly Kumaun Lok Parishad, Reg) is social cultural organization of non-resident Uttranchalis at Faridabad and working in the direction of spreading our cultural values/heritage to generation next for last 08 years

In continuation of our tradition, this year also we are going to publish our annual souvenir/magazine “Devbhoomi. To publish in “Devbhoomi” we invite articles from eminent intellectuals. You are a well known person who in actively involve in writing issues to related to “hamar pahad”. May I request you to contribute article/poem/view/stories etc. etc. to this issue ( if possible "घुघूती बासूती" + others)

Thanking you in advance.

With regards

Email: hamar.pahad@gmail.com

ujju ने कहा…

aapne to ekdam senti kar diya...bachpan ki yaad aa gayi...

Sneha ने कहा…

aati sunder vernan.:)

poemsnpuja ने कहा…

घुघूती चिड़िया का नाम होता है ये तो पता था पर बासूती किसलिए ये आज पता चला और इसके पीछे की मार्मिक कथा भी. लक्ष्मी के पांव हमारे यहाँ भी दिवाली में बनाये जाते हैं.
और जिस तरह आपने बच्चे को पांव पर झुलाने का जिक्र किया है हमारे यहाँ भी होता है और उसकी पहली लाइन है...घुघुआ घुग, मलेल पुर...पता नहीं इसका मतलब क्या होता है...आज आपके तरफ की बात सुनी तो अपना गाँव बड़ी शिद्दत से याद आने लगा. ये पोस्ट बड़ी अच्छी लगी.

hempandey ने कहा…

आपकी पोस्ट यदा कदा पढ़ता हूँ और एक दो बार टिप्पणि भी दी है. यह पोस्ट नहीं पढ़ पाया था.आपने लिंक दे कर उपकार किया.मेरे अनुमान से (सुनिश्चित नहीं हूँ) बासूती का अर्थ कुहूकने से है. घुघूती के गले में चरयो वाली बात की जानकारी मुझे नहीं थी.आपने अपनी पोस्ट के माध्यम से एक नयी जानकारी देकर एक और उपकार किया है. घुघूती का सम्बन्ध भिटौली और घुघूती बासूती के अलावा घुघूती के त्यौहार से भी है.

Abhishek ने कहा…

घुघूती के बारे में आज विस्तार से जानकारी मिली. बच्चे को घुटनों पर झुलाते हुए ऐसा ही एक गीत Bihar में भी प्रचलित है.

(gandhivichar.blogspot.com)

Dileepraaj Nagpal ने कहा…

Shukriya Aapka