Thursday, November 15, 2007

वह तो केवल एक है

वह केवल एक है
चाहता अनेक है
यहाँ भी होऊँ
वहाँ भी होऊँ
किसको पाऊँ
किसको खोऊँ
प्रश्न ये अनेक हैं
और वह एक है ।


मन का सारा खेल है
कि वह तो एक है
सबसे उसका मेल है
किन्तु वह एक है ।


वह तो केवल एक है
सबसे उसको प्रेम है
इसका भी रखना ध्यान है
उसका भी रखना ध्यान है
किसको छोड़ूँ
किसको पकड़ूँ
द्वंद ये अनेक हैं
और वह एक है ।


बात ये अजब है
कि वह तो एक है
चाहता वह गजब है
किन्तु वह एक है ।


घुघूती बासूती

10 comments:

  1. वह एक है, चाहना अनेक हैं. यही तो मानव जीवन का सत्य है. जिस दिन यह इच्छा खत्म हो गयी इंसान भी खत्म हो जायेगा.

    माया मरी ना मन मरा, मर मर गये शरीर
    आशा तृष्णा ना मरे , कह गये दास कबीर.

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  2. आपने सहज रूप में मानव मन का वर्णन कर डाला... मन एक है लेकिन रूप उसके हज़ार हैं तभी तो अंर्तद्वंद में रहता है...

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  3. इसका भी रखना ध्यान है, उसका भी रखना ध्यान है...
    यही तो ज़िंदगी है, उसकी लयताल है।

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  4. वह केवल एक है
    चाहता अनेक है
    यहाँ भी होऊँ
    वहाँ भी होऊँ
    किसको पाऊँ
    किसको खोऊँ
    प्श्न ये अनेक हैं
    और वह एक है ।

    गजब लाईने लिखीं हैं।

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  5. संजय बेंगाणी11:41 am

    सुन्दर बुनावट

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  6. हां हम सबका यही हाल है विखंडित व्यक्तित्व , द्वंद्व और प्रश्नाकुलता ...

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  7. क्या शानदार लिखा है आपने!!

    आशा है आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा!!

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  8. sach hi kaha hai aapney....bahut se paksh ..magar vah ek hai..sundar

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  9. अद्भुत है. एक और अनेक का ये किस्सा अनंत से चला आ रहा है और अनंत तक चलेगा. अति सुंदर अभिव्यक्ति.

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  10. वाह बढ़िया, मुझे तो आपका नाम ही बहुत पसंद है। शायद आपके ब्लॉग पर ही पढ़ा था कि घुघूती गौरैया को कहते हैं। आज वह पोस्ट नहीं मिली। क्या आप बता सकती हैं कहाँ है (हो सके तो मुझे लिंक भेज दें कृपया)। ऐसी ही एक लोक रचना हिंदी में भी है जिसे बच्चों को पैर पर झुलाते हुए बोला जाता है। कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
    खंती मंती कौड़ी पाई
    कौड़ी ले हम गंग बहाई
    गंगामाता बालू दीनी
    बालू ले हम भुजवे की दीनी
    भुजवा हमका दाना दीना
    दाना ले घसियारे को दीना
    घसियारा हमका घास दीना
    घास ले हम गैया को दीनी
    गैया हमको दुद्दू दीनी
    दुद्दू ले हम खीर पकाई
    खीर पकाई सब घर ने खाई
    बची बचाई आले धरी पिटारे धरी
    आ गई घूस खा गई खीर
    नई दिवार उठी उठी उठी
    पुरानी गिरी धम्म...
    घूस क्या होता है एक दिन मैने दादी से पूछा था। दाती बोलीं एक तरह की चुहिया होती है। देखो तो बचपन की बातें कैसी याद रहती हैं नया कुछ याद करूँ तो झट से भूल जाता है।

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