यह कहावत बचपन से सुनती आई हूँ परन्तु प्रत्यक्ष में देखना अब हुआ। लगता है कि कोई आवारा अक्षय कलश वाला बादल मेरे साथ साथ चल रहा है। 'जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो' कि तर्ज पर यह बादल पहले सौराष्ट्र में मेरे गाँव पर बरसता रहा फिर जब मुम्बई गई तो वहाँ भी साथ लगा रहा। मूसलाधार बारिश में ही हम यहाँ से निकले और मूसलाधार बारिश, कभी कभी सामान्य भी, में हम मुम्बई की गीली खाक छानते रहे। लौटे तो फिर वही ‘कुत्ता बिल्ली छाप’ बारिश शुरू हो गई। बस इतनी ही गनीमत थी विमान के नीचे तैरते बादल कुछ समय के लिए कंजूस बन गए। राजकोट से २०० कि.मी की कार यात्रा इतनी दुरूह हो गई कि वाइपर भी बारिश से बुरी तरह हार रहे थे। सामने सड़क भी नजर नहीं आ रही थी। कमी थी तो रास्ते में ट्रैफिक जाम था। पता चला कि एक पेड़ सड़क पर गिरा हुआ था और कारों के अलावा, ट्रकों व बसों की एक लम्बी कतार फंसी हुई थी। भाग्य से यह एक कस्बा या छोटे शहर में हुआ था सो ड्राइवर गलियों के बीच से कभी आगे बढ़ाता तो कभी वापिस पीछे जाता हुआ कार को वापिस मुख्य सड़क पर ले आया।
हमारे मुम्बई प्रवास में यहाँ लगभग नहीं के बराबर वर्षा हुई। परन्तु जब से लौटी हूँ यह बादल बरस ही रहा है। पहले तो दो एक दिन कभी कभार ‘आँख मिचौली’ भी खेल लेता था ताकि मैं सुखाने डाले कपड़ों को कभी अंदर तो कभी बाहर टाँगती रहूँ और इस प्रकार मुफ्त में वजन कम करने का आनन्द लूँ। परन्तु मंगलवार से तो मूसलाधार ही बरस रहा है। बुधवार की सुबह से तो जो बरस रहा है तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा। अब तो हाल यह है कि बाहर तो बाहर इसने घर के अन्दर भी बरसना शुरू कर दिया है। एक चक्रवात(गुजराती में वावाजोड़ा सा कुछ) और एक भूकंप(गुजराती में धरतीकम्प) ने यहाँ के काली कपासी मिट्टी( न जाने लोग कुछ लाली लिए, खुशी खुशी मूँगफली उगाने वाली इस मिट्टी को काली कपासी मिट्टी क्यों कहते हैं? यह इतनी चिकनी है कि यदि थोड़ी भी गीली मिट्टी पर चल लें तो चप्पलों का भार पाव से अधिक कुछ ही कदम में हो जाता है। फिर अनन्त काल तक चप्पलों से 'मिट्टी छुटाओ' अभियान चलाना पड़ता है।) पर बने मकानों की नींव ही पहले से हिला रखी है। सो इतने दिनों की बरसात की मार खाते खाते अब छत ने भी जवाब दे दिया है। वह घर के दो तीन भागों में पानी को रोकने का अपना युद्ध हार गई है। सो अब कुछ बाल्टियों व टब को अस्थाई तौर पर यह काम सौंप दिया है। छत पर बने गोदाम को तो पहले ही शत्रु पक्ष के हवाले कर दिया है।
कमी है तो पैक करने के उद्देश्य से हमने सारा सामान यहाँ वहाँ बिखेर रखा है। कान लगातार आती वर्षा की आवाज से थक गए हैं। बाहर बगीचा और सड़क पानी में डूबे हुए हैं। कैंचुए व मैंढक आश्रय के लिए हमारे बरामदे की तरफ बढ़े चले आ रहे हैं। स्नानगृहों की नालियों से कतार में तिलचट्टे शरण माँगते हुए चले आ रहे हैं। न जाने क्यों वे वहाँ पहुँचते ही पीठ के बल लेट जा रहे हैं। सो स्नानगृह औंधे पड़े तिचट्टों की मरणस्थली बना हुआ है। आज तो नालियों की जाली पर रखी नैपथेलीन की गोलियाँ भी उन्हें आने से नहीं रोक पा रहीं। हम बस बाहर पड़ी बगीचे की कुर्सियों पर साँपों के विराजमान होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
पास का तालाब लबालब भरा पड़ा है। लगता है अब तक तो कारखाने के पास की दोनों झीलें भी अतिप्रवाह की चपेट में आ गईं होंगी। मैं वर्षा के आँकड़े पाना चाह रही हूँ किन्तु पति दिल्ली गए हुए हैं सो यह काम जरा कठिन है। पता नहीं उनको अहमदाबाद से यहाँ लाने को जो कार गई है वह उन तक पहुँच पाएगी या नहीं। दो दिन से हमारी स्कूल बस नहीं आई। कल वेरावल व आस पास के गाँवों से आने वाले कर्मचारियों रास्ते में बस फँस जाने की आशंका के कारण आधे दिन से कम के काम के बाद ही घर भेज दिया गया। मुझे लग रहा है कि मैं किसी समुद्र में जहाज के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद उसमें से बचाए सामान के साथ एक टापू में फँसी हुई हूँ।
मन में बस एक ही पुकार उठ रही है 'ओ आवारा बादल, कुछ दिन के लिए तो मेरा पीछा छोड़ और किसी अनावृष्टि वाले क्षेत्र में जाकर बरस!'
लगभग पाँच वर्ष पहले मैं ऐसी ही मूसलाधार बारिश में यहाँ रहने आई थी और लगता है कि ऐसी ही मूसलाधार बारिश में यहाँ से जाऊँगी।
पुनश्चः आज आस पास के गाँवों व वेरावल में जिनके घरों में पानी भर गया है उनके लिए भोजन के ५००० पैकेट गेस्ट हाउस में बनाकर भेजे जा रहे हैं। सो कामवाली वहाँ काम कर रही है। वह आज भी नहीं आएगी।
लगता है आवारा बादल ने मेरी सुन ली है। अब वर्षा रुक गई है। काश यह पोस्ट पहले ही लिख दी होती! क्या वह भी मेरा ब्लॉग पढ़ता है? अरे, मेरे पोस्ट करने से पहले ही सुन ली है! क्या वह मेरे कम्प्यूटर पर भी नजर रखता है? जो भी करता हो, मैं तो आशा करती हूँ कि वह भारत के अनावृष्टि वाले क्षेत्रों की तरफ का चक्कर लगा ही आए।
घुघूती बासूती
Friday, July 24, 2009
Wednesday, July 22, 2009
बारिश की फुँहारें, लीची का शरबत, गरमागरम खस्ता पकौड़े और अनीता जी का साथ
मुझे लगता है कि अनीता जी के इतने बड़े दिल के लिए शायद मुम्बई छोटी पड़ी तो नवीं मुम्बई बनानी पड़ी।
अनीता जी से मिलने के स्वप्न पिछले वर्ष भी देखे थे। एक बार नेट पर बतियाते हुए संजीत(आवारा बंजारा) ने कहा, आइए आपको अपनी एक दोस्त से मिलवाता हूँ। मैंने कहा नेकी और पूछ पूछ। बस उस दिन संजीत ने अनीता जी से जो मिलवाया तो हमने कई बार नेट पर घंटों बातें कीं। हमने पाया कि हम दोनों की उम्र एक है,मजाक करने, टाँग खिंचाई के शौक भी एक से थे। हीही हाहा करते हुए समय भाग जाया करता। मैं तो सदा की उल्लू हूँ और सुबह उठने की न कोई जल्दी न कोई मजबूरी, परन्तु अनीता जी तो सुबह साढ़े छः बजे कॉलेज के लिए निकलती हैं, फिर भी न जाने बतियाने के लिए कहाँ से देर रात को शक्ति निकाल लेतीं थीं।
खैर,पिछले साल जब मैंने बताया कि हम मुम्बई रहने आ रहे हैं तो उन्होंने अक्खी मुम्बई की तरफ से मेरा खुले दिल से स्वागत किया। किन्हीं कारणों से पिछले साल हमारा जाना टल गया। इस बार फिर से हमारी बदली की बातें चलीं तो एक बार फिर यह खबर अनीता जी को सुनाई। उनका फोन नम्बर लिया। फिर जैसा कि मैं सदा करती हूँ, वह नम्बर लिए बिना मैं अपने घुघूत के साथ मुम्बई पहुँच गई। तब पाया कि नम्बर तो साथ लाई ही नहीं। संजीत से नम्बर माँगकर अनीता जी को अपने आगमन की सूचना दी। उन्होंने अपने अन्दाज में मुझे नवीं मुम्बई में ही फ्लैट किराए पर लेने को पटा लिया,अब मनोविज्ञान पढ़ाती हैं तो मन को जीतना तो उनके बाएँ हाथ की कनिष्ठिका का खेल है। मैंने घुघूत जी को मना लिया। सो हम दोनों वर्षा की फुहारों का आनन्द लेते हुए नवीं मुम्बई पहुँच गए। (मुम्बई वासियों को याद रहे कि वहाँ ढंग की वर्षा लेकर हम ही १२ तारीख को पहुँचे थे! मूसलाधार बारिश में 'दो बेचारे' मुम्बई में मकान ढूँढ रहे थे।)
हमने कुछ फ्लैट देखे, दो पसन्द आए और अगले दिन निर्णय बताएँगे कहकर अनीता जी को फोन किया कि आपके घर पहुँच रहे हैं। उसके बाद का दृष्य तो अनीता जी ने अपने लेख में विस्तार से बताया है। जो नहीं बताया वह मैं बताती हूँ। गले एक बार नहीं दो बार लगाया था। वे बेचारी पहली बार से उबर भी न पाईं थीं कि मैंने दूसरा कन्धा भी नहीं छोड़ा। इस मामले में मैं समानता की घोर पक्षधर हूँ, एक कंधे को पकड़ूँ तो दूसरे को कैसे छोड़ देती?
पीठ पर ठंडी जलकण मिश्रित ठंडी बयार थी तो हाथ में अनीता जी ने संसार का सबसे स्वाद लीची का शरबत पकड़ा दिया। कुछ तो चार दिन से भटकने व अब फ्लैट पसंद आने का कमाल था और शेष अनीता जी के हाथों का जादू था। अमृत तुल्य उस शरबत का स्वाद मैं कभी नहीं भूलूँगी। सामने गर्मागरम पकोड़ों की प्लेट रख दी। खाएँ कि बतियाएँ कि उनके सुन्दर घर को ताकें कि ठँडी हवा का मजा लें, समझ ही नहीं आ रहा था। सबका मिलाजुला मजा लेते हुए समय भागता गया और हम आभासी दोस्त आमने सामने बैठे आनन्दित, पुलकित हो रहे थे। लग ही नहीं रहा था कि हम पहली बार मिल रहे हं। कहीं कोई संकोच नहीं था।
जब पता चला कि अनीता जी के पति विनोद जी पौधों के शौकीन हैं तो छत पर बने उनके गमलों वाले बगीचे को भी देखने पहुँच गए। वहाँ की हरियाली देख मन विभोर हो गया। देर बहुत हो चली थी और हमें मुम्बई के दूसरे छोर चर्चगेट जाना था सो विदा ली।
अगले दिन हम लोग दलबल सहित फ्लैट के कागज आदि पक्के करवाने पहुँचे। दो फ्लैट में से एक को चुनना था। चुना और वाकपटु दलाल की बातें सुनते रहे। किराए के मकान का यह दूसरा अनुभव था। पहले वाला तो सन ८० में जब मुम्बई गए थे तो घुघूत जी ने ही खोजा था। बहुत माथापच्ची हुई। अन्त में जब हस्ताक्षर करने का समय आया तो मैंने कहा कि आप लोग यह सब करिए, मैं तो अनीता जी के घर जा रही हूँ। तभी उनका फोन आया। मेरे कान मोबाइल की घंटी पर ध्यान देने के आदी नहीं हैं सो दो बार वे पहले भी घंटी बजा चुकी थीं और मोबाइल पर्स में ही बजता रहा था।
अनीता जी के घर जाकर फिर से लीची का शरबत पीया, न पिलातीं तो मैं खोजकर स्वयं ले लेती। वे सामने बैठी सब्जी काटती पकाती रहीं। मैं बिना रुके बोलती रही। फिर कम्प्यूटर पर बैठ संजीत को परेशान करने का यत्न करने लगे। वह परेशान होने के मूड में नहीं था, व्यस्त था। युनूस जी से पहली बार नेट पर हैलो हाय किया। संजीत को फोन पर परेशान किया। दोनों ही बच्चियाँ बनीं छेड़खानी करने के मूड में थीं। न जाने कितने लोग हमारी छेड़खानी का शिकार होते परन्तु उनके सौभाग्य से घुघूत जी आ गए। सो शैतानियाँ रुकीं।
बातें करते दस बज गए और विनोद जी घर आ गए। सबने मिलकर स्वादिष्ट भोजन किया। इलाके के बारे में जानकारी ली। इतना अपनापन पाकर हमारा मन झूम रहा था। नई जगह बसने की चिन्ता काफूर हो गई थी। अन्त में हमने जल्द ही फिर मिलने के लिए उनसे विदा ली।
यह तो ट्रैलर था........ महीने के अन्त तक हम सामान समेटकर मुम्बई पहुँच रहे हैं। मुम्बई, सावधान!
घुघूती बासूती
अनीता जी से मिलने के स्वप्न पिछले वर्ष भी देखे थे। एक बार नेट पर बतियाते हुए संजीत(आवारा बंजारा) ने कहा, आइए आपको अपनी एक दोस्त से मिलवाता हूँ। मैंने कहा नेकी और पूछ पूछ। बस उस दिन संजीत ने अनीता जी से जो मिलवाया तो हमने कई बार नेट पर घंटों बातें कीं। हमने पाया कि हम दोनों की उम्र एक है,मजाक करने, टाँग खिंचाई के शौक भी एक से थे। हीही हाहा करते हुए समय भाग जाया करता। मैं तो सदा की उल्लू हूँ और सुबह उठने की न कोई जल्दी न कोई मजबूरी, परन्तु अनीता जी तो सुबह साढ़े छः बजे कॉलेज के लिए निकलती हैं, फिर भी न जाने बतियाने के लिए कहाँ से देर रात को शक्ति निकाल लेतीं थीं।
खैर,पिछले साल जब मैंने बताया कि हम मुम्बई रहने आ रहे हैं तो उन्होंने अक्खी मुम्बई की तरफ से मेरा खुले दिल से स्वागत किया। किन्हीं कारणों से पिछले साल हमारा जाना टल गया। इस बार फिर से हमारी बदली की बातें चलीं तो एक बार फिर यह खबर अनीता जी को सुनाई। उनका फोन नम्बर लिया। फिर जैसा कि मैं सदा करती हूँ, वह नम्बर लिए बिना मैं अपने घुघूत के साथ मुम्बई पहुँच गई। तब पाया कि नम्बर तो साथ लाई ही नहीं। संजीत से नम्बर माँगकर अनीता जी को अपने आगमन की सूचना दी। उन्होंने अपने अन्दाज में मुझे नवीं मुम्बई में ही फ्लैट किराए पर लेने को पटा लिया,अब मनोविज्ञान पढ़ाती हैं तो मन को जीतना तो उनके बाएँ हाथ की कनिष्ठिका का खेल है। मैंने घुघूत जी को मना लिया। सो हम दोनों वर्षा की फुहारों का आनन्द लेते हुए नवीं मुम्बई पहुँच गए। (मुम्बई वासियों को याद रहे कि वहाँ ढंग की वर्षा लेकर हम ही १२ तारीख को पहुँचे थे! मूसलाधार बारिश में 'दो बेचारे' मुम्बई में मकान ढूँढ रहे थे।)
हमने कुछ फ्लैट देखे, दो पसन्द आए और अगले दिन निर्णय बताएँगे कहकर अनीता जी को फोन किया कि आपके घर पहुँच रहे हैं। उसके बाद का दृष्य तो अनीता जी ने अपने लेख में विस्तार से बताया है। जो नहीं बताया वह मैं बताती हूँ। गले एक बार नहीं दो बार लगाया था। वे बेचारी पहली बार से उबर भी न पाईं थीं कि मैंने दूसरा कन्धा भी नहीं छोड़ा। इस मामले में मैं समानता की घोर पक्षधर हूँ, एक कंधे को पकड़ूँ तो दूसरे को कैसे छोड़ देती?
पीठ पर ठंडी जलकण मिश्रित ठंडी बयार थी तो हाथ में अनीता जी ने संसार का सबसे स्वाद लीची का शरबत पकड़ा दिया। कुछ तो चार दिन से भटकने व अब फ्लैट पसंद आने का कमाल था और शेष अनीता जी के हाथों का जादू था। अमृत तुल्य उस शरबत का स्वाद मैं कभी नहीं भूलूँगी। सामने गर्मागरम पकोड़ों की प्लेट रख दी। खाएँ कि बतियाएँ कि उनके सुन्दर घर को ताकें कि ठँडी हवा का मजा लें, समझ ही नहीं आ रहा था। सबका मिलाजुला मजा लेते हुए समय भागता गया और हम आभासी दोस्त आमने सामने बैठे आनन्दित, पुलकित हो रहे थे। लग ही नहीं रहा था कि हम पहली बार मिल रहे हं। कहीं कोई संकोच नहीं था।
जब पता चला कि अनीता जी के पति विनोद जी पौधों के शौकीन हैं तो छत पर बने उनके गमलों वाले बगीचे को भी देखने पहुँच गए। वहाँ की हरियाली देख मन विभोर हो गया। देर बहुत हो चली थी और हमें मुम्बई के दूसरे छोर चर्चगेट जाना था सो विदा ली।
अगले दिन हम लोग दलबल सहित फ्लैट के कागज आदि पक्के करवाने पहुँचे। दो फ्लैट में से एक को चुनना था। चुना और वाकपटु दलाल की बातें सुनते रहे। किराए के मकान का यह दूसरा अनुभव था। पहले वाला तो सन ८० में जब मुम्बई गए थे तो घुघूत जी ने ही खोजा था। बहुत माथापच्ची हुई। अन्त में जब हस्ताक्षर करने का समय आया तो मैंने कहा कि आप लोग यह सब करिए, मैं तो अनीता जी के घर जा रही हूँ। तभी उनका फोन आया। मेरे कान मोबाइल की घंटी पर ध्यान देने के आदी नहीं हैं सो दो बार वे पहले भी घंटी बजा चुकी थीं और मोबाइल पर्स में ही बजता रहा था।
अनीता जी के घर जाकर फिर से लीची का शरबत पीया, न पिलातीं तो मैं खोजकर स्वयं ले लेती। वे सामने बैठी सब्जी काटती पकाती रहीं। मैं बिना रुके बोलती रही। फिर कम्प्यूटर पर बैठ संजीत को परेशान करने का यत्न करने लगे। वह परेशान होने के मूड में नहीं था, व्यस्त था। युनूस जी से पहली बार नेट पर हैलो हाय किया। संजीत को फोन पर परेशान किया। दोनों ही बच्चियाँ बनीं छेड़खानी करने के मूड में थीं। न जाने कितने लोग हमारी छेड़खानी का शिकार होते परन्तु उनके सौभाग्य से घुघूत जी आ गए। सो शैतानियाँ रुकीं।
बातें करते दस बज गए और विनोद जी घर आ गए। सबने मिलकर स्वादिष्ट भोजन किया। इलाके के बारे में जानकारी ली। इतना अपनापन पाकर हमारा मन झूम रहा था। नई जगह बसने की चिन्ता काफूर हो गई थी। अन्त में हमने जल्द ही फिर मिलने के लिए उनसे विदा ली।
यह तो ट्रैलर था........ महीने के अन्त तक हम सामान समेटकर मुम्बई पहुँच रहे हैं। मुम्बई, सावधान!
घुघूती बासूती
Thursday, July 02, 2009
गेहूँ और घुन दोनों ही बच गए।
भारतीय संविधान की धारा ३७७, समलैंगिककता और स्त्री /पुरुष कल्याण
आज दिल्ली उच्च न्यायालय ने संविधान की धारा ३७७ से समलैंगिकों को मुक्त करके न केवल समलैंगिक पुरुष व स्त्रियों पर उपकार किया है अपितु सामान्य जनता पर भी उपकार किया है। यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तरह से जीवन जीने का अधिकार है, नहीं है तो होना चाहिए किन्तु यह उससे भी बड़ा सच है कि जब वह व्यक्ति छिपे दबे तरीके से अपनी तरह से जीवन जीने के लिए, समाज में स्वीकृति पाने के लिए, दूसरों का जीवन नारकीय बना दे तो यह दूसरे का अधिकार हनन है। शायद इतने समय तक न चाहते हुए भी बहुत से समलैंगिक मजबूरी(इस मजबूरी को बहाना या स्वार्थ भी कह सकते हैं या ढोंग भी या फिर कायरता भी, किन्तु सच यह है कि वे स्वयं पीड़ित हैं, परेशान हैं।) में विषमलैंगिक (इतरलिंगी) लोगों से विवाह कर बहुधा उनका जीवन नष्ट करते रहे हैं। हमारा समाज इन मासूमों, जिनसे समलैंगिक अपनी वस्तुस्थिति छिपाकर विवाह करते रहे हैं, की बलि का यह मूल्य चुकाकर भी अपने को समलैंगिक संस्कृति से मुक्त मान शुतुरमुर्ग की तरह अपना चेहरा रेत में छिपाए ही आत्ममुग्ध था।
कोई उस स्त्री की मनोदशा का अनुमान लगाए जो विवाह के बाद पाए कि उसका पति उसकी ओर से पूर्णतया उदास है। वह अपने में कमी ढूँढती है। (स्त्री है तो स्वाभाविक रूप से कमी उसमें ही होगी, पति में तो हो ही नहीं सकती!) वह पति को खुश रखने की हर संभव चेष्टा करती है। पति का परिवार उसके रूप, उसकी चाल ढाल, बातचीत में दोष ढूँढता है। जानना चाहता है कि क्या कारण है कि उनका राजा बेटा इस स्त्री से विरक्त है। राजा बेटा माता पिता को कभी नहीं बताता कि वह तो स्त्रियों में रुचि ही नहीं रखता, या कि जिस मित्र से कहकर उसे माता पिता ने विवाह के लिए उसे राजी करवाया था वही उनके बेटे का प्रेमी है। सो अब शुरु हो जाता है उस निर्दोष स्त्री का मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक उत्पीड़न।
सास ससुर पोते(कभी कोई पोती का मुंह देखने को बेकरार देखा सुना है?)का मुँह दिखाने की बात करते हैं,समाज पूछता है कि कब गोद भरेगी। स्त्री किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी रह जाती है। वह क्या बताए कि वे तो पति पत्नी ही नाम के हैं। पहले तो पति भी उसे ही हीनभावना देने पर तुला रहता है कि तुम मुझे आकर्षित नहीं कर पातीं। फिर देर सवेर सच सामने आता है तो यह समाज में प्रतिष्ठित पति अपनी दरियादिली बताते हुए समझाता है कि तुम साधन सम्पन्न हो, पढ़ी लिखी हो, नौकरीपेशा हो, जब चाहे तुम अलग हो सकती हो। मैंने तो तुमसे विवाह ही इसलिए किया कि तुम अत्मनिर्भर हो! किसी मुझपर आश्रित कन्या से विवाह करता तो वह अलग कैसे रह पाती? कैसे जीवन यापन करती?
सो नेकदिल मनुष्य किसी पढ़ीलिखी, कामकाजी स्त्री का हृदय छलनी कर देता है। क्यों? क्योंकि वह माता पिता को यह नहीं बता सका कि वह समलैंगिक है, क्योंकि विवाह करने से समाज उसे समलैंगिक मानने की गल्ती नहीं करेगा। तब वह चैन से अपने सम्बन्ध भी बना सकेगा और पत्नी के हाथ का पका खाना भी खा सकेगा।
सच तो यह है कि शायद वह बुरा नहीं था। वह स्वयं पीड़ित था बस अपनी लाचारी की आग में किसी अन्य का जीवन भी झुलसा गया, केवल अपनी कायरता के कारण। प्रत्येक व्यक्ति वीर नहीं होता, प्रत्येक व्यक्ति इतनी प्रताड़ना सहने का साहस नहीं जुटा सकता, न समाज के तीर झेलने के लिए सीना तानकर खड़ा हो सकता है। सो वह किसी अन्य का जीवन नष्ट कर उसका सभी रिश्तों से मोहभंग कर देता है।
मैं तो कहूँगी कि वे समलैंगिक जो अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे हम पर भी उपकार कर रहे थे। अब वे अपनी तरह का जीवन कम से कम कानून के भय से मुक्त होकर तो जी सकेंगे। साथ ही साथ अन्य समलैंगिक भी शायद खुले में आकर स्वीकार करें कि वे समलैंगिक हैं ताकि किसी स्त्री या पुरुष को इनसे विवाह के बाद इतनी हताशा हाथ न लगे।
सो समलैंगिक लोगों को भी अपनी तरह जीने का अधिकार दो। वे किसी के जीवन में हस्तक्षेप नहीं कर रहे, हम उनके में न करें।
माता पिता के लिए अपनी संतान का समलैंगिक होना स्वीकारना कठिन है। परन्तु सत्य को स्वीकारना ही सही है। उससे कब तक मुँह मोड़ सकते हो? जहाँ तक हो सके अपनी समलैंगिक संतान का विवाह किसी ऐसे व्यक्ति से न करो जिसे उसकी इस पसंद का पता न हो। अनेक माता पिता यह आशा करते हैं कि विवाह होने से संतान सामान्य हो जाएगी। हमारे समाज में तो असंतुलित मस्तिष्क वाली संतान का विवाह भी इसी आशा में कर दिया जाता है। संस्कृति की आड़ में अपने दिवास्वप्नों को पूरा करने के चक्कर में किसी अन्य व्यक्ति का जीवन नष्ट करने से हम जरा भी नहीं हिचकिचाते। हमारी आँखों पर एक ऐसा रंगीन चश्मा चढ़ा होता है कि हम सच को नहीं देखते।
दुख तो तब होता है जब समाज के प्रतिष्ठित व समझदार लोग ऐसी मूर्खता करते हैं। अब कमसे कम ऐसा कम होगा। मैं इस निर्णय से समलैंगिकों के लिए तो प्रसन्न हूँ ही परन्तु उनमें से कुछ जो समाज के दबाव में विवाह करने वाले थे और अब नहीं करेंगे और जो इतरलिंगी उनका जीवनसाथी बनने के क्रूर भाग्य से बच गए उनके लिए भी प्रसन्न हूँ। गेहूँ और घुन दोनों ही बच गए। यही न्याय है।
घुघूती बासूती
आज दिल्ली उच्च न्यायालय ने संविधान की धारा ३७७ से समलैंगिकों को मुक्त करके न केवल समलैंगिक पुरुष व स्त्रियों पर उपकार किया है अपितु सामान्य जनता पर भी उपकार किया है। यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तरह से जीवन जीने का अधिकार है, नहीं है तो होना चाहिए किन्तु यह उससे भी बड़ा सच है कि जब वह व्यक्ति छिपे दबे तरीके से अपनी तरह से जीवन जीने के लिए, समाज में स्वीकृति पाने के लिए, दूसरों का जीवन नारकीय बना दे तो यह दूसरे का अधिकार हनन है। शायद इतने समय तक न चाहते हुए भी बहुत से समलैंगिक मजबूरी(इस मजबूरी को बहाना या स्वार्थ भी कह सकते हैं या ढोंग भी या फिर कायरता भी, किन्तु सच यह है कि वे स्वयं पीड़ित हैं, परेशान हैं।) में विषमलैंगिक (इतरलिंगी) लोगों से विवाह कर बहुधा उनका जीवन नष्ट करते रहे हैं। हमारा समाज इन मासूमों, जिनसे समलैंगिक अपनी वस्तुस्थिति छिपाकर विवाह करते रहे हैं, की बलि का यह मूल्य चुकाकर भी अपने को समलैंगिक संस्कृति से मुक्त मान शुतुरमुर्ग की तरह अपना चेहरा रेत में छिपाए ही आत्ममुग्ध था।
कोई उस स्त्री की मनोदशा का अनुमान लगाए जो विवाह के बाद पाए कि उसका पति उसकी ओर से पूर्णतया उदास है। वह अपने में कमी ढूँढती है। (स्त्री है तो स्वाभाविक रूप से कमी उसमें ही होगी, पति में तो हो ही नहीं सकती!) वह पति को खुश रखने की हर संभव चेष्टा करती है। पति का परिवार उसके रूप, उसकी चाल ढाल, बातचीत में दोष ढूँढता है। जानना चाहता है कि क्या कारण है कि उनका राजा बेटा इस स्त्री से विरक्त है। राजा बेटा माता पिता को कभी नहीं बताता कि वह तो स्त्रियों में रुचि ही नहीं रखता, या कि जिस मित्र से कहकर उसे माता पिता ने विवाह के लिए उसे राजी करवाया था वही उनके बेटे का प्रेमी है। सो अब शुरु हो जाता है उस निर्दोष स्त्री का मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक उत्पीड़न।
सास ससुर पोते(कभी कोई पोती का मुंह देखने को बेकरार देखा सुना है?)का मुँह दिखाने की बात करते हैं,समाज पूछता है कि कब गोद भरेगी। स्त्री किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी रह जाती है। वह क्या बताए कि वे तो पति पत्नी ही नाम के हैं। पहले तो पति भी उसे ही हीनभावना देने पर तुला रहता है कि तुम मुझे आकर्षित नहीं कर पातीं। फिर देर सवेर सच सामने आता है तो यह समाज में प्रतिष्ठित पति अपनी दरियादिली बताते हुए समझाता है कि तुम साधन सम्पन्न हो, पढ़ी लिखी हो, नौकरीपेशा हो, जब चाहे तुम अलग हो सकती हो। मैंने तो तुमसे विवाह ही इसलिए किया कि तुम अत्मनिर्भर हो! किसी मुझपर आश्रित कन्या से विवाह करता तो वह अलग कैसे रह पाती? कैसे जीवन यापन करती?
सो नेकदिल मनुष्य किसी पढ़ीलिखी, कामकाजी स्त्री का हृदय छलनी कर देता है। क्यों? क्योंकि वह माता पिता को यह नहीं बता सका कि वह समलैंगिक है, क्योंकि विवाह करने से समाज उसे समलैंगिक मानने की गल्ती नहीं करेगा। तब वह चैन से अपने सम्बन्ध भी बना सकेगा और पत्नी के हाथ का पका खाना भी खा सकेगा।
सच तो यह है कि शायद वह बुरा नहीं था। वह स्वयं पीड़ित था बस अपनी लाचारी की आग में किसी अन्य का जीवन भी झुलसा गया, केवल अपनी कायरता के कारण। प्रत्येक व्यक्ति वीर नहीं होता, प्रत्येक व्यक्ति इतनी प्रताड़ना सहने का साहस नहीं जुटा सकता, न समाज के तीर झेलने के लिए सीना तानकर खड़ा हो सकता है। सो वह किसी अन्य का जीवन नष्ट कर उसका सभी रिश्तों से मोहभंग कर देता है।
मैं तो कहूँगी कि वे समलैंगिक जो अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे हम पर भी उपकार कर रहे थे। अब वे अपनी तरह का जीवन कम से कम कानून के भय से मुक्त होकर तो जी सकेंगे। साथ ही साथ अन्य समलैंगिक भी शायद खुले में आकर स्वीकार करें कि वे समलैंगिक हैं ताकि किसी स्त्री या पुरुष को इनसे विवाह के बाद इतनी हताशा हाथ न लगे।
सो समलैंगिक लोगों को भी अपनी तरह जीने का अधिकार दो। वे किसी के जीवन में हस्तक्षेप नहीं कर रहे, हम उनके में न करें।
माता पिता के लिए अपनी संतान का समलैंगिक होना स्वीकारना कठिन है। परन्तु सत्य को स्वीकारना ही सही है। उससे कब तक मुँह मोड़ सकते हो? जहाँ तक हो सके अपनी समलैंगिक संतान का विवाह किसी ऐसे व्यक्ति से न करो जिसे उसकी इस पसंद का पता न हो। अनेक माता पिता यह आशा करते हैं कि विवाह होने से संतान सामान्य हो जाएगी। हमारे समाज में तो असंतुलित मस्तिष्क वाली संतान का विवाह भी इसी आशा में कर दिया जाता है। संस्कृति की आड़ में अपने दिवास्वप्नों को पूरा करने के चक्कर में किसी अन्य व्यक्ति का जीवन नष्ट करने से हम जरा भी नहीं हिचकिचाते। हमारी आँखों पर एक ऐसा रंगीन चश्मा चढ़ा होता है कि हम सच को नहीं देखते।
दुख तो तब होता है जब समाज के प्रतिष्ठित व समझदार लोग ऐसी मूर्खता करते हैं। अब कमसे कम ऐसा कम होगा। मैं इस निर्णय से समलैंगिकों के लिए तो प्रसन्न हूँ ही परन्तु उनमें से कुछ जो समाज के दबाव में विवाह करने वाले थे और अब नहीं करेंगे और जो इतरलिंगी उनका जीवनसाथी बनने के क्रूर भाग्य से बच गए उनके लिए भी प्रसन्न हूँ। गेहूँ और घुन दोनों ही बच गए। यही न्याय है।
घुघूती बासूती
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