Saturday, December 29, 2007

विदाई एक दुल्हन की

विदाई एक दुल्हन की
सारे दिन शहर घूम फिरकर बराती शाम को मुझे विदा कराने आ गए । मैं भी सुबह वाली लड़की से साड़ी वाली दुल्हन में परिवर्तित हो चुकी थी । टीका आदि लगाया गया और माँ ने कुछ कुमाँऊनी तरीके से मुझे विदा किया । लोगों ने अपने अपने बड़े रूमाल इस अवसर के लिए तैयार रखे थे । सब विदाई के रोने धोने और मुझे चुप कराने को तैयार दिख रहे थे। अफसोस, कि मैं उनकी यह तमन्ना पूरी ना कर पाई । मुझे तो अभी तक रोना और आँखों से नीर बहाना सीखना बाकी था। फिर हॉस्टेल में मैं अकेली रहती थी। वहाँ हमें एकल कमरे मिले हुए थे, सो घर से दूर अकेले रहने की भी आदत थी । अब तो मैं अपने पहले के मित्र और अब नये नवेले बने पति के साथ रहने जा रह थी सो मेरी तर्क बुद्धि ने समझा दिया कि रोने जैसी बात कुछ नहीं है । फिर कम फिल्में देखने के कारण मुझे ग्लिसरीन के प्रयोग के बारे में जानकारी भी नहीं थी । खैर लोग अन्तिम क्षण तक आशान्वित थे कि मैं शायद रूमालों को कृतार्थ कर ही दूँ । यदि मुझे जुकाम ही लगा होता तो भी यदि कोई बताता कि रोना आवश्यक है तो मैं शायद थोड़ा सुड़क सुड़क कर नाक ही रूमाल से रगड़ लेती । परन्तु मेरा शादियों में सम्मिलित होने के अनुभव का अभाव यहाँ आड़े आया । मैं रूमालों के दुख की चिन्ता किये बिना खुशी खुशी कार में बैठ गई । तब सब रूमाल जेबों या पर्सों के अन्दर चले गए और मैंने अपना रूमाल हिलाते हुए घर को बाय बाय कर दिया ।

पुणे से हमें बम्बई, तब मुम्बई नाम का पता नहीं था, ट्रेन से जाना था । थोड़ा समय अभी भी बाकी था इसलिये एक साड़ियों की दुकान से सबने साड़ियाँ खरीदी और पति ने भी मुझे जीवन की पहली साड़ी भेंट की । हम मुम्बई की ट्रेन पकड़ वहाँ पहुँच गए । दो तीन घंटे बाद दिल्ली की गाड़ी थी सो सबने खाना खाया और गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगे । साथ में कुछ फल मिठाई आदि भी पैक की थीं सो उन्हें खाने के लिए खोला गया । देखा कि अन्य फलों के साथ में टोकरी में केले भी रखे गए थे । कुछ केले छोटी सी
यात्रा के दौरान शहीद हो गए थे व कुछ घायल । समस्या थी कि इनका क्या किया जाए तो ससुर जी ने निश्चय किया शहीदों को तो कचरे में डाल श्रद्धांजली दी जाए और घायलों के साथ कुछ मिठाई आदि लेकर किसी गरीब को दे दिया जाए । सो घुघूता जी और मैं, घुघूता जी के शब्दों में, मिस्टर गरीब की खोज में निकल पड़े । शायद उस दिन भिखारी भी हड़ताल पर थे । हम पूरा प्लेटफॉर्म घूम लिये कोई परन्तु कोई भिखारी नहीं मिला । भिखारी भी शायद हमारे खेमे में थे । अब साढ़े पाँच महीने के बिछड़े पक्षियों को स्टेशन से बाहर भिखारी ढूँढने का बहाना मिल गया और वे सबको बताकर बाहर उड़ गए । अब भिखारी ढूँढने की कोई जल्दी तो थी नहीं, सो पक्षी आराम से ट्रेन छूटने से कुछ मिनट पहले ही वापिस आए ।

अगली सुबह जब सब चाय पीने लगे तो मुझे भी दी गई । अपनी शादी के कार्ड छापने वाले की दुकान पर चाय कॉफी मना करने पर दूध दिये जाने की घटना ताजा याद थी । इस भय से कि कोई मुझे दूध की बोतल ही ना पकड़ा दे , मैंने चुपचाप चाय ले ली । जीवन में कभी कोई गरम पेय नहीं पिया था । दूध व सूप भी ठंडा करके ही पिया था । मैंने चाय का पहला घूँट भरा और मेरे मुँह के अंदर की सारी त्वचा झुलस कर एक च्युइंग गम की तरह गोला बन मेरे मुँह में इकट्ठा हो गई । मेरे कुछ भी खाने पीने को मना ना करने के सारे इरादे पर पानी फिर गया । अब तो सिवाय पानी के और ठंडे दूध के, जो किसी ने मुझे नहीं पूछा, मैं कुछ भी खा पी नहीं सक रही थी । उपवास करती, खाने में नखरा करने वाली दुल्हन नखरा करती करती ट्रेन यात्राकर ससुराल पहुँच गई ।

घुघूती बासूतीhttp://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/12/blog-post_18.html

Sunday, December 23, 2007

गुजरात का मन

गुजरात का मन
चुनाव के परिणाम आ चुके हैं । भा ज पा को स्पष्ट बहुमत मिल चुका है । अब बहुत से लोग इस जीत के कारण ढूँढेगे । गुजराती जनता के भा ज पा में विश्वास तो एक कारण रहा ही होगा, परन्तु मुझे लगता है कि एक कारण यह भी रहा होगा कि पत्रकारों ने गुजरात और मोदी का राक्षसीकरण सा कर दिया था । गुजरात शब्द को गाली सा बना दिया गया था । जिसे गुजरात की स्वाभिमानी जनता ने पसन्द नहीं किया होगा । भारत का कौन सा राज्य यह कह सकता है कि वहाँ दंगे नहीं हुए ? काश्मीरी पंडितों के लिए क्यों आँसू नहीं बहाए जाते ? यह पूछने पर लोग कहते हैं कि यहाँ पर शासन ने भी दंगों को नहीं रोका या बढ़ावा दिया । परन्तु उनका यह गुस्सा दिल्ली के १९८४ के शासन पर नहीं निकलता है ?
क्या हमारे सिख नागरिकों का खून पानी था ? या काश्मिरी पंडितों का पानी है ?
इसका मतलब यह नहीं कि किसी भी नागरिक की हत्या दंगों या किसी और कारण से होनी चाहिये ।
परन्तु यह कि किसी भी एक प्रान्त के पीछे पड़ जाना हानिकारक ही सिद्ध हो सकता है । आशा है कि अब गुजरात में ऐसी कोई भी बात नहीं होगी ।
घुघूती बासूती

Tuesday, December 18, 2007

शादी किसकी है ?



परीक्षा का अन्तिम दिन था । अन्तिम प्रैक्टिकल देकर जब मैं निकली तो मेरे मित्र बिहार से मुझसे मिलने चन्डीगढ़ आए हुए थे । घूमते हुए उन्होंने पूछा " मुझसे शादी करोगी ? " मैंने हाँ कह दिया । अगले दिन मुझे घर के लिए निकलना था । रास्ते में दिल्ली आता था और वे दिल्ली के ही थे । सो उन्होंने मुझे ट्रेन पर चढ़ाया और स्वयं टैक्सी पकड़ दिल्ली पहुँच गए । टैक्सी घर के बाहर खड़ी की और घर में घुसते से ही सबको सूचना देते हुए बोले , " मैं शादी कर रहा हूँ । लड़की की ट्रेन दिल्ली स्टेशन पहुँचती ही होगी । ट्रेन एक घंटा रुकती है जिसे देखना है मेरे साथ जल्दी चले । " उनकी बहन, भाभी और एक मित्र दौड़ते भागते तैयार हुए और स्टेशन पहुँचे । लड़की देखी गई । मेरे मित्र को तो मेरे पूरे परिवार ने देख रखा था ।

जब उन्होंने इतना बड़ा धमाका किया था तो मैं क्यों पीछे रहती ! स्टेशन पर पिताजी को देखते से प्रणाम करते करते ही कह दिया कि मैं अमुक से शादी कर रही हूँ । पिताजी बोले विवाह का निर्णय क्या ऐसे लेते हैं ? मैंने कहा यदि पाँच वर्ष जानकर भी ना ले सकूँ तो शायद कभी भी ना ले सकूँ । खैर घर पहुँचे । माँ, भाई, भाभी तो मेरे खेमे में ही थे । सो कोई कठिनाई नहीं हुई । भाई की नई नौकरी थी । शहर अनजाना था । भाभी को पूर्ण आराम बताया गया था क्योंकि मैं बुआ बनने वाली थी । सो मैं पिताजी के साथ या कभी किसी पारिवारिक मित्र के साथ कभी शादी के कार्ड पसन्द करने जाती , कभी बरातियों को ठहराने को होटल । कभी माला वाले से बात होती कभी सजावट वालों से । कभी अकेली भी जाती । एक बार हम कार्ड पसन्द कर रहे थे तो दुकानदार ने चाय के लिए पूछा । मैंने कभी चाय पी नहीं थी । तो उसने कॉफी के लिए पूछा । मैंने फिर ना कहा । थोड़ी देर में पिताजी के लिए चाय और मेरे लिए एक कप दूध आ गया । गरम दूध पीना तो सजा लगता था । मैं मुँह बना रही थी , वह बोला कि आजकल के बच्चों को दूध पता नहीं क्यों इतना बुरा लगता है । मेरे हाथ से गरम दूध का प्याला लगभग छलक ही गया । फिर उसने पूछा "शादी किसकी है ?" मैंने कहा मेरी । उस बेचारे के हाथ से प्याला छलक गया ।
ऐसे ही मैं पिताजी के साथ होटल देखने गई । पसन्द भी आ गया । कमरे देखकर जब हम नीचे आए तो वही प्रश्न "शादी किसकी है ?" कभी कभी तो मन होता था कि एक बिल्ला लगा लूँ या प्लेकार्ड लेकर घूमूँ जिसमें लिखा हो " मेरी शादी" !

खैर , अब तो मैं कई बार किसी के पूछने से पहले ही यह बता दिया करती थी कि शादी मेरी है । समय बीतता गया और मेरी शादी भी हो गई । विदाई अगली शाम की थी । सो सारी रात मैं माँ से बात करती रही । सुबह उठी सिर धोया और रोज की तरह रोज के कपड़ों में तैयार हो गई । ससुराल वाले तो शाम को पूरा शहर घूम कर आ रहे थे । माँ भाभी के साथ लगीं थीं कि एक महिला आ गईं । बोलीं " मैं कल आ नहीं सकी । दुल्हन कहाँ है ? उसे यह छोटा सा उपहार देना है। " मैं समझ गई कि यह मुझे पहचानी नहीं हैं । मैंने कहा अभी भेजती हूँ । अन्दर गई, साड़ी पहनी , बिन्दी , चूड़ियाँ आदि पहन ली और उपहार लेने आ गई । वे बोली तुम्हारी छोटी बहन बिल्कुल तुम सी लगती है । उसे भी यूँ सजा दो तो दुल्हन लगेगी । मैंने कहा " वह तो है । बहन किसकी है ! " बाद में पता चला कि वे भाभी के पीछे मेरी छोटी बहन से अपने बेटे का रिश्ता करने को अड़ गईं थीं । वे बेचारी कहती ही रह गईं कि मेरी कोई छोटी बहन नहीं है ।


Saturday, December 15, 2007

चल रे मन


चल रे मन
रे मन, चल भीड़ से परे
चल, मुझसे बात कर
कुछ अपनी सुना
कुछ मेरी सुन
तू भी अकेला
मैं भी अकेली ।

इक तू ही तो है
जिसने साथ दिया
बचपन से अब तक
तूने ही मुझे जाना है
बाकी तो सब कुछ
बस पल भर में आना
पल भर में जाना है
बस तूने ही मेरा
और मैंने ही तेरा
साथ निभाना है ।

चल रे मन,
कुछ जुगनू ढूँढे
देख तो कैसा अंधेरा है
चल, कुछ तारें ढूँढें
वे भी तो अकेले हैं
देखें बादलों ने क्या
नए आकार बनाए हैं
शायद हो बना
कोई उड़ता पक्षी
या दिख जाए
कोई थिरकती हिरणी ।

चल रे मन,
कुछ नया खेल खेलें
तू मुझे बता अपने सपने
मैं तुझे बताऊँ कुछ अपने
हाँ मन,
टूटे सपने भी चलते हैं
वे रिक्त हृदय तो भरते हैं
बता कैसे तेरे सपने टूटे
सुन कैसे मेरे सपने रूठे ।

चल रे मन,
फिर कुछ सपने बुनें
चल, हृदय पर कुछ
पैबंद ही लगाते हैं
कुछ उलझे प्रश्नों से
हम बहुत दूर चलें
क्यों कब कैसे हुआ
को हम भूल चलें ।

चल रे मन,
रात बीत गई इन बातों में
चल सुबह की लाली देखें
अब तू भी वापिस आ जा
मेरे रिक्त हृदय में जा समा
चल हम मिल पूरे हो जाएँ
तू और मैं इक हो जाएँ
मैं व मेरा मन,मन और मैं
इक दूजे के पूरक हो जाएँ।
देख सूरज उगने वाला है
नया दिन मिल हम शुरू करें।

चल रे मन ,
मेरे संग चल
न बहक इधर उधर
कर ले बसेरा मुझमें
बन जा मुझ सा बन्दी
मेरी देह के पिंजरे में ।

घुघूती बासूती

Wednesday, December 12, 2007

बधाई हो ! हमारे बच्चे भी खून की होली खेलने में अमेरिकन बच्चों से पीछे नहीं रह गए !

कल ही गुड़गाँव में विकास व आकाश नामक दो चौदह वर्षीय लड़कों ने अपने एक सहपाठी अभिषेक त्यागी को पाँच गोली मारकर खत्म कर दिया । एक बच्चा अपने पिता आजाद सिंह की पिस्तौल स्कूल ले आया था और स्कूल खत्म होने पर अभिषेक की हत्या कर दी । याने यह कार्य उन्होंने क्षणिक गुस्से में नहीं किया बल्कि सोच समझ कर योजना बद्ध तरीके से पूरे होशो हवास में किया । ये बच्चे कोई बिना माँ बाप के, अभावों में सड़क पर पलने वाले नहीं थे । ये खाते पीते परिवारों के बच्चे थे । स्कूल था यूरो इन्टरनेशनल स्कूल, गुड़गाँव ! यहाँ क्वालिटी पढ़ाई मिलती है , बच्चों व अध्यापकों का अनुपात भी बहुत अच्छा है । कुछ दिन पहले ही किसी और शहर में बारहवीं कक्षा के एक लड़के को उसके साथ ट्यूशन पढ़ने वाले लड़कों ने मिल कर हॉकियों से पीट पीट कर मार डाला ।

यह अभिषेक हमारा या तुम्हारा बेटा हो सकता था । ये हत्यारे भी हमारे या तुम्हारे बेटे हो सकते थे । समाज और बच्चे इतने गुस्सैल क्यों हो गये हैं ? किसी से पटती नहीं तो उसे मार डालो । जिस लड़की को चाहो, वह तुम्हें ना चाहे तो उसके चेहरे पर एसिड डाल उसका चेहरा विकृत कर दो ।

संसार क्षुब्ध है,आश्चर्यचकित है । यह क्या हो रहा है ? मनोवैज्ञानिक , मनोचिकित्सक, अविभावक, अध्यापक सब सन्न हैं । क्यों हो रहा है यह मौत का तांडव ? कहाँ जा रहे हैं हमारे बच्चे ? क्यों वे अपना व दूसरों का विनाश कर रहे हैं ?

अरे भाई यह रॉकेट विज्ञान नहीं है, एकदम सीधी सी बात है । क्या हमने सुना नहीं है बोए पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होएँ ? अब जो फसल हमने बोई थी उस ही को काटने में कैसा संकोच ? हमने अपने बच्चों को दिया ही क्या है ? एक दूषित पर्यावरण,टूटते या शिथिल पड़ते रिश्ते ! भागम भाग के जीवन में किसी तरह बच्चे के मुँह में दूध की बोतल डाल दी, नैपी बदल दिया और सोचा कि हमारे ममत्व व पितृत्व का यहीं अन्त हो गया । एक नर्सरी,एक स्कूल में दाखिला दिला दिया, एक ट्यूटर लगा दिया । अरे भाई, उसे लाड़ कौन करेगा ? कौन उसके स्व को महत्व देगा ? कौन उसके साथ खेल खेलेगा ? कौन उसके सामने आदर्श रखेगा ? टी वी, कम्प्यूटर, या कार्टून ? अब तो परिवार में इतने बच्चे भी नहीं होते कि वे आपस में खेलते रहें । कार्टून के संसार में कोई मरता नहीं है । कितना भी पीट लो, ऊपर से ट्रक, ट्रेन कुछ भी निकाल लो, व्यक्ति या प्राणी पिचक भले ही जाएगा , किन्तु इतना लचीला होता है कि फिर खड़ा हो जाता है । कम्प्यूटर खेल भी बच्चों को गोली मारना ,चाकू मारना सिखाते हैं ।

एक क्लर्क, एक मजदूर बनने के लिए तो योग्यता चाहिये, किन्तु एक नए जीवन के निर्माण के लिए किसी योग्यता की आवश्यकता नहीं । बस जन्म दे दो, खर्चा कर दो और सोचो की उत्तरदायित्व खत्म । फिर आप अपने निजी जीवन में लड़ो ,जूझो, देश, समाज, धर्म एक दूसरे पर चढ़ाई करें , युद्ध करें तो क्या बच्चों पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ? क्यों ? वे तो कच्ची मिट्टी हैं और जो खाका संसार व समाज का उनके सामने खींचोगे वे उस ही के अनुरूप ढल जाएँगे । तुम तो विनाश की होली खेलो और उनसे आशा करो संयम की ? सब तरफ अन्याय करो और सोचो कि बच्चे किशोर व युवा समझदार होंगे, न्याय में विश्वास करेंगे, शान्ति से रहेंगे ?

बड़े क्षुब्ध मन से मैंने इस विषय पर यह कविता लिखी है .........

बिखरा बचपन भटका यौवन

सोच रहे हैं सैकड़ों मनोवैज्ञानिक

कहाँ गलत हो गया यहाँ

वह था भोला, प्यारा बच्चा फोटो का

यह हत्यारापन उसे मिला कहाँ

वह तो रहता था श्रेष्ठ देश में

उसे यह वहशीपन मिला कहाँ

सारी सुख सुविधाएँ मिलती थीं उसे

फिर वह उच्च संस्कृति में बौराया कैसे यहाँ

सोचो डॉक्टर, सोचो शिक्षाविद्

सोचो नेता, सोचो पंडित

सीधा सा यह जीवन का गणित है

यह रॉकेट विज्ञान नहीं !

देखो बच्चों के बिखरे बचपन को

देखो उनके भटके यौवन को

विश्व भर में हो रहा यही है

एक देश की यह बात नहीं

टी वी के सामने बीतता है बचपन

वही उसे सहलाता, लाड़ लड़ाता है

अपनों के पास समय नहीं है

कम्प्यूटर साथ निभाता है

वे ही साथी हैं, वे ही शिक्षक

नए खिलौने, पिस्तौल, कारतूस

यही सब तो उसने जाना है ।

अपने पूर्वाग्रह उसे हम हैं दे देते

हिंसा, घृणा और वैमनस्य

उसके नन्हें बाल हृदय को

समझ न पाते हम फूहड़ नादान बड़े

जब चाहे वह समय और साथ हमारा

ले आते हम सारा बाजार उठा

उसे उठाओ गोदी में, लगा सीने से

स्नेह की उसकी प्यास बुझाओ

चाहे कितनी ही कमी हों उसमें

ना जतलाओ निराशा उसमें

ढूँढ ढूँढ गुण उसके निखारो

उसका व्यक्तित्व जरा ।

घुघूती बासूती

मतदान

हमने भी मतदान दिया ।
एक जमाने से बताया जा रहा है मत दान करो, मत दान करो, परन्तु हम हैं कि दानवीर कर्ण की परम्परा पर चलते हुए दान प्राप्त करने वाले या हमारे मत रूपी दान के इच्छुक की पात्रता या योग्यता को ताक पर रख हर बार मत दान करके ही दम लेते हैं ।
जीवन में और कुछ दान किया हो या ना किया हो मत तो दान किया ही है । कभी भी कोई उम्मीदवार या दल ऐसा नहीं था कि वह अपनी योग्यता व अच्छाई के आधार पर हमारे मत का अधिकारी बनता । हर बार अजीब अजीब मूल्यों वाले दलों व थाली के बैंगन से उम्मीदवार हमें मिले ।
कभी कभी लगता है कि मतदान शब्द भारत की राजनीति को ही ध्यान में रखकर बनाया गया है । शायद यह शब्द बनाने वाले लोग जानते थे कि मत पाने वाले लोग अधिकतर सुयोग्य नहीं होंगे इसलिये हमें पहले से ही आगाह कर देते हैं कि मतदान =दान मत करो । परन्तु हम तो वही कुत्ते की पूँछ हैं, कभी सीधी नहीं होती । चाहे जितना मना कर लो हम किसी ना किसी अनजाने व्यक्ति को अपना मत दे ही आते हैं । आज मतदान करने निकलते समय ही हमें दो उम्मीदवारों का नाम पता चला । तीन और भी खड़े थे , उनका नाम पता नहीं है । अब न छूटने वाली स्याही से अपनी उंगली सुशोभित कर अपनी व समाज की दृष्टि में एक जिम्मेदार व सचेत नागरिक बन गई हूँ ।
अब ऊँट के मुँह में अपने मत रूपी जीरा डाल प्रतीक्षा है कि देखें ऊँट किस करवट बैठता है। हम यह भी जानते हैं कि जिस भी करवट बैठे कोई ना कोई नागरिक तो कीड़े मकोड़ों की तरह उनके भार के नीचे दब ही जाएँगे ।
घुघूती बासूती

Tuesday, December 11, 2007

अदेखाई

अदेखाई
एक शब्द है गुजराती में
छोटा सा है शब्द पर
मन में है उसने जगह बनाई
कहते हैं लोग उसे अदेखाई ।

कुछ कुछ ईर्ष्या से
यह मिलता सा है
कुछ कुछ जलन सा
यह जान पड़ता है ।

पर इस शब्द के अर्थ
हैं मेरे लिये कुछ और
यह ना पड़ोसी की सुन्दर
पत्नी से है मेरी ईर्ष्या ।

यह नहीं है किसी की
पदोन्नति से पैदा हुई जलन
ना किसी की बड़ी कार देख
पुरानी कार से मिलती पीड़ा ।

ना दूजों के ज्ञान से
उपजी यह मेरी उलझन
ना देख सहकर्मी के बंगले को
मेरे मन की बढ़ती धड़कन ।

यह तो है गुजराती में
बोले जाने वाला तेरा प्रिय
वह शब्द जिसको हम
सब कहते हैं अदेखाई ।

जो होती है फूल से, देखूँ
जब तेरे बालों में लगे उसे ,
देख तेरे माथे की बिन्दिया
हो जाती है मुझे अदेखाई ।

तेरे गले में चमकता आभूषण
जब भी देता है मुझे दिखाई
मन में उमड़ता घुमड़ता है
तब एक ही शब्द अदेखाई।

घुघूती बासूती

Thursday, December 06, 2007

राम का जन्म खालीस्तान में हुआ था !

आप को आश्चर्य हो रहा है ? मुझे भी बहुत हुआ था । अरे, जब आज तक खालीस्तान बना ही नहीं तो वहाँ राम तो क्या कोई भी जन्म नहीं ले सकता ।

बात उन दिनों की है जब बिटिया को हिन्दी के पाठ्यक्रम में संक्षिप्त सी रामायण भी पढ़ाई जाती थी । वही अपना छुट्टियों का गृहकार्य करते हुए हमसे पूछ रही थी कि यह खालीस्तान क्या होता है । कुछ तो हम धर्म आदि के प्रति उदासीन थे और कुछ बच्चियों का कुछ स्टेरेलाइज्ड से वातावरण में जीने के कारण संसार की जानकारी कम और पुस्तकों व काल्पनिक चीजों की जानकारी अधिक होने के कारण हमें कई बार ऐसे प्रश्नों का सामना करना पड़ता था । परन्तु हमें यह समझ नहीं आ रहा था कि वह खालीस्तान के बारे क्यों पूछ रही है । फिर भी हमने अपने जीवन के मूलमंत्र, कि बच्चियों की कोई बात नहीं टालेंगे, उन्हें उनकी उम्र व समझ के अनुसार उत्तर अवश्य देंगे, के चलते उसे समझाना आरम्भ किया कि कैसे कुछ लोग एक नया राष्ट्र चाहते हैं आदि आदि । वह बोली कि फिर दे देना चाहिये ना । मैं इस विषय में कुछ समझाती उससे पहले ही वह बोली कि माँ यह राष्ट्र तो पहले भी रहा होगा क्योंकि टीचर कहती हैं कि राम का जन्म खालीस्तान में हुआ था ।

अब हम बुरी तरह चौंके । माना कि जिन छोटी सी जगहों में हम रहते आए हैं वहाँ का पढ़ाई का स्तर बहुत नीचा रहता है क्योंकि अध्यापक ही नहीं मिलते, फिर भी यह तो अति थी । मैंने कहा आगे क्या लिखाया है वह भी पढ़ो। वह सुनाने लगी " राम को १४ वर्ष का खालीस्तान हुआ था । रावण सीता को उठाकर खालीस्तान ले गया । "

अब बात हमें समझ में आई । यह खालीस्तान रिक्त स्थानों को भरो वाला ‍‌डैश था । हम लोग हाल में ही इस नई जगह आए थे सो बिटिया को नई टीचर के पढ़ाने का तरीका व शब्द नहीं पता थे । पहले वाले विद्यालयों में डैश कहा जाता था और यहाँ खाली स्थान ।

घुघूती बासूती

Tuesday, December 04, 2007

एक सात वर्ष की बच्ची के साम्यवाद से एक ग्यारह वर्ष की लड़की के पूँजीवाद की हार



बात तब की है जब मैं ग्यारह वर्ष की थी । पूँजीवाद या साम्यवाद के बारे में कुछ विशेष नहीं जानती थी सिवाय इसके कि सोवियत संघ में बच्चों की देखभाल करना सरकार का दायित्व था, लोग मिलकर खेती करते थे आदि। तभी हमारे पड़ोस में एक नया परिवार रहने आया । दोनों के घरों में बगीचे थे । मेरे पिताजी को बागवानी का विशेष शौक था सो हमारा बगीचा सदा सबसे अच्छा होता था । भाँति भाँति के फलों के पेड़, फूल व सब्जियाँ साल भर लगी रहती थीं । उन दिनों हमारे इलाहाबादी अमरूद का पेड़ मीठे अमरूदों से लदा पड़ा था ।

एक शाम जब मैं बगीचे में गई तो देखा लगभग सात वर्ष की एक लड़की अमरूद तोड़ रही थी । मैंने उससे पूछा "यह क्या चल रहा है ?" वह बोली "अमरूद तोड़ रही हूँ ।" मैंने पूछा " क्यों तोड़ रही हो ?" वह बोली "खाने के लिए ।" मैंने पूछा "किससे पूछकर तोड़ रही हो ?" वह बोली "किसी से भी नहीं।" मैंने कहा "किसी के घर से बिना पूछे कुछ भी नहीं तोड़ते।" वह बोली " मेरे घर अमरूद नहीं लगे हैं तो मैं यहाँ से तोड़ रही हूँ।" मैंने कहा "ऐसा नहीं करना चाहिये।" वह बोली "वाह दीदी, सारे अमरूद क्या तुम ही खाओगी ? हम क्या खाएँगे ?"

मेरे पास इस प्रश्न का उत्तर ना तब था ना आज है । बड़े होकर जब साम्यवाद के बारे में पढ़ा तो मुझे वह बच्ची याद आ गई । साथ में यह भी कि उसके साम्यवाद ने मेरे पूँजीवाद को अपने भोलेपन से हरा दिया था ।

घुघूती बासूती

Monday, December 03, 2007

अम्मा २

अम्मा २

अम्मा पड़ोस में रहती हैं । मुझे वे बहुत भाती हैं क्योंकि उन्हें पढ़ने का बहुत शौक है । वैसे तो वे हिन्दी भाषी हैं पर यहाँ बंगाल में उन्हें हिन्दी की पुस्तकें व समाचार पत्र सरलता से उपलब्ध नहीं होते हैं, अत: उन्होंने बंगला पढ़ना,समझना व कुछ सीमा तक बोलना भी सीख लिया है। वैसे तो उन्होंने अधिकतर बंगला साहित्य का हिन्दी अनुवाद पढ़ रखा था परन्तु अब मूल उपन्यास पढ़ गदगद हो जाती हैं ।
अम्मा ने एक खाते पीते मध्यमवर्गीय ऊँचे कुल में जन्म लिया था । विवाह भी एक सभ्रान्त परिवार में हुआ था । पति भी ठीक ठाक कमा रहे थे । किन्तु घर में दुर्भाग्य की मार कुछ ऐसी पड़ी कि उनके विवाह से पहले ही घर की हालत खस्ता हो गई थी । घर के सबसे बड़े पुत्र की मृत्यु, दुकान व घर में चोरियाँ, इन सब ने ससुर की कमर तोड़ दी थी ।
अंग्रेज सरकार की नौकरी वाले पिता के घर फ्रॉक,पैन्ट्स,निकर आदि पहनने वाली अम्मा को पुत्रवधू बना ससुर बहुत गर्व से घर ले जा रहे थे। वहाँ डोली में लंह्गा व ढेर सारे आभूषण पहने १२ वर्ष की अम्मा को यह गुड़ियों का खेल सा लग रहा था । उन्हें लग रहा था कि अभी यह खेल खत्म होगा और वे वापिस अपने घर यह सब उतार फ्रॉक पहन अपनी सहेलियों व भाई बहनों के साथ मस्ती कर रही होंगी। परन्तु यह खेल था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
आखिर वे ससुराल पहुँची , दूल्हे को घोड़े से व दुल्हन को पालकी से उतारा गया। वहाँ सब लोग उनके रूप, गहनों,कपड़ों, सैन्डल व लम्बे बालों को देखकर आश्चर्य कर रहे थे । उनके मुलायम हाथ यह दर्शा रहे थे कलम के अलावा उन्हो्ने दराती, खुरपी तो क्या चाकू भी कभी नहीं पकड़ा है ।
ससुर उनसे रोज गीता व रामायण सुनते। अपनी बेटियों व आसपास की लड़कियों से उनसे लिखना पढ़ना सीखने को कहते । परन्तु गाँव में बहू का मूल्य तो केवल उसके खाना पकाने, खेतों में काम करने, गाय भैंस का खयाल रखने की योग्यता से ही आँका जाता। पति अपनी बालिका वधू को देखते, गाँव में उसके भविष्य की चिन्ता करते , परन्तु ना तो इस बच्ची को अपने साथ शहर ले जा सकते थे, ना उसके लिए कुछ और कर सकते थे। वे अम्मा को माता पिता व बड़ों का कहा मानने को कह कर शहर नौकरी पर चले गए।
उनका मन भी अम्मा की चिन्ता में लगा रहता। वे जानते थे कि जबतक गाँव के लोग उन्हें अपना सा न बना लेंगे तब तक अम्मा पर तानों की बौछार होगी। पति के जाते ही परिवार ने उन्हें भी खेतों पर ले जाना शुरू कर दिया। शुरू में तो अम्मा को धान रोपना भी खेल ही लगता था । जैसे बच्चे मिट्टी से खेलते हैं कुछ वैसे ही अम्मा धान रोपतीं। गाय भैंस का काम भी उनसे बतियाती हुईं करती । गाय भैंसो को अपने विद्यालय में सीखी कविताएँ सुनातीं। गोबर के उपले खूब मन से बनातीं । कोशिश करतीं कि सब उपले बराबर आकार के और बिल्कुल गोल होंए। यह सब देख स्वाभाविक था कि परिवार की अन्य स्त्रियों को उनपर गुस्सा आता और वे उनसे तेज काम करने को कहतीं। घर को गोबर से लीपना भी उन्होंने सीख लिया था । वे घर लीपकर सुन्दर रंगोली बनातीं ।
पति उन्हें पत्र लिखते, उनका हाल पूछते। उनके बाल मन में अभी पति के लिए कोई विशेष स्थान नहीं बना था । न ही उन्हें इस रिश्ते का महत्व ही पता चला था। पति साल में एक बार घर आते। किशोरी पत्नी को देखते व गाँव के वातावरण में रमते हुए देखते। सोचते कि अब जब मैं इसे शहर ले जाऊँगा तो क्या वह उस वातावरण में रह सकेगी ।
१७ वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने भाई से अम्मा को शहर पहुँचाने को कहा । जब वे स्टेशन में उन्हें लेने पहुँचे तो खस्ता हाल कपड़ों, गहने विहीन शरीर , चप्पल रहित फटे हुए पैर देख उनका मन अपनी पत्नी की दुर्दशा देख रो पड़ा । जब उन्होंने अम्मा से उनकी शादी में मायके से मिली ढेरों साड़ियों , गहनों व तरह तरह की सैन्डल्स के बारे में पूछा तो वे बोलीं कि वे तो घर में सबने रख लिये हैं । उनसे कहा कि शहर में नए खरीद लेना । वे उन्हें लेकर साड़ियों की दुकान पर गए, कुछ साड़ियाँ खरीदीं । फिर जूतों की दुकान में गए । दुकानदार ने जब अम्मा के सामने चप्पलें रखीं तो अम्मा को कौन सी चप्पल किस पैर में डालें नहीं समझ आ रहा था। ये वही शहर वाली अम्मा थीं, पढ़ने की शौकीन अम्मा, सैन्डल पहनने वाली अम्मा ! जब हाथ पकड़ सड़क पार कराने लगे तो सख्त , खुरदुरे हाथ को पकड़ उन नरम गुलाबी हाथों को याद करने लगे जो उन्होंने पाणि ग्रहण के समय पकड़े थे।
अम्मा व उनके पति ने अभावों में भी अपने बच्चों को बेहतर से बेहतर शिक्षा दी । अम्मा के पास दो तीन ही साड़ियाँ होती थीं व मोहल्ले की स्त्रियाँ उन्हें रोज रोज वही पहनने के लिए टोकती थीं । अब अम्मा के सभी बच्चे कमाने लगे हैं । अम्मा के पास किसी चीज की कमी नहीं है , कमी है तो केवल उनके पति की । रंग बिरंगी साड़ियाँ व गहने पति के बिना पहनने का उनका मन नहीं होता । पहले दुर्गा पूजा में जाती थीं तब ढंग के कपड़े नहीं थे , अब अलमारियाँ साड़ियों से पटी पड़ी हैं तो उनका जाने का मन नहीं होता । सुहागिनों के बीच विधवा का जाना उन्हें अच्छा नहीं लगता । मैं और उनके बच्चे उन्हें समझाते रहते हैं।
आज अम्मा मान गईं । नई आसमानी साड़ी , हाथों में सोने का एक कंगन व पोती की लाई विदेशी घड़ी पहन अम्मा नई कार में परिवार के साथ घूमने जा रही हैं । मैं हाथ हिलाकर अम्मा को बाय कह रही हूँ । लगता है वही १२ वर्ष की अम्मा लौट आईं हैं। और आज पालकी की बजाय चमचमाती कार में एक नई यात्रा पर निकलीं हैं ।
घुघूती बासूती

Saturday, December 01, 2007

मेंढक

मेंढक
हृदय में एक दर्द इक जमाने से धंसा था
मन में एक कांटा ना जाने कबसे गड़ा था,
चुभता था वह रह रहकर अन्तस् में उसको
कितनी बातें दर्द की याद करातीं थीं उसको ।

इस दर्द को ना वह छोड़ पाती थी
ना दर्द ही कभी छोड़ पाता था उसको,
अन्दर वह पल पल घुटती रहती थी
इस घुटन ने तोड़ डाला था उसको ।

इक दिन उसने एक सुनसान जगह में
झाँका व फुसफुसा कह दी बात कुँए में,
सोचा था कि मन हल्का हो जाएगा
जब मन की बात वह कुँआ सुनेगा ।

उसने ना जाना कि कुँए में मेंढक था रहता
कुछ गरम आँसू उसके जा मेंढक पर गिरे,
निकला बाहर मेंढक शब्द उससे ये कहता
मैं हूँ भाग्यशाली, तेरे मोती मुझपर आ झरे ।

सुन ली है बात मैंने तेरे दर्द व दुख की
जानता है क्या वह भी बात तेरे दर्द की,
कब से तुम सीने से लगाए बैठी थी इसको
आज मैं ना सुनता तो ना कहती किसी को ।

वह बोली कुछ मोड़ भी आते हैं जीवन में
और कभी मिल जाते हैं अन्धे से ये रास्ते,
मुड़ना भी पड़ता है नई राह की खोज में
सहनी पड़ती बेवफाई भी प्यार के वास्ते ।

यह कह वह चली गई अपनी दुनिया में
मेंढक भी जा कूदा वापिस अपने कुँए में,
सोच रही थी वह कि कहीं मेंढक यह
कहानी का राजकुमार तो ना था वह ।

मेंढक भी सोच रहा था कि वह नारी
जो जाने कहाँ से आई कुँए पर उसके,
कहीं वही तो ना थी उसकी राजकुमारी
शायद भाग्य बदलने आई थी उसके ।

घुघूती बासूती