Thursday, November 01, 2007

अहसास

एक उम्र गुजर जाती है
उम्र गुजरन॓ का अहसास होन॓ तक
सब कुछ बिखर जाता है
बिखराव का अहसास होने तक ।

जीवन हाथ से निकल जाता है
रेत सा फिसलने का अहसास होने तक
सबकुछ ही बेमानी हो जाता है
अपने बेमानी होने का अहसास होने तक ।

आँचल पूरा भीग जाता है
आँसुओं के रीतने का अहसास होने तक
अपने हाथ छुड़ा लेते हैं
अपनों के जाने का अहसास होने तक ।

हाथ खाली हो चुके होते हैं
सबकुछ खोने का अहसास होने तक
आशाएँ सारी खो जाती हैं
निराश होने का अहसास होने तक ।

मौत आ चुकी होती है
जिन्दा थे का अहसास होने तक
साँसें खत्म हो चुकी होती हैं
साँस लेते थे का अहसास होने तक ।

घुघूती बासूती

17 comments:

  1. हर पल को अपनी उत्कृष्टता के साथ जी लें तो फिर किसी बात का ग़म ना हो.खैर सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  2. बेहतरीन...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति. बधाई.

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  3. आपने शायद स्त्री केन्द्रित लिखा है। पर पुरुष के हिसाब से भी मामला वही है। मिड-लाइफ क्राइसिस बहुत महसूस की है - कर रहे हैं।

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  4. सारा खेल अहसास का ही है। इसलिए कम से कम बिखरने का अहसास दूर ही रहे तो, बेहतर है। वैसे ज्यादातर लोग इससे बच नहीं पाते हैं।

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  5. यथार्थ के करीब ।

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  6. बहुत सुन्दर और एक्दम यथार्थ के करीब लिखा है

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  7. एक यथार्थ को शब्दों में पिरोया है आपने...
    परन्तु पीछे मुड कर अपनी उपलब्धियों को भी देखें तो शायद ये मायूसी कुछ कम हो जाती है...शायद मिट भी जाये....जो बीज आपने बोयें है.. वो शायद अभी फ़ल नहीं ला पाये पर लायेंगे जरूर..

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  8. भावभीनी ! आपका सुन्दर भाव पढ़कर मुझमे भी एक अहसास जागा ---
    "मेरे पास सिर्फ एक लम्हा है !
    लम्हा अजर-अमर है, इस मृग-तृष्णा में जीने दो"

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  9. एक खूबसूरत कविता को पढना,
    उस कविता के खत्म होने का एहसास होने तक...

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  10. शव्‍दों में बसे भाव को एहसास कराती कविता ।
    धन्‍यवाद ।

    www.aarambha.blogspot.com

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  11. खूबसूरत कविता

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  12. वाकई एहसासो को शब्दो मे बांध दिया है आपने!!

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  13. भाव भरी कविता.....

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  14. बहुत, बहुत सुन्दर! यह कविता तो सुन्दर लगी और शब्दों का चयन भी। ज्ञान जी की इस टिप्पणी में उल्लिखित दोनों बिन्दुओं से मैं तो सहमत नहीँ हूँ। यह कहीँ से स्त्री या पुरुष केन्द्रित नहीँ लगती और न ही मिड लाईफ क्राईसिस का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रकार का अहसास (चेतना अथवा वस्तुस्थिति / परिस्थिति का संज्ञान) तो किसी भी वय में अलग अलग कल खण्डों में होता ही है - मसलन विद्यार्थी को, व्यसनी को, आम युवक-युवती को, यहाँ तक कि अमरीका जैसे देश को भी, ईराक के बाद (यह बात दीगर है कि वे शायद व्यक्त नहीँ करते)। सो, मेरे हिसाब से तो यह बहुत सटीक, भावात्मक और उपदेशात्मक कविता है। आरम्भिक पंक्तियों में तो यह गोपाल दास "नीरज" की अति लोकप्रिय कविता "कारवाँ ग़ुज़र गया..." की भी याद दिलाती है (वह कोई मिड लाईफ क्राईसिस का परिणाम नहीँ थी)

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  15. सही,सजीव अहसास!

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  16. rachana2:32 pm

    आपकी कविता खत्म हो गयी,
    पढने के मजे का अहसास होने तक्!

    बहुत पसँद आई कविता.

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  17. चाहे कुछ भी हो पर अहसास जिंदा ही रहता है…।
    बहुत सुंदर कविता…।

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