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Monday, January 11, 2010

चलती चक्की देख कर .........घुघूती बासूती

गेहूँ की पिसाई तीन रुपया!

सरकार गरीबी की रेखा से नीचे की आबादी को राशन में शायद २ रुपए किलो गेहूँ उपलब्ध करवाती है। सबसे पहले तो समस्या यह है कि बहुत से लोगों के पास राशन कार्ड ही नहीं होता। राशन कार्ड होने पर भी शहरों में जब गरीब मकान बदलते हैं तो यह कार्ड तभी उपयोग किया जा सकता है जब नए मकान का पता आदि दर्ज कराया जाए। इस काम के लिए मकानमालिक के साथ हुए करारनामे की आवश्यकता होती है जो बहुत से मकानमालिक उपलब्ध नहीं करवाते। मैं केवल अपनी महरी से सुनी बात कह रही हूँ, गलत भी हो सकती है।

यदि यह मान भी लिया जाए कि अधिकतर गरीबों को राशन में गेहूँ मिल रहा है तो भी उसकी पिसाई मुम्बई में १ जनवरी से ३ रुपया प्रति किलो हो गई है। रागी(मडुए)की ४ रुपए प्रति किलो हो गई है। क्या गरीब स्त्रियाँ एक बार फिर से हाथ की चक्की पर आटा पीसने को बाध्य होंगी? चार पाँच घरों में काम करने के बाद क्या वे यह कर पाएँगी?
जब खाद्यान्नों के बढ़ते हुए मूल्य मध्यम वर्ग की कमर तोड़ रहे हैं तो गरीबों की स्थिति क्या हो रही होगी?

जब से मेरी बाँह पर प्लास्टर चढ़ा है, मैं सब्जी खरीदने नहीं जा पा रही। मैंने पहले कई बार देखा था कि महरी किसी न किसी के लिए सब्जी खरीदकर लाती थी। मैंने पूछा कि क्या वह मेरे लिए भी ला देगी तो उसने कहा कि आजकल वह सब्जी खरीदने जाती ही नहीँ क्योंकि भाव इतने अधिक बढ़ गए हैं। जब अपने लिए लाती थी तब दूसरों के लिए भी खरीद लाती थी। उसने सब्जी खाना बन्द कर दिया तो क्या अब वह गेहूँ भी बिन पिसा खाने को बाध्य होगी?

चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय..
तीन रुपए पिसाई के दे, रोना हो तो रोय!

घुघूती बासूती