वस्त्र कैसे हों? यह एक बहुत ही कठिन व निजी प्रश्न है और इसमें स्थान, जलवायु, आर्थिक स्थिति और उम्र भी बहुत बड़ी निर्णायक भूमिका निभाती है। इसे व्यक्ति विशेष पर छोड़ देना ही सबसे बेहतर होता है। किन्तु जब लोग किसी संस्था से जुड़ते हैं तो संस्था को लगता है कि वे लोग संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं और संस्था चाहने लगती है कि उसके प्रतिनिधि उसके मूल्यों को अपने व्यवहार, व्यक्तित्व व पहनावे में संसार के सामने रखें। व्यवहार अधिक महत्वपूर्ण है परन्तु उसे नियन्त्रित करना अधिक कठिन है सो संस्थाएँ पहनावे को ही नियन्त्रित करने में लग जाती हैं। सच तो यह है कि हमारा उथलापन पहनावे को ही व्यक्तित्व मान लेता है।
संस्थाएँ यदि पहनावे में क्या अपेक्षित है यह भर दिशा निर्देश या गाइडलाइन्स में बता दें तो समस्या काफी सीमा तक सुलझ सकती है। वे कौन से वस्त्र पहनें भारतीय या विदेशी यह निर्णय न ही करें तो बेहतर है। वैसे भी जिस देश का काम काज अंग्रेजी में होता है वहाँ परिधान के भारतीय होने पर जोर देना गलत होगा। फिर यह देश इतना बड़ा और इतनी विविधता लिए है कि किसी एक या दो परिधानों पर भारतीयता का ठप्पा लगाना मूर्खता ही होगी। अस्सी के दशक में जब दक्षिण भारत में सलवार कुर्ते का चलन बढ़ा तब वहाँ के परम्परावादी लोग लड़कियों के लहंगे व आधी साड़ी या पावदा (यह वहाँ का अविवाहित किन्तु बड़ी लड़कियों का पाराम्परिक परिधान है, था कहना अधिक उचित होगा। अब यह केवल विवाह व त्यौहारों तक सीमित हो गया है। लहंगे के ऊपर साड़ी का ब्लाउज और आधी साड़ी लहंगे पर चुनरी की तरह बाँई तरफ से खोंसी जाती है और फिर साड़ी के पल्लू की तरह ही ली जाती है। देखने में बहुत सुन्दर लगती है। ) न पहनने से परेशान थे। आज सलवार कुर्ता लगभग पूर्णतया दक्षिण भारत में स्वीकार कर लिया गया है। मुझे याद है एक दक्षिणी विद्यार्थी का यह कथन कि उत्तर भारत के प्रॉफेशनल कॉलेजों में सलवार कुर्ता अधिकतर दक्षिणी लड़कियाँ ही पहनती हैं जबकि उत्तर भारतीय लड़कियाँ जीन्स पहनती हैं। यह बात नब्बे के दशक की है। आज की स्थिति मैं नहीं जानती।
पूर्वोत्तर में भी आसाम में मेखला चादर है तो शेष जगह एक लुँगी की तरह का wrap around और ब्लाउज है। बंगाल में साड़ी पहनने का अलग ही तरीका है। परन्तु सब जगह समय के साथ बदलाव आया है। और सबसे अधिक बदलाव तो पुरुषों के पहनावे में आया है। गूगल में जाकर यदि पुरुषों के पारम्परिक भारतीय परिधान देखें तो लगेगा कि ये गायब हो गए हैं। अधिकतर पुरुषों को तो वे पहनने भी नहीं आएँगे! क्या कोई पुरुषों के पारम्परिक परिधानों के लुप्त होने के कारण बता सकेगा? या फिर मेरी बिटिया के स्कूल द्वारा मजाक में दिए हास्यास्पद तर्क से ही काम चलाना होगा? वहाँ बताया गया था कि एन्ग्लो वैदिक का एन्ग्लो लड़कों के लिए है और वैदिक लड़कियों के लिए ! अतः लड़के पैन्ट्स पहनेंगे और लड़कियाँ सलवार कुर्ता और दुपट्टा !
महाराष्ट्र में तब परकर पोल्का( लंहगा और लंहगे के ऊपरी भाग को ढकता हुआ ढीला ब्लाउज ) के स्थान पर स्कर्ट ब्लाउज को स्वीकारा गया। ९ गज की साड़ी के स्थान पर ६ गज की साड़ी चल निकली। साड़ी भी सारे भारत में अलग अलग तरह से पहनी जाती थी। माँ जब गाँव जातीं तो सीधे पल्ले की साड़ी पहनती। उल्टे पल्ले की साड़ी जो आज पूरे भारत में स्वीकार्य है तब गाँव में फैशन मानी जाती। शायद कोई हरियाणवी मित्र मेरी इस बात को भी मानेगा कि एक समय में हरियाणवी स्त्रियाँ घर से बाहर निकलते समय सलवार कुर्ता नहीं लंहगा पहनती थीं। साड़ी भी नहीं। तो कैसे लहंगे और जेब वाले लम्बे ब्लाउज(कुर्ती ) से सलवार कुर्ते, फिर साड़ी और फिर वापिस सलवार कुर्ते की यह स्वीकृति यात्रा हुई?
कैसे सलवार कुर्ते जैसे एक पूर्णतया पंजाबी परिधान को सम्पूर्ण भारत ने सुविधा के कारण अपना लिया ? जब स्त्रियाँ घर से बाहर बसों व ट्रेन से यात्रा करके जाने लगीं तो साड़ी को पार्टी परिधान मानने लगीं और सलवार कुर्ते को नित्य का परिधान! साड़ी में कितने ही गुण क्यों न हों कुछ असुविधा भी है। असुविधा को भी भूल जाएँ तो कुछ व्यवहारिक समस्याएँ हैं जिनके चलते यह भागने, दौड़ने, भीड़ में धक्कामुक्की करने व यात्रा में लेटने सोने के लिए सबसे सही नहीं है।
सलवार कुर्ता साड़ी की इन्हीं असुविधाओं के चलते व इसके 'पंजाबी किन्तु भारतीय तो है' की मान्यता व इससे लगभग सारा शरीर ढके जाने के कारण अधिक लोगों की स्वीकृति पा गया। परन्तु जैसे किसी समय दक्षिण भारत ने सलवार कुर्ते को मान्यता दी वैसे ही उत्तर भारत जीन्स व ट्राउजर्स को मान्यता देने की लड़ाई लड़ रहा है।
सत्तर के दशक में जब हम कॉलेज में थे तो आधी से अधिक छात्राएँ बेलबॉटम, ट्राउज़र्स, पेरेलल्स व जीन्स पहनती थीं। हो सकता है कि यह महानगरों में ही होता हो परन्तु मुझे प्रत्यक्ष में कोई विरोध नहीं दिखा। थोड़ा दबा सा विरोध फ्रॉक या स्कर्ट ब्लाउज का अवश्य होता था किन्तु रोक नहीं थी। मुझे आश्चर्य होता है कि आज लगभग पैंतीस या चालीस वर्ष के बाद इसका अधिक व मुखर विरोध हो रहा है। तब विरोध अधिकतर तब होता था जब ये ही परिधान विवाह के बाद पहने जाते थे।
क्या हम आज कम सहिष्णु हो गए हैं ? या संस्कृति के ठेकेदार अधिक मुखर हो गए हैं ? या फिर हमारे परिधान उस सीमा को पार कर गए हैं जहाँ तक समाज बदलाव को स्वीकार कर सकता है ? या फिर हमारे छात्र व छात्राएँ पार्टी व कॉलेज का अन्तर भूल गए हैं ? मुझे लगता है कि जीन्स या ट्राउज़र्स का विरोध करने की अपेक्षा कैज़ुअल, फ़ॉर्मल व पार्टी परिधानों का अन्तर समझना व समझाना अधिक उचित होगा। जीन्स(हिपस्टर कैज़ुअल नहीं हो सकती,कैज़ुअल वस्त्र शायद वे होते हैं जिन्हें हमें बारम्बार सम्भालना, ठीक करना नहीं पड़ता, यदि यह सब ध्यान रखना पड़े तो हम कैज़ुअल नहीं रह पाते! ) व टीशर्ट कैज़ुअल, ट्राउज़र्स व कॉलर व बाँह वाली कमीज, अमिनि स्कर्ट व स्कर्ट तक आता ब्लाउज फ़ॉर्मल, मिनि स्कर्ट या छोटी टॉप पार्टी परिधान मानी जाती हैं। प्रायः सभी दफ्तरों में यही नियम होता है। साड़ी व सलवार कुर्ते को सभी जगह मान्यता दी जाती है क्योंकि इन्हें पहनने से भारत में किसी को रोकना उतना ही गलत होगा जितना कई होटल व क्लब आदि में पुरुषों को धोती कुर्ते या कुर्ते पाजामे पहनने से रोकना गलत लगता है। पुरुषों के लिए पूरी बाँह की कमीज, टाई, व ट्राउजर्स, या सूट फॉर्मल होता है।
जैसे अपने सुविधाजनक होने के कारण सलवार कुर्ता पूरे भारत में मान्यता प्राप्त कर गया वैसे ही जीन्स भी अपनी सुविधाजनक व कम से कम मैन्टेनेन्स की लागत व टिकाऊ होने के कारण मान्यता प्राप्त कर ही लेंगी। जीन्स जेब व मेहनत के हिसाब से सबसे सस्ती पड़ती हैं। दो जीन्स में पूरा कॉलेज जीवन बिताया जा सकता है। एक में बिताने वाले भी बहुत मिल जाएँगे। ना इस्तरी का झँझट, ना आज कौन सा परिधान पहनें सोचने की झँझट, बस चार पाँच टी शर्ट्स में से कोई एक उठाई और जीन्स के साथ पहन ली। सलवार कुर्ते के साथ इस्तरी करने की समस्या रहती है। साड़ी तो खैर पहनना ही धोबी को हर बार इस्तरी के रुपए चढ़ाने वाला धोबीप्रिय परिधान है।
जो लोग वर्दी के पक्ष में हैं वे अमीर गरीब का तर्क देते हैं। मुझे लगता है कि मनुष्य में इस उम्र तक इतनी समझ तो आ ही जानी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की जेब अलग अलग होती है और दूसरों की बराबरी करना घाटे का सौदा है। वर्दी लागू करेंगे तो क्या सबके लिए बस में या साइकिल पर आना भी निर्धारित करेंगे ? जब कोई मंहगी नई मोटरसाइकिल या कार में आएगा तो क्या आप उसे रोक देंगे ? कभी न कभी तो इन नवयुवकों/ नवयुवतिओं को जीवन की सचाई का सामना करना ही होगा। हम उन्हें कहाँ तक बचा पाएँगे? कपड़ों के पीछे पागल न होना भी एक आत्मविश्वास की स्टेटमेंट होता है। मेरी बिटिया ने तो मेरी किसी युग की जीन्स में कॉलेज के तीन साल निकाल दिए। यह उसका फैशन या आत्मविश्वास का स्टेटमेंट था।
कुछ वर्ष पहले म्यानमार में छात्रों के लिए राष्ट्रीय पारम्परिक परिधान पहनना अनिवार्य कर दिया गया था। मेरे डॉक्टर मित्र को दुख था कि उसके बेटे जीन्स नहीं पहन सकेंगे क्योंकि लूँगी (longyi) पहनना अनिवार्य हो गया था।
हमारे अधिकार व स्वतंत्रता धीरे धीरे ही छीने जाते हैं, एक झटके में नहीं। छीनने वाले यह देखते रहते हैं कि हमारी सहनशक्ति कितनी है। यदि एक वार हम झेल जाएँ तो वह अन्तिम नहीं होगा। इसके बाद एक और फिर एक और होना निश्चित है। साड़ी जैसे परिधान जिसके लिए प्रत्येक भारतीय के मन में आदर है, शायद वैसा ही जैसा माँ के लिए होता है, उसे भी एक नई दृष्टि से देखा जा रहा है। बहुत से स्कूलों में एक तरफ तो जहाँ अध्यापिकाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है वहीं साड़ी के ब्लाउज व उनमें से झलकती पीठ को छिपाने के लिए वर्दी के जैकेट पहनाए जा रहे हैं। अपने परिधान पर गर्व भी है और लज्जा भी!
यह तर्क भी दिया जा रहा है कि हमारी स्त्रियाँ ऐसे परिधान पहनती हैं कि यदि किसी अंग/भाग/ज़िस्म को लगातार देखते जाओ तो वे अपने वस्त्र ठीक करने लगती हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि उन्हें किसी ने यह नहीं सिखाया कि अपने से विपरीत लिंग के लोगों से बात करते समय दृष्टि उनके चेहरे पर केन्द्रित रखी जाती है न कि उनके शरीर के अन्य भागों पर। यदि आप किसी के बुर्के, या ढके सिर को भी घूरते जाएँगे तो वह उसे ठीक करने लगेगी या छूकर देखेगी कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं कि कहीं कौवे आदि ने सिर पर बीट तो नहीं कर दी। यदि यही किसी पुरुष के साथ किया जाए तो शायद वह भी सचेत हो जाएगा, मूँछ को घूरेंगे तो हाथ फिराकर देखेगा कि मूँछ पर खाना, दूध आदि तो नहीं लगा रह गया !
वैसे जहाँ तह उत्तरप्रदेश का प्रश्न है कम से कम अभी के लिए तो मायावती जी ने इस मुद्दे को सुलझा दिया है। परन्तु यह मुद्दा सरलता से मरता नहीं, रक्तबीज दानव की तरह बारम्बार उठ खड़ा होता है। स्त्रियों के लिए क्या उचित व अनुचित है या कहिए कि क्या स्त्रियोचित है हमारे समाज में अन्य महत्वपूर्ण समस्याओं के अभाव में, सबसे अधिक चिन्ता का विषय बनता जा रहा है।
यदि हम युवाओं को वयस्क मानने लगें तो जैसे वे देश के कर्णधारों का चुनाव कर सकते हैं शायद वैसे ही अपने वस्त्रों का भी कर लें।
घुघूती बासूती
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ड्रेस कोड: शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता!
जब भी सुनती हूँ कि किसी कॉलेज में ड्रेस कोड लागू हुआ है तो अपने छात्र जीवन की याद आती है। सत्तर का दशक था। उस जमाने में लड़कियाँ इतनी आगे नहीं आईं थीं कि किसी को वे चुनौती लगतीं। सो प्रायः हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया जाता था। अधिकतर किसी को(अध्यापक/अध्यापिका वर्ग को) हमारे पहनावे से कोई परेशानी नहीं थी। कभी कभार ही होता था कि कोई अध्यापक/अध्यापिका हमें घूरकर देख लेता।
अब यह मत सोचिए कि हम सलवार कुर्ते पहनते होंगे। विवाह पूर्व हमारे पास दो ही सलवार कुर्ते थे। एक तो हमने सिलाई सीखने के चक्कर में बनाया था और दूसरा जबर्दस्ती बनवाया गया था। जबर्दस्ती! हाँ बिल्कुल हास्यास्पद जबर्दस्ती होती थी छात्राओं के साथ! यह था शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता! आज भी उसकी याद आती है तो उससे चिढ़ ही उठती है।
किसी बावले से क्षण में, शिक्षा के क्षेत्र में किसी शक्तिशाली मानव ने यह निर्णय लिया था कि कॉलेज की लड़कियों की वर्दी होनी चाहिए। शायद सारे सप्ताह हमें वर्दी पहनाने में उन्हें स्वयं भी अटपटा लगा हो या लगा हो कि यह तो अति होगी सो केवल हर सोमवार पंजाब विश्वविद्यालय के कॉलेजों में पढ़ने वाली प्रत्येक छात्रा श्वेत वस्त्रधारी हो जाती थी। यह बात और है कि यदि सहशिक्षा वाला कॉलेज हो तो छात्र रंग बिरंगे परिधानों में ही होते थे। केवल छात्राएँ वर्दीधारी होती थीं। पता नहीं सहशिक्षा वाले हमारे कॉलेज के प्रिन्सिपल को यह अटपटा लगता था या केवल हमें ही लगता था। वर्दी का नियम केवल सफेद तक ही सीमित था,आप सफेद साड़ी,फ्रॉक,स्कर्ट ब्लाउज,ट्राउजर्स कुछ भी पहन सकती थीं। अधिकतर के पास सलवार कुर्ता इसलिए था कि रैगिंग के दिनों में सलवार कुर्ता ही वर्दी होती थी।
थोड़ा बहुत मनोविज्ञान जब पढ़ा तो इस शक्तिशाली मानव,जिसे हमारे लिए नियम बनाने का अधिकार था, की थोड़ी मानसिक चीरफाड़ कर कारण खोजना चाहा परन्तु असफलता ही हाथ आई। कारण आज भी समझ नहीं आता। वर्दी का विचार तो जो था सो था किन्तु केवल छात्राओं के लिए क्यों यह तर्क समझ नहीं आता था। सोचिए कॉलेज में खेलदिवस है या वार्षिकोत्सव है। छात्र होते थे रंगबिरंगे और छात्राएँ सफेद वर्दी में!यही हाल स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के दिन होता था। हमारे साथ ही हमारे स्कूल में पढ़े छात्र बिना वर्दी के और हम वर्दी में रानी बेटियाँ बनी होती थीं।
बहुत वर्षों बाद एक बार जब मैं अपने एक सहपाठी के साथ कॉलेज के दिन याद कर रही थी तो उसे इस वर्दी वाली बात की याद दिलाई और पूछा कि केवल हमें क्यों पहनाई जाती थी तुम्हें क्यों नहीं। तब वह ठहाका लगाकर हँसा और बोला कि लड़कों से पंगा लेने को किसका दिमाग खराब हुआ था। लड़कों पर नियम कायदे लगाकर तो देखते कौन लड़का इस नियम को मानता? हड़ताल हो जाती। 'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' हमें तुम्हारी वर्दी देखकर तुम पर बहुत हँसी आती थी।
हाँ, तो मुझे मेरा उत्तर उसके इस ब्रह्म वाक्य में मिल गया,'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' शायद इसे सही करके ऐसे कहा जा सकता है कि स्त्री दबती है इसलिए दबाई जाती है। शायद दबती के पुल्लिंग की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि यह केवल एक स्त्रियोचित गुण है।
आज 'ड्रेस कोड लागू करना गुनाह तो नहीं' लेख पढ़ा। मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ किन्तु केवल यह चाहती हूँ कि ऐसे ड्रेस कोड पुरुषों पर भी लागू किए जाएँ। कुर्ते पाजामों, धोती कुर्तों में घूमते विशुद्ध भारतीय बालक क्या सुन्दर दृष्य उत्पन्न करेंगे! अहा, तब ही तो हम सच्चे भारतीय कहलाएँगे, अपनी संस्कृति के सच्चे रक्षक! देखिए वातावरण कितना शुद्ध, सात्विक हो जाएगा। वस्त्र बदलते ही उनके मनोभाव भी स्वच्छ हो जाएँगे। लड़कियों पर तब वे बुरी नजर नहीं डालेंगे। सारी कलुषित भावनाएँ धुल जाएँगी।
मैं जानती हूँ कि ऐसा ही होगा क्योंकि वस्त्र ही छेड़छाड़ व बलात्कार का मुख्य कारण हैं। हम वर्दी पहनती थीं तब भी छेड़ी जाती थीं। हमारे वस्त्र तो ठीक होते थे केवल छेड़ने वालों के गलत होते थे। सो वस्त्र दोनों तरफ से ही भारतीय होने चाहिए। तभी मन शुद्ध होगा। आपकी क्या राय है?
मेरी राय अगले लेख में!
घुघूती बासूती
अब यह मत सोचिए कि हम सलवार कुर्ते पहनते होंगे। विवाह पूर्व हमारे पास दो ही सलवार कुर्ते थे। एक तो हमने सिलाई सीखने के चक्कर में बनाया था और दूसरा जबर्दस्ती बनवाया गया था। जबर्दस्ती! हाँ बिल्कुल हास्यास्पद जबर्दस्ती होती थी छात्राओं के साथ! यह था शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता! आज भी उसकी याद आती है तो उससे चिढ़ ही उठती है।
किसी बावले से क्षण में, शिक्षा के क्षेत्र में किसी शक्तिशाली मानव ने यह निर्णय लिया था कि कॉलेज की लड़कियों की वर्दी होनी चाहिए। शायद सारे सप्ताह हमें वर्दी पहनाने में उन्हें स्वयं भी अटपटा लगा हो या लगा हो कि यह तो अति होगी सो केवल हर सोमवार पंजाब विश्वविद्यालय के कॉलेजों में पढ़ने वाली प्रत्येक छात्रा श्वेत वस्त्रधारी हो जाती थी। यह बात और है कि यदि सहशिक्षा वाला कॉलेज हो तो छात्र रंग बिरंगे परिधानों में ही होते थे। केवल छात्राएँ वर्दीधारी होती थीं। पता नहीं सहशिक्षा वाले हमारे कॉलेज के प्रिन्सिपल को यह अटपटा लगता था या केवल हमें ही लगता था। वर्दी का नियम केवल सफेद तक ही सीमित था,आप सफेद साड़ी,फ्रॉक,स्कर्ट ब्लाउज,ट्राउजर्स कुछ भी पहन सकती थीं। अधिकतर के पास सलवार कुर्ता इसलिए था कि रैगिंग के दिनों में सलवार कुर्ता ही वर्दी होती थी।
थोड़ा बहुत मनोविज्ञान जब पढ़ा तो इस शक्तिशाली मानव,जिसे हमारे लिए नियम बनाने का अधिकार था, की थोड़ी मानसिक चीरफाड़ कर कारण खोजना चाहा परन्तु असफलता ही हाथ आई। कारण आज भी समझ नहीं आता। वर्दी का विचार तो जो था सो था किन्तु केवल छात्राओं के लिए क्यों यह तर्क समझ नहीं आता था। सोचिए कॉलेज में खेलदिवस है या वार्षिकोत्सव है। छात्र होते थे रंगबिरंगे और छात्राएँ सफेद वर्दी में!यही हाल स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के दिन होता था। हमारे साथ ही हमारे स्कूल में पढ़े छात्र बिना वर्दी के और हम वर्दी में रानी बेटियाँ बनी होती थीं।
बहुत वर्षों बाद एक बार जब मैं अपने एक सहपाठी के साथ कॉलेज के दिन याद कर रही थी तो उसे इस वर्दी वाली बात की याद दिलाई और पूछा कि केवल हमें क्यों पहनाई जाती थी तुम्हें क्यों नहीं। तब वह ठहाका लगाकर हँसा और बोला कि लड़कों से पंगा लेने को किसका दिमाग खराब हुआ था। लड़कों पर नियम कायदे लगाकर तो देखते कौन लड़का इस नियम को मानता? हड़ताल हो जाती। 'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' हमें तुम्हारी वर्दी देखकर तुम पर बहुत हँसी आती थी।
हाँ, तो मुझे मेरा उत्तर उसके इस ब्रह्म वाक्य में मिल गया,'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' शायद इसे सही करके ऐसे कहा जा सकता है कि स्त्री दबती है इसलिए दबाई जाती है। शायद दबती के पुल्लिंग की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि यह केवल एक स्त्रियोचित गुण है।
आज 'ड्रेस कोड लागू करना गुनाह तो नहीं' लेख पढ़ा। मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ किन्तु केवल यह चाहती हूँ कि ऐसे ड्रेस कोड पुरुषों पर भी लागू किए जाएँ। कुर्ते पाजामों, धोती कुर्तों में घूमते विशुद्ध भारतीय बालक क्या सुन्दर दृष्य उत्पन्न करेंगे! अहा, तब ही तो हम सच्चे भारतीय कहलाएँगे, अपनी संस्कृति के सच्चे रक्षक! देखिए वातावरण कितना शुद्ध, सात्विक हो जाएगा। वस्त्र बदलते ही उनके मनोभाव भी स्वच्छ हो जाएँगे। लड़कियों पर तब वे बुरी नजर नहीं डालेंगे। सारी कलुषित भावनाएँ धुल जाएँगी।
मैं जानती हूँ कि ऐसा ही होगा क्योंकि वस्त्र ही छेड़छाड़ व बलात्कार का मुख्य कारण हैं। हम वर्दी पहनती थीं तब भी छेड़ी जाती थीं। हमारे वस्त्र तो ठीक होते थे केवल छेड़ने वालों के गलत होते थे। सो वस्त्र दोनों तरफ से ही भारतीय होने चाहिए। तभी मन शुद्ध होगा। आपकी क्या राय है?
मेरी राय अगले लेख में!
घुघूती बासूती
Wednesday, June 10, 2009
यह तीर
यह तीर
तुम्हीं कहो तुमसे क्या कहूँ ओ दोस्त
मेरे पास कहने को शब्द चूक गए हैं,
तुम्हारे पास हों तो उधार दे दो दोस्त
मेरा तो सारा ही खजाना चूक गया है।
तुझसे नाराज हो मैं ही रीत जाती हूँ
कैसे होऊँ तुझसे नाराज ए दोस्त मेरे,
फिर से भरना है संवेदनाओं का घड़ा
तो कैसे रूठूँ तुझसे बता ओ मीत मेरे।
तेरे तरकश में तो भरे हैं कितने ही तीर
मेरे तरकश का तो तू था आखिरी तीर,
अब चलाऊँ या रखूँ सम्भाल कर इसे
न तू बताए, न बता सकता यह तीर।
निशाना कोई भी लगाऊँ या न लगाऊँ
चलाऊँ या हृदय लगाऊँ मीत यह तीर,
कुछ भी कर लूँ चाहे, वक्ष पर मेरे ही
चलना तो हर हाल में ही है यह तीर!
घुघूती बासूती
तुम्हीं कहो तुमसे क्या कहूँ ओ दोस्त
मेरे पास कहने को शब्द चूक गए हैं,
तुम्हारे पास हों तो उधार दे दो दोस्त
मेरा तो सारा ही खजाना चूक गया है।
तुझसे नाराज हो मैं ही रीत जाती हूँ
कैसे होऊँ तुझसे नाराज ए दोस्त मेरे,
फिर से भरना है संवेदनाओं का घड़ा
तो कैसे रूठूँ तुझसे बता ओ मीत मेरे।
तेरे तरकश में तो भरे हैं कितने ही तीर
मेरे तरकश का तो तू था आखिरी तीर,
अब चलाऊँ या रखूँ सम्भाल कर इसे
न तू बताए, न बता सकता यह तीर।
निशाना कोई भी लगाऊँ या न लगाऊँ
चलाऊँ या हृदय लगाऊँ मीत यह तीर,
कुछ भी कर लूँ चाहे, वक्ष पर मेरे ही
चलना तो हर हाल में ही है यह तीर!
घुघूती बासूती
Monday, June 08, 2009
बिटिया तो है फूल की डाली... पर पहले कर दो उसे गर्भ से खाली
बात तब की है जब हम दिल्ली में थे। वहीं एक जान पहचान वाले सज्जन भी रहते थे। व्यवसायी हैं। हमारे साथ बिटिया और पुत्री वर (वही शब्द जमाता, जमाई, दामाद, जो न जाने क्यों मुझे जरा भी नहीं सुहाता) हमारे फ्लैट में रह रहे थे। तो फ्लैट के कुछ काम के सिलसिले में उनसे बात हुई। बात-बात में घुघूत की सेवानिवृत्ति की बात निकल आई। चर्चा होने लगी कि उसके बाद हम कहाँ रहेंगे आदि। फिर बात खर्चे पर चली आई- खर्चा कौन उठाएगा। स्वाभाविक था कि बिटिया और पुत्रीवर ही दिल्ली में रहते थे, सो वे भुगतान करेंगे। हम बाद में उन्हें पैसा लौटा दें या नहीं, यह अलग बात थी। हमने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद हम उस शहर में रहना चाहेंगे जहाँ दोनों या कम से कम एक बेटी रहती हो। उन्होंने जानना चाहा ऐसा क्यों। हमने कहा कि भाई, कभी कोई दुख तकलीफ हुई तो। हमारी देखभाल करने वाली तो यही दो बेटिया है। वे ध्यान रखेंगी। उनकी नजर में हमारा यह फैसला सही नहीं था।
उन महाशय के अनुसार बेटियों से दुख तकलीफ में सहायता लेना गलत था। उनके मुताबिक, बेटियाँ तो फूलों की डाली हैं उन्हें तो बस देना ही देना होता है, उनसे कुछ भी लेना गलत है। आर्थिक सहायता तो दूर की बात... कष्ट में सहायता लेना भी गलत है।
उनकी ये बातें सुनकर मुझे अपने बचपन और किशोरावस्था में पढ़े स्कूली पुस्तकों के वे लेख याद आए जिनके कारण हिन्दी से मेरी शत्रुता सी हो गई। उनमें से एक बिटिया के विवाह व विदाई के बारे में था। आह, क्या समा बाँधा था- लड़की पराई होने का। बाबुल से विदाई का। बाबुल के घर की रोप का दूसरे घर में रोपे जाने आदि का! विवाह के समय प्रज्ज्वलित अग्नि में लड़की का भूतकाल जल जाने का और उसका नया जन्म होने का! विदाई के समय माता पिता, भाई बहन के फूट-फूटकर रोने का! जैसे वह मर ही गई हो। कहने को कितना मधुर परन्तु यथार्थ में कितना जहरबुझा! मेरी समझ में बेटियों के बारे में ऐसे लेख व लोक गीत ही तो कन्या भ्रूणों की हत्या का कारण होते हैं।
बिटिया, एक मधुर किन्तु पराया अहसास! उसे तो किसी और के घर जाना है। तभी तो आपको अपने घर के लिए चिराग की आवश्यकता है। सो उसे पैदा करने की चेष्टा में या तो पुत्रियों की पंक्ति खड़ी कर दीजिए या फिर भ्रूण परीक्षण करवाइए। ऐसे में घुघूती कितनी विषाक्त हो जाती है, केवल वही जानती है।
हमारे उन मित्र के मुताबिक हम बेटियों पर किसी सहायता के लिए कभी भी निर्भर नहीं होना चाहिए। आप सोचेगें कि वाह क्या विचार हैं, बेटियों को अपनी देखरेख, चिन्ता से मुक्त कर देने वाले! किन्तु ये विचार जहाँ बेटियों को माता-पिता की हर चिन्ता से मुक्त करते हैं, वहीं यदि दो से अधिक बेटियाँ होने की सम्भावना हो तो आने वाली बेटियों को संसार से भी मुक्त कर देते हैं। उन साहब की भी ऐसी कहानी थी। वे शायद नहीं जानते थे कि मैं उनकी यह कहानी जानती हूँ और उनका बेटी प्रेम भी।
बात ऐसी है कि उनकी और हमारी शादी आसपास ही हुई थी। उनकी भी दो बेटियाँ हुईं और मेरी भी। उनकी दोनों बेटियाँ मेरी बेटियों से कुछ दिन ही छोटी-बड़ी थीं। फिर एक दिन पता चला की उनकी तीसरी संतान होने वाली है। उन साहब ने पता कराया तो मशीन ने बताया कि वह संतान भी बेटी ही होगी। सो पाँचवें या छठे महीने में जब बेटी का होना एकदम पक्का हो गया तो उन्होंने इस अनचाही बेटी से छुटकारा पाने का फैसला किया। उस अजन्मी बेटी को जबर्दस्ती जन्म दिया गया। हाँ, इतने महीने बीतने पर गर्भपात नहीं होता। इतने माह में गर्भपात गैरकानूनी भी है और खतरनाक जानलेवा भी। सो, जबरन जन्म देकर मारा जाता है। प्रीमैच्योर लेबर पेन के लिए जबरन नसों में दवा चढ़ाई जाती है। बच्ची जबरन समय से पहले पैदा की जाती है और मार दी जाती है। तो उन्होंने तीसरी बेटी को यह तरीका अपनाकर दुनिया में आने से रोक दिया। यह थी उनकी तीसरी फूलों की डाली, जो समय से पूर्व ही माँ के गर्भ से निकाल कर मार दी गई। ... जानते हैं, उस अजन्मी बेटी की माँ का क्या कहना था। माँ का कहना था कि वह बिल्कुल उनकी बड़ी बेटी सी दिखती थी। यानी बच्ची के नैन-नक्श बन चुके थे, कैसी दिखती है, पता चल सकता था। लेकिन उस फूल की डाली को बढ़ने नहीं दिया गया।
और यह सब उस औरत को करना पड़ा, जो दुआ करती थी कि उसे बेटी हो। हुआ यों कि जब उन सज्जन की पत्नी पहली बार गर्भवती हुई ( मैं भी उस वक्त माँ बनने वाली थी), तब कहती थी कि सास, ससुर व पति को मुँडा (लड़का) चाहिए इसलिए मैं प्रार्थना करती हूँ कि कुड़ी( लड़की) ही होए। केवल उनको जलाने को यह कहती और मजे लेती। वह जीवंत स्त्री तीसरी बेटी के समय तक इतनी कमजोर पड़ चुकी थी कि वह उसे निकाल फेंकने को तैयार हो गई! बिना किसी विरोध के। उफ, बेटे की चाह में एक औरत (माँ) को कितना मजबूर बना दिया जाता है।
अब आइए शुरुआत के मुद्दे पर चलते हैं। यानी बेटियों से मदद लेने की बात। मैं पूछती हूँ कि क्या गलत है कि यदि मैं अपनी बेटियों को महज फूलों की डाली न मानकर व्यक्ति मानूँ। ऐसा व्यक्ति जो अपने माता-पिता का उत्तराधिकारी बनें। उनके बुढ़ापे और तकलीफ की घड़ी में उनका ध्यान भी रखे!
अब आप ही बताइए क्या होना बेहतर है,-फूलों की ऐसी डाली जो यदि नापसंद हो तो काटकर फेंक दी जाए या केवल व्यक्ति जिसके अधिकार भी हैं तो कुछ उत्तरदायित्व भी हैं... और हाँ जिसे साथ में जीने का अधिकार भी है।
मुझे तो संतान ही चाहिए थी, जो चाहे पुलिंग हो या स्त्रीलिंग परन्तु जिन्हें मैं प्यार करूँ और अच्छे व्यक्ति के रूप में बड़ा करूँ। मुझे फूलों की वे , आह, कवितामय डालियाँ नहीं चाहिए थीं जिनकी संख्या जितनी मैं चाहूँ उतनी ही हो। जिन्हें मैं 'बाबुल की दुआएँ लेती जा' गीत गाकर अपने संसार से विदा नहीं करूँ,जो 'बाबुल असी चिड़ियाँ दा ....' गाकर मुझसे विदा न हों, सदा मेरा संसार बनी रहें और जो मेरा सहारा हों और जिनका मैं सहारा होऊँ, किसी कर्त्तव्य में बन्ध कर नहीं, केवल स्नेह के बन्धन के कारण!
घुघूती बासूती
पुनश्चः इन्हें भी पढ़िए।
१ चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पियें बेटा होगा
२ तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी
३ जब न गायब बेटियों से पूछा जाएगा
४ अनचहाही मुसलमान बेटियाँ.. जमीनी हकीकत
५.लड़की मरै घड़ी भर का दुख, जिये तो जनम भर का
६.बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा
घुघूती बासूती
उन महाशय के अनुसार बेटियों से दुख तकलीफ में सहायता लेना गलत था। उनके मुताबिक, बेटियाँ तो फूलों की डाली हैं उन्हें तो बस देना ही देना होता है, उनसे कुछ भी लेना गलत है। आर्थिक सहायता तो दूर की बात... कष्ट में सहायता लेना भी गलत है।
उनकी ये बातें सुनकर मुझे अपने बचपन और किशोरावस्था में पढ़े स्कूली पुस्तकों के वे लेख याद आए जिनके कारण हिन्दी से मेरी शत्रुता सी हो गई। उनमें से एक बिटिया के विवाह व विदाई के बारे में था। आह, क्या समा बाँधा था- लड़की पराई होने का। बाबुल से विदाई का। बाबुल के घर की रोप का दूसरे घर में रोपे जाने आदि का! विवाह के समय प्रज्ज्वलित अग्नि में लड़की का भूतकाल जल जाने का और उसका नया जन्म होने का! विदाई के समय माता पिता, भाई बहन के फूट-फूटकर रोने का! जैसे वह मर ही गई हो। कहने को कितना मधुर परन्तु यथार्थ में कितना जहरबुझा! मेरी समझ में बेटियों के बारे में ऐसे लेख व लोक गीत ही तो कन्या भ्रूणों की हत्या का कारण होते हैं।
बिटिया, एक मधुर किन्तु पराया अहसास! उसे तो किसी और के घर जाना है। तभी तो आपको अपने घर के लिए चिराग की आवश्यकता है। सो उसे पैदा करने की चेष्टा में या तो पुत्रियों की पंक्ति खड़ी कर दीजिए या फिर भ्रूण परीक्षण करवाइए। ऐसे में घुघूती कितनी विषाक्त हो जाती है, केवल वही जानती है।
हमारे उन मित्र के मुताबिक हम बेटियों पर किसी सहायता के लिए कभी भी निर्भर नहीं होना चाहिए। आप सोचेगें कि वाह क्या विचार हैं, बेटियों को अपनी देखरेख, चिन्ता से मुक्त कर देने वाले! किन्तु ये विचार जहाँ बेटियों को माता-पिता की हर चिन्ता से मुक्त करते हैं, वहीं यदि दो से अधिक बेटियाँ होने की सम्भावना हो तो आने वाली बेटियों को संसार से भी मुक्त कर देते हैं। उन साहब की भी ऐसी कहानी थी। वे शायद नहीं जानते थे कि मैं उनकी यह कहानी जानती हूँ और उनका बेटी प्रेम भी।
बात ऐसी है कि उनकी और हमारी शादी आसपास ही हुई थी। उनकी भी दो बेटियाँ हुईं और मेरी भी। उनकी दोनों बेटियाँ मेरी बेटियों से कुछ दिन ही छोटी-बड़ी थीं। फिर एक दिन पता चला की उनकी तीसरी संतान होने वाली है। उन साहब ने पता कराया तो मशीन ने बताया कि वह संतान भी बेटी ही होगी। सो पाँचवें या छठे महीने में जब बेटी का होना एकदम पक्का हो गया तो उन्होंने इस अनचाही बेटी से छुटकारा पाने का फैसला किया। उस अजन्मी बेटी को जबर्दस्ती जन्म दिया गया। हाँ, इतने महीने बीतने पर गर्भपात नहीं होता। इतने माह में गर्भपात गैरकानूनी भी है और खतरनाक जानलेवा भी। सो, जबरन जन्म देकर मारा जाता है। प्रीमैच्योर लेबर पेन के लिए जबरन नसों में दवा चढ़ाई जाती है। बच्ची जबरन समय से पहले पैदा की जाती है और मार दी जाती है। तो उन्होंने तीसरी बेटी को यह तरीका अपनाकर दुनिया में आने से रोक दिया। यह थी उनकी तीसरी फूलों की डाली, जो समय से पूर्व ही माँ के गर्भ से निकाल कर मार दी गई। ... जानते हैं, उस अजन्मी बेटी की माँ का क्या कहना था। माँ का कहना था कि वह बिल्कुल उनकी बड़ी बेटी सी दिखती थी। यानी बच्ची के नैन-नक्श बन चुके थे, कैसी दिखती है, पता चल सकता था। लेकिन उस फूल की डाली को बढ़ने नहीं दिया गया।
और यह सब उस औरत को करना पड़ा, जो दुआ करती थी कि उसे बेटी हो। हुआ यों कि जब उन सज्जन की पत्नी पहली बार गर्भवती हुई ( मैं भी उस वक्त माँ बनने वाली थी), तब कहती थी कि सास, ससुर व पति को मुँडा (लड़का) चाहिए इसलिए मैं प्रार्थना करती हूँ कि कुड़ी( लड़की) ही होए। केवल उनको जलाने को यह कहती और मजे लेती। वह जीवंत स्त्री तीसरी बेटी के समय तक इतनी कमजोर पड़ चुकी थी कि वह उसे निकाल फेंकने को तैयार हो गई! बिना किसी विरोध के। उफ, बेटे की चाह में एक औरत (माँ) को कितना मजबूर बना दिया जाता है।
अब आइए शुरुआत के मुद्दे पर चलते हैं। यानी बेटियों से मदद लेने की बात। मैं पूछती हूँ कि क्या गलत है कि यदि मैं अपनी बेटियों को महज फूलों की डाली न मानकर व्यक्ति मानूँ। ऐसा व्यक्ति जो अपने माता-पिता का उत्तराधिकारी बनें। उनके बुढ़ापे और तकलीफ की घड़ी में उनका ध्यान भी रखे!
अब आप ही बताइए क्या होना बेहतर है,-फूलों की ऐसी डाली जो यदि नापसंद हो तो काटकर फेंक दी जाए या केवल व्यक्ति जिसके अधिकार भी हैं तो कुछ उत्तरदायित्व भी हैं... और हाँ जिसे साथ में जीने का अधिकार भी है।
मुझे तो संतान ही चाहिए थी, जो चाहे पुलिंग हो या स्त्रीलिंग परन्तु जिन्हें मैं प्यार करूँ और अच्छे व्यक्ति के रूप में बड़ा करूँ। मुझे फूलों की वे , आह, कवितामय डालियाँ नहीं चाहिए थीं जिनकी संख्या जितनी मैं चाहूँ उतनी ही हो। जिन्हें मैं 'बाबुल की दुआएँ लेती जा' गीत गाकर अपने संसार से विदा नहीं करूँ,जो 'बाबुल असी चिड़ियाँ दा ....' गाकर मुझसे विदा न हों, सदा मेरा संसार बनी रहें और जो मेरा सहारा हों और जिनका मैं सहारा होऊँ, किसी कर्त्तव्य में बन्ध कर नहीं, केवल स्नेह के बन्धन के कारण!
घुघूती बासूती
पुनश्चः इन्हें भी पढ़िए।
१ चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पियें बेटा होगा
२ तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी
३ जब न गायब बेटियों से पूछा जाएगा
४ अनचहाही मुसलमान बेटियाँ.. जमीनी हकीकत
५.लड़की मरै घड़ी भर का दुख, जिये तो जनम भर का
६.बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा
घुघूती बासूती
Friday, June 05, 2009
सौराष्ट्र के किसान पक्षियों के लिए ज्वार बोते हैं, फलों के वृक्षों पर फल छोड़ते हैं !
आज के स्वार्थी जमाने में यह बात चौंकाने वाली लगती है परन्तु यह है सच। १ जून के टाइम्स औफ इन्डिया में सौराष्ट्र के किसान पक्षियों के लिए ज्वार बोते हैं का समाचार तो है ही परन्तु फल वाली बात तो मेरी देखी हुई है।
सौराष्ट्र के किसानों ने यह महसूस किया कि जबसे उन्होंने कपास, मूँगफली व गन्ने जैसी फसलें लगानी शुरू की हैं पक्षियों की संख्या घटती जा रही है। सो जोडिया तालुके के किसानों ने एक नया समाधान ढूँढ निकाला है। ये हर खेत में ज्वार या बाजरे की दो पंक्तियाँ केवल पक्षियों के लिए लगाते हैं। इसे ये भगवान नो भाग (भगवान का भाग) कहते हैं। राजू बाला और उसके जैसे बहुत से किसानों ने यह करना शुरू किया है।
यह शुरुआत पक्षियों व पर्यावरण के लिए वरदान सिद्ध होगी। फोरेस्टर वी डी बाला का कहना है कि उनका 'नवरंग नेचर क्लब' गाँव गाँव में 'राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत' का संदेश दे रहा है। उन्हें आशा है कि इस मानसून में १०,००० किसान ऐसा करेंगे।
समाचार सच होगा इसका अनुमान आप मेरे सौराष्ट्र प्रवास के अनुभवों से लगा सकते हैं। लगभग साढ़े नौ वर्ष पहले जब मैं पोरबन्दर के पास रहने आई तो पहले ही दिन कामवाली से कहा कि ओटे पर बहुत चींटियाँ हैं जरा गीले कपड़े से पोछ दो। तो वह बोली यह तो जीव हत्या होगी। पंखा चला दो चींटियाँ चली जाएँगी।
कुछ समय बाद जब चीकू पकने लगे तो माली तोड़ तोड़कर देता रहा। फिर बंद कर दिया। मैंने पूछा कि भाई क्या बात है चीकू नहीं तोड़ते। वह बोला कि खत्म हो गए। मैंने दिखाया कि दो पेड़ों पर अभी तो ३०-४० चीकू लगे हुए हैं। वह बोला कि वे तो चिड़ियों के लिए छोड़े हैं वे थोड़े ही तोड़ेंगे। मैं अपने स्वार्थीपन पर लज्जित थी और उसके बड़प्पन पर खुश। ध्यान रहे, चीकू मुझे जरा भी पसन्द नहीं और घुघूत जी को मधुमेह के कारण मना हैं, सो लगभग सभी माली, कामवाली, ड्राइवर आदि को ही बाँटे जाते थे।
एक और बात जो मैंने यहाँ देखी वह यह कि सब्जी मंडी आदि में गाय, बकरी आदि घूमते हैं, उन्हें सब्जियों पर मुँह मारने से रोकते तो हैं परन्तु कभी पीटते नहीं। कई बार मेरे सामने ही गाय पूरी की पूरी यहाँ बहुत मंहगी मिलने वाली फूल गोभी लेकर चलती बनी परन्तु डंडा उसे कभी नहीं पड़ा।
बहुत से घरों के सामने सीमेन्ट की छोटी छोटी हौदियाँ सी बनी होती हैं। गृहणियाँ उनमें गाय के लिए खाना डालती हैं।
मुझे गाय भैंस का सड़क पर घूमना तो पसन्द नहीं परन्तु ये सब बातें यहाँ के लोगों का पशु पक्षी प्रेम अवश्य दिखाती हैं। शायद तभी भारत भर में गिर का जंगल ही एक सुरक्षित जंगल है जहाँ सिंहों की संख्या बढ़ रही है घट नहीं रही। जबकि सिंह प्रायः मालधारियों व गाँव वालों के पशु खा जाते हैं। सरकार मुआवजा तो देती है परन्तु कभी कोई उनका शिकार नहीं करता। जितने भी शिकार हुए वह मध्यप्रदेश के कटनी से आए शिकारियों ने ही किए और वे पकड़े भी गए।
शायद यही कारण है कि मैं अपनी बस्ती तक में मोरों को नाचते और नील गायों व कभी कभी हिरणों को भी घूमते देख सकती हूँ। एक बार तो लगभग बीस फुट की दूरी पर बाघ को भी बस्ती में देखा। मैंने यहाँ व पहले जहाँ पोरबन्दर के पास रहती थी वहाँ आज तक साँप निकलने पर उसे मारते हुए नहीं देखा। सच तो यह है कि हमें बताया गया है कि कम्पनी के मालिक लोगों ने साँप मारने को मना कर रखा है।
तो कुछ तो विशेष है सौराष्ट्र के लोगों में!
घुघूती बासूती
सौराष्ट्र के किसानों ने यह महसूस किया कि जबसे उन्होंने कपास, मूँगफली व गन्ने जैसी फसलें लगानी शुरू की हैं पक्षियों की संख्या घटती जा रही है। सो जोडिया तालुके के किसानों ने एक नया समाधान ढूँढ निकाला है। ये हर खेत में ज्वार या बाजरे की दो पंक्तियाँ केवल पक्षियों के लिए लगाते हैं। इसे ये भगवान नो भाग (भगवान का भाग) कहते हैं। राजू बाला और उसके जैसे बहुत से किसानों ने यह करना शुरू किया है।
यह शुरुआत पक्षियों व पर्यावरण के लिए वरदान सिद्ध होगी। फोरेस्टर वी डी बाला का कहना है कि उनका 'नवरंग नेचर क्लब' गाँव गाँव में 'राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत' का संदेश दे रहा है। उन्हें आशा है कि इस मानसून में १०,००० किसान ऐसा करेंगे।
समाचार सच होगा इसका अनुमान आप मेरे सौराष्ट्र प्रवास के अनुभवों से लगा सकते हैं। लगभग साढ़े नौ वर्ष पहले जब मैं पोरबन्दर के पास रहने आई तो पहले ही दिन कामवाली से कहा कि ओटे पर बहुत चींटियाँ हैं जरा गीले कपड़े से पोछ दो। तो वह बोली यह तो जीव हत्या होगी। पंखा चला दो चींटियाँ चली जाएँगी।
कुछ समय बाद जब चीकू पकने लगे तो माली तोड़ तोड़कर देता रहा। फिर बंद कर दिया। मैंने पूछा कि भाई क्या बात है चीकू नहीं तोड़ते। वह बोला कि खत्म हो गए। मैंने दिखाया कि दो पेड़ों पर अभी तो ३०-४० चीकू लगे हुए हैं। वह बोला कि वे तो चिड़ियों के लिए छोड़े हैं वे थोड़े ही तोड़ेंगे। मैं अपने स्वार्थीपन पर लज्जित थी और उसके बड़प्पन पर खुश। ध्यान रहे, चीकू मुझे जरा भी पसन्द नहीं और घुघूत जी को मधुमेह के कारण मना हैं, सो लगभग सभी माली, कामवाली, ड्राइवर आदि को ही बाँटे जाते थे।
एक और बात जो मैंने यहाँ देखी वह यह कि सब्जी मंडी आदि में गाय, बकरी आदि घूमते हैं, उन्हें सब्जियों पर मुँह मारने से रोकते तो हैं परन्तु कभी पीटते नहीं। कई बार मेरे सामने ही गाय पूरी की पूरी यहाँ बहुत मंहगी मिलने वाली फूल गोभी लेकर चलती बनी परन्तु डंडा उसे कभी नहीं पड़ा।
बहुत से घरों के सामने सीमेन्ट की छोटी छोटी हौदियाँ सी बनी होती हैं। गृहणियाँ उनमें गाय के लिए खाना डालती हैं।
मुझे गाय भैंस का सड़क पर घूमना तो पसन्द नहीं परन्तु ये सब बातें यहाँ के लोगों का पशु पक्षी प्रेम अवश्य दिखाती हैं। शायद तभी भारत भर में गिर का जंगल ही एक सुरक्षित जंगल है जहाँ सिंहों की संख्या बढ़ रही है घट नहीं रही। जबकि सिंह प्रायः मालधारियों व गाँव वालों के पशु खा जाते हैं। सरकार मुआवजा तो देती है परन्तु कभी कोई उनका शिकार नहीं करता। जितने भी शिकार हुए वह मध्यप्रदेश के कटनी से आए शिकारियों ने ही किए और वे पकड़े भी गए।
शायद यही कारण है कि मैं अपनी बस्ती तक में मोरों को नाचते और नील गायों व कभी कभी हिरणों को भी घूमते देख सकती हूँ। एक बार तो लगभग बीस फुट की दूरी पर बाघ को भी बस्ती में देखा। मैंने यहाँ व पहले जहाँ पोरबन्दर के पास रहती थी वहाँ आज तक साँप निकलने पर उसे मारते हुए नहीं देखा। सच तो यह है कि हमें बताया गया है कि कम्पनी के मालिक लोगों ने साँप मारने को मना कर रखा है।
तो कुछ तो विशेष है सौराष्ट्र के लोगों में!
घुघूती बासूती
Thursday, June 04, 2009
रंग हो जाने चाहिए बेरंग
यह लेख मुम्बई हमलों के दौरान लिखा था। कल अरुण जी का लेख ‘शीला जी आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं’ पढ़कर याद आ गया सो पुराना होने पर भी पढ़ ही लीजिए। अरुण ने इसे प्रासंगिक बना दिया है।
जब मुम्बई का ताज जल रहा था तब मैं रंगों पर भी कान लगाए हुए थी । भय था कि अब कौन सा रंग बैन करना होगा । दुर्भाग्य से हम स्त्रियों के कपड़े रंग बिरंगे होते हें । जब किसी रंग पर बैन लगता है, प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष में ही सही, कुछ साड़ियाँ पेटी में डालनी पड़ती हैं । कुछ दिनों से मेरे पास दो तीन साड़ियाँ जो गलत रंग की थीं (यहाँ यह साफ कर दूँ कि वे मैंने नहीं खरीदी थीं, मुझे परिवार वालों से उपहार में मिली थीं ) बहुत दुख के साथ मैंने छिपा दी थीं । जमाना खराब है, कोई कहने लगे कि चिड़ियाएँ भी गलत रंग पहन कर अपनी आतंकी मंशा दिखाने लगी हैं । फिर गलत राज्य में भी रहती हूँ। और तब तो मेरी जान ही निकल गई जब टी वी पर कई बार बताया गया कि आतंकवादी मेरे राज्य से आए थे । परन्तु कुछ घंटों के बाद कहा गया कि वे पड़ोसी देश से आए थे । मेरी जान में जान आई । वैसे भी यदि सरदार पटेल न होते तो शायद इस राज्य का यह हिस्सा पड़ोसी देश में ही होता । मैं प्रतीक्षा करती रही कि कोई कहेगा कि गुजरात का नाम बार बार लेने की आदत पड़ जाने के कारण गलती से मुँह से निकल गया । परन्तु ऐसा किसी ने नहीं कहा ।
मुझे भगवान पर कुछ विशेष विश्वास न होते हुए भी कभी कभार 'हे भगवान' कहने की आदत थी। आजकल कहते कहते रुक जाती हूँ क्योंकि कोई यह न कहे कि भगवा..न के बहाने गलत रंग को याद कर रही है । अब लगता है कि यह सब इसी तरह चलता रहा तो शायद खाकी रंग ही सुरक्षित रह जाएगा । जिस द्रुत गति से नए नए रंग के आतंक निकल रहे हैं आकाश से इन्द्र धनुष भी बैन करना होगा । परन्तु आज अभी तक आतंक का रंग नहीं बताया है । मैं प्रतीक्षा में हूँ जानने की । वैसे यदि सांकेतिक भाषा समझूँ तो आग का रंग भी तो हो सकता है और वह अग्नि भगवा..न का रंग याने वही पुरानी दो तीन साड़ियों का रंग ही है । चलो अच्छा ही हुआ । मेरा मन नई किसी भी रंग, खाकी भी नहीं, की साड़ियाँ खरीदने का नहीं है । जमाना वैसे भी मंदी का है ।
चलते चलतेः
गुजरात में एक दल की जीत का कारण शायद यहाँ का प्रसिद्ध आम 'केसर' भी है। इसका नाम बदल कर 'बेरंग' जैसा कुछ रख देना चाहिए। वैसे कुछ लोगों को जानकर संतोष होगा कि इस वर्ष ये आम भी चुनावों के परिणामों की तरह नाराज हैं। केसर आम इस वर्ष फला ही बहुत कम। मेरे बगीचे में इसके दो वृक्ष हैं और दोनों में केवल दो दो आम लटके हुए इस रंग की दुर्दशा की कहानी सुना रहे हैं।
घुघूती बासूती
जब मुम्बई का ताज जल रहा था तब मैं रंगों पर भी कान लगाए हुए थी । भय था कि अब कौन सा रंग बैन करना होगा । दुर्भाग्य से हम स्त्रियों के कपड़े रंग बिरंगे होते हें । जब किसी रंग पर बैन लगता है, प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष में ही सही, कुछ साड़ियाँ पेटी में डालनी पड़ती हैं । कुछ दिनों से मेरे पास दो तीन साड़ियाँ जो गलत रंग की थीं (यहाँ यह साफ कर दूँ कि वे मैंने नहीं खरीदी थीं, मुझे परिवार वालों से उपहार में मिली थीं ) बहुत दुख के साथ मैंने छिपा दी थीं । जमाना खराब है, कोई कहने लगे कि चिड़ियाएँ भी गलत रंग पहन कर अपनी आतंकी मंशा दिखाने लगी हैं । फिर गलत राज्य में भी रहती हूँ। और तब तो मेरी जान ही निकल गई जब टी वी पर कई बार बताया गया कि आतंकवादी मेरे राज्य से आए थे । परन्तु कुछ घंटों के बाद कहा गया कि वे पड़ोसी देश से आए थे । मेरी जान में जान आई । वैसे भी यदि सरदार पटेल न होते तो शायद इस राज्य का यह हिस्सा पड़ोसी देश में ही होता । मैं प्रतीक्षा करती रही कि कोई कहेगा कि गुजरात का नाम बार बार लेने की आदत पड़ जाने के कारण गलती से मुँह से निकल गया । परन्तु ऐसा किसी ने नहीं कहा ।
मुझे भगवान पर कुछ विशेष विश्वास न होते हुए भी कभी कभार 'हे भगवान' कहने की आदत थी। आजकल कहते कहते रुक जाती हूँ क्योंकि कोई यह न कहे कि भगवा..न के बहाने गलत रंग को याद कर रही है । अब लगता है कि यह सब इसी तरह चलता रहा तो शायद खाकी रंग ही सुरक्षित रह जाएगा । जिस द्रुत गति से नए नए रंग के आतंक निकल रहे हैं आकाश से इन्द्र धनुष भी बैन करना होगा । परन्तु आज अभी तक आतंक का रंग नहीं बताया है । मैं प्रतीक्षा में हूँ जानने की । वैसे यदि सांकेतिक भाषा समझूँ तो आग का रंग भी तो हो सकता है और वह अग्नि भगवा..न का रंग याने वही पुरानी दो तीन साड़ियों का रंग ही है । चलो अच्छा ही हुआ । मेरा मन नई किसी भी रंग, खाकी भी नहीं, की साड़ियाँ खरीदने का नहीं है । जमाना वैसे भी मंदी का है ।
चलते चलतेः
गुजरात में एक दल की जीत का कारण शायद यहाँ का प्रसिद्ध आम 'केसर' भी है। इसका नाम बदल कर 'बेरंग' जैसा कुछ रख देना चाहिए। वैसे कुछ लोगों को जानकर संतोष होगा कि इस वर्ष ये आम भी चुनावों के परिणामों की तरह नाराज हैं। केसर आम इस वर्ष फला ही बहुत कम। मेरे बगीचे में इसके दो वृक्ष हैं और दोनों में केवल दो दो आम लटके हुए इस रंग की दुर्दशा की कहानी सुना रहे हैं।
घुघूती बासूती
Wednesday, June 03, 2009
हम में से कितने श्रवण कुमार के माता पिता बनना चाहेंगे?
मैं तो कदापि नहीं। सोचिए आप स्वस्थ या अस्वस्थ हैं, दृष्टि वाले हैं या दृष्टिहीन, गरीब या अमीर, कुछ भी क्यों न हों, क्या आप चाहेंगे कि आपका लाडला या लाडली(बराबरी का जमाना है तो ढोने का अधिकार भी चाहिए ही चाहिए!) आपको कंधे पर लादे यहाँ से वहाँ घूमे? वह तो महापुरुष,त्यागी,पुण्यात्मा हो सकता है किन्तु आप? आप तो महा स्वार्थी,निष्ठुर व अधम ही होंगे। कोई कैसे व क्यों अपनी संतान के कंधों पर बैठकर संसार घूम सकता है, चाहे वह तीर्थयात्रा का ही पुण्य काम हो। लक्ष्य से भी अधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य पाने का साधन,उसको पाने के लिए अपनाया रास्ता व उस रास्ते को आपने कैसे पार किया, होता है। क्या इन सभी मापदंडों पर श्रवण कुमार के माता पिता खरे उतरे थे?
यदि संतान को माता पिता को उठाकर स्नानगृह,पाखाने या हस्पताल ले जाना पड़े तब तो तर्कसंगत भी है और सराहनीय भी। वैसे प्रायः ऐसी स्थिति आने तक संतान भी युवा नहीं रह जाती वह स्वयं वृद्ध हो चुकी होती है या वृद्धावस्था की कगार पर खड़ी होती है।
मैं आज तक समझ नहीं पाई कि जिन युगों की हम दुहाई देते हैं उन्हीं युगों में यदि राम सा आज्ञाकारी पुत्र था तो दशरथ सा बिना सोचे समझे वरदान देने वाला पिता भी और कैकई सी माँ भी। ययाति सा अपने पुत्र से यौवन माँगकर और अधिक समय तक भोग विलास की कामना करने वाला पिता भी। अब इस पिता के व्यवहार को आप कैसे उचित ठहराएँगे? यदि भीष्म पितामह सी संतान थी तो अपने बेटे के त्याग को अपना अधिकार समझ जीवन के सुख भोगने वाला उसका पिता भी था।
हमारी पीढ़ी के कितने माता पिता अपने बच्चों को कष्ट देकर सुखी रहने का स्वप्न भी देख सकते हैं? मैं तो नहीं। दाल रोटी व सिर पर छत के लिए यदि उनपर आश्रित रहना पड़ा, उन्हें कष्ट देना पड़ा तो समझा जा सकता है परन्तु अपने विलास या अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए तो कतई नहीं।
मैं यह नहीं कह रही कि माता पिता को सुखी जीवन जीने का अधिकार नहीं है परन्तु यदि यह अधिकार अपनी संतान के सुखी जीवन के अधिकार को छीन कर लिया गया है तो क्या यह सही है?
श्रवण कुमार की तो धारणा ही गलत है। उससे भी अधिक गलत श्रवण कुमार के माता पिता बनने की इच्छा रखने की।
टिप्पणी में सबसे पहले हाँ या ना या विस्तार में मेरे प्रश्न 'क्या आप श्रवण कुमार के माता पिता बनना चाहेंगे' का उत्तर अवश्य दीजिए।
ताऊ के 'कलयुगी श्रवण' को पढ़ने के बाद बचपन से मन में आता यह प्रश्न आज आपके सामने है।
घुघूती बासूती
यदि संतान को माता पिता को उठाकर स्नानगृह,पाखाने या हस्पताल ले जाना पड़े तब तो तर्कसंगत भी है और सराहनीय भी। वैसे प्रायः ऐसी स्थिति आने तक संतान भी युवा नहीं रह जाती वह स्वयं वृद्ध हो चुकी होती है या वृद्धावस्था की कगार पर खड़ी होती है।
मैं आज तक समझ नहीं पाई कि जिन युगों की हम दुहाई देते हैं उन्हीं युगों में यदि राम सा आज्ञाकारी पुत्र था तो दशरथ सा बिना सोचे समझे वरदान देने वाला पिता भी और कैकई सी माँ भी। ययाति सा अपने पुत्र से यौवन माँगकर और अधिक समय तक भोग विलास की कामना करने वाला पिता भी। अब इस पिता के व्यवहार को आप कैसे उचित ठहराएँगे? यदि भीष्म पितामह सी संतान थी तो अपने बेटे के त्याग को अपना अधिकार समझ जीवन के सुख भोगने वाला उसका पिता भी था।
हमारी पीढ़ी के कितने माता पिता अपने बच्चों को कष्ट देकर सुखी रहने का स्वप्न भी देख सकते हैं? मैं तो नहीं। दाल रोटी व सिर पर छत के लिए यदि उनपर आश्रित रहना पड़ा, उन्हें कष्ट देना पड़ा तो समझा जा सकता है परन्तु अपने विलास या अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए तो कतई नहीं।
मैं यह नहीं कह रही कि माता पिता को सुखी जीवन जीने का अधिकार नहीं है परन्तु यदि यह अधिकार अपनी संतान के सुखी जीवन के अधिकार को छीन कर लिया गया है तो क्या यह सही है?
श्रवण कुमार की तो धारणा ही गलत है। उससे भी अधिक गलत श्रवण कुमार के माता पिता बनने की इच्छा रखने की।
टिप्पणी में सबसे पहले हाँ या ना या विस्तार में मेरे प्रश्न 'क्या आप श्रवण कुमार के माता पिता बनना चाहेंगे' का उत्तर अवश्य दीजिए।
ताऊ के 'कलयुगी श्रवण' को पढ़ने के बाद बचपन से मन में आता यह प्रश्न आज आपके सामने है।
घुघूती बासूती
Tuesday, June 02, 2009
कभी तो पूछना होगा
कभी तो पूछना होगा
तारों से
क्या गिनते हैं वे नींद न आने पर ?
आँसुओं से
क्या बहाते हैं वे उदास होने पर ?
भाग्य से
किसे दोष देता है वह बुरा समय आने पर ?
कुत्ते की दुम से
किसे हिलाती है वह खुश होने पर ?
नानी से
किसे याद करती है परेशानी आने पर ?
घुघूती बासूती
तारों से
क्या गिनते हैं वे नींद न आने पर ?
आँसुओं से
क्या बहाते हैं वे उदास होने पर ?
भाग्य से
किसे दोष देता है वह बुरा समय आने पर ?
कुत्ते की दुम से
किसे हिलाती है वह खुश होने पर ?
नानी से
किसे याद करती है परेशानी आने पर ?
घुघूती बासूती
Monday, June 01, 2009
माँ की यादों के झरोखे से बहते किस्से..... १ धानसिंह का भाई मानसिंह
धानसिंह का भाई मानसिंह
माँ मेरे पास दस वर्ष बाद रहने आईं हैं। जब तक पिताजी थे दोनों लगभग हर वर्ष सर्दियाँ हमारे साथ गुजारते थे। भारतीय समाज में जहाँ बेटी के घर का पानी भी नहीं पिया जाता था वहाँ मैंने उन्हें हमारे पास आने व रहने के लिए लगभग ३१ वर्ष पहले के जमाने में कैसे सहमत किया यह एक अलग कहानी है। यहाँ तो मैं आपको माँ से सुने किस्से सुनाने जा रही हूँ। माँ से बात करते हुए वे अपनी वर्षों पहले पढ़ी कविताएँ, कहानियाँ या उपन्यास में लेखक ने क्या कहा था आज भी सुना देती हैं। कभी शकुन्तला ने दुष्यन्त को कमल के पत्ते पर नाखून से खुरचकर क्या पत्र लिखा था, कभी किसी कवि की कल्पना तो कभी अपनी दूसरी कक्षा में पढ़ी कविता। माँ ८६ वर्ष की हैं।
उनके बताए कुछ किस्से तो पहले भी सुना चुकी हूँ। लीजिए यह एक जो उन्होंने मुझे तब सुनाया जब मैंने उन्हें नींबूपानी दिया और कहा कि पी लीजिए अन्यथा गरम हो जाएगा तो उन्हें यह याद आया।
धानसिंह का भाई मानसिंह, कोठलपुर में उतरा है
मिलना है तो मिल लो, नहीं तो शीतलपुर को जाता है।
एक स्त्री के पति से मिलने कुछ मेहमान आए। स्त्री भात पका रही थी। वह भात पकाने पर उसका माँड निकालती थी। माँड में बहुत से बी विटामिन होते हैं व ढेर सारा शक्तिवर्धक कार्बोहाइड्रेट। अब यह सब उसे पता था या नहीं, मैं कह नहीं सकती परन्तु यह गरमागरम माँड वह अपने पति को पीने को देती थी। माँड पीना कोई बहुत गर्व का काम नहीं माना जाता होगा। शायद गरीब ही पीते होंगे। सो वह चाहती थी कि इससे पहले कि माँड ठंडा हो जाए पति रसोई में आकर माँड पी ले। मेहमानों के सामने कैसे कहे कि आइए माँड पी लीजिए। सो उसने ये पंक्तियाँ कहीं। मैं और आप ना भी समझ पाएँ परन्तु पति समझ गया और रसोई में आकर माँड पीकर वापिस अपने मेहमानों के बीच चला गया।
चलिए इन पंक्तियों का अर्थ समझते हैं।
धानसिंह= धान से बना चावल
मानसिंह= माँड, क्योंकि धान से बने चावल से बना है इसलिए धानसिंह का भाई (कवि वाली छूट ली गई है।)
कोठलपुर= कोठल या कुठला जो पुराने जमाने में लकड़ी से बना एक कटोरा जैसा होता था। क्योंकि माँड उसमें निकाला गया इसलिए कोठलपुर में उतरा है।
शीतलपुर= शीतल या ठंडा हो जाएगा।
घुघूती बासूती
माँ मेरे पास दस वर्ष बाद रहने आईं हैं। जब तक पिताजी थे दोनों लगभग हर वर्ष सर्दियाँ हमारे साथ गुजारते थे। भारतीय समाज में जहाँ बेटी के घर का पानी भी नहीं पिया जाता था वहाँ मैंने उन्हें हमारे पास आने व रहने के लिए लगभग ३१ वर्ष पहले के जमाने में कैसे सहमत किया यह एक अलग कहानी है। यहाँ तो मैं आपको माँ से सुने किस्से सुनाने जा रही हूँ। माँ से बात करते हुए वे अपनी वर्षों पहले पढ़ी कविताएँ, कहानियाँ या उपन्यास में लेखक ने क्या कहा था आज भी सुना देती हैं। कभी शकुन्तला ने दुष्यन्त को कमल के पत्ते पर नाखून से खुरचकर क्या पत्र लिखा था, कभी किसी कवि की कल्पना तो कभी अपनी दूसरी कक्षा में पढ़ी कविता। माँ ८६ वर्ष की हैं।
उनके बताए कुछ किस्से तो पहले भी सुना चुकी हूँ। लीजिए यह एक जो उन्होंने मुझे तब सुनाया जब मैंने उन्हें नींबूपानी दिया और कहा कि पी लीजिए अन्यथा गरम हो जाएगा तो उन्हें यह याद आया।
धानसिंह का भाई मानसिंह, कोठलपुर में उतरा है
मिलना है तो मिल लो, नहीं तो शीतलपुर को जाता है।
एक स्त्री के पति से मिलने कुछ मेहमान आए। स्त्री भात पका रही थी। वह भात पकाने पर उसका माँड निकालती थी। माँड में बहुत से बी विटामिन होते हैं व ढेर सारा शक्तिवर्धक कार्बोहाइड्रेट। अब यह सब उसे पता था या नहीं, मैं कह नहीं सकती परन्तु यह गरमागरम माँड वह अपने पति को पीने को देती थी। माँड पीना कोई बहुत गर्व का काम नहीं माना जाता होगा। शायद गरीब ही पीते होंगे। सो वह चाहती थी कि इससे पहले कि माँड ठंडा हो जाए पति रसोई में आकर माँड पी ले। मेहमानों के सामने कैसे कहे कि आइए माँड पी लीजिए। सो उसने ये पंक्तियाँ कहीं। मैं और आप ना भी समझ पाएँ परन्तु पति समझ गया और रसोई में आकर माँड पीकर वापिस अपने मेहमानों के बीच चला गया।
चलिए इन पंक्तियों का अर्थ समझते हैं।
धानसिंह= धान से बना चावल
मानसिंह= माँड, क्योंकि धान से बने चावल से बना है इसलिए धानसिंह का भाई (कवि वाली छूट ली गई है।)
कोठलपुर= कोठल या कुठला जो पुराने जमाने में लकड़ी से बना एक कटोरा जैसा होता था। क्योंकि माँड उसमें निकाला गया इसलिए कोठलपुर में उतरा है।
शीतलपुर= शीतल या ठंडा हो जाएगा।
घुघूती बासूती
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