Thursday, August 06, 2009

राखी का भविष्य

न जाने क्यों कुछ लोगों को अलग राग अलापने का रोग होता है। मुझे भी यही रोग है। होना तो यह चाहिए कि जिस सुर में सब गाएँ आप भी अपना सुर मिला दो। माँ कहती हैं कि तुम्हें तो हर बात में स्त्री पक्ष दिखता है। मैं कहूँगी स्त्री पक्ष ही नहीं मुझे पैन्टिंग में केवल उगता सूरज ही नहीं ढली हुई रात भी दिखती है, पेड़ है तो उसके साये के नीचे बढ़ने का संघर्ष करती कमजोर घास भी दिखती है, पूर्णिमा का चाँद है तो उसके प्रकाश में न दिख पाने वाले तारे भी थोड़े से दिखते हैं, फिर भी पूर्ण चित्र तो कभी भी नहीं देख पाती, न कभी देख पाने के सपने पालती।


सो राखी या रक्षाबन्धन के दिन मेरे मन में न केवल भाई बहन के अमर स्नेह के वे चित्र ही उभरते हैं अपितु बहुत से और खयाल आते हैं। ये खयाल रंग में भंग तो डालते ही हैं किन्तु मेरे हिसाब से चित्र को पूरा भी करते हैं।


क्या भाई का होना आवश्यक है? या सिक्के के दूसरे पहलू को देखें तो क्या बहन का होना आवश्यक है? हो सकता है कि जब पाँच सात बच्चे होते थे और दो चार और पैदा करने में कोई विशेष आर्थिक व सामाजिक कठिनाई नहीं थी तब शायद भाई बहन दोनों का होना आदर्श माना जा सकता था। परन्तु आज के समय में? आज तो पति पत्नी एक या दो बच्चों की सोचकर ही चलते हैं। ऐसे में एक पुत्र हो और एक पुत्री यह चाहत तो बेमानी है। फिर यह हो भी जाए तो भी भाई को भाई नहीं मिलेगा और बहन को बहन। सो राखी के त्यौहार का बहुत लम्बे समय तक हर परिवार में चलना कठिन ही लगता है। जहाँ भाई बहन दोनों हैं वहाँ भी रिश्ते कितने निभाए जाते हैं यह सोचने की बात है।


यह रिश्ता सबसे अधिक मधुर इसलिए कहलाता था क्योंकि बहन को परिवार की जमीन जायदाद से कोई हिस्सा नहीं मिलता था। उसके हाथ यदि कुछ आता था तो यह मधुर रिश्ता ही। भाई जायदाद को लेकर लड़ लेते थे, बहन को तो बस यही चिन्ता रहती थी कि माता पिता के बाद उसका मायका बना रहे और वह मायका भाइयों के कारण ही बना रहता था और भाई भी यह जानते थे कि बहन को अपने जन्म के परिवार से केवल और केवल स्नेह ही मिलना है और कुछ नेग और कुछ नहीं। सो कहीं चैत की भिटोली(जैसे कुमाऊँ में चैत्र मास में बहन को कुछ रुपए भेंट में मनी और्डर कर दिए जाते थे)तो कहीं राखी में कुछ रुपए या भेंट दी जाती थी। जिन बहनों के भाई नहीं होते थे उनका मायका माता पिता के साथ ही खत्म हो जाता था। तब लोग घूमने को कश्मीर या कन्याकुमारी या विदेश तो जाते नहीं थे, स्त्री के पास घर के कामकाज और ऊब से निकलने को मायका ही एक स्थान होता था। सो बचपन से उन्हें भाई का महात्म्य सुनाया, सिखाया, दिखाया जाता था।(आज जब स्त्री भी भाइयों के बराबर हिस्से की अधिकारी हो गई है और धीरे धीरे इस हिस्से की माँग भी करना शुरू कर देगी तो ये भाई बहन के सम्बन्ध पहले से नहीं रह जाएँगे। और इन सम्बन्धों को पहला सा बनाए रखने के लिए स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित भी नहीं रखा जा सकता।)


मुझे याद है बचपन में सुनी उस रीटा की कहानी जिसने भगवान के आगे भाई की माँग की और बदले में एक विचित्र सी कसम खाई कि भाई होगा तो यह करेगी और भाई होने पर पूरी भी की और भगवान के पास भी चली गई। भाई की यह ललक शायद एक स्वाभाविक ललक नहीं है अपितु समाज जनित ललक है। मेरी दो बेटियाँ हैं, मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी भाई की कमी महसूस की हो या भाई हो ऐसी इच्छा दिखाई हो। हाँ बड़ी बेटी जब अकेली थी तो बहन लाने की माँग जरूर की थी तब जब पड़ोसी बच्चे कोई खिलौना न देने पर 'नहीं दोगी तो हम चले जाएँगे' की धमकी देते थे। मेरी बेटियों में भाई की ललक शायद इसलिए नहीं थी क्योंकि हमने घर में पुत्र न होने का कभी दुख नहीं मनाया, न पुत्र का महत्व ही कभी बताया, न इस विषय में कभी बात ही की। या यह बात की कि कैसे मेरे पति को अपने पुत्र होने के कर्त्तव्य निभाने हैं या कैसे मुझे मायके से अपेक्षाएँ हैं। वे केवल यह जानती थीं कि दादा दादी बाबा के माता पिता हैं और नाना नानी माँ के। उनका सम्मान करना है और जब वे हमारे पास आएँ तो उनकी देखभाल करनी है क्योंकि वे वृद्ध हैं। न दादा दादी पुत्र के माता पिता होने के कारण विशेष थे न मेरे पुत्री के माता पिता होने के कारण विशेष नहीं थे। सो सारा मामला संस्कार का है।


भाई होना वैसे ही अच्छा है जैसे बहन होना। यदि रिश्ते बराबरी के हों तो बहन भी बहन का साथ दे सकती है, सुख दुख बाँट सकती है। सच तो यह है कि बहन ही अधिक बाँट सकती है। भाई के घर में भी रिश्ता तो भाभी ही बनाए रखती है। बहुत ही कम भाई होंगे जो बहन के साथ बैठ घंटों मन की बात करते हैं। यह काम तो भाभी या बहन ही कर पाती है।


मुझे एक बहन की याद आ रही है। उसका परिवार एक ऐसे समय से बाहर निकला था जो दलदल में फँसे होने सा था। दलदल में फंसी वह जानती थी कि भाई से गुहार लगाना बेकार होगा। सो नहीं लगाई। खैर वह दलदल से बाहर निकली। कुछ ही महीनों में भाई के घर एक विवाह था। वह वहाँ गई। यह पहला अवसर था जब इस भयंकर स्थिति से बाहर निकलने के बाद वह अपने मायके के किसी सदस्य से मिल रही थी,जब अपना दर्द वह किसी अपने से बाँट सकती थी। सांत्वना तो दूर की बात है, भाई ने हालचाल भी नहीं पूछा। उसे चुप रहने को कहकर भाई अपनी उस साली से यात्रा विवरण माँग रहा था जिससे वह प्रायः मिलता था और जो महज चार घंटे की यात्रा कर आई थी। सोचने की बात है कि साली भी जीजा को राखी बाँध सकती है (यहाँ यही अधिक सही व सहज भी होता), ननद भी भाभी को या भाभी ननद को। प्रश्न भाई बहन का नहीं, मन मिलने का है। राजस्थान में ननद भाभी को राखी बाँधती है। (बताया जाता है कि पति पत्नी के अलावा कोई भी किसी को राखी बाँध सकता है। वैसे भी पुराने समय में पुरोहित यजमान को राखी बाँधते थे।) क्या उपरोक्त भाई बहन में राखी का कोई महत्व है?


ये त्यौहार महत्वपूर्ण थे। जीवन की एकरसता को कम कर जीवन में उमंग लाते थे। उस जमाने में जब स्त्रियाँ जब मन करे मायके या कहीं भी घूमने प्रस्थान नहीं कर पाती थीं, तब ये उन्हें मायके जाने का एक ठोस कारण देते थे। या फिर जब भाई बहन के घर रहने नहीं जा सकता था, यह भाई को बहन के घर जाने व वहाँ जाकर उसकी खोज खबर लेने का एक जायज कारण प्रदान करते थे। परन्तु आज के छोटे छोटे एक या दो बच्चों वाले परिवार में तो ये केवल पुत्र या पुत्री, भाई या बहन की कमी ही महसूस करवा पाते हैं। (किसी भी परिवार में यदि दो बच्चे होंगे तो एक पुत्री व पु्त्र होने की सम्भावना ५० प्रतिशत है और दो पुत्रियों की २५ प्रतिशत और दो पुत्रों की भी २५ प्रतिशत। यह तब जब अवांछित पुत्रियों का गर्भपात या शिशु हत्या चाहे उसका ध्यान न रखकर या बीमार पड़ने पर उसका उचित इलाज न करवाकर न की जाए।) या फिर इस त्यौहार के प्रति 'अच्छा आज राखी है!' का सा उदासीन भाव ही पैदा करते हैं।


मौसेरे, ममेरे,चचेरे भाइयों को राखी भेजना या बाँधना भी एक विकल्प है किन्तु कितने कम उम्र भाई अपनी दूर की बहनों की यत्न से भेजी राखी का जवाब भी देते हैं? ऐसे में यह सिलसिला एक ना एक दिन टूट ही जाता है। जो बच्चे साथ पले बढ़े नहीं उनपर जबर्दस्ती स्नेह थोपा नहीं जा सकता। जैसे जैसे परिवार दूर दराज के शहरों में जाकर बसेंगे इन रिश्तों की गर्माई अगली पीढ़ी तक रख पाना कठिन तो होता ही जाएगा। या फिर एक विकल्प दिनेश द्विवेदी जी का दिया हुआ है कि इसे विश्च बंधुत्व का रूप दे दिया जाए।


फिर भी जब तक यह त्यौहार चलता है, सबको शुभकामनाएँ।


घुघूती बासूती

Monday, August 03, 2009

कपड़े को मैला होने या मैला मान लेने पर इतना भी मत पीट पीट कर धोएँ कि फट ही जाए !

आजकल मैले कपड़े खूब धुल रहे हैं, सरेआम धुल रहे हैं, इतने धुल रहे हैं कि लगता है कि अब उनकी खैर नहीं। मित्रो, कपड़े को मैला होने पर(या मैला होने के भ्रम में भी) धोओ, अवश्य धोओ, परन्तु ध्यान रहे कि वह फट ही न जाए। फट ही गया तो धुलाई किस काम की रहेगी ? मुझे तो उनके चरमराने की आवाज साफ सुनाई दे रही है।


इस ब्लॉगजगत की विशेषता ही यह है कि यहाँ आकर हम अपने विचार परोस जाते हैं। विचार भी खाने की तरह होते हैं। अपने में शायद ही कोई बहुत बुरा होता है किन्तु किसी को पसन्द आता है तो चख जाता है, किसी को बहुत पसन्द आता है तो खाकर 'वाह वाह' कर जाता है, कोई चखता है और उसे पसन्द नहीं आता तो या तो बता जाता है या बिना बताए ही चले जाता है और किसी को उससे पूर्ण परहेज होता है, वह चखता ही नहीं। मैं 'बैंगन का भर्ता' नहीं खाती। मेरे न खाने के अपने कारण हैं। जो मुझे बहुत ही तार्किक लगते हैं, न भी लगें तो मेरे न खाने से भर्ते को क्या हानि ? मैं शाकाहारी हूँ, माँस नहीं खाती, न कभी खाऊँगी। अब कोई कितने भी तर्क या कुतर्क उसके पक्ष में दे दे, किसी भी महानात्मा का कहा मुझे पढ़ा जाए, मैं अपने स्वाद के लिए किसी जानवर की हत्या तो करने से रही, उनकी भी नहीं जो मुझे बेहद प्रिय हैं और उनकी भी नहीं जो नहीं हैं।


विचार परोसना तक तो सही है किन्तु विचारों की बाढ़ ही ले आओगे तो हम उन्हें हजम कहाँ कर पाएँगे, बस आकंठ डूबने के भय में सहम जाएँगे। यह भी बहुत सम्भव है कि आपके परोसे भोजन से विरक्ति ही हो जाए। नहीं विश्वास तो अपने प्रिय व्यंजन को मनों में अपने सामने रखिए, संभव है कि खाने का मन ही नहीं होगा, साहसी और जिद्दी हैं तो शायद पेट भर या उससे भी अधिक(यदि जिद्दी के साथ लालची भी हैं तो) खा ही लो, परन्तु देखना भविष्य में वह आपका प्रिय व्यंजन नहीं रह जागा। जिद में भले ही आप उसे प्रिय कहते फिरें।


इस अति परोसने से कुछ ऐसा ही हो रहा है। बहुत से लोग जो किसी विशेष व्यंजन को पसंद भी करते थे अब वितृष्णा से भर गए हैं। परन्तु परोसने वाले थक ही नहीं रहे। परोसे ही जा रहे हैं और साथ में कपड़े को मैला, मैला कहकर पीटते ही जा रहे हैं। यह नहीं समझ रहे कि उनके अपने ही वस्त्र तार तार हुए जा रहे हैं। कपड़ा धुल गया, बहुत धुल गया, अब बारी मन की है, थोड़ा उसे साफ कर लेते हैं। सच तो यह है कि कपड़ा शायद कभी इतना मैला ही नहीं था जितना कि हमारा मन मैला था। उसे धोने के लिए कौन सा डिटर्जैन्ट लाएँ ? शायद आत्ममुग्धता का घूँट थोड़ा छोटा लगाएँ ? 'मैं मैं' बकरी को शोभा देता है मनुष्य को नहीं, चाहे सच में हमारा मन इसी 'मैं मैं' से रचा बसा हो फिर भी उसे जग उजागर कितना कर सकते हैं ? यदि कपड़ा इतना धुलने पिटने के बाद भी बचा रह गया हो तो इस 'मैं' को क्या थोड़ा उसमें लपेट देना सही नहीं होगा ? थोड़ा ढका रहेगा तो लोग उससे कम परेशान होंगे। अब औरों के 'मैं' के लिए भी तो थोड़ी जगह छोड़नी होगी। नहीं छोड़ेंगे तो उनका 'मैं' आपके 'मैं' से भिड़न्त तो न चाहकर भी कर ही बैठेगा।


यही हाल 'मेरा पैगम्बर तेरे से बड़ा' वालों का हो रहा है। धर्म कोई कमीज तो हो नहीं हो गई कि सफेदी की तुलना की जा सके। यदि धर्म को कमीज भी मानते हो तो भाई, जैसी भी है मैं तो अपनी वाली ही पहनूँगी क्योंकि वही मुझे फिट बैठती है और उसी में मुझे सुविधा लगती है। अब आपकी वाली तो उधार लेकर पहनने से रही। आप अपनी पहनिए, मुझे मेरी पहनने दीजिए। न पसन्द आए तो मत देखिए उसकी तरफ, मैं देखने को कह भी नहीं रही। पैगम्बर तो जो कहना चाहते थे कहकर चले गए। अब भूत में जाकर हम उन्हें न तो रोक सकते हैं, न यह पूछ सकते हैं कि भाई यह सब क्यों कह गए ? हम पसन्द करें या न करें, अब जाकर उनसे अपनी आपत्ति तो दर्ज करा नहीं सकते। आप उनकी न कहकर अपनी कहें तो कोई संवाद भी किया जा सकता है।


तो जो मित्र इन मैली कमीजों, उनकी धुलाई से तंग आ चुके हैं, आइए, मेरे परोसे को देखें, मन करे तो चखें, स्वाद लगे तो खाएँ, न लगे तो न खाएँ। मन करे तो स्वाद या बेस्वाद बताते जाएँ, न करे तो न बताएँ परन्तु मैला, मैला कह इसकी फटने की स्थिति तक धुलाई न करें। यह कमीज है और मेरी कमीज है आप अपनी को ही पहनिए, धोइए, पटकिए, उसे पहन इतराइए, परन्तु मेरी पसन्द की कमीज मुझे पहनने दीजिए, उसे धोने के चक्कर में न पड़ें, न अपनी को उससे बेहतर कहिए (कहना ही है तो कहिए, हम रोक तो नहीं सकते) बस जबरन अपनी कमीज मुझे पहनाने की चेष्टा मत कीजिए। ऐसा करते जाएँगे तो मुझे भी आपकी कमीज मुझे क्यों पसन्द नहीं बताना पड़ेगा। और मैं आपकी कमीज को धोना नहीं चाहती, न ही उसे कहाँ कहाँ कीड़ों ने खाया है, कहाँ कहाँ कितने दाग हैं, आपको दिखलाना चाहती। क्योंकि जब मैं ऐसा करूँगी तो मेरी कमीज के दोष और भी अधिक दिखने लगेंगे। बेहतर होगा कि सबको अपनी अपनी कमीज मुबारक हो!


घुघूती बासूती