अली जी का किस्सा 'कोतो टोको' पढ़कर मुझे अपने पति के घर का एक किस्सा याद आ गया। बात बहुत पहले की है, लगभग ३५ वर्ष पहले की, जब फाउन्टैन पेन उपयोग किए जाते थे और खरीदने से पहले उनसे लिखकर निब की जाँच की जाती थी।
दादा पैन की दुकान पर गए। पैन चुना और फिर उससे लिखकर देखा। प्रायः ऐसे में व्यक्ति अपना नाम ही लिखता है या हस्ताक्षर करता है। दादा ने भी वही किया। दादा का नाम पढ़कर दुकानदार बोला," साहब आप तो अपनी ही जात वाले हो। आपसे दो रुपया कम लूँगा।"
उस जमाने में दो रुपए कम नहीं होते थे। परन्तु जाति में विश्वास न करने वाले दादा बोले," तुम अपना पूरा पैसा लो, मैं तो अपने दोस्त का नाम लिख रहा था।"
दुकानदार बोला, " साहब, आप बहुत ईमानदार हो, दो रुपए बचाने के लिए भी झूठ नहीं बोले।"
उस बेचारे को क्या पता था कि दादा ने ईमानदारी नहीं की थी और झूठ बोला था, जातिवाद से बचने के लिए!
आज भी जब कभी किसी पेन को हस्ताक्षर करने से पहले चलाकर देखती हूँ तो दादा का यह किस्सा याद आ जाता है।
घुघूती बासूती
Tuesday, May 19, 2009
Monday, May 18, 2009
माँ क्या तुम रोई नहीं?
बिटिया को फोन पर बताया कि आज 'तारे जमीं पर' देखी। उसका पहला प्रश्न था कि माँ क्या तुम रोई नहीं? मैंने कहा कि नहीं, क्रोध, क्षोभ के अतिरेक के चलते रो नहीं सकी। कहा कि मुझे तुम लोगों की याद आई और तुम्हें हॉस्टेल छोड़ने का दृष्य याद आया। तुम दोनों को ईशान की जगह रखकर देखा। जब उसे हॉस्टेल छोड़ा था तो वह अपेक्षाकृत बड़ी भी थी और अपनी इच्छा से गई थी। फिर भी मन का क्या हाल हुआ था। कितने अनजाने भयों ने मुझे घेरा हुआ था। जब तक उससे दोबारा मिल नहीं ली शान्ति नहीं हुई थी। एक माँ के लिए बच्चे को पहले दिन स्कूल में छोड़ना और पहली बार हॉस्टेल में छोड़ना बहुत कठिन होता है।
खैर बात 'तारे जमीं पर' की हो रही थी। देखते समय मन अवसाद से भर गया। अन्त सुखद था किन्तु यदि ईशान को वह कला का अध्यापक नहीं मिलता तो ! सोचकर ही काँप जाती हूँ। यदि संसार के माता पिता देखें और उनके माता पिता कहलाने की योग्यता को देखें तो भगवान नाम की वस्तु पर कभी विश्वास नहीं हो सकता। यदि वह होता तो क्या इतने अयोग्य व अपरिपक्व लोगों को माता पिता बनने का भगवान सा दायित्व कभी सौंपता। वह तो या है ही नहीं या स्वयं इतना अपूर्ण है कि उसने मानव को भी कितना अयोग्य व अपरिपूर्ण बनाकर उसे एक क्या अनेक नन्हे बच्चों का दायित्व बिना कुछ सोचे समझे पकड़ा दिया। न जाने कितने ईशान अपने पिता के झूठे दम्भ व अपनी माँ की असहायता भरे पिता के सामने झुकते स्वभाव का शिकार होते हैं।
पिता के बारे में अधिक नहीं कहूँगी (इस बारे में पुरुष ही बेहतर कह सकते हैं।) किन्तु माँ के असहाय होने पर बहुत क्रोध आया। ऐसी असहाय माँओं को जो अपनी संतान के लिए भी अपने पति का विरोध नहीं कर सकतीं माँ बनने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए। जितनी भी आज्ञाकारी सुशील पत्नी बनने का शौक हो अवश्य पूरा करो परन्तु अपने बच्चों की बलि चढ़ाकर नहीं। अरे, किसी पशु या पक्षी माँ को ही देखकर उससे सीखो। उनके पास तो माँ बनने या न बनने का चुनाव भी नहीं होता परन्तु एक बार जब माँ बनती हैं तो अपने बच्चों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा देती हैं। यहाँ एक जगह बताया जाता है कि बच्चों के लिए उसने अपनी आजीविका को छोड़ा। त्याग का कोई महत्व नहीं है, जब तक जिसके लिए त्याग किया हो उसको लाभ न मिले। किसी बच्चे को इसलिए छात्रावास में डालना क्योंकि वह हमसे संभलता नहीं है अपने दायित्व से मुँह फेरना है। बच्चे संसार के सबसे असहाय प्राणी होते हैं। उनपर अन्याय करना सबसे निकृष्ट काम है। ईशान की असहाय अवस्था देखकर मन तड़प उठता है।
हमारा समाज सही अर्थों में समाज नहीं है जंगल राज्य है। जो इस व्यवस्था में फिट बैठ जाए वह सामान्य जीवन जी सकता है, जो उसपर विजय पा ले वह विजयी हो जाता है। जो जरा सा भी सामान्य से इधर उधर हुआ समाज उसे लील जाता है। ईशान भी हमारी इस व्यवस्था की वेदी पर बलि चढ़ ही जाने वाला था। इससे तो पहले का जमाना या गाँव ही बेहतर हैं जहाँ बच्चा यदि विद्यालय में असफल रहता है तो कोई अन्य काम कर अपनी आजीविका चला लेता है। किन्तु शहरों में तो हम हर बच्चे से विद्यालय में सफल होने की अपेक्षा रखते हैं और उसके सिवाय भी जीवन में कुछ है न तो सोच पाते हैं न ही बच्चे को कोई विकल्प ही दे पाते हैं।
हम स्कूलों में भेड़ बकरियों की तरह बच्चे भर देते हैं और उनसे आशा करते हैं कि वे चाहे जिस भी नाप या आकार के हों हमारे बनाए खानों में फिट बैठ जाएँ। यदि आपने कभी आलू भी उगाएँ हों तो जानेंगे कि सब आलू एक ही नाप व आकार के नहीं होते। फिर क्या आप बच्चे को काट छाँट कर अपने बनाए खानों में फिट करेंगे? कुछ बड़े स्कूलों ने इस बात को ध्यान में रखकर बच्चों की ग्राह्य क्षमता के अनुसार उन्हें विभिन्न वर्गों में रखने का प्रयास किया। यह सफल भी हो सकता है। यदि इसमें भी स्कूल व माता पिता का दम्भ आड़े न आए। यदि धीरे सीखने वाले बच्चों को हेय दृष्टि से न देखा जाए, यदि धीमे बच्चों का पाठ्यक्रम कम कर दिया जाए और उन्हें पढ़ने को अधिक समय दिया जाए तो वे भी काफी कुछ सीख सकते हैं। सभी बच्चों से समान समय में समान पाठ्यक्रम घोटने की अपेक्षा न केवल धीमे बच्चों के साथ अन्याय है अपितु तेज बच्चों की पढ़ाई के प्रति अरुचि पैदा करने की भी उत्तरदायी है। कितने ही कुशाग्र बुद्धि बच्चे इस धीमी गति की पढ़ाई से उकता जाते हैं व नई नई शैतानियाँ कर अपना मन बहलाते हैं।
सभी बच्चों को एक ही स्कूल में पढ़ने का समान अवसर देना नैतिक तो हो सकता है परन्तु व्यवहारिक नहीं। जब कक्षा में पचास से अधिक छात्र हों और एक अध्यापक के पास उन्हें देने को कुल ४५ मिनट हों तो क्या अलग अलग योग्यता या कमी वाले हर छात्र को देने को अध्यापक के पास समय हो सकता है ? वह भी तब जब अध्यापक सबसे अधिक योग्यता के आधार पर बनाए या चुने नहीं जाते अपितु मजबूरी या बहुत से अन्य कारणों के कारण बनते व चुने जाते हैं।
सोचिए कैसा होता यदि आपका बच्चा बस में लदकर स्कूल जाने की बजाए अपने ही क्षेत्र के एक स्कूल में पैदल या साइकिल चलाकर जाता। जहाँ दो चार अध्यापक केवल कमजोर या विशेष छात्रों की सहायता के लिए ही होते। जहाँ उसे दाखिले के लिए कोई साक्षात्कार न देना होता। बच्चा है तो स्कूल में उसके लिए जगह भी होती। यदि माता पिता दोनों कामकाजी हैं तो एक विशेष शुल्क देने पर जहाँ वह उनके आने तक आराम से खेलता, आराम करता, खाना खाता, पढ़ाई करता या पुस्तकालय में पुस्तकें पढ़ता या टी वी देखता।
क्या यह असंभव लगता है ? यदि सोचा जाए तो इतना असंभव भी नहीं है। ये सरकारी स्कूल किसलिए बनाए गए हैं ? अन्य देशों में कैसे बच्चे इन्हीं में पढ़कर सफल हो रहे हैं ? इन्हें सुधारकर ऐसा क्यों नहीं बनाया जाता ? क्यों नहीं इनकी नए सिरे से रचना की जा सकती ? एक नई अध्यापन सेवा की घोषणा क्यों नहीं की जाती ? प्रशासनिक सेवा की सी तर्ज पर। जहाँ अच्छा वेतन व सम्मान मिलेगा किन्तु आठ घंटे के कड़े श्रम व दायित्व के बाद। शायद इस सेवा को निजी कम्पनियों के हाथ में भी थमाया जा सकता है। यदि स्कूल ढंग से न चलें तो किसी अन्य को दिया जा सकता है। इस तरह इनमें स्पर्धा भी होगी। संसार में अपनी सफल निजी कम्पनियाँ स्थापित कर नाम कमा चुके लोग अवकाशप्राप्ति के बाद जीवन को अर्थ व दिशा देने के रास्ते खोज रहे हैं। ऐसे व बहुत से अन्य सफल व अवकाशप्राप्त लोग शायद यह चुनौती स्वीकार कर सकते हैं। ये व कुछ जाने माने शिक्षाविद यह प्रयोग कर सकते हैं व सफल होने पर इसी मॉडेल पर स्कूल चलाए जा सकते हैं।
जो भी हो हमारे अज्ञान व आलस के कारण हमारे बच्चों को कष्ट हो और वे अन्याय सहें यह गलत है। सारा संसार रुक सकता है, सही नीतियाँ बनने की प्रतीक्षा कर सकता है किन्तु बच्चे प्रतीक्षा नहीं कर सकते। उनके लिए जो करना है आज ही होना चाहिए। कल बहुत देर हो चुकी होगी।
घुघूती बासूती
खैर बात 'तारे जमीं पर' की हो रही थी। देखते समय मन अवसाद से भर गया। अन्त सुखद था किन्तु यदि ईशान को वह कला का अध्यापक नहीं मिलता तो ! सोचकर ही काँप जाती हूँ। यदि संसार के माता पिता देखें और उनके माता पिता कहलाने की योग्यता को देखें तो भगवान नाम की वस्तु पर कभी विश्वास नहीं हो सकता। यदि वह होता तो क्या इतने अयोग्य व अपरिपक्व लोगों को माता पिता बनने का भगवान सा दायित्व कभी सौंपता। वह तो या है ही नहीं या स्वयं इतना अपूर्ण है कि उसने मानव को भी कितना अयोग्य व अपरिपूर्ण बनाकर उसे एक क्या अनेक नन्हे बच्चों का दायित्व बिना कुछ सोचे समझे पकड़ा दिया। न जाने कितने ईशान अपने पिता के झूठे दम्भ व अपनी माँ की असहायता भरे पिता के सामने झुकते स्वभाव का शिकार होते हैं।
पिता के बारे में अधिक नहीं कहूँगी (इस बारे में पुरुष ही बेहतर कह सकते हैं।) किन्तु माँ के असहाय होने पर बहुत क्रोध आया। ऐसी असहाय माँओं को जो अपनी संतान के लिए भी अपने पति का विरोध नहीं कर सकतीं माँ बनने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए। जितनी भी आज्ञाकारी सुशील पत्नी बनने का शौक हो अवश्य पूरा करो परन्तु अपने बच्चों की बलि चढ़ाकर नहीं। अरे, किसी पशु या पक्षी माँ को ही देखकर उससे सीखो। उनके पास तो माँ बनने या न बनने का चुनाव भी नहीं होता परन्तु एक बार जब माँ बनती हैं तो अपने बच्चों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा देती हैं। यहाँ एक जगह बताया जाता है कि बच्चों के लिए उसने अपनी आजीविका को छोड़ा। त्याग का कोई महत्व नहीं है, जब तक जिसके लिए त्याग किया हो उसको लाभ न मिले। किसी बच्चे को इसलिए छात्रावास में डालना क्योंकि वह हमसे संभलता नहीं है अपने दायित्व से मुँह फेरना है। बच्चे संसार के सबसे असहाय प्राणी होते हैं। उनपर अन्याय करना सबसे निकृष्ट काम है। ईशान की असहाय अवस्था देखकर मन तड़प उठता है।
हमारा समाज सही अर्थों में समाज नहीं है जंगल राज्य है। जो इस व्यवस्था में फिट बैठ जाए वह सामान्य जीवन जी सकता है, जो उसपर विजय पा ले वह विजयी हो जाता है। जो जरा सा भी सामान्य से इधर उधर हुआ समाज उसे लील जाता है। ईशान भी हमारी इस व्यवस्था की वेदी पर बलि चढ़ ही जाने वाला था। इससे तो पहले का जमाना या गाँव ही बेहतर हैं जहाँ बच्चा यदि विद्यालय में असफल रहता है तो कोई अन्य काम कर अपनी आजीविका चला लेता है। किन्तु शहरों में तो हम हर बच्चे से विद्यालय में सफल होने की अपेक्षा रखते हैं और उसके सिवाय भी जीवन में कुछ है न तो सोच पाते हैं न ही बच्चे को कोई विकल्प ही दे पाते हैं।
हम स्कूलों में भेड़ बकरियों की तरह बच्चे भर देते हैं और उनसे आशा करते हैं कि वे चाहे जिस भी नाप या आकार के हों हमारे बनाए खानों में फिट बैठ जाएँ। यदि आपने कभी आलू भी उगाएँ हों तो जानेंगे कि सब आलू एक ही नाप व आकार के नहीं होते। फिर क्या आप बच्चे को काट छाँट कर अपने बनाए खानों में फिट करेंगे? कुछ बड़े स्कूलों ने इस बात को ध्यान में रखकर बच्चों की ग्राह्य क्षमता के अनुसार उन्हें विभिन्न वर्गों में रखने का प्रयास किया। यह सफल भी हो सकता है। यदि इसमें भी स्कूल व माता पिता का दम्भ आड़े न आए। यदि धीरे सीखने वाले बच्चों को हेय दृष्टि से न देखा जाए, यदि धीमे बच्चों का पाठ्यक्रम कम कर दिया जाए और उन्हें पढ़ने को अधिक समय दिया जाए तो वे भी काफी कुछ सीख सकते हैं। सभी बच्चों से समान समय में समान पाठ्यक्रम घोटने की अपेक्षा न केवल धीमे बच्चों के साथ अन्याय है अपितु तेज बच्चों की पढ़ाई के प्रति अरुचि पैदा करने की भी उत्तरदायी है। कितने ही कुशाग्र बुद्धि बच्चे इस धीमी गति की पढ़ाई से उकता जाते हैं व नई नई शैतानियाँ कर अपना मन बहलाते हैं।
सभी बच्चों को एक ही स्कूल में पढ़ने का समान अवसर देना नैतिक तो हो सकता है परन्तु व्यवहारिक नहीं। जब कक्षा में पचास से अधिक छात्र हों और एक अध्यापक के पास उन्हें देने को कुल ४५ मिनट हों तो क्या अलग अलग योग्यता या कमी वाले हर छात्र को देने को अध्यापक के पास समय हो सकता है ? वह भी तब जब अध्यापक सबसे अधिक योग्यता के आधार पर बनाए या चुने नहीं जाते अपितु मजबूरी या बहुत से अन्य कारणों के कारण बनते व चुने जाते हैं।
सोचिए कैसा होता यदि आपका बच्चा बस में लदकर स्कूल जाने की बजाए अपने ही क्षेत्र के एक स्कूल में पैदल या साइकिल चलाकर जाता। जहाँ दो चार अध्यापक केवल कमजोर या विशेष छात्रों की सहायता के लिए ही होते। जहाँ उसे दाखिले के लिए कोई साक्षात्कार न देना होता। बच्चा है तो स्कूल में उसके लिए जगह भी होती। यदि माता पिता दोनों कामकाजी हैं तो एक विशेष शुल्क देने पर जहाँ वह उनके आने तक आराम से खेलता, आराम करता, खाना खाता, पढ़ाई करता या पुस्तकालय में पुस्तकें पढ़ता या टी वी देखता।
क्या यह असंभव लगता है ? यदि सोचा जाए तो इतना असंभव भी नहीं है। ये सरकारी स्कूल किसलिए बनाए गए हैं ? अन्य देशों में कैसे बच्चे इन्हीं में पढ़कर सफल हो रहे हैं ? इन्हें सुधारकर ऐसा क्यों नहीं बनाया जाता ? क्यों नहीं इनकी नए सिरे से रचना की जा सकती ? एक नई अध्यापन सेवा की घोषणा क्यों नहीं की जाती ? प्रशासनिक सेवा की सी तर्ज पर। जहाँ अच्छा वेतन व सम्मान मिलेगा किन्तु आठ घंटे के कड़े श्रम व दायित्व के बाद। शायद इस सेवा को निजी कम्पनियों के हाथ में भी थमाया जा सकता है। यदि स्कूल ढंग से न चलें तो किसी अन्य को दिया जा सकता है। इस तरह इनमें स्पर्धा भी होगी। संसार में अपनी सफल निजी कम्पनियाँ स्थापित कर नाम कमा चुके लोग अवकाशप्राप्ति के बाद जीवन को अर्थ व दिशा देने के रास्ते खोज रहे हैं। ऐसे व बहुत से अन्य सफल व अवकाशप्राप्त लोग शायद यह चुनौती स्वीकार कर सकते हैं। ये व कुछ जाने माने शिक्षाविद यह प्रयोग कर सकते हैं व सफल होने पर इसी मॉडेल पर स्कूल चलाए जा सकते हैं।
जो भी हो हमारे अज्ञान व आलस के कारण हमारे बच्चों को कष्ट हो और वे अन्याय सहें यह गलत है। सारा संसार रुक सकता है, सही नीतियाँ बनने की प्रतीक्षा कर सकता है किन्तु बच्चे प्रतीक्षा नहीं कर सकते। उनके लिए जो करना है आज ही होना चाहिए। कल बहुत देर हो चुकी होगी।
घुघूती बासूती
Friday, May 15, 2009
बच्ची को भूल गए ! (इतना क्यों कुढ़ती हूँ ? भाग २)
कुछ वर्ष पहले की बात है। हमारी बस्ती में किसी की बिटिया के जुड़वा बच्चे हुए, एक लड़की और एक लड़का। दो बच्चों को वह अकेली पाल नहीं सकती थी। सो कौन सा बच्चा नानी के पास रहा होगा यह अनुमान कोई भी भारतीय लगा सकता है। अधिकतर लोग कहेंगे कि एक को तो नानी के पास रहना ही था तो यदि लड़की को रखा गया तो क्या गलत हुआ। मैं केवल इस निर्णय के आधार को जानना चाहती हूँ। क्या यह निर्णय बच्चों के जन्म के समय के भार को देखकर किया गया कि कौन बच्चा कमजोर है और किसे माँ के दूध से वंचित रखा जा सकता है ? क्यों सदा ऐसे निर्णय लड़कियों के विरुद्ध जाते हैं ।
खैर जैसा कि होना था लड़की ही नानी के पास रही। वह कुछ महीने की हुई जब गुजरात में भूकंप ( गुजराती में इसका बहुत अच्छा नाम है, धरतीकम्प) आया। सारा परिवार घर से बाहर भागा। कौन घर में छूट गई? वही बच्ची ! बाहर आकर उन्हें ध्यान आया कि वह तो अन्दर ही छूट गई। कोई उसे लेने अन्दर नहीं दौड़ा। मैं अपने कुत्तों को बुलाकर उन्हें साथ लेकर बाहर जा सकती थी। उन्हें छोड़कर बाहर भागने की सोच भी नहीं सकती थी तो वे उस बच्ची को कैसे भूल सके?
बाद में यह किस्सा हँस हँसकर बताया गया। मानती हूँ बताने वाली स्त्री ही थी। इसीलिए तो दुख भी अधिक हुआ और फिर वही कंडिशनिंग की बात आ जाती है। जन्म से ही (आजकल तो कोख में ही) हमें यह पता रहता है कि पुरुष जान का मूल्य अधिक है। हम इसे एक ऐसा यथार्थ मान लेते हैं कि प्रश्न ही नहीं करते। खैर, मानना होगा कि स्त्री की जान बहुत जीवट वाली होती है अन्यथा अबतक तो उसे विलुप्त हो ही जाना चाहिए था।
घुघूती बासूती
भाग १ स्त्री का मूल निवास बदल गया।
खैर जैसा कि होना था लड़की ही नानी के पास रही। वह कुछ महीने की हुई जब गुजरात में भूकंप ( गुजराती में इसका बहुत अच्छा नाम है, धरतीकम्प) आया। सारा परिवार घर से बाहर भागा। कौन घर में छूट गई? वही बच्ची ! बाहर आकर उन्हें ध्यान आया कि वह तो अन्दर ही छूट गई। कोई उसे लेने अन्दर नहीं दौड़ा। मैं अपने कुत्तों को बुलाकर उन्हें साथ लेकर बाहर जा सकती थी। उन्हें छोड़कर बाहर भागने की सोच भी नहीं सकती थी तो वे उस बच्ची को कैसे भूल सके?
बाद में यह किस्सा हँस हँसकर बताया गया। मानती हूँ बताने वाली स्त्री ही थी। इसीलिए तो दुख भी अधिक हुआ और फिर वही कंडिशनिंग की बात आ जाती है। जन्म से ही (आजकल तो कोख में ही) हमें यह पता रहता है कि पुरुष जान का मूल्य अधिक है। हम इसे एक ऐसा यथार्थ मान लेते हैं कि प्रश्न ही नहीं करते। खैर, मानना होगा कि स्त्री की जान बहुत जीवट वाली होती है अन्यथा अबतक तो उसे विलुप्त हो ही जाना चाहिए था।
घुघूती बासूती
भाग १ स्त्री का मूल निवास बदल गया।
Thursday, May 14, 2009
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी के प्रश्न और उत्तर देने का मेरा प्रयास
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी के प्रश्नों के उत्तर तो मैं बहुत पहले ही दे चुकी हूँ। आज फिर प्रस्तुत कर रही हूँ। वैसे हो सकता है कि सभी प्रश्नों के उत्तर उन्हें न मिलें या संतुष्ट न कर पाएँ।
यह भी मानती हूँ कि जितने प्रश्न मैं करती हूँ उन सबके उत्तर मेरे पास नहीं हैं, तभी तो प्रश्न करती हूँ। कुछ ऐसे भी विषय उठाए जाते हैं जिनके उत्तर मिलने में समय लगेगा किन्तु यदि यथास्थिति को स्वीकार कर लिया जाएगा तो बेहतर की खोज कैसे होगी ?
पुरुष को कोसने की जहाँ तक बात है तो अधिकतर पितृसत्ता को कोसा जाता है न कि पुरुष को। सोचने की बात यह है कि पुरुष भी पितृसत्ता के कारण कुछ हानियाँ भी झेल रहा है, जैसे...
१ पितृसत्ता के चलते स्त्रियों का उतना समुचित विकास नहीं हो पाता जितना अन्यथा होता। उसे भी ऐसी ही पत्नी, सहयोगी, सहेली मिलती है जो अपनी क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठा पाईं।
२ स्त्री भ्रूण हत्या के चलते उसके लिए जीवन संगिनी पाना भी कठिन होता जा रहा है।
३ सदियों से होते आए अन्याय के कारण उस पुरुष को भी शक की नजर से देखा जाता है, जो समता में विश्वास करता हो।
४ अन्यायी समाज कभी भी उतना सुखद नहीं हो सकता जितना न्यायपूर्ण समाज हो सकता है। न ही ऐसा समाज उतना आर्थिक व सामाजिक विकास कर सकता है। जिस समाज में आधी आबादी दबाई व कुचली हुई हो वह कैसे पूर्ण विकसित हो सकता है ? उसी समाज में स्त्री के साथ पुरुष को भी रहना पड़ता है।
ऐसी ही और भी बहुत सी हानियाँ गिनवाई जा सकती हैं।
जिस दिन पुरुष यह समझ लेगा कि एक बेहतर व समता में विश्वास करने वाला समाज उसके लिए भी लाभदायक होगा तो वह भी पितृसत्ता के विरुद्ध आवाज उठाएगा।
उन्होंने अन्त में पूछा है......
इस बात पर सवाल कि यदि आपके घर के लड़के की शादी जिस लड़की से होने वाली है और मालूम हो जाये कि उसके साथ बलात्कार हुआ था तो क्या उसको घर की बहू बना लिया जायेगा? (यह सवाल विशेष रूप से उन महिलाओं से जो नारी सशक्तिकरण के नाम पर झंडा बुलन्द करतीं हैं और पुरुषों को गाली देकर इतिश्री कर लेतीं हैं)
मेरा उत्तरः यदि मेरा बेटा होता तो वह अपनी पसन्द से ही शादी करता। यदि उसकी पसन्द वह लड़की होती जिसका बलात्कार हुआ है तो भी वह उसकी पत्नी बनती। हाँ, शायद बलात्कारी से जितनी शत्रुता उस लड़की को होती उतनी ही मुझे भी हो जाती।
यदि मेरी बेटी बलात्कारी से विवाह करना चाहती तो मैं उसको मनःचिकित्सक से मिलने की सलाह अवश्य देती।
शायद समझ आया हो कि मुझे बलात्कारी विभत्स व अग्रहणीय लगता है न की बलत्कृत।
अन्त के तीनों प्रश्नों के उत्तर उन्हें मेरी इस पुनः पोस्ट किए लेख में मिल जाएँगे। मैं लेख के साथ उसपर आईं टिप्पणियाँ भी यहाँ दे रही हूँ क्योंकि उस लेख पर कुछ बहुमूल्य टिप्पणियाँ आईं थीं। देखिए.........
स्त्रियों के मुद्दे पर : कुछ उत्तर, कुछ और प्रश्न
यह मेरा काफी समय पहले लिखा लेख है । शायद काफी लोगों को स्त्री के स्त्री का शत्रु होने का रहस्य या कहें कारण , यहाँ मिल जाएँगे । ]
हमने व हमारे समाज ने क्या गलतियाँ की हैं और क्या गलतियाँ अभी भी करे जा रहे हैं इसका कुछ कुछ परिणाम तो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है, किन्तु भविष्य इन परिणामों को बहुत विकराल रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करेगा । जब तक यह परिणाम हमारे इस मूल रूप से अन्धे समाज को भी दिखने लगेगें, तब तक बहुत नहीं तो काफी देर हो चुकी होगी । समस्याएँ बहुत हैं व अधिकतर हमारी अपनी बनाई हुई ही हैं ।
इस समय मैं भारतीय समाज में स्त्रियों के स्थान , भ्रान्तियों व उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों कि चर्चा कर रही हूँ । आज तक इन सबसे मुख्य व प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्रियों को हानि होती थी । अतः हमारा समाज , जो कि मुख्य रूप से पुरुषों के लिए ही बना है, जहाँ का धर्म, संस्कृति , कायदे कानून, सब कुछ पुरुषों के हितों को ही ध्यान में रखकर बनाए गए हैं , चैन की नींद सो सकता था व अपने घर का कचरा कालीन के नीचे दबा सकता था । यहाँ यह भी कह दूँ कि केवल भारत या एक धर्म या समाज ही नहीं सब धर्म, संस्कृति, कायदे कानून, पुरुष के हितों को देखकर बने हैं । किन्तु आज हानि व हमला पुरुष के हितों , सुख चैन, सुविधाओं पर है । उसका व उसके समाज का अस्तित्व ही खतरे में है । स्त्रियों का तो खतरे में है ही , किन्तु वह बहुत ही सूक्ष्म बात है, पुरुष व पुरुष के अस्तित्व के सामने । सो हो सकता है, पुरुषों के साथ साथ वे अन्धी स्त्रियाँ भी , जो स्त्री के अस्तित्व, उसके आदर व उसके जीवन के महत्व को नहीं मानती, वे भी जाग जाएँ क्योंकि आखिर उनके लाड़ले बेटों का भविष्य दाँव पर लग गया है ।
हमारा इतिहास गवाह है कि स्त्री पर जब भी , जैसे भी हो सकता था, अत्याचार किया गया । कुछ पुरुषों ने किया, कुछ स्वयं शक्ति चखने के लिए एक स्त्री ने दूसरी पर किया । यह शक्ति परीक्षण वह पुरुष पर तो कर नहीं सकती हैं ,अतः जैसे ही परिवार में उसकी स्थिति कुछ सुदृढ़ होती थी, तो वह परिवार में नई आई सदस्याओं पर कुछ रैगिंग की तर्ज पर यह शक्ति परीक्षण करती हैं । बार बार पुरुष यह कह कर कि स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु है , अपना पल्ला झाड़ लेता है । किन्तु जब आपके बच्चे की रैगिंग में टाँग टूट जाए या जान चली जाए, तो आप महाविद्यालय प्रशासन को यह कह कर कि विद्यार्थी ही विद्यार्थी का सबसे बड़ा शत्रु है बरी तो नहीं कर देते । तो फिर परिवार में हुए अत्याचार से स्वयं को परिवार का मुखिया होने के नाते कैसे बरी कर लेते हो ?
स्त्री को घर से निकाला गया , जलाया गया, मारा गया, मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया । उसे वश में रखने के लिए कभी उसे कुछ लालच दिया गया तो कभी उससे कुछ सुविधाएँ छीन ली गईं । लालच के रूप में सुन्दर रंग बिरंगे वस्त्र , आभूषण , रंगीन सौभाग्य चिन्ह व सब प्रकार का भोजन ग्रहण करने का अधिकार । दंडित करने व लाइन में रखने के लिए यही सब सुवधाएँ उससे छीन ली जाती थीं । उसे बताया जाता था कि ये सब सुख उसे तभी तक प्राप्य हैं जब तक वह अपने जीवन के आधार, अपने स्वामी, अपने पति को जीवित व प्रसन्न रख पाएगी । ये सब निर्जला व्रत उपवास इसी भय की देन हैं । वह पति व अपनी सुविधाओं व बहुत बार अपने जीने के अधिकार को बचाने के लिए भौतिक रूप से जो बन पड़ता था करती थी । किन्तु अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए पति का जीवन कैसे भी बचाना अनिवार्य था । सो भौतिक रूप से सब कुछ करने के बाद वह अन्ध श्रद्धा की शरण लेती थी ।
विश्वास न हो ऐसी स्थिति की कल्पना करिये जहाँ आपका जीवन एक पतली डोर से लटका हुआ हो, जीवित जलाए जाने की तलवार आपके सिर पर लटक रही हो । उदाहरण के लिए यदि आपका जीवन किसी ऐसी शक्ति के हाथ में हो जो बहुत शक्तिशाली, क्रूर , अविवेकी व तर्कविहीन हो, लकीर की फकीर हो , जिस पर किसी न्याय की गुहार का कोई प्रभाव न पड़ता हो । वह शक्ति या व्यक्ति आप से कहे कि जब तक आप के सिर पर बाल हैं आप जीवित रहेंगे और जिस दिन ये बाल झड़े, आपको जीवित चिता के हवाले कर दिया जाएगा । अब आपके लिए ये बाल प्राणों से भी अधिक प्रिय होंगे । आप एक बार खाना भूल जाएँगे किन्तु बालों की साज संवार , सफाई, व स्वास्थ्य के विषय में कभी नहीं भूलेंगे । वे बाल आपकी जान हैं, धर्म हैं , या ये कहें कि वे ही आपका जीवन हैं । अब आप जब सब तरह से उनकी रक्षा करते नहीं थकते और फिर भी देखते हैं कि समय असमय आपके मित्रों , भाइयों, चाचा , ताऊओं के बाल झड़ ही जाते हैं और ऐसा होने पर उन्हें घसीट कर चिता पर रख दिया जाता है । उनकी चीखें आपके कानों के परदों को फाड़कर आपके अन्तर्मन तक को दहला जाती हैं । सोते जागते, खाते पीते ये चीखें आपका साथ नहीं छोड़ती । तब आप आध्यात्म, अलौकिक , दैवीय, अतिमानवीय शक्तियों का भी सहारा लेने लगते हैं । आपने देखा था कि दो मित्रो के बाल तब झड़ गए जब उन्होंने खाली पेट चाय पी थी या दो और के तब जब उन्होंने अपने बालों से तंग आकर उन्हें गाली दी थी । सो अब आप खाली पेट चाय पीना छोड़ देते हैं, बालों को कभी भूले से भी गाली नहीं देते हैं । यदि कोई सुझा दे कि गले में यह हरे मोती का धागा डाल लो तो बाल अधिक समय तक टिकते हैं, सो आप वह भी कर लेते हैं । यदि कहें कि बुधवार को दाढ़ी न बनाने से बाल सुरक्षित रहते हैं तो क्या आप केवल दाढ़ी बनाने के सुख के लिए जीते जी चिता में डाले जाने का खतरा , भय, आशंका मोल लेंगे ? सो अब आप चाहेंगे कि आशीर्वाद में भी यदि कोई आपको बालवान या बालवता कहे तो बेहतर है क्योंकि आपका चिरंजीवी होना तो उनके होने पर निर्भर है । आप प्राण जाएँ पर बाल न जाएँ में पूर्ण विश्वास करेंगे । सो इसको कहते हैं कंडिशनिंग ! अब न केवल आपके चेतन मन को बालों से मोह है अपितु आपका अवचेतन मन भी बालों के प्रति मोहित है । सो अब समाज कहता है कि बालों को इतना प्रेम करना, उनका ध्यान रखना, उन्हें जान से अधिक चाहना आपका स्वभाव है । यही आपके संस्कार हैं, यही आपका धर्म है, यही आपके देश की संस्कृति है । बिल्कुल सही है । जिन बालों के रहते आप पलंग पर सो सकते हैं , भांति भांति के व्यंजन खा सकते हैं, रंग बिरंगे कपड़े पहन सकते हैं , सबसे बड़ी बात कि जी सकते हैं, उन बालों पर आप क्यों न बलिहारी जाएँगे । यह तो है इस जन्म की बात !
घुघूती बासूती
चर्चा चालू है । अभी नया लिखने की स्थिति में नहीं हूँ । शीघ्र ही इस विषय पर और लिखूँगी ।
17 टिप्पणियाँ:
अजित ने कहा…
समर्थ सार्थक लेखन। चर्चा चालू रखिये। अगली पोस्ट की प्रतीक्षा में।
4:54 अपराह्न
Rachna ने कहा…
हे नर , क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
कि नारी को हथियार बना कर
अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
कि नारी शरीर कि
संरचना को बखाने बिना
साहित्यकार नहीं समझे जाते हो तुम
तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालये
बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
वह फैशन वीक मे काम करे
तो नंगी नाच रही है
तुम्हारी तारीफ हो तो
तुम तारीफ के काबिल हो
उसकी तारीफ हो तो
वह "औरत" की तारीफ है
तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
वह वेश्या बने तो बदनाम है
हे नर
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
5:10 अपराह्न
ललित ने कहा…
सर्वप्रथम "या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरी" फिर "गतिस्वं गतिस्वं त्वमेकां भवानि" तक ऋषि, मुनि, देवों, सभी ने नारी की पूजा की है। हिन्दू शास्त्र कहते हैं "यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता", शंकराचार्य ने भी देवी की स्तुति में अनेकानेक काव्य लिखे हैं।
हिन्दू लोग नारी की रक्षा, सम्मान को बचाने के लिए अपनी जान देते आए हैं, देते रहेंगे।
इस्लाम में नारी को कुछ निम्न स्थान दिया गया है। एक पुरुष को चार-चार विवाह की अनुमति होती है। भारत में विदेशी आक्रमणों के बाद विशेषकर मुगल शासनकाल में नारी की ऐसी दयनीय स्थिति शुरू हुई थी। किन्तु अब धीरे धीरे समाज परिवर्तन हो रहा है आशा है शीघ्र ही नर-नारी दोनों बराबर होकर कदम से कदम मिलाकर विश्व को प्रगति पथ पर ले जाएँगे।
आपके लेखों में पुरुष वर्ग के प्रति जितनी निराशा, विरोधाभास और वैचारिक जहरीलापन प्रकट हो रहा है उससे लगता है कि शायद आपको किसी इस्लाम अनुयायी पुरुष से धोखा, दर्द मिला हो। पिता, पुत्र, भाई, पति-प्रेमी का सच्चा स्नेह-प्रेम न मिल पाया हो। निवेदन है कि निष्पक्ष, निरपेक्ष होकर शान्त मन से सोचें...
अनेक पुरुषों ने नारी की वन्दना मे, प्रशंसा में, काव्य से लेकर महाकाव्य तक लिखे हैं। लेकिन महिलाओं द्वारा पुरुष की प्रशंसा में कितने काव्य लिखें हैं? 'देवियाँ' में भी ऐसी कृतघ्नता क्यों?
6:10 अपराह्न
अभय तिवारी ने कहा…
बहुत ज़बरदस्त तरीके से अपनी बात रखी है आपने घुघूती जी..
श्रीमान ललित, आप लेख समझने की कोशिश करें.. लेखक के विषय में अपने अनुचित अनुमान न निकालें.. और उस ऊर्जा का इस्तेमाल स्वयं अपने दिमाग की ग्रंथियों को सुलझाने में करें, वह बेहतर होगा..
आप यहाँ जिस मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं न सिर्फ़ वह साम्प्रदायिक है बल्कि ठीक वही पुरुष-वर्चस्ववादी है जिसका घुघुती जी ने उल्लेख किया है..
आप को अधिकार किसने दिया कि आप किसी स्त्री से इस तरह के सवाल करें? ये निहायत अशिष्टता, मूर्खता और अहंमन्यता है..
क्या किसी "देवी" से बात करने का यही तरीका जानते हैं आप?
7:38 अपराह्न
Rachna ने कहा…
@abhay tiwari
you have said what i wanted to say
so not repeating . Mam is a senior lady and an icon and one has to meet her to understand what she is
8:44 अपराह्न
masijeevi ने कहा…
इस अच्छी खासी चर्चा में हिंदू-मुसलमान के आने की जगह कैसे निकाली गई भई ?
घुघुतीजी फिलहाल ऐसी टिप्पणियों को इग्नोर मारें और जारी रहें।
10:15 अपराह्न
anitakumar ने कहा…
घुघुती जी
आपने बड़े सरल ढगं से उस शक्ति खीचतान को समझाया है जिसकी मैं ने अपने कमेंट में चर्चा की थी। रचना जी ने बहुत सुन्दर कविता के सहारे अपनी बात कही है। ललित जी बेवजह सांप्रदायिक प्रवति दिखा रहे हैं, और देवियों ने पुरुषों की तारिफ़ में अगर लिखना शुरु कर दिया तो क्या समाज उनके चरित्र पर लाछन न लगाएगा। पुरुष स्त्री की तारिफ़ करे तू श्रंगार रस और अगर स्त्री करे तो कुल्टा॥
चर्चा जारी रखिए पलीज
10:55 अपराह्न
Mired Mirage ने कहा…
मसीजीवी जी निश्चिन्त रहिये । मेरे पास हिन्दु मुस्लिम वाली बात के लिये भी उत्तर हैं । यह अच्छा ही है कि लोग ऐसे प्रश्न पूछें । शीघ्र ही उत्तर दूँगी थोड़ा सा स्वास्थ्य के कारण देर हो सकती है ,किन्तु उत्तर अवश्य दूँगी ।
घुघूती बासूती
10:57 अपराह्न
Lavanyam -Antarman ने कहा…
घुघूती जी,
स्त्री का सँघर्ष सदीयोँ को पार करता हुआ आज २१ वीँ सदी के प्रथम चरण तक आ पहुँचा है --
आप ने अपने विचार साफ तरीके से लिखे हैँ ..
आगे भी पढने की उत्सुक्ता बनी रहेगी ..
आशा है आप के स्वास्थ्य मेँ सुधार है
..ध्यान रखियेगा,
स स्नेह,
-- लावण्या
11:58 अपराह्न
Sanjeet Tripathi ने कहा…
आपकी कविताएं जितनी स्पर्शी होती है उतने ही ज्वलंत आपके लेख, चिंतन के लिए मजबूर करने वाले!!
बंधु ललित, इतनी आसानी से किसी के प्रति अनुमान लगा लेने की कला आपने कहां से सीखी। या यूं कहें कि किसी भी प्रसंग मे हिन्दु-मुस्लिम वाला संदर्भ जोड़ने की कला आपने कहां से सीखी बंधु। अगर ऐसी कोई संस्था हो जो यह सब सीखाती हो तो काश वह बंद की जा सके!!
12:04 पूर्वाह्न
रंजू ने कहा…
बहुत ही ज्वलंत सवालो और जवाबो से रचा है आपका यह लेख पर यह वक्त अब बदल रहा है
और बदलेगा ...कुछ कभी इसी तरह का मैंने भी लिखा था
तुम पुरुष हो इसलिए तोड़ सके सारे बंधनो को
मैं चाहा के इस से मुक्त ना हो पाई
रोज़ नापती हूँ अपनी सूनी आँखो से आकाश को
चाहा के भी कभी में मुक्त गगन में उड़ नही पाई
ना जाने कितने सपने देखे,कितने ही रिश्ते निभाए
हक़ीकत की धरती पर बिखर गये वो सब
मैं चाहा के भी उन रिश्तो की जकड़न तोड़ नही पाई
बहुत मुश्किल है अपने इन बंधनो से मुक्त होना
तुम करोगे तो यह साहस कहलायेगा
मैं करूंगी तो नारी शब्द अपमानित हो जाएगा!!
रंजना
9:14 पूर्वाह्न
Ashutosh ने कहा…
बासूती जी,
मेरे ब्लाग पे पधारने का बहुत बहुत धन्यवाद ।
सही कहा आपने । कल चक्र की निरंतरता बनी रहती है । समय घाव तो भर देता है , परंतु दाग के चिन्ह रह ही जाते है ।
पीड़ा हमारा सहज स्वाभाव नही है , जीवन से मिली विषमता एवं कथोराघत से यह ही सीख पाया हू बस । यात्रा जरी है और साथ ही सीखने - समझने का प्रयास भी ।
- आशुतोष
12:01 अपराह्न
Pramod Singh ने कहा…
बहुत सही.. प्रेरणाजोत बनी रहिए..
1:14 अपराह्न
Shastri JC Philip ने कहा…
काफी चिंतनीय विषय. चर्चा को आगे बढाईये -- शास्त्री जे सी फिलिप
मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!
9:26 अपराह्न
रवीन्द्र प्रभात ने कहा…
"यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता",
हमेशा से हीं नारी हमारे समाज में श्रद्धा की दृष्टि से देखी जाती रही है, आपकी प्रस्तुति वेहद -वेहद प्रशंसनीय है. शब्द और बिंब में ग़ज़ब का तालमेल. बहुत -बहुत वधाईयाँ .
1:50 अपराह्न
महावीर ने कहा…
बहुत ही सशक्त लेख है, इस चर्चा को जारी रखिए।
यह सांप्रदायिक चर्चा यहीं रुक जाए तो उचित होगा। व्यर्थ में ही मूल लेख से दूर जा रहे हैं। इस्लामी संस्कृति पर कीचड़ फेंक कर ४ पत्नियों की बात करेंगे, वे लोग द्रौपदी को फिर पांच पतियों के बीच लाकर खड़ा कर देंगे, राजाओं की बहु-विवाह रीत के उदाहरण देकर व्यर्थ का एक नया बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। जिन चिन्तनशील मुद्दों पर चर्चा चल रही है, वह खटाई में पड़ जाएगी।
6:40 अपराह्न
हरिराम ने कहा…
गम्भीर चिन्तन विषयक लेख है आपका! साथ ही इन समस्याओं को सुलझाने हेतु कुछ सुझाव भी दें, तो सबको मार्गदर्शन मिलेगा। ललित जी की टिप्पणी हमें भी अच्छी नहीं लगी। उन्हें सम्माननीय महिलाओं पर व्यक्तिगत अनुमान व प्रश्न नहीं करने चाहिए, भले ही दूसरे पैराग्राफ में ऐतिहासिक कटुसत्य लिखा है। पर सद्भावना और संहति की दृष्टि से यह भड़काऊ हो सकता है। कृपया उक्त टिप्पणी को delete कर दीजिए।
11:43 पूर्वाह्न
अन्त में अपने ही एक अन्य लेख की ये पंक्तियाँ पढ़वाती हूँ.......
मुझे किसी पुरुष से कोई शिकायत नहीं है । केवल एक सुन्दर बराबरी के समाज की कल्पना भर करना चाहती हूँ , जहाँ स्त्रियाँ ना पूजी जाएँ ना दुत्कारी जाएँ । न हमें देवी बनना है न प्रतिमा, केवल व्यक्ति बनकर रहना है । क्या यह बहुत बड़ी माँग है ?
घुघूती बासूती
यह भी मानती हूँ कि जितने प्रश्न मैं करती हूँ उन सबके उत्तर मेरे पास नहीं हैं, तभी तो प्रश्न करती हूँ। कुछ ऐसे भी विषय उठाए जाते हैं जिनके उत्तर मिलने में समय लगेगा किन्तु यदि यथास्थिति को स्वीकार कर लिया जाएगा तो बेहतर की खोज कैसे होगी ?
पुरुष को कोसने की जहाँ तक बात है तो अधिकतर पितृसत्ता को कोसा जाता है न कि पुरुष को। सोचने की बात यह है कि पुरुष भी पितृसत्ता के कारण कुछ हानियाँ भी झेल रहा है, जैसे...
१ पितृसत्ता के चलते स्त्रियों का उतना समुचित विकास नहीं हो पाता जितना अन्यथा होता। उसे भी ऐसी ही पत्नी, सहयोगी, सहेली मिलती है जो अपनी क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठा पाईं।
२ स्त्री भ्रूण हत्या के चलते उसके लिए जीवन संगिनी पाना भी कठिन होता जा रहा है।
३ सदियों से होते आए अन्याय के कारण उस पुरुष को भी शक की नजर से देखा जाता है, जो समता में विश्वास करता हो।
४ अन्यायी समाज कभी भी उतना सुखद नहीं हो सकता जितना न्यायपूर्ण समाज हो सकता है। न ही ऐसा समाज उतना आर्थिक व सामाजिक विकास कर सकता है। जिस समाज में आधी आबादी दबाई व कुचली हुई हो वह कैसे पूर्ण विकसित हो सकता है ? उसी समाज में स्त्री के साथ पुरुष को भी रहना पड़ता है।
ऐसी ही और भी बहुत सी हानियाँ गिनवाई जा सकती हैं।
जिस दिन पुरुष यह समझ लेगा कि एक बेहतर व समता में विश्वास करने वाला समाज उसके लिए भी लाभदायक होगा तो वह भी पितृसत्ता के विरुद्ध आवाज उठाएगा।
उन्होंने अन्त में पूछा है......
इस बात पर सवाल कि यदि आपके घर के लड़के की शादी जिस लड़की से होने वाली है और मालूम हो जाये कि उसके साथ बलात्कार हुआ था तो क्या उसको घर की बहू बना लिया जायेगा? (यह सवाल विशेष रूप से उन महिलाओं से जो नारी सशक्तिकरण के नाम पर झंडा बुलन्द करतीं हैं और पुरुषों को गाली देकर इतिश्री कर लेतीं हैं)
मेरा उत्तरः यदि मेरा बेटा होता तो वह अपनी पसन्द से ही शादी करता। यदि उसकी पसन्द वह लड़की होती जिसका बलात्कार हुआ है तो भी वह उसकी पत्नी बनती। हाँ, शायद बलात्कारी से जितनी शत्रुता उस लड़की को होती उतनी ही मुझे भी हो जाती।
यदि मेरी बेटी बलात्कारी से विवाह करना चाहती तो मैं उसको मनःचिकित्सक से मिलने की सलाह अवश्य देती।
शायद समझ आया हो कि मुझे बलात्कारी विभत्स व अग्रहणीय लगता है न की बलत्कृत।
अन्त के तीनों प्रश्नों के उत्तर उन्हें मेरी इस पुनः पोस्ट किए लेख में मिल जाएँगे। मैं लेख के साथ उसपर आईं टिप्पणियाँ भी यहाँ दे रही हूँ क्योंकि उस लेख पर कुछ बहुमूल्य टिप्पणियाँ आईं थीं। देखिए.........
स्त्रियों के मुद्दे पर : कुछ उत्तर, कुछ और प्रश्न
यह मेरा काफी समय पहले लिखा लेख है । शायद काफी लोगों को स्त्री के स्त्री का शत्रु होने का रहस्य या कहें कारण , यहाँ मिल जाएँगे । ]
हमने व हमारे समाज ने क्या गलतियाँ की हैं और क्या गलतियाँ अभी भी करे जा रहे हैं इसका कुछ कुछ परिणाम तो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है, किन्तु भविष्य इन परिणामों को बहुत विकराल रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करेगा । जब तक यह परिणाम हमारे इस मूल रूप से अन्धे समाज को भी दिखने लगेगें, तब तक बहुत नहीं तो काफी देर हो चुकी होगी । समस्याएँ बहुत हैं व अधिकतर हमारी अपनी बनाई हुई ही हैं ।
इस समय मैं भारतीय समाज में स्त्रियों के स्थान , भ्रान्तियों व उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों कि चर्चा कर रही हूँ । आज तक इन सबसे मुख्य व प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्रियों को हानि होती थी । अतः हमारा समाज , जो कि मुख्य रूप से पुरुषों के लिए ही बना है, जहाँ का धर्म, संस्कृति , कायदे कानून, सब कुछ पुरुषों के हितों को ही ध्यान में रखकर बनाए गए हैं , चैन की नींद सो सकता था व अपने घर का कचरा कालीन के नीचे दबा सकता था । यहाँ यह भी कह दूँ कि केवल भारत या एक धर्म या समाज ही नहीं सब धर्म, संस्कृति, कायदे कानून, पुरुष के हितों को देखकर बने हैं । किन्तु आज हानि व हमला पुरुष के हितों , सुख चैन, सुविधाओं पर है । उसका व उसके समाज का अस्तित्व ही खतरे में है । स्त्रियों का तो खतरे में है ही , किन्तु वह बहुत ही सूक्ष्म बात है, पुरुष व पुरुष के अस्तित्व के सामने । सो हो सकता है, पुरुषों के साथ साथ वे अन्धी स्त्रियाँ भी , जो स्त्री के अस्तित्व, उसके आदर व उसके जीवन के महत्व को नहीं मानती, वे भी जाग जाएँ क्योंकि आखिर उनके लाड़ले बेटों का भविष्य दाँव पर लग गया है ।
हमारा इतिहास गवाह है कि स्त्री पर जब भी , जैसे भी हो सकता था, अत्याचार किया गया । कुछ पुरुषों ने किया, कुछ स्वयं शक्ति चखने के लिए एक स्त्री ने दूसरी पर किया । यह शक्ति परीक्षण वह पुरुष पर तो कर नहीं सकती हैं ,अतः जैसे ही परिवार में उसकी स्थिति कुछ सुदृढ़ होती थी, तो वह परिवार में नई आई सदस्याओं पर कुछ रैगिंग की तर्ज पर यह शक्ति परीक्षण करती हैं । बार बार पुरुष यह कह कर कि स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु है , अपना पल्ला झाड़ लेता है । किन्तु जब आपके बच्चे की रैगिंग में टाँग टूट जाए या जान चली जाए, तो आप महाविद्यालय प्रशासन को यह कह कर कि विद्यार्थी ही विद्यार्थी का सबसे बड़ा शत्रु है बरी तो नहीं कर देते । तो फिर परिवार में हुए अत्याचार से स्वयं को परिवार का मुखिया होने के नाते कैसे बरी कर लेते हो ?
स्त्री को घर से निकाला गया , जलाया गया, मारा गया, मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया । उसे वश में रखने के लिए कभी उसे कुछ लालच दिया गया तो कभी उससे कुछ सुविधाएँ छीन ली गईं । लालच के रूप में सुन्दर रंग बिरंगे वस्त्र , आभूषण , रंगीन सौभाग्य चिन्ह व सब प्रकार का भोजन ग्रहण करने का अधिकार । दंडित करने व लाइन में रखने के लिए यही सब सुवधाएँ उससे छीन ली जाती थीं । उसे बताया जाता था कि ये सब सुख उसे तभी तक प्राप्य हैं जब तक वह अपने जीवन के आधार, अपने स्वामी, अपने पति को जीवित व प्रसन्न रख पाएगी । ये सब निर्जला व्रत उपवास इसी भय की देन हैं । वह पति व अपनी सुविधाओं व बहुत बार अपने जीने के अधिकार को बचाने के लिए भौतिक रूप से जो बन पड़ता था करती थी । किन्तु अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए पति का जीवन कैसे भी बचाना अनिवार्य था । सो भौतिक रूप से सब कुछ करने के बाद वह अन्ध श्रद्धा की शरण लेती थी ।
विश्वास न हो ऐसी स्थिति की कल्पना करिये जहाँ आपका जीवन एक पतली डोर से लटका हुआ हो, जीवित जलाए जाने की तलवार आपके सिर पर लटक रही हो । उदाहरण के लिए यदि आपका जीवन किसी ऐसी शक्ति के हाथ में हो जो बहुत शक्तिशाली, क्रूर , अविवेकी व तर्कविहीन हो, लकीर की फकीर हो , जिस पर किसी न्याय की गुहार का कोई प्रभाव न पड़ता हो । वह शक्ति या व्यक्ति आप से कहे कि जब तक आप के सिर पर बाल हैं आप जीवित रहेंगे और जिस दिन ये बाल झड़े, आपको जीवित चिता के हवाले कर दिया जाएगा । अब आपके लिए ये बाल प्राणों से भी अधिक प्रिय होंगे । आप एक बार खाना भूल जाएँगे किन्तु बालों की साज संवार , सफाई, व स्वास्थ्य के विषय में कभी नहीं भूलेंगे । वे बाल आपकी जान हैं, धर्म हैं , या ये कहें कि वे ही आपका जीवन हैं । अब आप जब सब तरह से उनकी रक्षा करते नहीं थकते और फिर भी देखते हैं कि समय असमय आपके मित्रों , भाइयों, चाचा , ताऊओं के बाल झड़ ही जाते हैं और ऐसा होने पर उन्हें घसीट कर चिता पर रख दिया जाता है । उनकी चीखें आपके कानों के परदों को फाड़कर आपके अन्तर्मन तक को दहला जाती हैं । सोते जागते, खाते पीते ये चीखें आपका साथ नहीं छोड़ती । तब आप आध्यात्म, अलौकिक , दैवीय, अतिमानवीय शक्तियों का भी सहारा लेने लगते हैं । आपने देखा था कि दो मित्रो के बाल तब झड़ गए जब उन्होंने खाली पेट चाय पी थी या दो और के तब जब उन्होंने अपने बालों से तंग आकर उन्हें गाली दी थी । सो अब आप खाली पेट चाय पीना छोड़ देते हैं, बालों को कभी भूले से भी गाली नहीं देते हैं । यदि कोई सुझा दे कि गले में यह हरे मोती का धागा डाल लो तो बाल अधिक समय तक टिकते हैं, सो आप वह भी कर लेते हैं । यदि कहें कि बुधवार को दाढ़ी न बनाने से बाल सुरक्षित रहते हैं तो क्या आप केवल दाढ़ी बनाने के सुख के लिए जीते जी चिता में डाले जाने का खतरा , भय, आशंका मोल लेंगे ? सो अब आप चाहेंगे कि आशीर्वाद में भी यदि कोई आपको बालवान या बालवता कहे तो बेहतर है क्योंकि आपका चिरंजीवी होना तो उनके होने पर निर्भर है । आप प्राण जाएँ पर बाल न जाएँ में पूर्ण विश्वास करेंगे । सो इसको कहते हैं कंडिशनिंग ! अब न केवल आपके चेतन मन को बालों से मोह है अपितु आपका अवचेतन मन भी बालों के प्रति मोहित है । सो अब समाज कहता है कि बालों को इतना प्रेम करना, उनका ध्यान रखना, उन्हें जान से अधिक चाहना आपका स्वभाव है । यही आपके संस्कार हैं, यही आपका धर्म है, यही आपके देश की संस्कृति है । बिल्कुल सही है । जिन बालों के रहते आप पलंग पर सो सकते हैं , भांति भांति के व्यंजन खा सकते हैं, रंग बिरंगे कपड़े पहन सकते हैं , सबसे बड़ी बात कि जी सकते हैं, उन बालों पर आप क्यों न बलिहारी जाएँगे । यह तो है इस जन्म की बात !
घुघूती बासूती
चर्चा चालू है । अभी नया लिखने की स्थिति में नहीं हूँ । शीघ्र ही इस विषय पर और लिखूँगी ।
17 टिप्पणियाँ:
अजित ने कहा…
समर्थ सार्थक लेखन। चर्चा चालू रखिये। अगली पोस्ट की प्रतीक्षा में।
4:54 अपराह्न
Rachna ने कहा…
हे नर , क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
कि नारी को हथियार बना कर
अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
कि नारी शरीर कि
संरचना को बखाने बिना
साहित्यकार नहीं समझे जाते हो तुम
तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालये
बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
वह फैशन वीक मे काम करे
तो नंगी नाच रही है
तुम्हारी तारीफ हो तो
तुम तारीफ के काबिल हो
उसकी तारीफ हो तो
वह "औरत" की तारीफ है
तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
वह वेश्या बने तो बदनाम है
हे नर
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
5:10 अपराह्न
ललित ने कहा…
सर्वप्रथम "या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरी" फिर "गतिस्वं गतिस्वं त्वमेकां भवानि" तक ऋषि, मुनि, देवों, सभी ने नारी की पूजा की है। हिन्दू शास्त्र कहते हैं "यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता", शंकराचार्य ने भी देवी की स्तुति में अनेकानेक काव्य लिखे हैं।
हिन्दू लोग नारी की रक्षा, सम्मान को बचाने के लिए अपनी जान देते आए हैं, देते रहेंगे।
इस्लाम में नारी को कुछ निम्न स्थान दिया गया है। एक पुरुष को चार-चार विवाह की अनुमति होती है। भारत में विदेशी आक्रमणों के बाद विशेषकर मुगल शासनकाल में नारी की ऐसी दयनीय स्थिति शुरू हुई थी। किन्तु अब धीरे धीरे समाज परिवर्तन हो रहा है आशा है शीघ्र ही नर-नारी दोनों बराबर होकर कदम से कदम मिलाकर विश्व को प्रगति पथ पर ले जाएँगे।
आपके लेखों में पुरुष वर्ग के प्रति जितनी निराशा, विरोधाभास और वैचारिक जहरीलापन प्रकट हो रहा है उससे लगता है कि शायद आपको किसी इस्लाम अनुयायी पुरुष से धोखा, दर्द मिला हो। पिता, पुत्र, भाई, पति-प्रेमी का सच्चा स्नेह-प्रेम न मिल पाया हो। निवेदन है कि निष्पक्ष, निरपेक्ष होकर शान्त मन से सोचें...
अनेक पुरुषों ने नारी की वन्दना मे, प्रशंसा में, काव्य से लेकर महाकाव्य तक लिखे हैं। लेकिन महिलाओं द्वारा पुरुष की प्रशंसा में कितने काव्य लिखें हैं? 'देवियाँ' में भी ऐसी कृतघ्नता क्यों?
6:10 अपराह्न
अभय तिवारी ने कहा…
बहुत ज़बरदस्त तरीके से अपनी बात रखी है आपने घुघूती जी..
श्रीमान ललित, आप लेख समझने की कोशिश करें.. लेखक के विषय में अपने अनुचित अनुमान न निकालें.. और उस ऊर्जा का इस्तेमाल स्वयं अपने दिमाग की ग्रंथियों को सुलझाने में करें, वह बेहतर होगा..
आप यहाँ जिस मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं न सिर्फ़ वह साम्प्रदायिक है बल्कि ठीक वही पुरुष-वर्चस्ववादी है जिसका घुघुती जी ने उल्लेख किया है..
आप को अधिकार किसने दिया कि आप किसी स्त्री से इस तरह के सवाल करें? ये निहायत अशिष्टता, मूर्खता और अहंमन्यता है..
क्या किसी "देवी" से बात करने का यही तरीका जानते हैं आप?
7:38 अपराह्न
Rachna ने कहा…
@abhay tiwari
you have said what i wanted to say
so not repeating . Mam is a senior lady and an icon and one has to meet her to understand what she is
8:44 अपराह्न
masijeevi ने कहा…
इस अच्छी खासी चर्चा में हिंदू-मुसलमान के आने की जगह कैसे निकाली गई भई ?
घुघुतीजी फिलहाल ऐसी टिप्पणियों को इग्नोर मारें और जारी रहें।
10:15 अपराह्न
anitakumar ने कहा…
घुघुती जी
आपने बड़े सरल ढगं से उस शक्ति खीचतान को समझाया है जिसकी मैं ने अपने कमेंट में चर्चा की थी। रचना जी ने बहुत सुन्दर कविता के सहारे अपनी बात कही है। ललित जी बेवजह सांप्रदायिक प्रवति दिखा रहे हैं, और देवियों ने पुरुषों की तारिफ़ में अगर लिखना शुरु कर दिया तो क्या समाज उनके चरित्र पर लाछन न लगाएगा। पुरुष स्त्री की तारिफ़ करे तू श्रंगार रस और अगर स्त्री करे तो कुल्टा॥
चर्चा जारी रखिए पलीज
10:55 अपराह्न
Mired Mirage ने कहा…
मसीजीवी जी निश्चिन्त रहिये । मेरे पास हिन्दु मुस्लिम वाली बात के लिये भी उत्तर हैं । यह अच्छा ही है कि लोग ऐसे प्रश्न पूछें । शीघ्र ही उत्तर दूँगी थोड़ा सा स्वास्थ्य के कारण देर हो सकती है ,किन्तु उत्तर अवश्य दूँगी ।
घुघूती बासूती
10:57 अपराह्न
Lavanyam -Antarman ने कहा…
घुघूती जी,
स्त्री का सँघर्ष सदीयोँ को पार करता हुआ आज २१ वीँ सदी के प्रथम चरण तक आ पहुँचा है --
आप ने अपने विचार साफ तरीके से लिखे हैँ ..
आगे भी पढने की उत्सुक्ता बनी रहेगी ..
आशा है आप के स्वास्थ्य मेँ सुधार है
..ध्यान रखियेगा,
स स्नेह,
-- लावण्या
11:58 अपराह्न
Sanjeet Tripathi ने कहा…
आपकी कविताएं जितनी स्पर्शी होती है उतने ही ज्वलंत आपके लेख, चिंतन के लिए मजबूर करने वाले!!
बंधु ललित, इतनी आसानी से किसी के प्रति अनुमान लगा लेने की कला आपने कहां से सीखी। या यूं कहें कि किसी भी प्रसंग मे हिन्दु-मुस्लिम वाला संदर्भ जोड़ने की कला आपने कहां से सीखी बंधु। अगर ऐसी कोई संस्था हो जो यह सब सीखाती हो तो काश वह बंद की जा सके!!
12:04 पूर्वाह्न
रंजू ने कहा…
बहुत ही ज्वलंत सवालो और जवाबो से रचा है आपका यह लेख पर यह वक्त अब बदल रहा है
और बदलेगा ...कुछ कभी इसी तरह का मैंने भी लिखा था
तुम पुरुष हो इसलिए तोड़ सके सारे बंधनो को
मैं चाहा के इस से मुक्त ना हो पाई
रोज़ नापती हूँ अपनी सूनी आँखो से आकाश को
चाहा के भी कभी में मुक्त गगन में उड़ नही पाई
ना जाने कितने सपने देखे,कितने ही रिश्ते निभाए
हक़ीकत की धरती पर बिखर गये वो सब
मैं चाहा के भी उन रिश्तो की जकड़न तोड़ नही पाई
बहुत मुश्किल है अपने इन बंधनो से मुक्त होना
तुम करोगे तो यह साहस कहलायेगा
मैं करूंगी तो नारी शब्द अपमानित हो जाएगा!!
रंजना
9:14 पूर्वाह्न
Ashutosh ने कहा…
बासूती जी,
मेरे ब्लाग पे पधारने का बहुत बहुत धन्यवाद ।
सही कहा आपने । कल चक्र की निरंतरता बनी रहती है । समय घाव तो भर देता है , परंतु दाग के चिन्ह रह ही जाते है ।
पीड़ा हमारा सहज स्वाभाव नही है , जीवन से मिली विषमता एवं कथोराघत से यह ही सीख पाया हू बस । यात्रा जरी है और साथ ही सीखने - समझने का प्रयास भी ।
- आशुतोष
12:01 अपराह्न
Pramod Singh ने कहा…
बहुत सही.. प्रेरणाजोत बनी रहिए..
1:14 अपराह्न
Shastri JC Philip ने कहा…
काफी चिंतनीय विषय. चर्चा को आगे बढाईये -- शास्त्री जे सी फिलिप
मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!
9:26 अपराह्न
रवीन्द्र प्रभात ने कहा…
"यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता",
हमेशा से हीं नारी हमारे समाज में श्रद्धा की दृष्टि से देखी जाती रही है, आपकी प्रस्तुति वेहद -वेहद प्रशंसनीय है. शब्द और बिंब में ग़ज़ब का तालमेल. बहुत -बहुत वधाईयाँ .
1:50 अपराह्न
महावीर ने कहा…
बहुत ही सशक्त लेख है, इस चर्चा को जारी रखिए।
यह सांप्रदायिक चर्चा यहीं रुक जाए तो उचित होगा। व्यर्थ में ही मूल लेख से दूर जा रहे हैं। इस्लामी संस्कृति पर कीचड़ फेंक कर ४ पत्नियों की बात करेंगे, वे लोग द्रौपदी को फिर पांच पतियों के बीच लाकर खड़ा कर देंगे, राजाओं की बहु-विवाह रीत के उदाहरण देकर व्यर्थ का एक नया बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। जिन चिन्तनशील मुद्दों पर चर्चा चल रही है, वह खटाई में पड़ जाएगी।
6:40 अपराह्न
हरिराम ने कहा…
गम्भीर चिन्तन विषयक लेख है आपका! साथ ही इन समस्याओं को सुलझाने हेतु कुछ सुझाव भी दें, तो सबको मार्गदर्शन मिलेगा। ललित जी की टिप्पणी हमें भी अच्छी नहीं लगी। उन्हें सम्माननीय महिलाओं पर व्यक्तिगत अनुमान व प्रश्न नहीं करने चाहिए, भले ही दूसरे पैराग्राफ में ऐतिहासिक कटुसत्य लिखा है। पर सद्भावना और संहति की दृष्टि से यह भड़काऊ हो सकता है। कृपया उक्त टिप्पणी को delete कर दीजिए।
11:43 पूर्वाह्न
अन्त में अपने ही एक अन्य लेख की ये पंक्तियाँ पढ़वाती हूँ.......
मुझे किसी पुरुष से कोई शिकायत नहीं है । केवल एक सुन्दर बराबरी के समाज की कल्पना भर करना चाहती हूँ , जहाँ स्त्रियाँ ना पूजी जाएँ ना दुत्कारी जाएँ । न हमें देवी बनना है न प्रतिमा, केवल व्यक्ति बनकर रहना है । क्या यह बहुत बड़ी माँग है ?
घुघूती बासूती
Tuesday, May 12, 2009
इतना क्यों कुढ़ती हूँ ?
माँ पूछती हैं कि इतना क्यों कुढ़ती हूँ स्त्री मुद्दों पर !
हाँ, मैं कुढ़ती हूँ। गलत होता देखती हूँ तो उसे अपना भाग्य मान स्वीकार नहीं करना चाहती। बहुत कुछ स्वीकार किया है स्त्री ने, अब और नहीं। गलत को गलत ही मानना होगा, चाहे गलत करने वाला स्त्री हो या पुरुष। अधिक नहीं कर सकते तो गलत को गलत तो कह ही सकते हैं हम सब। जब हम गलत को गलत कहना शुरू करेंगे तब ही शायद किसी दिन गलत होना रुक पाएगा। जानती हूँ कि मैं नारे नहीं लगाऊँगी, जुलूस नहीं निकालूँगी किन्तु अपने आस पास होते गलत पर 'ये तो होता ही है,' या 'हाँ हमारे समाज की यही रीति है' कहकर उसपर सही की मुहर तो नहीं लगाऊँगी।
भाग १
स्त्री का मूल निवास बदल गया।
बहुत वर्ष पहले पढ़ी थी यह समस्या। एक स्त्री नौकरी करती थी। उसे उसके संस्थान की तरफ से वर्ष में एक बार छुट्टियों के लिए यात्रा भत्ता मिलता था। उसके माता पिता रहते थे गोआ में और वह नौकरी करती थी उत्तर भारत में अपनी ससुराल से २० कि मी दूर। संस्थान का नियम था कि यात्रा भत्ता केवल स्थाई आवास(जहाँ के मूल निवासी हो) तक जाने के लिए दिया जाएगा। उनके अनुसार उसका घर विवाह के बाद उसका ससुराल था न कि मायका अतः केवल २० कि मी का दिया जाएगा न कि गोआ तक का।
इसे कौन न्याय कहेगा ? क्या विवाह के बाद गोआ उसका मूल निवास नहीं रहा? क्या उससे उसकी संस्कृति भी जबर्दस्ती छीन ली जाएगी ? उसके मन प्राण में बसा समुद्र, समुद्र तट व गोआ और वहाँ की भाषा व संस्कृति क्या अब उसकी नहीं रह गईं ?
मुझे भी प्रायः यह कहा जाता है कि अब तुम कुँमाऊनी नहीं हो, पति के प्रदेश व जाति की हो। यदि ऐसा होता तो क्यों कुँमाऊ शब्द सुन मेरा मन चहक उठता है? क्यों आज भी वहाँ की सुगन्ध मेरे नथुनों में भरी पड़ी है? जिस दिन मेरे अन्दर के कुँमाऊ को निकाल सको उस दिन मुझे बताना कि मैं कहाँ की हूँ।
अब तो खैर शायद यात्रा भत्ता नियम बदल गए हैं किन्तु यह नियम बनाने वाले ने क्या सोचकर बनाया होगा ? यह नियम हमारे समाज की मानसिकता दर्शाता है।
घुघूती बासूती
हाँ, मैं कुढ़ती हूँ। गलत होता देखती हूँ तो उसे अपना भाग्य मान स्वीकार नहीं करना चाहती। बहुत कुछ स्वीकार किया है स्त्री ने, अब और नहीं। गलत को गलत ही मानना होगा, चाहे गलत करने वाला स्त्री हो या पुरुष। अधिक नहीं कर सकते तो गलत को गलत तो कह ही सकते हैं हम सब। जब हम गलत को गलत कहना शुरू करेंगे तब ही शायद किसी दिन गलत होना रुक पाएगा। जानती हूँ कि मैं नारे नहीं लगाऊँगी, जुलूस नहीं निकालूँगी किन्तु अपने आस पास होते गलत पर 'ये तो होता ही है,' या 'हाँ हमारे समाज की यही रीति है' कहकर उसपर सही की मुहर तो नहीं लगाऊँगी।
भाग १
स्त्री का मूल निवास बदल गया।
बहुत वर्ष पहले पढ़ी थी यह समस्या। एक स्त्री नौकरी करती थी। उसे उसके संस्थान की तरफ से वर्ष में एक बार छुट्टियों के लिए यात्रा भत्ता मिलता था। उसके माता पिता रहते थे गोआ में और वह नौकरी करती थी उत्तर भारत में अपनी ससुराल से २० कि मी दूर। संस्थान का नियम था कि यात्रा भत्ता केवल स्थाई आवास(जहाँ के मूल निवासी हो) तक जाने के लिए दिया जाएगा। उनके अनुसार उसका घर विवाह के बाद उसका ससुराल था न कि मायका अतः केवल २० कि मी का दिया जाएगा न कि गोआ तक का।
इसे कौन न्याय कहेगा ? क्या विवाह के बाद गोआ उसका मूल निवास नहीं रहा? क्या उससे उसकी संस्कृति भी जबर्दस्ती छीन ली जाएगी ? उसके मन प्राण में बसा समुद्र, समुद्र तट व गोआ और वहाँ की भाषा व संस्कृति क्या अब उसकी नहीं रह गईं ?
मुझे भी प्रायः यह कहा जाता है कि अब तुम कुँमाऊनी नहीं हो, पति के प्रदेश व जाति की हो। यदि ऐसा होता तो क्यों कुँमाऊ शब्द सुन मेरा मन चहक उठता है? क्यों आज भी वहाँ की सुगन्ध मेरे नथुनों में भरी पड़ी है? जिस दिन मेरे अन्दर के कुँमाऊ को निकाल सको उस दिन मुझे बताना कि मैं कहाँ की हूँ।
अब तो खैर शायद यात्रा भत्ता नियम बदल गए हैं किन्तु यह नियम बनाने वाले ने क्या सोचकर बनाया होगा ? यह नियम हमारे समाज की मानसिकता दर्शाता है।
घुघूती बासूती
Saturday, May 09, 2009
बेटा पिता का गुरु ! बेटियाँ माँ की !
आज सुबह जब यह समाचार पढ़ा कि एक पिता व पुत्र दोनों दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं और पिता को पुत्र ही घर पर पढ़ाया करता था तो मेरे चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी। पिता आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ चुका था व सिंचाई विभाग में काम करता है। पुत्र स्कूल जाता है और घर लौटकर पिता को पढ़ाता है व स्वयं भी पढ़ता है। पिता को आशा है कि दसवीं पास करने से उसकी पदोन्नति हो जाएगी।
मुझे सदा यह लगता है कि मेरे विचार व सोचने का तरीका मेरी बेटियों से बहुत प्रभावित है। जब मैं उस समय के बारे में सोचती हूँ जब वे इस संसार में नहीं आईं थीं और तब की मैं के बारे में सोचती हूँ तो पाती हूँ कि तब की मैं आज जैसी नहीं थी। कुछ कुछ तो थी परन्तु कोयले सी कार्बन थी। आज जितनी थोड़ी बहुत चमक मुझमें आई है वह उन्हीं के कारण है। उन्होंने अपनी तरफ से मुझे हीरा वाले कार्बन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कसर रही तो मेरे अपने प्रयासों में व मेरी सोखने की शक्ति में।
शायद ही कोई दिन ऐसा रहा हो जब उनसे मैंने कुछ नया नहीं सीखा। मैं उनके साथ सदा बच्ची ही बनी रही। माँ तो थी मैं उनकी किन्तु उनकी हर मस्ती, हर शैतानी व हर खेल में मैं भाग लेने की कोशिश करती थी। यहाँ तक कि उनके मित्र भी आते थे तो वे भी मुझे अपने खेलों में शामिल कर लेते थे। फिर सदा ही हम तीन व हमारे कुत्ते ही होते थे। पति तो सदा सुबह होते ही जो फोन पर लगते थे तो घर में बिताए अधिकतर समय उसी में लगे रहते थे। शाम को बहुत देर से घर आते थे। मेरी असली साथी तो सदा मेरी बेटियाँ ही रहीं।
जीवन का न जाने कितना दर्शन मैंने उनसे ही सीखा। पहले से पढ़े लेखकों व पुस्तकों को मैंने उनके साथ पढ़कर नई नजर से देखना सीखा। जब भी वे लाइब्रेरी से कोई किताब लातीं, चाहे वह बच्चों की ही क्यों न हो, सदा पढ़ने की मेरी भी बारी होती थी। मैंने फिर से कॉमिक पढ़े, फिर से ऍन रैंड पढ़ी, फिर से बच्ची से किशोरी और किशोरी से युवा हुई। लगता था कि जो बातें पहले केवल मस्तिष्क को छूती थीं तब हृदय को भी छूने लगीं। यदि पहले जीवन में सात रंग थे तो तब सात सौ शेड्स दिखने लगे। हर खुशी, हर वस्तु, हर सोच ने एक नया आकार व रंग ले लिया था। एक बिल्कुल ही नया रूप, आकार व रंग। पहले जो चीजें धुँधली थीं अब वे काफी साफ नजर आने लगी थीं। मैं अपने आप को भी समझने लगी थी। लोगों को , उनके व्यवहार को समझने लगी थी। आश्चर्य होता है कि पहले मैं यह सब क्यों नहीं समझ पाती थी।
कुछ इतने गूढ़ जीवन दर्शन से मेरा परिचय कराया कि मैं कभी कभी आश्चर्यचकित रह जाती हूँ सोचकर कि छोटे बच्चे जिस सत्य को देख पाते हैं हम क्यों नहीं। जैसे यदि हम किसी के लिए कुछ करते हैं तो वास्तव में उसके लिए नहीं अपने लिए, शुद्ध रूप से अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। क्योंकि वैसा करना हमें खुशी देता है और हमारे मन में हमारी जो छवि है उसको और सुदृढ़ करता है। सो किसी अन्य के लिए किया मत सोचो अपने लिए किया सोचकर चलो। अतः वह अब हमें धन्यवाद देगा की कामना न करो। इस सोच ने ही जीवन को कितना सरल कर दिया।
मैं शाकाहारी थी किन्तु पशु प्रेम मैंने उनसे सीखा। मेरे लिए शाकाहारी होना केवल एक तथ्य था। शाकाहारी होने का कारण केवल अपने परिवार की जीवन प्रणाली का हिस्सा था। शायद माँसाहार से घृणा भी उसी का हिस्सा थी। पति का परिवार माँसाहारी था। बच्चियों को भी माँसाहारी बनाया। किन्तु जब वे बड़ी हुईं तो माँस जो उनका प्रिय भोजन था उन्होंने स्वयं पशु प्रेम के चलते त्याग दिया। मुझे कुत्तों ही नहीं हर प्राणी से प्यार करना उन्होंने ही सिखाया। कुत्तों की माँ व बिल्लियों की नानी उन्हीं ने बनाया।
मेरे जीवन मूल्यों पर उनकी गहरी छाप है। इतनी गहरी कि उन्हें घर छोड़े हुए १२ साल होने को हैं परन्तु बड़ी ने १७ साल में और छोटी ने १४ साल में मुझे जो सिखाया वह आज भी मैं नहीं भूली हूँ। कुछ भी नहीं हल्का पड़ा है बल्कि समय के साथ साथ मैं अपने पर उनकी छाप और भी साफ देख पाती हूँ। आज भी मैं उन्हें कहती हूँ कि यदि उम्र के साथ स्वार्थ, भ्रम व खड़ूसपन मुझमें आने लगे तो मुझे रोक लेना, टोक देना। मैं अपने जीवन में आई उन नन्हीं गुरुओं से सीखा कोई भी पाठ भूलना नहीं चाहती।
घुघूती बासूती
यह लेख जब हमारे प्रान्त में दसवीं की परीक्षाएँ हो रही थीं तब लिखा था।
घुघूती बासूती
मुझे सदा यह लगता है कि मेरे विचार व सोचने का तरीका मेरी बेटियों से बहुत प्रभावित है। जब मैं उस समय के बारे में सोचती हूँ जब वे इस संसार में नहीं आईं थीं और तब की मैं के बारे में सोचती हूँ तो पाती हूँ कि तब की मैं आज जैसी नहीं थी। कुछ कुछ तो थी परन्तु कोयले सी कार्बन थी। आज जितनी थोड़ी बहुत चमक मुझमें आई है वह उन्हीं के कारण है। उन्होंने अपनी तरफ से मुझे हीरा वाले कार्बन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कसर रही तो मेरे अपने प्रयासों में व मेरी सोखने की शक्ति में।
शायद ही कोई दिन ऐसा रहा हो जब उनसे मैंने कुछ नया नहीं सीखा। मैं उनके साथ सदा बच्ची ही बनी रही। माँ तो थी मैं उनकी किन्तु उनकी हर मस्ती, हर शैतानी व हर खेल में मैं भाग लेने की कोशिश करती थी। यहाँ तक कि उनके मित्र भी आते थे तो वे भी मुझे अपने खेलों में शामिल कर लेते थे। फिर सदा ही हम तीन व हमारे कुत्ते ही होते थे। पति तो सदा सुबह होते ही जो फोन पर लगते थे तो घर में बिताए अधिकतर समय उसी में लगे रहते थे। शाम को बहुत देर से घर आते थे। मेरी असली साथी तो सदा मेरी बेटियाँ ही रहीं।
जीवन का न जाने कितना दर्शन मैंने उनसे ही सीखा। पहले से पढ़े लेखकों व पुस्तकों को मैंने उनके साथ पढ़कर नई नजर से देखना सीखा। जब भी वे लाइब्रेरी से कोई किताब लातीं, चाहे वह बच्चों की ही क्यों न हो, सदा पढ़ने की मेरी भी बारी होती थी। मैंने फिर से कॉमिक पढ़े, फिर से ऍन रैंड पढ़ी, फिर से बच्ची से किशोरी और किशोरी से युवा हुई। लगता था कि जो बातें पहले केवल मस्तिष्क को छूती थीं तब हृदय को भी छूने लगीं। यदि पहले जीवन में सात रंग थे तो तब सात सौ शेड्स दिखने लगे। हर खुशी, हर वस्तु, हर सोच ने एक नया आकार व रंग ले लिया था। एक बिल्कुल ही नया रूप, आकार व रंग। पहले जो चीजें धुँधली थीं अब वे काफी साफ नजर आने लगी थीं। मैं अपने आप को भी समझने लगी थी। लोगों को , उनके व्यवहार को समझने लगी थी। आश्चर्य होता है कि पहले मैं यह सब क्यों नहीं समझ पाती थी।
कुछ इतने गूढ़ जीवन दर्शन से मेरा परिचय कराया कि मैं कभी कभी आश्चर्यचकित रह जाती हूँ सोचकर कि छोटे बच्चे जिस सत्य को देख पाते हैं हम क्यों नहीं। जैसे यदि हम किसी के लिए कुछ करते हैं तो वास्तव में उसके लिए नहीं अपने लिए, शुद्ध रूप से अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। क्योंकि वैसा करना हमें खुशी देता है और हमारे मन में हमारी जो छवि है उसको और सुदृढ़ करता है। सो किसी अन्य के लिए किया मत सोचो अपने लिए किया सोचकर चलो। अतः वह अब हमें धन्यवाद देगा की कामना न करो। इस सोच ने ही जीवन को कितना सरल कर दिया।
मैं शाकाहारी थी किन्तु पशु प्रेम मैंने उनसे सीखा। मेरे लिए शाकाहारी होना केवल एक तथ्य था। शाकाहारी होने का कारण केवल अपने परिवार की जीवन प्रणाली का हिस्सा था। शायद माँसाहार से घृणा भी उसी का हिस्सा थी। पति का परिवार माँसाहारी था। बच्चियों को भी माँसाहारी बनाया। किन्तु जब वे बड़ी हुईं तो माँस जो उनका प्रिय भोजन था उन्होंने स्वयं पशु प्रेम के चलते त्याग दिया। मुझे कुत्तों ही नहीं हर प्राणी से प्यार करना उन्होंने ही सिखाया। कुत्तों की माँ व बिल्लियों की नानी उन्हीं ने बनाया।
मेरे जीवन मूल्यों पर उनकी गहरी छाप है। इतनी गहरी कि उन्हें घर छोड़े हुए १२ साल होने को हैं परन्तु बड़ी ने १७ साल में और छोटी ने १४ साल में मुझे जो सिखाया वह आज भी मैं नहीं भूली हूँ। कुछ भी नहीं हल्का पड़ा है बल्कि समय के साथ साथ मैं अपने पर उनकी छाप और भी साफ देख पाती हूँ। आज भी मैं उन्हें कहती हूँ कि यदि उम्र के साथ स्वार्थ, भ्रम व खड़ूसपन मुझमें आने लगे तो मुझे रोक लेना, टोक देना। मैं अपने जीवन में आई उन नन्हीं गुरुओं से सीखा कोई भी पाठ भूलना नहीं चाहती।
घुघूती बासूती
यह लेख जब हमारे प्रान्त में दसवीं की परीक्षाएँ हो रही थीं तब लिखा था।
घुघूती बासूती
Thursday, May 07, 2009
लौट आना मेरे नन्हे मित्र!
आज का दिन या कहिए शाम सफल हो गई। शाम को माँ के साथ बाहर बगीचे में बैठी थी। पीठ के पीछे मोंगरे व जाई की बेलें पूरी दीवार को ढके हुए अपने फूलों से सुगन्धी बिखेर रहीं थीं। ठीक हमारे आगे कुछ गुलाब इस गर्मी के मौसम में भी खिल कर अपनी जिजीविषा प्रदर्शित कर रहे थे। छोटे से कमल कुंड से कमल के पत्ते सामने लगे बल्ब के हल्के प्रकाश में स्नान कर रहे थे। मंद पवन में वे हिलते तो लगता मानो उनकी दर्पण सी सतह पर सैकड़ों छोटे छोटे तारों के बिम्ब झिलमिला रहे हों। सामने रबर के पेड़ की शाखाओं व पत्तियों के बीच से चाँद हमसे लुकाछिपी खेल रहा था। दूर कहीं कोई चिड़िया चहचहा रही थी। नाक, आँख, कान व त्वचा सब मानो एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे थे कि कौन सबसे सुखद अनुभूति मेरे मस्तिष्क तक पहुँचाएगा। माँ कभी कोई भूला बिसरा गीत गुनगुनाती तो कभी किन्हीं कविताओं की पंक्तियाँ।
मैं मंत्रमुग्ध सी सभी इन्द्रियों में चलती स्पर्धा का आनन्द ले रही थी। चाँद अपने सौन्दर्य से लगभग लगभग विचलित कर रहा था। शनिवार को पूर्णिमा है और कल व्रत की पूर्णिमा। मैं कई दिन से उसे बढ़ता देख रही हूँ, ठीक वैसे ही जैसे किसी बच्चे को बढ़ता देखते हैं। प्रतीक्षा में हूँ कि वह कब अपने पूर्ण यौवन पर पहुँचेगा। जानती हूँ कि फिर वह घटता जाएगा, जैसे बुढ़ापे की ओर जाएगा। आजकल बुढ़ापे के बारे में अधिक ही सोच व लिख रही हूँ। कुछ दिन में शायद मेरी इस विषय पर लिखी श्रृँखला तैयार हो जाए। सोचती हूँ कि इन विचारों को झटकूँ या चलने दूँ। मैं चलने देती हूँ।
तभी घास में कुछ जगमगाया। मैं पागल बच्ची की तरह उठकर उस ओर भागी। धड़कते हृदय से बस यही सोचते हुए कि यह वही हो। बहुत बहुत वर्षों से खोया, वही हो। मैं पास पहुँची, झुकी और निहारती गई। वही तो था। मेरे बचपन का मनमोहक जीव। मेरी खुशी का कोई अन्त नहीं था। मन किया उसे छू लूँ किन्तु जानती हूँ कि हम ही तो उसके अपराधी हैं सो बिन छुए मंत्रमुग्ध देखती रही। फिर लौटकर माँ के पास आकर बैठ गई। बोली,'अपने साथियों को भी यहीं बुला लो ना! हम कभी कोई कीटनाशक नहीं छिड़कते। यहीं आकर बस जाओ ना!पिछले कितने सालों से तुम गायब थे। बच्चों की एक पीढ़ी ने तुम्हें देखा ही नहीं होगा। बस कविता कहानियों में तुम्हारा वर्णन सुना पढ़ा होगा। जुगनू नाम उनके मन में वह बाँवलापन नहीं पैदा करता होगा जो मेरे मन में करता है।'
मैं अपनी कविताओं की उन पंक्तियों को याद करती हूँ जिसमें मैंने जुगनू का जिक्र किया है। उन पलों को भी जीना चाहती हूँ जिन पलों में उन्हें लिखा था और उन भावनाओं को भी जो लिखते समय मुझे मथ रही थीं।
माँ रामायण की वे चौपाइयाँ सुनाने लगीं जिसमें सीता ने रावण की तुलना जुगनू से की है। शायद राम की सूर्य या चन्द्र से। जादू टूट गया। मैं माँ से कहने लगी कि स्त्री होकर क्यों रामायण को याद करती हो। फिर स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले सुन्दर काँड पाठ से उपजी अपनी कटुता बताने लगी। नाक, आँख, कान, त्वचा जो सुगन्ध, दृष्य, चहचहाने व शीतल पवन से उपजी प्रतिस्पर्धा कर रहे थे वे नैपथ्य में चले गए, जिह्वा पर केवल एक तीखा कटु स्वाद रह गया तुलसी वचनों का व इस स्थानांतरण से पहले की जगह सुन्दर काँड पाठ करती स्त्रियों की याद का।
जुगनू तुम कल फिर आना। कल मैं दुखदायी बातों के लिए कान बंद रखूँगी। कल मैं केवल तुम्हें निहारूँगी। 'ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, और नारी' मेरे अन्तः से आकर मेरे कानों में सीसा नहीं डाल सकेंगे।
लौट आना मेरे नन्हे मित्र! कल की शाम मैं केवल तुम्हें अनुभव करूँगी।
घुघूती बासूती
मैं मंत्रमुग्ध सी सभी इन्द्रियों में चलती स्पर्धा का आनन्द ले रही थी। चाँद अपने सौन्दर्य से लगभग लगभग विचलित कर रहा था। शनिवार को पूर्णिमा है और कल व्रत की पूर्णिमा। मैं कई दिन से उसे बढ़ता देख रही हूँ, ठीक वैसे ही जैसे किसी बच्चे को बढ़ता देखते हैं। प्रतीक्षा में हूँ कि वह कब अपने पूर्ण यौवन पर पहुँचेगा। जानती हूँ कि फिर वह घटता जाएगा, जैसे बुढ़ापे की ओर जाएगा। आजकल बुढ़ापे के बारे में अधिक ही सोच व लिख रही हूँ। कुछ दिन में शायद मेरी इस विषय पर लिखी श्रृँखला तैयार हो जाए। सोचती हूँ कि इन विचारों को झटकूँ या चलने दूँ। मैं चलने देती हूँ।
तभी घास में कुछ जगमगाया। मैं पागल बच्ची की तरह उठकर उस ओर भागी। धड़कते हृदय से बस यही सोचते हुए कि यह वही हो। बहुत बहुत वर्षों से खोया, वही हो। मैं पास पहुँची, झुकी और निहारती गई। वही तो था। मेरे बचपन का मनमोहक जीव। मेरी खुशी का कोई अन्त नहीं था। मन किया उसे छू लूँ किन्तु जानती हूँ कि हम ही तो उसके अपराधी हैं सो बिन छुए मंत्रमुग्ध देखती रही। फिर लौटकर माँ के पास आकर बैठ गई। बोली,'अपने साथियों को भी यहीं बुला लो ना! हम कभी कोई कीटनाशक नहीं छिड़कते। यहीं आकर बस जाओ ना!पिछले कितने सालों से तुम गायब थे। बच्चों की एक पीढ़ी ने तुम्हें देखा ही नहीं होगा। बस कविता कहानियों में तुम्हारा वर्णन सुना पढ़ा होगा। जुगनू नाम उनके मन में वह बाँवलापन नहीं पैदा करता होगा जो मेरे मन में करता है।'
मैं अपनी कविताओं की उन पंक्तियों को याद करती हूँ जिसमें मैंने जुगनू का जिक्र किया है। उन पलों को भी जीना चाहती हूँ जिन पलों में उन्हें लिखा था और उन भावनाओं को भी जो लिखते समय मुझे मथ रही थीं।
माँ रामायण की वे चौपाइयाँ सुनाने लगीं जिसमें सीता ने रावण की तुलना जुगनू से की है। शायद राम की सूर्य या चन्द्र से। जादू टूट गया। मैं माँ से कहने लगी कि स्त्री होकर क्यों रामायण को याद करती हो। फिर स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले सुन्दर काँड पाठ से उपजी अपनी कटुता बताने लगी। नाक, आँख, कान, त्वचा जो सुगन्ध, दृष्य, चहचहाने व शीतल पवन से उपजी प्रतिस्पर्धा कर रहे थे वे नैपथ्य में चले गए, जिह्वा पर केवल एक तीखा कटु स्वाद रह गया तुलसी वचनों का व इस स्थानांतरण से पहले की जगह सुन्दर काँड पाठ करती स्त्रियों की याद का।
जुगनू तुम कल फिर आना। कल मैं दुखदायी बातों के लिए कान बंद रखूँगी। कल मैं केवल तुम्हें निहारूँगी। 'ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, और नारी' मेरे अन्तः से आकर मेरे कानों में सीसा नहीं डाल सकेंगे।
लौट आना मेरे नन्हे मित्र! कल की शाम मैं केवल तुम्हें अनुभव करूँगी।
घुघूती बासूती
Monday, May 04, 2009
वर्बल डायरियाः कोई क्या करे चुनावी मौसम में ये रोग हो ही जाता है !
वर्बल डायरियाः कोई क्या करे चुनावी मौसम में ये रोग हो ही जाता है !
एक भीषण रोग है verbal diarrhoea । हिन्दी में इसे मौखिक अतिसार भी कहा जा सकता है। वैसे तो हममें से कई प्रायः इसके हल्के फुल्के लक्षणों से ग्रस्त रहते हैं परन्तु चुनावी मौसम में नेता लोगों में इस मौखिक अतिसार की कुछ अधिक ही अति हो जाती है। इस रोग का ध्यान मुझे श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के चिट्ठे 'कीचड़ उछाल स्पर्धा' को पढ़कर इस रोग के गलत निदान को देख आया। उन्होंने रोग के लक्षणों को देखा और इसे हाइपर थेथराइडिज्म रोग बताया। मैं उनके इस निदान से कतई सहमत नहीं हूँ। अब वे ठहरे इन्जीनियर सो कल पुर्जों के रोगों का निदान ही क्या इलाज भी जानते हैं। परन्तु इस बीमारी को पहचानने में गलती कर गए।
वे लिखते हैं संक्षेप में, वे इस बीमारी को क्या जानें! हम जैसे लोग जो स्कूल, कॉलेज में जब साराँश माँगा जाता था तो कविता या पाठ से भी लम्बा लिख आते थे वे ही इस रोग को सही पहचान सकते हैं। इसका ही तो चचेरा भाई लिखित अतिसार है। किसी ने सही कहा है,
'जाके पैर न फटी विबाई वो क्या जाने पीर पराई।'
सो भइया और बहिना, हम नेताओं की इस पीर को खूब समझते और पहचानते हैं। पुरानी पीड़ा जो है। चुनाव आयोग भी इसे समझता है, तभी तो 'गीदड़ भभकियाँ' भर ही देता है। आप कुछ भी कह लीजिए, बस हाथ काटने की बात मत करें। आज कुछ कहें, कल कुछ और, कौन पूछता है और यदि पूछे तो और भी अच्छा, कमसे कम सुर्खियों में तो रहेंगे।
खैर आज हम रोगमुक्त हैं सो इतना ही।
घुघूती बासूती
पुनश्चः
मेरे अंग्रेजी के ब्लॉग पर यह पोस्ट Systemic Hijack of Culture भी पढ़ने का कष्ट करें।
घुघूती बासूती
एक भीषण रोग है verbal diarrhoea । हिन्दी में इसे मौखिक अतिसार भी कहा जा सकता है। वैसे तो हममें से कई प्रायः इसके हल्के फुल्के लक्षणों से ग्रस्त रहते हैं परन्तु चुनावी मौसम में नेता लोगों में इस मौखिक अतिसार की कुछ अधिक ही अति हो जाती है। इस रोग का ध्यान मुझे श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के चिट्ठे 'कीचड़ उछाल स्पर्धा' को पढ़कर इस रोग के गलत निदान को देख आया। उन्होंने रोग के लक्षणों को देखा और इसे हाइपर थेथराइडिज्म रोग बताया। मैं उनके इस निदान से कतई सहमत नहीं हूँ। अब वे ठहरे इन्जीनियर सो कल पुर्जों के रोगों का निदान ही क्या इलाज भी जानते हैं। परन्तु इस बीमारी को पहचानने में गलती कर गए।
वे लिखते हैं संक्षेप में, वे इस बीमारी को क्या जानें! हम जैसे लोग जो स्कूल, कॉलेज में जब साराँश माँगा जाता था तो कविता या पाठ से भी लम्बा लिख आते थे वे ही इस रोग को सही पहचान सकते हैं। इसका ही तो चचेरा भाई लिखित अतिसार है। किसी ने सही कहा है,
'जाके पैर न फटी विबाई वो क्या जाने पीर पराई।'
सो भइया और बहिना, हम नेताओं की इस पीर को खूब समझते और पहचानते हैं। पुरानी पीड़ा जो है। चुनाव आयोग भी इसे समझता है, तभी तो 'गीदड़ भभकियाँ' भर ही देता है। आप कुछ भी कह लीजिए, बस हाथ काटने की बात मत करें। आज कुछ कहें, कल कुछ और, कौन पूछता है और यदि पूछे तो और भी अच्छा, कमसे कम सुर्खियों में तो रहेंगे।
खैर आज हम रोगमुक्त हैं सो इतना ही।
घुघूती बासूती
पुनश्चः
मेरे अंग्रेजी के ब्लॉग पर यह पोस्ट Systemic Hijack of Culture भी पढ़ने का कष्ट करें।
घुघूती बासूती
Saturday, May 02, 2009
राजा की कहानी और हमारा मतदान
मैं मतदान कर आई। क्यों कर आई ? क्योंकि मुझे यह कहानी याद आती है।
एक राजा को सुबह सुबह कोई विशेष पूजा/ अभिषेक करना था, जिसमें बहुत दूध की आवश्यकता थी। उसने अपने शहर की प्रजा से कहा कि रात को सभी एक एक लोटा दूध मंदिर के पास एक खाली पड़े तालाब में डाल दें ताकि अभिषेक के लिए आराम से दूध भी इकट्ठा हो जाए और बिना किसी पर अधिक बोझ पड़े सभी की तरफ से अभिषेक भी हो जाए। सब लोग सहमत हो गए।
अगले दिन जब राजा अभिषेक के लिए गया तो उसने पाया कि तालाब में दूध की जगह लगभग पानी ही था। पानी का रंग हल्का दूधिया अवश्य था। राजा आश्चर्यचकित था और लोग भी। हुआ यह था कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति ने सोचा कि इतने सारे लोग तालाब में दूध डालेंगे तो वह एक लोटा पानी ही डाल देगा तो क्या अंतर पड़ेगा। अब एक व्यक्ति पानी डालता तो तालाब का दूध उस पानी मिलाने पर भी दूध ही रहता किन्तु वहाँ तो सभी ने पानी डाल दिया था।
यही हाल लोकतंत्र का भी हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति जब यह सोचता है कि एक उसके मत न डालने से क्या अंतर पड़ेगा तो लोकतंत्र का तालाब भी केवल पनीले दूध से भर जाता है, असली शुद्ध दूध रूपी लोकतंत्र से नहीं। मतदान न करने वाले इस लोकतंत्र के यज्ञ में जहाँ दूध की आहुति चाहिए वहाँ मत न देकर मानो एक लोटा पानी डाल आते हैं और लोकतंत्र के दूध को पानीमय बना देते हैं। जब ४० या ५० प्रतिशत ही मतदान होगा तो सोचिए मतदान कौन नहीं करके आए हैं। जो मतदान के प्रति उदासीन हैं वे कोई अनपढ़ व्यक्ति नहीं हैं । वे वे ही लोग हैं जो पढ़े लिखे हैं, जो वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, किन्तु जो इसमें भाग न लेकर इस व्यवस्था को और भी लचर बना रहे हैं। जब प्रत्याशी जानते हैं कि पढ़े लिखे लोग मतदान नहीं करेंगे तो वे अनपढ़ गरीब जनता को लुभाने वाले ही वायदे व काम करते हैं। यदि सभी वर्ग के लोग मतदान करने लगें तो वे भी मजबूर हो जाएँगे कि उनके काम, भाषण व वायदे किसी एक वर्ग विशेष के लिए न होकर सभी नागरिकों के लिए हों। तब शायद कोई हमारा मत धर्म, जाति या खोखले वायदों से नहीं खरीद पाएगा। तब शायद दलों व प्रत्याशियों में कुछ काम करके जीतने की होड़ लगेगी। तब वे हमें एक खरीददार का आदर देंगे। जब हमारे हाथ में राजा का मुकुट होगा तो उस मुकुट को पहनने के लिए प्रत्याशियों को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी। किन्तु यदि हम यह दर्शाएँगे कि इस मुकुट को हाथ में लेने भर से हमारे हाथ मैले हो जाएँगे तो वे हमारी कद्र क्यों करेंगे?
'जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ' ही हमारा महामंत्र होना चाहिए। हम यदि राजनीति के पानी को दुर्गंधमय मानकर उसमें डुबकी लगाने से कतराएँगे तो हम मोती तो कतई नहीं पा सकेंगे। माना अभी मोती शायद हैं भी बहुत कम या शायद न ही हैं किन्तु जिस स्तर के लोग मतदान करेंगे उसी स्तर के प्रत्याशी भी होंगे। यदि आप अपने स्तर के नेता चाहते हैं तो डुबकी तो लगानी ही पड़ेगी। देखिए फिर हम जैसे लोग भी चुनाव लड़ने को आगे आएँगे।
गुजरात के राज समधियाला नामक गाँव में ८४ प्रतिशत मतदान हुआ। समाचार पत्र के अनुसार यह भारत के सबसे साफ सुथरे गाँवों में से एक है। यहां मतदान करना अनिवार्य है। जो मतदान नहीं करते उन्हें ५१ रुपए का दंड भरना पड़ता है। यहाँ के १०१९ मतदाताओं में से ८५० ने मतदान किया। ५० लोगों को वैध कारणों से मतदान से छूट मिली थी। जो १५० मतदाता गाँव से बाहर थे उनमें से भी लगभग ८० मतदान के लिए वापिस आ गए थे। यहाँ १९८३ से सदा ८० प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ है।
मतदान न देने को भी हम अपना अधिकार मान सकते हैं। सो शायद दंड वाली बात गले नहीं उतरती परन्तु हम अपने परिवार, अपने मित्रों, सहयोगियों को तो मतदान करने को प्रेरित करने का यत्न कर सकते हैं। कुछ और नहीं तो यह तो पूछ ही सकते हैं कि मतदान कर आए क्या। यदि सभी उनसे पूछने लगेंगे तो शायद उन्हें भी लगने लगे कि उनसे मतदान करने की अपेक्षा की जाती है।
घुघूती बासूती
एक राजा को सुबह सुबह कोई विशेष पूजा/ अभिषेक करना था, जिसमें बहुत दूध की आवश्यकता थी। उसने अपने शहर की प्रजा से कहा कि रात को सभी एक एक लोटा दूध मंदिर के पास एक खाली पड़े तालाब में डाल दें ताकि अभिषेक के लिए आराम से दूध भी इकट्ठा हो जाए और बिना किसी पर अधिक बोझ पड़े सभी की तरफ से अभिषेक भी हो जाए। सब लोग सहमत हो गए।
अगले दिन जब राजा अभिषेक के लिए गया तो उसने पाया कि तालाब में दूध की जगह लगभग पानी ही था। पानी का रंग हल्का दूधिया अवश्य था। राजा आश्चर्यचकित था और लोग भी। हुआ यह था कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति ने सोचा कि इतने सारे लोग तालाब में दूध डालेंगे तो वह एक लोटा पानी ही डाल देगा तो क्या अंतर पड़ेगा। अब एक व्यक्ति पानी डालता तो तालाब का दूध उस पानी मिलाने पर भी दूध ही रहता किन्तु वहाँ तो सभी ने पानी डाल दिया था।
यही हाल लोकतंत्र का भी हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति जब यह सोचता है कि एक उसके मत न डालने से क्या अंतर पड़ेगा तो लोकतंत्र का तालाब भी केवल पनीले दूध से भर जाता है, असली शुद्ध दूध रूपी लोकतंत्र से नहीं। मतदान न करने वाले इस लोकतंत्र के यज्ञ में जहाँ दूध की आहुति चाहिए वहाँ मत न देकर मानो एक लोटा पानी डाल आते हैं और लोकतंत्र के दूध को पानीमय बना देते हैं। जब ४० या ५० प्रतिशत ही मतदान होगा तो सोचिए मतदान कौन नहीं करके आए हैं। जो मतदान के प्रति उदासीन हैं वे कोई अनपढ़ व्यक्ति नहीं हैं । वे वे ही लोग हैं जो पढ़े लिखे हैं, जो वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, किन्तु जो इसमें भाग न लेकर इस व्यवस्था को और भी लचर बना रहे हैं। जब प्रत्याशी जानते हैं कि पढ़े लिखे लोग मतदान नहीं करेंगे तो वे अनपढ़ गरीब जनता को लुभाने वाले ही वायदे व काम करते हैं। यदि सभी वर्ग के लोग मतदान करने लगें तो वे भी मजबूर हो जाएँगे कि उनके काम, भाषण व वायदे किसी एक वर्ग विशेष के लिए न होकर सभी नागरिकों के लिए हों। तब शायद कोई हमारा मत धर्म, जाति या खोखले वायदों से नहीं खरीद पाएगा। तब शायद दलों व प्रत्याशियों में कुछ काम करके जीतने की होड़ लगेगी। तब वे हमें एक खरीददार का आदर देंगे। जब हमारे हाथ में राजा का मुकुट होगा तो उस मुकुट को पहनने के लिए प्रत्याशियों को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी। किन्तु यदि हम यह दर्शाएँगे कि इस मुकुट को हाथ में लेने भर से हमारे हाथ मैले हो जाएँगे तो वे हमारी कद्र क्यों करेंगे?
'जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ' ही हमारा महामंत्र होना चाहिए। हम यदि राजनीति के पानी को दुर्गंधमय मानकर उसमें डुबकी लगाने से कतराएँगे तो हम मोती तो कतई नहीं पा सकेंगे। माना अभी मोती शायद हैं भी बहुत कम या शायद न ही हैं किन्तु जिस स्तर के लोग मतदान करेंगे उसी स्तर के प्रत्याशी भी होंगे। यदि आप अपने स्तर के नेता चाहते हैं तो डुबकी तो लगानी ही पड़ेगी। देखिए फिर हम जैसे लोग भी चुनाव लड़ने को आगे आएँगे।
गुजरात के राज समधियाला नामक गाँव में ८४ प्रतिशत मतदान हुआ। समाचार पत्र के अनुसार यह भारत के सबसे साफ सुथरे गाँवों में से एक है। यहां मतदान करना अनिवार्य है। जो मतदान नहीं करते उन्हें ५१ रुपए का दंड भरना पड़ता है। यहाँ के १०१९ मतदाताओं में से ८५० ने मतदान किया। ५० लोगों को वैध कारणों से मतदान से छूट मिली थी। जो १५० मतदाता गाँव से बाहर थे उनमें से भी लगभग ८० मतदान के लिए वापिस आ गए थे। यहाँ १९८३ से सदा ८० प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ है।
मतदान न देने को भी हम अपना अधिकार मान सकते हैं। सो शायद दंड वाली बात गले नहीं उतरती परन्तु हम अपने परिवार, अपने मित्रों, सहयोगियों को तो मतदान करने को प्रेरित करने का यत्न कर सकते हैं। कुछ और नहीं तो यह तो पूछ ही सकते हैं कि मतदान कर आए क्या। यदि सभी उनसे पूछने लगेंगे तो शायद उन्हें भी लगने लगे कि उनसे मतदान करने की अपेक्षा की जाती है।
घुघूती बासूती
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