Saturday, May 19, 2007

एक और कायर ?

कायर....२
इस कविता में भी मैं एक आत्महत्या के विषय में लिख रही हूँ । मैं आत्महत्या को बिल्कुल भी सही नहीं मानती । यह गलत है । हर हाल में गलत है । एक जीवन को समाप्त करना, चाहे वह अपना ही क्यों न हो, विशेषकर, तब जब यह जीवन सम्भावनाओं से भरा हुआ हो, सर्वथा गलत है । किन्तु मैं उन परिस्थितियों के बारे में लिखना चाहती हूँ जो किसी को ऐसा कदम उठाने की तरफ बढ़ने में सहायता करते हैँ । थोड़ा सा सहारा, थोड़ा सा सकारात्मक रवैया शायद उन्हें ऐसा करने से रोक दे । तब भी कुछ लोग बिना किसी को अपना दुख बताए शायद जीवन समाप्त कर लें, तब शायद कोई भी उनकी सहायता न कर सके । किन्तु अधिकतर मामलों में लोग मरना नहीं चाहते । वे मृत्यु को तभी चुनते हैं जब उन्हें सारे रास्ते बंद नजर आते हैं । जब वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनों से सहायता माँग चुके होते हैं और जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनकी सहायता नहीं करेगा विशेषकर उनके अपने ।
यहाँ पर मैं एक विवाहिता नवयौवना की पीड़ा के विषय में लिख रही हूँ । उसे अपने पति या ससुराल से क्या शिकायत थी लिखना कोई आवश्यक नहीं है । आप स्वयं ही कयास लगा सकते हैं । जो अधिक महत्वपूर्ण है वह है उसके अपनों का उसके प्रति संवेदना रहित व्यवहार !वह केवल थोड़ा सा सहारा चाहती थी ..........

मैंने चाहा था हँसकर जीना
जीवन मेरा हो गया दुश्वार
बहती जलधारा सी मैं थी
मैं बन गई बांध बंधी धार
जितना मैंने उड़ना चाहा
पंख मेरे थे उसने कतरे
माँ से भी मैं बोली थी
अब ऐसे ना जी पाऊँगी
आ माँ, मुझे ले जा ले आकर
जीवन मेरा बना अंगार
कहती थी वह बिटिया मेरी
कैसे भी निभा तू लेना
अब ना वापिस तुझे ला पाऊँगी
मेरी भी तू सोच कुछ
कैसे समाज में मुख दिखलाऊँगी ।

सारे रास्ते जब बंद हो गए
जीवन से थी मैंने पाई हार
सुलगा कर इक माचिस को मैंने
करना चाहा जीवन उद्धार
मरने पर तो सब जलते हैं
पर मैं बन गई जीती मशाल ।

आज मुझे कायर तुम कहते हो
कहाँ गई थीं कल ये सब बात
मैंने भी था जीवन जीना चाहा
पर ना जीने देते थे हालात
ओ बड़ी बातें करने वालो
क्या तुम दे पाते मेरा साथ
तुम जलती माचिस को छू लो
फिर देना मुझे उपदेश
ओ मुझे कायर कहने वालो
क्या जानो तुम दर्द मेरा
कैसे होता है मन इतना पीड़ित
कि जीवन ज्योति बुझा हम पाते
तुमने तो दुनिया देखी है
क्यों न मुझे तुम लौटा थे लाते ।

इतना ही तो मैंने चाहा था
कुछ ऐसा हो जाए कि मैं
कर पाऊँ नवजीवन की शुरुआत
कुछ दिन मुझे सबल बनाते
अपने घर में मुझे ठहराते
मेरे घावों पर मरहम लगाते
फिर मैं नई राह निकलती
अपनी मंजिल खुद पा लेती ।

सुलग रही जब आत्मा चिता सी मेरी
क्यों तुम ना थे तब आग बुझाते
देखो मैं हवन कुंड बन गई
जवित हूँ पर भूत बन गई
पोर पोर में होती पीड़ा
बाल मेरे हैं झुलसाए
अब तो मेरे अपने भी
मुझसे हैं आँख चुराएँ ।

कुछ घंटों या दिन की ये पीड़ा
जीवन पर्यन्त सुलगने से बेहतर
मन आत्मा की पीड़ा के बदले
जलने की पीड़ा को गले लगाया
नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाए
वह मृत्यु ही अब मुझे है भाए ।

जीने की हुईं खतम लालसा
मरने की थी बेला आई
जीने के इस अद्भुत खेल में
हार सदा से मैं पाती आई
अब तुम जाओ रपट लिखाओ
मेरे मरने का केस बनाओ
जीते जी ना साथ दे सके
अब मरने पर रस्म निभाओ ।

घुघूती बासूती

20 comments:

  1. काकेश्6:05 am

    संवेदंशील , भावुक ,मार्मिक ..इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता.

    आपने इस बार अपनी पूरी बात भुमिका में कहाँ दी अच्छा लगा.पिछ्ली बार बात थोड़ी अधूरी सी लगी थी.

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  2. Anonymous6:06 am

    *कहाँ दी को कह दी पढ़ें.

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  3. बहुत मार्मिक रचना है मगर शायद अभी मैं इसे समझ नहीं पा रहा हूँ. दो बार पढ़ चुका. फिर कई बार पढ़ना पडेगा पूरा मर्म समझने के लिये. पढ़ेंगे जरुर फिर फिर.....

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  4. कविता बहुत अच्छी है पर , कविता जीवन में आशा का संचार करती है न कि आत्महत्या के लिए उकसाती है

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  5. अच्‍छी रचना. बधाई.

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  6. बहुत ही संवेदन शील रचना है ...एक सच को आपने बहुत ही ख़ूबसूरती से पिरोया है ...

    जीने की हुईं खतम लालसा
    मरने की थी बेला आई
    जीने के इस अद्भुत खेल में
    हार सदा से मैं पाती आई
    अब तुम जाओ रपट लिखाओ
    मेरे मरने का केस बनाओ
    जीते जी ना साथ दे सके
    अब मरने पर रस्म निभाओ

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  7. आत्महत्या तो गलत है पर मैं Euthanasia का पक्षधर हूं। कई बार सोचता हूं लिखूं पर बस ...

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  8. "क्या हम यह नहीं कह सकते कि आधुनिक जीवन और आधुनिक सभ्यता मृत्यु-चेतना पर टिकी हुई है।"
    "आधुनिक जीवन का अधिकांश कार्यक्रम इसी अहसास पर आधारित है -एक मकान बनाना ,जो अपने वंशधरों के काम आए,वसीयतनामा लिखना,हरेक बचत योजना में उत्तराधिकारी नियुक्त करना,मृत्यु से बचने के लालच में साहसपूर्ण कार्यों से कतराना,अपनी मृत्यु को बेच कर जीवन बीमा करवाना,जीवनकाल में ही स्मारक बनवाना आदि।"(किशन पटनायक,'मृत्यु पर एक बयान')

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  9. एक कहानी सुनों
    क्या आपने कभी देखे हैं पेड
    पहाड
    दरिया
    जंगल
    पशु देखे हैं क्या कभी
    हां,
    मैं जानता हूं,
    जरूर देखे होंगे आपने भी
    देखे हैं न बोलों.....
    बोलो तो एक बार.....
    हां बस कहानी यहीं से शुरू होती है

    अब इस सवाल का जवाब दो क्या आपको
    पेड पसंद है?
    पहाड पसंद है?
    जंगल पसंद है?
    जंतू पसंद है?
    पक्षी पसंद है?
    गर्मी पसंद है, या सर्दी?
    दिन पसंद है या रात?
    बस यहीं से होगी शुरूआत....
    बोलो बोलो उपरोक्त में से,
    क्या अच्छा लगता है
    क़्या अच्छा नही लगता है
    बोलो ना बोलो तो सही...
    क्या कहा आम पसंद है,
    संतरे खट्टे लगते है,
    शेर से डर लगता है,
    अमेरिकन कुत्ते अच्छे लगते है,
    नदी अच्छी है, पर पहाड आपको
    नहीं है भाते...
    इसी नाते.... मित्र मैं फिर सवाल करता हूं
    बस तुम जरा साथ दो तो निराशा हटाने का कमाल करता हूं

    आम पसंद तो संतरे का क्या करते हो.
    कुत्ते तो पाल लेते हो पर
    जंगल से शेरों को खत्म तो नही कर देते ना

    आपकी पसंद की नदियां सूख रही है
    तुम उसके लिय क्या कर पाए
    क्या हरे भरे पहाड को देख कर
    खुंदक में मर पाए
    यदि नहीं तो फिर जो न मिल सका
    उससे क्या घबरान..
    क्यों नाहक मौत को गले लगाना
    चलों कुदरत को पहचाने.
    कुछ नया झेल जाने का
    नाटक करें इसी बहाने
    अबकी नही तो फिर कभी
    अपने मन का भी पा जाएंगे.
    देखना जमाना देखेगा जब
    हम मुस्कुराएंगे.

    आपकी कविता को पढ कर तुरंत एक फ्लों में लिख गया. वास्तव में निराशा हि आत्म ह्त्या कि जननी है. आपकी कविता बहुत उम्दा और भाव पूर्ण थी जो इतने सारे भाव मेरे मन में उपजे टिप्पणी पोस्ट का रूप ले गई. मैं इसे अपने ब्लाग पर भी चेपूंगा.

    पुन् उत्त्म लेखन के लिये बधाई

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  10. मार्मिक!
    एक अच्छी रचना के लिए फ़िर से एक बार बधाई

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  11. घुघूती बासूती जी,आप की सोच एक नारी की सोच है जो सही है।लेकिन दुख से घबराकर मौत को चुनना क्या ठीक है-
    "जीने की हुईं खतम लालसा
    मरने की थी बेला आई
    जीने के इस अद्भुत खेल में
    हार सदा से मैं पाती आई"

    आप की कविता हमेशा की तरह यह भी खूबसूरत भावों से ओत-प्रोत है।लेकिन मै दो शब्द कहना चाहूँगा-

    "दुख से घबरा कर,चलना तो ना छोड़े
    गर राह लगे मुश्किल,इक राह नयी जोड़े"

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  12. bahut marmik kavita hai,
    padhte samay laga jaise har bhartiya nari aapke madhyam se kuch batana chah rahi ho.

    मरने पर तो सब जलते हैं
    पर मैं बन गई जीती मशाल ।

    bahut khub

    :)aapkamitrgss

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  13. आपने बहुत ही दर्द से भरी कविता लिखी है,..पढ़ते-पढ़ते आँख भर आई। यही तो होता आया है हमारे समाज की दोहरी मानसिकता। एक तरफ़ लड़की का विवाह क्या किया की जैसे घर-निकाला हो गया और उसका वापिस घर लौटना भी मुश्किल जहाँ उसने जंम लिया। आज बहुत कुछ नारी खुद सचेत हो गई है मगर कब समूल अंत होगा इसी बात का इंतजार है...

    सुनीता चोटिया(शानू)

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  14. "जीते जी ना साथ दे सके
    अब मरने पर रस्म निभाओ ।"

    व्यंग्य या करूणा निर्धारण मुश्किल है।

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  15. एक अच्छी रचना के लिए बधाई ।

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  16. भावप्रधान…मुखर रचना…।

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  17. मार्मिक, भावप्रधान कविता है और समाज का एक नग्न सत्य रूप जिसे आप ने अपनी कविता के माध्यम से दर्शाया है,, जीवन का दुखान्त

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  18. मरने पर रस्म अदायगी का महाकाव्य !

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  19. बहुत बढ़िया लेख हैं.. AchhiBaatein.com - Hindi blog for Famous Quotes and thoughts, Motivational & Inspirational Hindi Stories and Personality Development Tips

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  20. अवाक हूँ ...

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