Friday, April 10, 2015

सपनों के व्यक्ति

तुम सच नहीं हो सकते
तुम सच कैसे हो सकते हो
मैं स्वप्न देख रही थी
तुम चुपके से
मेरे स्वप्न से निकल कर
मेरे संसार में आ गए
आए ही नहीं तुम
मेरे संसार में छा गए।
क्यों, यह ना तुमने बतलाया
ना मैंने पूछा
बस, सच यही है
कि तुम मेरी कल्पनाओं
को अपनी कूची से भरते गए
भरते गए, भरते गए
तब तक.
जब तक मैंने पूछा नहीँ कि
तुम कौन हो, कहाँ से आए हो
क्यों आए हो।
फिर तुमने बताया कि तुम
मेरी कल्पनाओं की उड़ान हो
तुम ही हो वह
जो मुझे पँख देता है
मेरी कल्पना को उड़ान देता है
मेरे चित्रों को रंग देता है।
मैं मंत्रमुग्ध सपनों के इस कलाकार
और उसकी कूची को देखती रही
समय समय पर अपने मनमाने रंग
चित्रों में भरने की जिद करती गई
उसने रंग भरे मेरे कहने पर
किन्तु उन रंगों में वह शेड
अपने ही मन के भरता रहा।
अब हाल यह हो गया है
रंग मेरे अपने हैं किन्तु
शेड उसके हैं
मनमानी मेरी है
किन्तु जिद उसकी है
जीवन मेरा है किन्तु
जिजीविषा उसकी है।
जीती मैं हूँ
थोड़ा मरता वह है
मरती मैं हूँ
जीवन्त वह हो जाता है
रोती मैं हूँ
गीली आँख उसकी है
सोती मैं हूँ
स्वप्न वह देखता है
ओ मेरे सपनों के व्यक्ति
कह तो दो ना यह
केवल एक सपना है,
मुझे प्रतीक्षा है जागने की
उसे प्रतीक्षा है मेरे सोने की।
घुघूती बासूती

10 comments:

  1. किसी की जाग किसी का स्वप्न!!
    सुंदर रचना!

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  2. जागने और सोने का यह कैसा खेल है!! नैराश्य भरी अनुभूति क्यों?

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  3. बहुत मजबूत रचना.

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  4. सुन्दर सपना के साथ एक मजबूत रचना

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  5. आपके कल्पनाओं की उड़ान तो मास्टर पीस होती ही है

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  6. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (11-04-2015) को "जब पहुँचे मझधार में टूट गयी पतवार" {चर्चा - 1944} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. जिसे दिल ने अपना मान लिया उसे दर्द तो होता है ..
    बहुत बढ़िया ..

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  8. स्वप्न में सब कुछ संभव है

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  9. बहुत खूबसूरत !

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