Tuesday, March 11, 2008

तुम जुगनू बनकर आते हो

जीवन की अन्धियारी राहों में
तुम जुगनू बनकर आते हो,
जीवन की उजियारी राहों में
तुम नजर कभी नहीं आते हो ।

पल पल मेरी हर उलझन में
तुम साथ निभाए जाते हो,
पर मन की हर सुलझन में
अपना नाम नहीं लिखवाते हो।

मेरे दुःस्वप्नों में तुम आकर
झट बाहर मुझे ले आते हो,
मधुर स्वप्नों को तुम केवल
मेरे नाम ही कर जाते हो ।

जब भी पीना होता है हाला
तुम साथ मेरे आ पीते हो,
अमृत की जब आती बारी
मेरे हाथ थमा तुम जाते हो ।

चलती हैं जब भी काली आँधी
थामे हाथ मेरा तुम होते हो,
शीतल बयार जब भी बहती
तुम साथ मेरे ना होते हो ।

फँस जाती हूँ जब काँटों में
आँचल मेरा बचा ले आते हो,
होती जब फूलों भरी फुलवारी में
तुम जाने कहाँ चले जाते हो ।

घुघूती बासूती

10 comments:

  1. जीवन के इस लंबे सफर मे काश ऐसा हमराही सबको मिलता।

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  2. यानि फिर से जनावर की पोस्ट, छोटा हुआ तो क्या हुआ आखिर जुगनू है तो उसी समुदाय का। जुगनू की चमक और कविता में शब्दों का समा दोनो ही पसंद आये।

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  3. सिर्फ कठीन समय के साथी???

    गहरी है बात!!

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  4. jugnu ki upama,bahut hi sundar.

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  5. ्बहुत भावपूर्ण सुन्दर रचना है।

    चलती हैं जब भी काली आँधी
    थामे हाथ मेरा तुम होते हो,
    शीतल बयार जब भी बहती
    तुम साथ मेरे ना होते हो ।

    फँस जाती हूँ जब काँटों में
    आँचल मेरा बचा ले आते हो,
    होती जब फूलों भरी फुलवारी में
    तुम जाने कहाँ चले जाते हो

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  6. सुंदर!
    वरिष्ठ चोखेरबाली का यह रूप और भी बढ़िया लगता है!!

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  7. उत्तम विचार. उत्तम रचना. क्या बात है ..... Utopian though, but classic.

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  8. बेहद पसंद आई आपकी आज की कविता।

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  9. likhti rahe...achhi lagi aapki kavita.

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  10. आप (और हम…:)) लक्की हैं जो ऐसे जीवन साथी पाएं हैं सबके ऐसे होते तो ये नारीवाद का झगड़ा ही नहीं रहता न। बहुत सुंदर कविता

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