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Tuesday, May 15, 2012

ना, प्लीज़, लिजलिजी भावुकता तो रहने ही दो!.............................घुघूती बासूती


जब हम स्त्रियों, बच्चियों, बेटियों, लड़कियों की बात करते हैं तो वैसे नहीं करते जैसे किसी सामान्य मानव की करते हैं जिसके अधिकार हैं, दुख हैं, सुख हैं, इच्छाएँ हैं, आकांक्षाएँ हैं, जो सही भी हैं, गलत भी, बुरी भी, भली भी। हम उन्हें या तो सारी समस्याओं की जड़ मान जन्म ही नहीं देना चाहते या फिर एक तो चलेगी या यदि बहुत ही भले हुए तो दो तो चलेंगी किन्तु उससे अधिक नहीं, ना, ना बाबा, क्या लड़कियों की लाइन लगानी है, जैसी बातें करते हैं, उनके दहेज की चिन्ता में दुबले हुए जाते हैं, उन्हें 'पराया धन', 'चिड़िया', 'मेहमान', 'पराई अमानत' कहते हैं या फिर 'बेटियों से ही घर की रौनक होती है', या उन्हें 'लक्ष्मी' कहते हैं, उन्हें 'पूजनीय' बनाने की चेष्टा करते हैं, उसे 'माँ' मानते हैं, उससे पैर नहीं छुआते, उसके पैर पूजते हैं। अर्थात वह सबकुछ करते हैं जो उसे सामान्य सहज न होने दे, उसे चेताता रहे कि वह अलग है, परिवार की सदस्य होते हुए भी या तो परिवार पर बोझ है या उसमें विशेष स्थान रखने वाली 'मेहमान' है जिसे जहाँ वह है वहाँ सदा नहीं रहना, जिसका घर परिवार दूर कहीं और है।

'साडा चिड़ियाँ दा चम्बा वे बाबुल असाँ उड़ जाणाँ', 'बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले' आदि गीत स्त्री का भला नहीं करते अपितु बचपन से ही ऐसे गीत व विभिन्न आशीर्वाद जैसे 'सौभाग्यवती भवः', 'पुत्रवती भवः', विभिन्न मुहावरे, लोकोक्तियाँ जैसे 'अबला तेरी यही कहानी आँचल में दूध आँख में पानी' आदि स्त्री को अपने को या तो कुछ 'कम मानव' या त्याग की मूर्ति टाइप कुछ 'अधिक मानव' मानने को प्रेरित करते हैं। यदि बच्ची अधिक सोचने विचारने वाली हुई तो ये बातें उसे उद्वेलित करती हैं, यदि नहीं तो वह इस यथास्थिति को स्वीकार कर अपने को एक 'बोझ' या 'परजीवी' मानती हुई जीती है, यदि एक और चतुर मानसिकता व बुद्धि की हुई तो 'इस परिवार' से जितना बटोर सकती है बटोरकर अपने 'असली घर' ले जाने को तत्पर रहती है, दहेज की माँग हो या न हो वह जितना हो सके जब जब हो सके 'उस घर' ले जाना चाहती है, जो देखा जाए तो तर्कसंगत है। 'यह घर' तो जब उसका है ही नहीं तो वह इससे क्यों जुड़े?

स्कूल में दसवीं में एक हिन्दी पुस्तक थी, शायद नाम था 'साहित्य श्री'। इसमें 'बिटिया की विदाई' जैसे नाम का एक पाठ था जो इतना लिजलिजा था कि इसे झेलना कठिन हो जाता था। मुझे लगभग सबकुछ पढ़ना पसन्द था, विज्ञान भी व भाषाएँ भी। किन्तु पूरे स्कूली जीवन में जो पढ़ना मुझे अंगारों पर चलने समान लगता था वह यही पाठ था। उसमें बेटी के विवाह, फेरों, 'अग्नि में अब तक के जीवन के जलकर राख होने', व 'पति की परिणीता के रूप में नए जन्म' की बात, विदाई के हृदयविदारक दृष्य का वर्णन था।  

लेखक का नाम मुझे याद नहीं किन्तु उस उम्र में भी यदि वह व्यक्ति मुझे मिल जाता तो वह मेरे शब्दबाणों से न बच पाता। किन्तु कहते हैं न कि जीवन का हर अनुभव कुछ न कुछ सिखा जाता है सो इस पाठ ने मुझे जीवन भर के लिए इन विदाई गीतों, बेटी के जन्म, विवाह, हर बार उनके घर से जाते समय की विदाई के रोने के प्रति प्रभावशून्य कर दिया। जब भी ऐसा कोई क्षण मेरे जीवन में आया, चाहे अपने विवाह के रूप में या बेटियों के विवाह के रूप में आँखें कभी गीली नहीं हुईं, मन ने कहा 'न घुघूती प्लीज़, लिजलिजी भावुकता तो रहने ही दो!' 


पिछले महीने बारी बारी दोनो बेटियाँ व जवाँई हमारे पास रहकर गए। हवाईयात्रा ने इतनी सुविधा कर दी है कि दो एक छुट्टी लेकर भी बच्चे हमसे मिलने आ सकते हैं। जब बिटिया जा रही थी तो माँ कुछ भावुक होकर शकुन्तला के जाते समय  कण्व ॠषि  द्वारा कहे शब्द दोहरा रही थीं, 'यदि मुझ जैसे वनवासी को बेटी(पाली हुई )के जाने पर इतना दुख हो रहा है तो गृहस्थों को कितना दुख होता होगा।' मैं बेटी जवाँई को छोड़ने नीचे कार तक गई और लौटकर आकर माँ से बात करने लगी। उन्हें बताया कि मेरे लिए उसका जाना जरा भी कष्टप्रद बात नहीं है।

उन्हें कहा कि बेटे या बेटी किसी का भी जाना दुखदायी नहीं है। दोनो बेटियों के विवाह में भी मैं न भावुक हुई न परेशान। जिनसे विवाह कर रही थीं उन्हें जानती थी। बेटियों पर विश्वास था, उनकी पसन्द पर विश्वास था। सो माँ को याद दिलाया कि कैसे हम निश्चिन्त थे। एक का विवाह तो रजिस्टर्ड था और हमने केवल उत्सव मनाया, कोई चिन्ता कोई परेशानी नहीं हुई। दूसरी का सप्तपदी वाला था और हमने तो विवाह की रस्म जरा लम्बी खिंच जाने पर कुछ झपकियाँ भी लीं थीं, केमरे ने जो दर्ज कर लिया। पति व मैं कई फोटो में मस्त सोते हुए पाए गए। चिन्ता, परेशानी रोना, उदास होना हमसे कोसों दूर था। एक दो मजाक हुए और माँ भी हँस पड़ीं।

बेटा हो या बेटी वे दोनों ही अपने घर जाएँगे ही। सन्तान जब बड़ी हो जाए तो वह हमसे अलग रहेगी ही। वे आए, हमारे साथ सुखद समय बिताया, बाबा (घुघूत ) का जन्मदिन मनाया अब अपना अपना काम देखेंगे अपने घर जाएँगे। शायद यह बेटियों शब्द के साथ 'आँसू चिपका देना' हमारी बचपन से कन्डिशनिंग का फल है। मैंने माँ को डीकन्डिशन कर दिया, न अपने लिए रोने दिया न बेटियों के लिए।

शायद बेटियों के जाने के साथ जो उदासी, आँसू या आँखें नम होना प्रचलित है उसका कारण एक प्रकार की असहायता है। माता पिता बेटी को दूसरे को सौंप उन दूसरों व उसके भाग्य के हवाले कर देते थे व आज भी करते हैं। बस यही कारण है कि बेटी का नाम लेते ही विदाई, आँसू शब्द भी साथ चले आते हैं। शायद इन आँसुओं के साथ माता पिता बेटी के प्रति अपना उत्तरदायित्व भी बहा देते हैं और भविष्य का कोई अपराधभाव भी।

जब बेटी विवाह से पहले व बाद में भी हमारे घर का वही हिस्सा बनी रहती है जो परिवार के अन्य सदस्य जैसे बेटे होते हैं तो पलकें भीगती नहीं, हँसी ठहाके गूँजते हैं, माँ जितना बेटी को जाते समय अपना ध्यान रखने को कहती है शायद बेटों की माएँ भी उन्हें कहती होंगी। यदि हम बेटियों को सक्षम बनाएँ, उनका साथ देने को सदा तत्पर रहें तो हम 'लिजलिजी भावुकता' को छोड़, अपनी व बेटी दोनों की आँखों में आँसुओं की जगह विश्वास व खुशी की चमक ला सकते हैं।

घुघूती बासूती