जरा कल्पना कीजिए आप कार से कहीं जा रहे हैं एक अपाहिज भिखारी अपने पहिएँ लगे पटरे याने अपनी पटरागाड़ी पर बैठा भीख माँग रहा है। आपके मन में करुणा उभरती है और आप सौ सौ रुपए के दो नोट कार की खिड़की से अपना हाथ बढ़ा उसकी तरफ करते हैं, भिखारी नोट पकड़ता है और एक नोट सड़क पर गिर जाता है और भिखारी उसे उठा लेता है। किन्तु तभी एक पुलिस वाला आकर आपको सड़क पर कचरा फैलाने / सड़क पर कचरा फेंकने के अपराध पर जुर्माना लगा देता है। जुर्माना भी कोई सौ दो सौ रुपए का नहीं पूरे पच्चीस हजार रुपए का ! असम्भव लगता है ना ! मुझे भी। किन्तु यही बात अमेरिका में हुई, रुपयों में नहीं डॉलरों में हुई। अब तो सम्भव लगने लगी है?
अपाहिज भिखारी व्हील चैयर पर था। दयालु व्यक्ति का अपाहिज भाई भी व्हील चैयर उपयोग करता था व भिखारी को देख उसे अपने भाई का ध्यान आ गया। उसने दो दो डॉलर के दो नोट उसे दिए। एक नोट के सड़क पर गिर जाने पर उठाए जाने के बावजूद भी उसपर पाँच सौ डॉलर का जुर्माना लगा।
अब आते हैं हमारे अपने प्यारे देश व उसके नित स्नान करने वाले व बहुत से बिना स्नान किए पानी भी न पीने वाले सफाई पसन्द नागरिकों की तरफ। मैं रोज शाम वर्ली सी फेस पर सैर करने जाती हूँ। सैर के लिए यह जगह मैरीन ड्राइव सी ही है। पिछले अक्तूबर नवम्बर में सड़क जितने चौड़े इस प्रामेनेड/ फुटपाथ को तोड़कर दोबारा बनाया गया या कहिए इसका सुंदरीकरण किया गया। पूरे में सुन्दर पेवर ब्लॉक्स लगे हैं। सड़क की एक तरफ बैंच हैं जिनपर बैठ समुद्र देख सकते हैं व समुद्र की तरफ बैठने लायक ऊँचाई की काफी चौड़ी दीवार है जो कड़पा पत्थर या वैसे दिखने वाले पत्थरों की स्लैब्स से ऊपर व सामने की तरफ ढकी हुईं हैं। कुल मिलाकर इस सीफेस की सजावट व बनाने में कोई कँजूसी नहीं की गई है, न नगर निगम ने न प्रकृति ने।
समुद्र से आती ठंडी हवा में समुद्र को, समुद्र में होते सूर्यास्त को या सी लिंक को देखते हुए यहाँ सैर करना बहुत आनन्ददायक लगता है। पिछले साल जब हम यहाँ नए नए आए थे तो इस सड़क की साफ सफाई देख मन खुश हो जाता था। एक भी फेरी वाला यहाँ नहीं होता था। शिकायत हो सकती थी तो बस डस्टबिन की कमी की और कुत्तों को सैर कराने वालों से कुत्तों के निपटने के बाद सफाई न करने से। किन्तु डस्टबिन की कमी भी खलती नहीं थी क्योंकि खाली हाथ टहलते, दौड़ते, जौगिंग करते लोगों को डस्टबिन की आवश्यकता भी नहीं थी।
किन्तु अब इस प्रामेनेड पर बीसियों फेरी वाले घूमते रहते हैं। फेरी वालों के साथ स्वाभाविक है, कागज, पॉलीथीन, प्लास्टिक व पेपर कप, गिलास, चम्मचें व भु्ट्टे भी आ गए और उपयोग के बाद फेरी वाला और उसका ग्राहक तो अपने रास्ते चले जाते हैं किन्तु यहाँ क्या हुआ था उसके सबूत के तौर पर सड़क पर पड़े रह जाते हैं कागज, पॉलीथीन, प्लास्टिक व पेपर कप, गिलास, चम्मचें व भु्ट्टे के अवशेष। वही सड़क जिसे देख हर बार मन खुशी से पुलकित हो जाता था अब विशुद्ध भारतीय सड़क का रूप धारण कर चुकी है।
पहले जहाँ युवा व अधेड़ जोड़े हाथ थामे या और भी अधिक सटे, संसार से बेखबर समुद्र की तरफ मुँह किए गुटरगूँ करते पाए जाते थे अब एक दूजे का हाथ थामने की बजाए हाथ में कागज की पुड़िया, प्लेट या कप थामे भेल या कुछ और टूँगते नजर आते हैं। वह गुटरगूँ की मधुर सी लगभग न सुनाई देने वाली आवाज गायब होकर अब खाते हुए की जाने वाली चप चप की आवाज में परिवर्तित हो गई है। सैर करने वाले थककर बैठने वालों का स्थान अब बिना पैसे लगी सीट पर बैठ जी भर चबाने वालों ने ले ली है। समुद्र बेचारे को भी अब कम ही लोग ताकते हैं, अधिकतर अपनी पुड़िया पर नजर गड़ाए होते हैं। यहाँ से वहाँ तक जहाँ भी नजर जाए कागज, पॉलीथीन, प्लास्टिक व पेपर कप, गिलास, चम्मचें व भु्ट्टे एक दूसरे से स्थान के लिए लड़ते नजर आते हैं। अब हवा गालों को सहलाने व बालों, दुपट्टों, आँचलों को उड़ाने से अधिक कागज व पॉलीथीन को उड़ाने में व्यस्त रहने लगी है।
भारत में टहलते, दौड़ते, जौगिंग करते लोगों की अपेक्षा हर जगह पर खाने पीने वालों की संख्या कहीं अधिक है। जब तक यहाँ खाना पीना नहीं मिलता था तो पूरे के पूरे परिवार शाम को अपने घरों से उठ प्रामेनेड (घूमने फिरने की जगह ) पर आने की बजाए खाने सुस्ताने के अन्य ठिकानों पर जाते होंगे। अब तो खाते पीते माता पिता और उनके आधा या चौथाई दर्जन बच्चे फुटपाथ पर गेंद, क्रिकेट, गुब्बारे, तरह तरह के मेलों में मिलने वाले से खिलौनों से खेलते तेज चलने वालों के पैरों में उलझते गिरते पड़ते पाए जाते हैं। थककर यदि बैठना चाहो तो बैठने से पहले गहराती शाम में आँखें फाड़ फाड़ कर देखना पड़ता है कि विभिन्न भोजन, आइसक्रीम व पेयों के अवशेषों पर तो कहीं नहीं बैठ रहे।
अब तो मन एक ही प्रश्न पूछता है कि हम भारतीय हर जगह, हर समय इतना खाते क्यों है? यदि खाते ही हैं तो खाना व पेय डालने के लिए अपने साथ अपना कटोरा व कमंडल क्यों नहीं रखते? तब कम से कम न खाने वालों को खाने वालों की जूठन लगे कागज, पॉलीथीन, प्लास्टिक व पेपर कप, गिलास, चम्मचों व बैठने के स्थानों से तो न जूझना पड़ेगा। अब डस्टबिन की अपेक्षा व उनके उपयोग की अपेक्षा तो हमसे की नहीं जा सकती। हम तो जहाँ बैठ जाते हैं वहीं खाते हैं और वहीं कचरा फैलाते हैं। काश कोई कचरा फैलाने का पच्चीस हजार तो नहीं पच्चीस रुपए का ही जुर्माना तो हर बार कचरा फैलाने पर लगाता। शायद तब सरकार का खजाना ऊपर तक भर जाता और सरकार को टैक्स लगाने की आवश्यकता भी न रहती।
घुघूती बासूती