जो तुम बसते मेरे उर में
जो तुम बसते मेरे उर में,
बुझ जाती जन्मों की प्यास,
जो तुम बसते मेरे उर में,
महक जाती मेरी हर साँस।
मिट जाती सब मन की उलझन,
कम होती कुछ देह कि जकड़न,
बढ़ जाती शायद हृदय की धड़कन,
पर कुछ कम होता अन्त: क्रन्दन।
जो तुम बसते मेरे उर में,
जीवन आकाश सा असीम बन जाता,
हर निशा तारों जड़ित होती,
हर निशा मन शशि बन जाता।
पूरे होते कुछ तो सपने,
तुम भी लगते कुछ तो अपने,
शायद लगते हम तुमसे कुछ कहने,
शायद लगते तुम भी कुछ सुनने।
जो तुम बसते मेरे उर में,
मैं नदिया तुम सागर होते,
जो तुम बसते मेरे जल में,
मैं नौका तुम माँझी होते।
मन से मन की बातें होतीं,
मनोहारी ये शामें होतीं,
तनहाई की ना ये रातें होतीं,
हर धड़कन में ना आहें होतीं।
जो तुम बसते मेरे उर में,
हर पल ना दिल बोझिल होता,
जो तुम बसते मेरे उर में,
हर दिन ना ये श्रापित होता।
दिन भर मन ये कविता लिखता,
और शाम तुम्हारी बाट जोहता,
दिन भर मन ये सपने बुनता,
तुम आते तो हर सपना पूरा होता।
जो तुम बसते मेरे उर में,
बन घुघुति मन पक्षी उड़ता,
जो तुम बसते मेरे उर में,
जीवन स्वर्ण पिन्जरा ना लगता।
हर उमंग यूं शिथिल ना पड़ती,
हर ख्वाहिश ना दिल में घुटती,
तुमसे मिल मैं गगन में उड़ती,
तोड़ तारे अपने आँचल में जड़ती।
जो तुम बसते मेरे उर में,
शून्य सा ना ये मन होता,
जो तुम बसते मेरे उर में,
सूना सा ना ये हर पल होता।
मन गाता तुम बाँसुरी बजाते,
मन पींगें लेता तुम मुझे झुलाते,
मैं दिवास्वप्न देखती तुम मुझे जगाते,
मैं सजती तुम मुझे सजाते।
जो तुम बसते मेरे उर में,
हर पल इक क्रीड़ा सा होता,
जो तुम बसते मेरे उर में,
वक्ष पर तब यह पत्थर ना होता।
प्रणय होता जीवन का आधार,
मीठी होती जीवन सरिता की धार,
हर पल होती प्रेम की बौछार,
बस प्रेम ही होता अपना आहार।
जो तुम बसते मेरे उर में,
हो जाता जीवन साकार,
जो तुम बसते मेरे उर में,
मिल जाता जीने का आधार।
पर,
पर, क्या तुम बसते मेरे उर में?
क्या तुम जीते मेरे हर पल में?
क्या तुम आते मेरे जीवन में?
क्या तुम पाते निर्वाण मेरे आँचल में?
घुघूती बासूती
Tuesday, February 06, 2007
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आपक चिट्ठा आ गया ।बहुत खुशी की बात है।जितना वक्त शुरु करने में लगा उतना नई-नई प्रविष्टियों को पढ़ाने में मत लगाइयेगा।
ReplyDeleteहार्दिक शुभकामना ।
स्वागत है. परिचर्चा में आपको देखा था, अब चिट्ठा शुरु किया है एक भावपूर्ण रचना के साथ, जारी रखें. शुभकामनायें.
ReplyDeleteप्रेम प्रणय के श्रॄंगार से रंगी भावनायें, कल्पना के झूले झूलता मन, उसके साथ होने का रोमांच, हृदय का कौतूहल, .. अनोखा संगम..अत्यंत सुंदर.. ।
ReplyDeleteबधाई लिखना शुरू करने के लिये। शुभकामनायें जारी रखने के लिये!अपने नाम का मतलब बताइये कभी!
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर कविता, एकदम जलतंरग-सी.
ReplyDeleteनए चिट्ठे के लिए शुभकामनाएं. आपको चिट्ठा-जगत से जुड़ा देख प्रसन्नता हो रही है.
घुघूती बासूती जी,
ReplyDeleteचिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है। आखिरकार हमारा लम्बा होता इंतजार खत्म हुआ और चिट्ठाजगत में एक और काव्यमय चिट्ठे का आगाज़ हुआ.
उम्मीद करता हूँ कि आप लगातार काव्य-रस परोसती रहेंगी।
शुभ स्वागतम !
ReplyDeleteधन्यवाद अफलातून जी, उड़न तश्तरी जी,मान्या जी, अनूपजी, संजयजी, जोशी जी और मनीष जी । आपने मेरी कविता को पढ़ा व सराहा, उसके लिए मैं आपकी अति आभारी हूँ । आशा है भविष्य में भी मेरे चिट्ठे पर आकर मेरा उत्साह बढ़ाते रहेंगे । यदि आप पढ़ते रहेंगे तो मैं यूँ ही लिखती रहूँगी ।
ReplyDeleteअफलातून जी , नहीं अब इतना समय नहीं लगाऊँगी ।
मान्या जी व उड़न तश्तरी जी मेरी रचना को पसन्द करने व उसके भावों को सराहने के लिए धन्यवाद ।
अनूप जी , घुघुती एक पहाड़ी चिड़िया का नाम है । कुमाऊँ ,याने उत्तराँचल में इस चिड़िया का बहुत महत्व है । अनेक गीतों व लोरियों में इसका उल्लेख होता है ।शायद ही कोई कुमाँउनी बच्चा होगा जिसकी माँ ने घुघूती बासूती गाकर उसे खिलाया या सुलाया न हो । मैंने अपना यह नाम रखकर अपने प्यारे पहाड़ को अपना प्रणाम कहा है ।
धन्यवाद संजय जी , मेरी कविता की तुलना जलतरंग से करके तो आपने मुझे अति सम्मानित कर दिया । आशा है भविष्य में भी आपको मेरी कविताएँ पसन्द आएँगीं ।
जोशी जी , यत्न तो मेरा यही रहेगा कि लिखती रहूँ । बस मेरा उत्साह बढ़ाते रहियेगा ।
घुघूती बासूती ।
मुझसे रहा नहीं गया…आपका पहला पढ़कर इसे देखा…मजा आगया…जैसे शबनम की बारिश हो गई हो हृदय में, परत दर परत यह रचना आकर्षित करती है…सुंदर भाव लिखते रहें…धन्यवाद!
ReplyDeleteधन्यवाद dvine india जी । आपकी टिप्पणी पढ़ कर लिखने का उत्साह दूना हो गया । उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद।
ReplyDeleteघुघूती बासूती
bahut hi sunder rachna aur aapke naam ka meaning jaan ke bahut accha laga ....bahut hi sunder bhaav hai is ke ,dil ko chhoone waale ..aur sache kahe hue ...!!
ReplyDeleteyanha maiane kal bhi comment kiya tha! lagta hai post ho hi nahi paya..aapase aur bhee kai sundar rachanaaye paDhane ko milatee rahengee aisee aasha hai.
ReplyDeleteधन्यवाद रन्जू जी ओर रचना जी । रचना जी, आपको दोबारा टिप्पणी करनी पड़ी ,मुझे दुख है किन्तु आपको फिर धन्यवाद देती हूँ । कल मुझे भी ऐसी ही कठिनाई हो रही थी । कौई भी टिप्पणी पहुँच नहीं रही थी ।
ReplyDeleteघुघूती बासूती
मकर संक्रांति पर अपने पहाड़ की याद स्वाभाविक है
ReplyDeleteआपका गला लिखते समय कैसे भर भर कर आ रहा होगा मैं अनुमान लगा सकती हूं आपने बहुत सारी जानकारी दी पहाड़ी संस्कृति के बारमें धन्यवाद और आपको मकर संक्रांति की शुभ कामनाएं
"उर" का अर्थ क्या है?
ReplyDeleteबेनामी जी, उर का अर्थ छाती, हृदय, मन होता है। नेट पर अर्थ देखने के लिए http://shabdkosh.com का उपयोग कर सकते हैं।
Deleteघुघूती बासूती