'ये बाट्ट ही ऊँल' पीढ़ियों के बीच बढ़ती खाइयाँ और बदलते नुस्खे।
'ये बाट्ट ही ऊँल' या ऐसा ही कुछ कुमाऊँनी में बड़े बूढ़े कहते थे। अर्थात सब लोगों ने इसी राह से आना है, गुजरना है। बढ़ती उम्र के साथ उनकी बात का अर्थ व महत्व भी समझ आने लगा है। परन्तु उम्र का जो नुस्खा अपनी बात समझाने को उनके पास था वह हमारे पास नहीं है। अब हमें नुस्खा बदलना होगा।
मेरे पिछले लेख हम कहाँ जा रहे हैं पर कई टिप्पणियाँ आईं। बहुत से मित्र सहमत हैं, कुछ असहमत तो कुछ कई बातों से सहमत कई से असहमत। होना भी ऐसा ही चाहिए। यही तो लोकतन्त्र है। सभी को अपने विचार रखने व उनका आदान प्रदान करने का अधिकार है। परन्तु एक टिप्पणी ऐसी आई जिसने मुझे लिखने को एक ऐसा विषय दिया जिसपर मन ही मन विचार तो मैं कर ही रही थी परन्तु लिखा अभी तक नहीं था। ई स्वामी जी की बात आप भी पढ़िए।
eSwami ने कहा…
"जिन्हें यह चिन्ता हो रही है कि आँकड़े बताते हैं कि स्त्रियों को स्वतन्त्रता मिलने के बाद अमेरिका में विवाह के बाहर बच्चों के जन्म में वृद्धि हुई है वे साऊदी अरब या ऐसे ही किसी देश के आँकड़ों पर भी नजर डालें। वहाँ यह संख्या शून्य है। फिर हम वहाँ के कानून यहाँ लागू क्यों नहीं कर देते?"
आप साऊदी अरब के कानून भारत में लागू इसलिये नहीं कर सकते की आपके नेता ऐसा करने से पहले ही ग्लोबलाईजेशन के नाम पर भारत को उसकी लंगोटी[अस्मिता] समेत अमरीका के हाथों बेच खा चुके हैं. कहां जी रही हैं आप घुघुती जी? सन १९६० में? ठीक वैसे ही जैसे लडकियों के बाल नोचते पुरुष और पुलीसवाले और उनको रोकने के बजाय उसकी रिकॉर्डिंग कर के दिखाने वाले पुरुष अपना डे-जॉब कर रहे हैं - दिमागी रूप से १४ सदी में जीते हुए!!
आप और हम कब तक बहुत अच्छा लिखा बहुत संतुलित लिखा पढ कर खुश होते रहेंगे? कब तक??
सच तो ये है की नई पीढी के हॉर्नी लोग प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये थोपे गए दिन गुलाब के साथ कंडोम खरीद रहे हैं. गुजरती पीढी के फ़्रस्टु संस्कृति बचाने के नाम पर लडकियों के बाल नोच रहे हैं. और बडी चतुराई से उनके बीच की वैचारिक खाईयां आर्किटेक्ट की जा रही हैं - ताकी संवाद ही ना बचे. ताकी वे अपने विचार अपने अपने टीवी चैनलों से सीख/चुन लें! देवदास, देव डी हो चुका है. आज भारतीय संस्कृति की बात करने का मतलब पुरुष-प्रधानतावादी, स्त्री-विरोधी होना हो गया है - करोडों डालर लगे हैं ये स्थितियां बनाने में. वाना-बीज़ [नकलची] तो आधुनिक हो चुकने के लिये कुछ भी कर जाएंगे - और जो उन्हें संस्कारित कर सकते थे वे तो कचरे के डब्बे में फ़ेंके जा चुके हैं.
उन्होंने खाई की बात बहुत सही कही है। पीढ़ियों के बीच में ये खाइयाँ यदि पट जातीं तो सब पीढ़ियाँ एक दूसरे से कितना कुछ सीख सकती थीं। कोई भी अकेला सबकुछ नहीं जान सकता। सबसे बढ़िया पाठशाला अनुभव की पाठशाला होती है। यह भी आवश्यक नहीं कि जो अनुभव एक को हों वह दूसरे को भी हों। उससे भी आवश्यक यह है कि हरेक को गोबर में पैर रखकर ही या हाथ जलाकर ही ना सीखना पड़े। बहुत सी बार अन्य के उदाहरण से भी सीखा जा सकता है। इतिहास तो पढ़ाया ही इसलिए जाता है कि उससे हम गलतियों से सीखें व उन्हें न दोहराएँ। परन्तु शायद मनुष्य हर गलती को दोहराने को अभिशप्त है।
क्या कारण है कि मनुष्य इतनी प्रगति कर गया जितनी कोई भी अन्य प्राणी नहीं कर पाया? कारण कई हैं,
१. दो पैरों पर चलने से हाथों का अन्य कामों, औजार आदि बनाने के लिए स्वतन्त्र होना।
२. बोलने की क्षमता होने से भाषा का विकास कर पाना। जिससे वह अपने अनुभव व सीखा हुआ ज्ञान अपने बच्चों को दे सका। लिखित भाषा का विकास होने से यह मौखिक परम्परा को और भी आगे लिखित शिलालेखों फिर पुस्तकों तक ला पाया।
३. परिवार का गठन होने से बच्चों को विकास के लिए अधिक समय का मिल पाना।
कृषि के विकास के कारण प्रतिदिन के भोजन की चिन्ता से मुक्त होकर कुछ अलग सोच पाने व विकास कर पाने का अवसर मिल पाना।
४. समाज व राज्य का गठन कर पाने से न्याय व्यवस्था होने से धन, सुख सम्पदा को निश्चिन्त हो इकट्ठा कर पाना।
५. मनुष्य का विभिन्न कामों में विशेषज्ञता पा जाने से प्रत्येक को प्रत्येक काम करने की आवश्यकता का ना रह जाने से अपने क्षेत्र में विशेष रूप से माहिर हो पाने का अवसर मिल पाना।
ऐसे ही बहुत से अन्य कारण भी रहे हैं जो उसके विकास में सहायक रहे हैं। यहाँ से विकास करते करते उसका निजता को महत्व देना एक स्वाभाविक विकास था। परन्तु अपने समाज के अधिक अनुभवी लोगों से सीखना विकास का एक बहुत बड़ा कारण रहा। यही कारण था कि समाज में वृद्धों का स्थान बहुत ऊँचा माना जाता था।
परन्तु जबसे लिखित ज्ञान की सुविधा हुई तबसे हमें वही ज्ञान अपने क्षेत्र के सबसे बेहतर ज्ञनियों द्वारा लिखित रूप में मिलने लगा। फिर विज्ञान, टैक्नॉलॉजी, सूचना क्रान्ति, कम्प्यूटर के युग आदि ने तो पूरी रूपरेखा ही बदल दी। प्रायः बहुत से क्षेत्रों में नई पीढ़ी का ज्ञान पुरानी पीढ़ी से अधिक होने लगा। प्रत्येक नई पीढ़ी के पाठ्यक्रम में वह सब है जिसे हम जानते भी नहीं। और जब विशिष्टता का युग है तो कोई भी अपने क्षेत्र में अन्य क्षेत्र वालों से अधिक ही बड़ा विशेषज्ञ होता जा रहा है। यदि हम आशा करें कि किसी विषय में पी एच डी या उससे भी आगे का अनुसंधान करने वाला व्यक्ति यह माने कि उस विषय में उसके माता पिता अधिक जानते हैं तो यह सरासर मूर्खता होगी। प्रायः जब हमारा कम्प्यूटर या नेट हमें कष्ट देता है तो उसके निवारण के लिए हम अपने बच्चों या अपने युवा नेट मित्रों की ही गुहार लगाते हैं।
यह भी सोचना कि हमें व्यवहारिकता अधिक आती है भी सदा सही नहीं होगा। बहुत बार अगली पीढ़ी का कई क्षेत्रों में अनुभव व जानकारी हमसे अधिक होती है। ऐसे में प्रायः वे ही हमें राह सुझाते हैं। हममें से बहुतों को मोबाइल, कम्प्यूटर, ए टी एम, नेट द्वारा बुकिंग हमारे बच्चों ने ही सिखाई है। पहले जैसे हम प्रतीक्षा करते थे कि माँ या पिताजी घर आएँगे तो हमें जो प्रश्न समझ नहीं आ रहे वे हमें उनका उत्तर या कैसे हल करने हैं सिखाएँगे, वैसे ही हम अपने बच्चों का काम से, कॉलेज से, औफिस से, हॉस्टल या अन्य नगर से आने की प्रतीक्षा करते हैं। बहुत से नाना नानी, दादा दादी भी अपने नाती पोतियों से कहते सुने जा सकते हैं, कि रूको, जब तुम्हारी माँ घर आएगी तब वह तुम्हें इसको कैसे हल करना है बताएगी। कई बार तो माँ या पिता जिनके आने की प्रतीक्षा हो रही होती थी उन्हें भी कहना पड़ता है, कि अपनी कक्षा के काम की पुस्तिका दिखाओ देखें कैसे करवाया है या फिर भी न समझ आने पर कहते हैं कि कल अपनी अध्यापिका (बहुधा अध्यापिका ही)से पूछ लेना। कई बार एक दो साल बड़े भाई बहन को समस्या का हल आता है और माता पिता, दादा नानी को नहीं।
अब जब बच्चा बचपन से यह देखता है तो जो स्टीरिओटाइप हमारी पीढ़ी या हमारे माता पिता की पीढ़ी के मन में होती थी कि पिता, दादाजी को सब पता है (बहुधा किसी पुरुष)टूट जाता है। यह स्वाभाविक भी है। उसकी माँ उसे पढ़ाती है सो पिता,या नाना नानी,दादा दादी से अधिक जानती है। अध्यापिका माता पिता से अधिक जानती है। सो यह भ्रम कि पुरुष स्त्री से अधिक, बड़ी उम्र के कम उम्र से अधिक जानते हैं भी टूट जाता है। अब जब वह ऐसे वातावरण में बड़ा होता है और स्वयं यह देखता है कि प्रत्येक नई वस्तु का उपयोग चाहे वह नया कैमरा हो,टी वी हो या कुछ भी वह अधिक सरलता से करता है और बड़े विशेषकर वृद्ध नहीं कर पाते तो स्वाभाविक है कि वह यह मानता है कि उसकी सोच उम्र के कारण किसी से कम नहीं है। पुरुष व उम्र का वर्चस्व यहीं से कम होने लगता है।
सदा से पीढ़ियों के बीच में खाई होती थी। परन्तु माता पिता का अधिक ज्ञान बच्चों में एक स्वाभाविक आदर पैदा करता था। फिर माता पिता के पास जमीन जायदाद,मकान होता था,बहुधा अधिक आमदनी भी। परन्तु आज का युवा यदि माता पिता जितना भी पढ़े लिखे हों तो भी वह प्रायः उनसे अधिक कमाता है़ उनसे जल्दी अपना मकान बनाता है,बैंक में पैसा जमा करता है,अधिक देशों,विदेशों में रह चुका होता है। ऐसे में जब वह प्रत्यक्ष में यह देखता है कि वह पिछली पीढ़ी से किसी भी बात में कम नहीं है तो वह सहज ही पिछली पीढ़ी की हर बात भी नहीं मानेगा। केवल एक दो बातों में ही हम उनसे अधिक हैं और वे हो सकती हैं, हमारा उनके लिए निश्छल प्रेम,हमारा उनकी हर हाल में सुख समृद्धि की कामना करना,हमारा अधिक धैर्यवान होना, अधिक समझदार व व्यवहारकुशल होना, उन्हें भावनात्मक सुरक्षा दे पाना आदि।
अब यदि उनपर हमला बोलकर,उनकी प्रत्येक गतिविधि को बुरा व निकृष्ट बताकर हम उन्हें छोटा सिद्ध करना चाहें तो वे हमसे और भी अधिक दूर छिटक जाते हैं। यदि हम उनकी अधिकतर बातों को समझें और कुछेक मामलों में ही यह दर्शाएँ कि ये तो हमारे ऐसे मूल्य हैं जिनपर हम समझौता सरलता से नहीं करेंगे तो वे भी हमारे इन मूल्यों को हमारे लिए अमूल्य समझ उनका आदर करेंगे। या यदि उनका मत अलग होगा तो हमसे बातकर अपना दृष्टिकोण हमें समझाएँगे व हमारा समझने का यत्न करेंगे। यदि हम प्रायः अपने आपको उनके स्थान पर रखकर सोचें तो वे भी ऐसा ही करेंगे।
यदि हम औफिस से पाँच बजे घर आ जाते थे और छह से नौ का सिनेमा देखते थे और अपनी संतान से जो नौ दस बजे काम से घर लौटें आशा करें कि वे भी नौ बजे घर लौट आएँ तो क्या यह ज्यादती नहीं होगी? हमारा विवाह बीस बाइस या पच्चीस में हो गया और हम अपने इससे भी अधिक उम्र के युवा बच्चों से आशा करें कि उनके विपरीत लिंग के मित्र न हों,कि वे अपना साथी स्वयं न चुनें तो क्या यह सही होगा?
हमारी यह आशा करना कि वे हमारा वर्चस्व मानें जब वे हमें धोखाधड़ी करते,रिश्वतलेते,लोकसभा,राज्य सभा आदि में नेताओं को जूते चलाते,झूठ बोलते,दल बदलते देखें तो क्या हम अति आशावादी नहीं हो रहे? यदि हमें यह बढ़ती खाई पाटनी है तो हमें उम्र धन,शक्ति व ज्ञान की बजाए अपने संयम,आचरण व स्नेह से ही उनके मन में अपना स्थान बनाना है। यह नहीं कि उम्र के कारण उनसे आदर की माँग करें। जिस उदारता, सहनशीलता व आदर का पाठ युगों से युवाओं व विशेषकर युवा स्त्री को पढ़ाया जा रहा है उस पाठ की जितनी आवश्यकता पाठ पढ़ाने वालों को है किसी अन्य को नहीं। यदि हम प्रयत्न करेंगे तो शायद भयंकर रूप से बढ़ती इस खाई को पाट सकेंगे। यदि उम्र में बड़े हम हैं तो यह आरम्भ भी हमें ही करके अपना बड़प्पन दिखाना होगा।
घुघूती बासूती
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घुघूती बासूती
Thursday, February 19, 2009
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हम कहाँ जा रहे हैं ?
हम कहाँ जा रहे हैं ?
जिंद में एक लड़की को बाल पकड़कर गोल गोल घुमाया गया। चौकी इनचार्ज केवल संस्पेंड। मुझे अपनी बेटी से कहना पड़ता था कि बेटा जब ट्रेन यात्रा करती हो तो साथ में शादी का प्रमाणपत्र लेकर जाया करो। यह है मेरा भारत महान! सन ७७ में जब मैं ऐसा कोई सबूत लेकर नहीं चलती थी तो आज अपनी बेटी को यह सलाह देती हूँ। क्यों, क्योंकि हम बढ़ रहे हैं तेजी से १४वीं शताब्दी की ओर! संसार, देखते जाओ! भारत बढ़ रहा है तेजी से सबको पीछे छोड़ता हुआ।
मुझे याद है कि हमारे समय में भी हम लड़कियाँ अपने सहपाठियों के घर जाती थीं। दरवाजा खुला होता था। शायद तब संस्कृति के ठेकेदार पड़ोसी नहीं थे। अतः कोई बाहर से दरवाजा बन्द नहीं करता था। अन्यथा यह हम में से किसी के साथ भी हो सकता था।
मैं नहीं जानती कि वह लड़की अपने सहपाठी के साथ क्या आपराधिक कृत्य कर रही थी। परन्तु हत्यारे को भी, जब वह हमारे जीवन पर खतरा ना हो, हम पीट नहीं सकते, केवल कानून के हवाले कर सकते हैं और आशा कर सकते हैं कि वह उसे सजा दे तो क्या उस लड़की का अपराध हत्या से भी बड़ा था? हो सकता है कि बहुत से लोगों को लड़के लड़कियाँ का आपस में बात करना भी गलत लगता हो। ऐसे में उन लोगों के पास पूरा अधिकार है कि वे स्वयं को विपरीत लिंग से बचाकर रखें। यदि कोई उनपर दबाव डालेगा कि वे बातचीत करें, दोस्ती करें तो वह भी गलत होगा।
आजतक हम स्कूली बच्चों को नैतिक ज्ञान , मोरल साइंस पढ़ाते थे, सेक्स एजुकेशन की बात करते थे। अब समय आ गया है कि बच्चों को संविधान द्वारा दिए गए अन्य लोगों के अधिकारों के बारे में पढ़ाएँ। जैसे एम बी ए आदि में केस स्टडीज़ पढ़ाई जाती हैं, उनपर लेख लिखने को कहा जाता है उसी तरह से अन्य लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों का हनन करने वाले लोगों को क्या सजा दी जाती है, पढ़ाया जाए, उन्हें काल्पनिक या सत्य मामलों पर क्या किया जाना चाहिए, कैसे और क्या न्याय दिया जाना चाहिए आदि पर विचार करने को प्रेरित किया जाना चाहिए।
मानवाधिकार हनन, किसी की निजी स्वतन्त्रता का हनन हत्या से भी बड़ा अपराध है। हत्यारा किसी एक या दो का जीवन समाप्त करता है परन्तु निजी स्वतन्त्रता का हनन करने वाले तो जीवन को जीने योग्य ही नहीं रहने देते। जब निजी अधिकार ही नहीं रहेंगे तो जीवन का हम करेंगे भी क्या सिवाय एक बोझ की तरह ढोने के ? जी तो तिलचच्टे भी लेते हैं। पशुओं में ही शक्तिशाली का पूरे समूह पर शासन होता है। क्या यही स्थिति हम मनुष्यों में लाना चाहते हैं? स्त्रियों के नौकरी करने, बिन ब्याही माँ बनने से तो अपने परिवारों, समाज के नष्ट होने का भय हमें हो रहा है, परन्तु हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यदि निजी अधिकार रहे तो हम अपने बच्चों को बचपन में अपने जीवन मूल्य सिखा सकते हैं और यदि सफल रहे तो इन मूल्यों को बचाने की आशा कर सकते हैं परन्तु यदि समाज में ऐसा कट्टरपन आ गया तो वह समय दूर नहीं जब अपने मूल्य सिखाने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा क्योंकि हमें, हमारे बच्चों को इन कट्टरपंथियों के मूल्यों के अनुसार खाना, पीना, रहना, पढ़ना या न पढ़ना, जीना होगा। मुझे नहीं लगता की ऐसे समाज में नई पीढ़ी को लाना एक खुशी मनाने का अवसर रह जाएगा। वह केवल और केवल एक अन्य मानव को पशु से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर करना ही होगा। हमारे बच्चे दुखी होंगे कि वे पैदा ही क्यों हुए, वह भी तब जब उनमें कुछ सोचने की शक्ति रह जाएगी। हो सकता है वे भी कट्टरपंथियों की तरह हमारे ही सिर पर डंडा लेकर खड़े हो जाएँ, हमारी शिकायत हमारे उन आकाओं से करें कि हम घर में उनके आदेशानुसार नहीं जी रहे। जरा कल्पना कीजिए। कल्पना करने में कोई हानि नहीं है। यदि मैं आज से छह वर्ष पहले ही आने वाले समय की कल्पना कर बेटी से विवाह का प्रमाण पत्र लेकर चलने को कहती थी, इसलिए नहीं कि मुझे उसके किसी पुरुष के साथ चलने पर आपत्ति थी अपितु इसलिए कि मैं आने वाले खतरे के कदमों की आहट सुन पा रही थी। बेहतर होगा कि हम अपने पिता, भाई, चाचा, मामा आदि से अपने खून के रिश्ते का प्रमाणपत्र भी फोटो सहित लेकर घूमें। हो सके तो डी एन ए टेस्टिंग की रिपोर्ट व माता पिता के विवाह का प्रमाणपत्र भी साथ लेकर चलें। अन्यथा ऐसा ना हो कि उज्जैन या किसी भी अन्य शहर की तरह हमारे शहर के लोग भी हमें भाई के साथ कहीं जाने पर पीट डालें, चोटी से पकड़कर घुमा डालें। इससे पहले कि हममें से किसी को अश्विनी बनकर अपने साथ हुए घोर अन्याय की पीड़ा से छुटकारा पाने को गले में फाँसी का फंदा डालना पड़े या तो ऐसे अन्यायों के विरुद्ध हमें बोलना होगा या फिर प्रमाणपत्र आदि से लैस होकर सड़कों पर चलना होगा या किसी के घर जाना होगा। बेहतर व अधिक सुरक्षित तो यह होगा कि घर से बाहर ही ना जाएँ, पुत्रियों को जन्म ही न दें, यदि दुर्भाग्य से दे दें तो उन्हें घर में ही रखें।
जिन्हें यह चिन्ता हो रही है कि आँकड़े बताते हैं कि स्त्रियों को स्वतन्त्रता मिलने के बाद अमेरिका में विवाह के बाहर बच्चों के जन्म में वृद्धि हुई है वे साऊदी अरब या ऐसे ही किसी देश के आँकड़ों पर भी नजर डालें। वहाँ यह संख्या शून्य है। फिर हम वहाँ के कानून यहाँ लागू क्यों नहीं कर देते? वहाँ अपराध भी बहुत कम है। वहाँ यह नहीं होता कि कोई स्त्री तो राष्ट्रपति बन जाती है, कोई प्रधानमंत्री, कोई मुख्यमंत्री तो कोई किसी अन्य धर्म के पुरुष के साथ बात करने, यात्रा करने या प्रेम करने के अपराध में बस से घसीटी जाती हो, कोई किसी लड़के मित्र के घर में बाहर से बन्द कर दी जाती हो, फिर पुलिस द्वारा चोटी से पकड़कर चकरघन्नी की तरह घुमाई जाती हो। वहाँ राजकुमारी को भी उन अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया जाता है जिनके लिए एक आम स्त्री को। वहाँ कोई लड़की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री बनने के सवप्न सजाने का दुस्साहस नहीं करती होगी। यहाँ हम पहले अपनी बेटियों को समानता, आकाश छूने के स्वप्न दिखाते हैं और यदि वह हमारे या समाज के अपेक्षित नहीं चलती तो या तो उनकी हत्या हम स्वयं अपने कथित सम्मान की रक्षा के लिए कर देते हें या हमारे संस्कृति के रक्षक उन्हें प्रताड़ित कर मृत्यु को गले लगाने को बाध्य कर देते हैं। ये घटनाएं अपने आप में अपवाद हो सकती हैं, परन्तु यदि नहीं रोकी गईं तो ये आम हो जाएँगी और तब हमें अपनी बेटियों की भ्रूण हत्या करना एक बेहतर और दयालु समाधान लगेगा।
तब तक,
चलिए हम पिंक चड्ढी वालों के विरोध के तरीके का विरोध करें। क्योंकि उनका तरीका संस्कृति के रक्षकों से अधिक खतरनाक है। हम यह ना देखें कि वे अपने वस्त्र उतारकर देने को नहीं कह रहीं, बाजार से नई या फिर अपनी अलमारी से पुरानी भेजने को कह रही हैं।(अब यदि उस ही ब्लॉग में कोई कुछ अधिक कह रहा है तो क्या किया जा सकता है? यदि वे ऐसी टिप्पणियों को नहीं छापती तो कहा जाएगा कि विरोध के स्वर वे सह नहीं सकतीं।) हमें बाध्य भी नहीं कर रहीं ऐसा करने को। वे जो कर रही हैं उसका अर्थ हम नहीं समझेंगे। वे इसे क्यों कर रही हैं यह समझने में सोचना पड़ता है, उन्हें समझना पड़ता है, उनके स्थान पर स्वयं को रखकर देखना पड़ता है। यह सोचना पड़ता है कि यदि मैं युवा होती, स्त्री होती तो ये सब परिस्थितियाँ मुझे कैसी लगतीं। वे केवल और केवल एक काम कर रही हैं, इस हास्यास्पद तरीके से कट्टरपंथियों को हास्यास्पद बना रही हैं। हाँ, शायद उन्होंने जानबूझकर इसे ऐसा बनाया ताकि लोगों का ध्यान आकर्शित कर सकें। (बहुत से लोगों ने कट्टरता के विरोध में लिखा, शायद शालीनता से ही लिखा था, मैंने भी लिखा था, परन्तु उसका कितना प्रभाव पड़ा। यह तरीका जैसा भी था ना हिंसक था ना जबर्दस्ती थी। हमें सही लगे तो ठीक न लगे तो ठीक। ) परन्तु नहीं, वे अधिक खतरनाक हैं। आओ, अपनी बेटियों की उनसे रक्षा करें, न कि उनसे जो उन्हें किसी भी क्षण पकड़कर पीट सकते हैं, चोटी से पकड़कर घुमा सकते हैं। वह तो एक बहुत ही मामूली सा अपराध होगा। पब में जाना आवश्यक तो नहीं है, किसी विशेषकर अन्य जाति धर्म के पुरुष से प्रेम करना आवश्यक तो नहीं है, किसी सहपाठी से पुस्तक लेने (या हो सकता है कि वह बतियाने गई हो या प्रेम की पींग चढ़ाने)आवश्यक तो नहीं है। शराब पीने को कोई भी बहुत अच्छा तो नहीं कहेगा, बहुत सी अन्य वस्तुएँ, काम, व्यवहार, यहाँ तक कि परम्पराएँ भी गलत होती हैं। हमें ना भी लगें तो किसी अन्य को लग सकती हैं। हमें जो गलत लगता है वह अपने बच्चों को बाल्यावस्था में ठीक से समझा सकते हैं। अपने मूल्य उन्हें सिखा सकते हैं। जब वे वयस्क हो जाएँगे तो वे इतने समझदार हो चुके होंगे कि अपने निर्णय स्वयं ले सकेंगे। या हम यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय युवा कभी वयस्क माने जाने लायक बुद्धि विकसित नहीं कर पाते? देखते जाइए कल कोई बहुत से अन्य कामों को गलत करार कर देगा। किसी को लड़कियों का लड़कों के साथ चाय पीना भी गलत लग सकता है किसी को लड़कियों का लड़कियों के साथ या अकेले भी चाय पीना गलत लग सकता है। शायद बोतल बंद पानी पीना गलत लग सकता है। शायद उनका पैदा होना ही गलत लग सकता है। हम कहाँ सीमा रेखा खींचेंगे और हम होते कौन हैं किसी का जीवन नियन्त्रित करने वाले? देखते जाइए कल आपको अपने टखने भी दिखाने होंगे जबर्दस्ती दिखाने होंगे।
कोई कह रहा है प्रेम का प्रदर्शन ना करो। घर के अंदर करो। सही है परन्तु घर के अंदर किससे प्रेम करोगे? घर में तो आपके परिवार के लोग रहते हैं,अन्य परिवार, गोत्र (स्त्री पुरुष का प्रेम और विवाह अपने परिवार,गोत्र वाले से तो नहीं हो सकता हमारे समाज व कानून के अनुसार!) के लोग नहीं और यदि किसी अन्य के घर पुस्तक लेने भी जाओगी तो बाहर से दरवाजा बन्द कर दिया जाता है। पार्क में साथ बैठो तो मजनूँ पीटो पुलिस या कोई भी दल पीट देगा, रैस्टॉरैन्ट या पब में बैठने पर भी पिट सकते हो। तब साफ यह क्यों नहीं कहा जाता कि प्रेम मत करो, करो परन्तु उससे जिससे आपके अभिवावक आपका विवाह करें। तो सीधे सीधे यह कहा जा सकता है कि भारत में व्यक्ति को अपनी पसन्द से विवाह करने की अनुमति भले ही हो परन्तु विपरीत लिंग के लोगों के साथ घूमने बात करने की नहीं है। विवाह करने का निर्णय कोई एक दिन में तो लेगा नहीं परन्तु यदि कोई युगल साथ दिखा तो भले मानुष पकड़कर उनका विवाह करवा देंगे। माँग में सिन्दूर भरवा देंगे। तब क्या होगा जब स्त्री सिन्दूर या मंगलसूत्र में विश्वास न करती हो? या उसको विश्वास करने या न करने का अधिकार ही नहीं है? या फिर युवा यदि मिलें तो विक्टोरियन यूरोप की तरह किसी chaparone की तरह घर की किसी वृद्धा को साथ लेकर चलें?
क्या इन युवतियों को इस बात से कोई अन्तर पड़ा होगा कि उन्हें आतंकित करने वाला उनके धर्म के हैं, उनके देशवासी हैं,उनकी संस्कृति के रक्षक हैं? यदि कोई विदेशी या विदेशी संस्कृति वाला यह करता तो क्या अधिक कष्ट होता? शायद कम होता। यदि एक धर्म इतना कट्टरवादी होता जा रहा है तो दूसरा धर्म क्यों पीछे रहे? होड़ लगेगी क्या कि कौन कितना कट्टरवादी हो सकता है, कितना अन्य के जीवन में हस्तक्षेप कर सकता है? जिस संस्कृति की रक्षा की बात हम करते हैं, उस संस्कृति की विशेषता ही उनका उदार होना रहा था। या हम उस संस्कृति को अपना कहना चाह रहे हैं जो विदेशी आक्रमणों के बाद किन्हीं मजबूरियों में अपनाई गईं? हमारी संस्कृति में तो जिस मर्जी भगवान को पूजो, या ना पूजो, भगवान के अस्तित्व को न मानने वाले भी थे। शास्त्रार्थ होते थे। परन्तु वह काम कठिन है जोर जबर्दस्ती सरल व टिकाऊ व सस्ता उपाय है।
यह तर्क दिया जा रहा है कि आज तक तो तुम नहीं बोलीं,जब स्त्रियों को जलाया जाता है, जब कश्मीर में लड़कियों को बुरका पहनने को कहा जाता है,जब दहेज की माँग होती है, जब फतवे दिए जाते हैं, तो आज क्यों बोल रही हो? कल नहीं बोले तो क्या आज अपना बोलने का अधिकार खो दिया? वैसे सही आगाह कर रहे हैं, क्योंकि यदि आज भी नहीं बोले तो भविष्य में बोलने का अधिकार ही छीना जा चुका होगा। इस तर्क के अनुसार तो जब हमने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली तो फिर अंग्रेजों की क्यों नहीं? अग्रेजों को भगाना भी गलत रहा होगा, उनके हमें गुलाम बनाने के अधिकार का हनन था। भगाना था तो पहले मुगलों को भगाते, भूतकाल में जाकर भगाते। सोचने की बात है कि संसार में बहुत कुछ गलत होता है, हम सहमत नहीं होते,हम प्रत्येक गलत को गलत मानते हैं परन्तु जब हमारे अपने अधिकारों का हनन होता है या हमारे जीने के तरीके पर आक्रमण होता है तो हम अधिक खुल कर बोलते हैं। कोई किसी अन्य के ब्लॉग पर जाकर गाली देता है, हम उसे गलत मानते हैं, हो सकता है लिख भी दें कि यह गलत है परन्तु जब कोई हमारे ब्लॉग पर आकर गाली देता है तो हम उसका अधिक मुखर होकर विरोध करते हूँ,अधिक आहत होते हैं। यह स्वाभाविक है। क्या जब अध्यापक अपनी माँगों के लिए जलूस निकालते हैं,धरना देते हैं तो बैंक कर्मचारी भी धरने पर आ बैठते हैं? तो क्या जब वे अपनी किसी माँग के लिए धरना दें तो हम कहेंगे कि जब अध्यापकों के अधिकारों की लड़ाई हो रही थी तब आप चुप थे सो अब भी चुप बैठिए। अब क्यों नारे लगा रहे हो?
हम सहमत होएँ असहमत होएँ यह हमारा अपना अधिकार है। सब नया सही नहीं, सब पुराना भी सही नहीं। हमें अपने मूल्य स्वयं बनाने होंगे। सबका दृष्टिकोण अलग होता है। यही तो मानव व मानव में अन्तर है। प्रत्येक बरगद के पेड़ की आवश्यकता एक होती है,प्रत्येक हिरण की आवश्यकता एक होती है। उनमें दृष्टिकोण नामक वस्तु शायद ही पाई जाती है। परन्तु मानव के पास अपना दृष्टिकोण होता है। हमें एक दूसरे के दृष्टिकोण का आदर करना व उन्हें उन्हें मानने के अधिकार का आदर करना होगा ही। अन्यथा हम तो रहेंगे परन्तु हमारा दृष्टिकोण रखने का अधिकार नहीं। और वह दिन ऐसा होगा कि हम उसकी यदि कल्पना करें तो हमारा हृदय दहल जाएगा। हमारी अपनी वंश बेल को बनाए रखने की प्रकृति प्रदत्त इच्छा भी सिहर जाएगी। अपनी संतानों को ऐसा जीवन देने से पहले हम बार बार सोचेंगे। मुझसे असहमत होइए, आपका स्वागत है, परन्तु जरा उस भयंकर संसार की कल्पना भी कीजिए। बस एक बार फिर अपने पिछले लेख की तरह यहाँ भी लिखूँगी कि जब कट्टरवाद आएगा तो केवल लड़कियों को, स्त्रियों को, युवाओं को ही अपने चंगुल में नहीं लेगा एक दिन अच्छे बड़े बुजुर्गों को भी अपनी चपेट में ले लेगा। सोचिए हम कहाँ जा रहे हैं? हाँ लगे हाथ अपने बच्चों को कुछ जीवन मूल्य भी सिखा दें।
घुघूती बासती
जिंद में एक लड़की को बाल पकड़कर गोल गोल घुमाया गया। चौकी इनचार्ज केवल संस्पेंड। मुझे अपनी बेटी से कहना पड़ता था कि बेटा जब ट्रेन यात्रा करती हो तो साथ में शादी का प्रमाणपत्र लेकर जाया करो। यह है मेरा भारत महान! सन ७७ में जब मैं ऐसा कोई सबूत लेकर नहीं चलती थी तो आज अपनी बेटी को यह सलाह देती हूँ। क्यों, क्योंकि हम बढ़ रहे हैं तेजी से १४वीं शताब्दी की ओर! संसार, देखते जाओ! भारत बढ़ रहा है तेजी से सबको पीछे छोड़ता हुआ।
मुझे याद है कि हमारे समय में भी हम लड़कियाँ अपने सहपाठियों के घर जाती थीं। दरवाजा खुला होता था। शायद तब संस्कृति के ठेकेदार पड़ोसी नहीं थे। अतः कोई बाहर से दरवाजा बन्द नहीं करता था। अन्यथा यह हम में से किसी के साथ भी हो सकता था।
मैं नहीं जानती कि वह लड़की अपने सहपाठी के साथ क्या आपराधिक कृत्य कर रही थी। परन्तु हत्यारे को भी, जब वह हमारे जीवन पर खतरा ना हो, हम पीट नहीं सकते, केवल कानून के हवाले कर सकते हैं और आशा कर सकते हैं कि वह उसे सजा दे तो क्या उस लड़की का अपराध हत्या से भी बड़ा था? हो सकता है कि बहुत से लोगों को लड़के लड़कियाँ का आपस में बात करना भी गलत लगता हो। ऐसे में उन लोगों के पास पूरा अधिकार है कि वे स्वयं को विपरीत लिंग से बचाकर रखें। यदि कोई उनपर दबाव डालेगा कि वे बातचीत करें, दोस्ती करें तो वह भी गलत होगा।
आजतक हम स्कूली बच्चों को नैतिक ज्ञान , मोरल साइंस पढ़ाते थे, सेक्स एजुकेशन की बात करते थे। अब समय आ गया है कि बच्चों को संविधान द्वारा दिए गए अन्य लोगों के अधिकारों के बारे में पढ़ाएँ। जैसे एम बी ए आदि में केस स्टडीज़ पढ़ाई जाती हैं, उनपर लेख लिखने को कहा जाता है उसी तरह से अन्य लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों का हनन करने वाले लोगों को क्या सजा दी जाती है, पढ़ाया जाए, उन्हें काल्पनिक या सत्य मामलों पर क्या किया जाना चाहिए, कैसे और क्या न्याय दिया जाना चाहिए आदि पर विचार करने को प्रेरित किया जाना चाहिए।
मानवाधिकार हनन, किसी की निजी स्वतन्त्रता का हनन हत्या से भी बड़ा अपराध है। हत्यारा किसी एक या दो का जीवन समाप्त करता है परन्तु निजी स्वतन्त्रता का हनन करने वाले तो जीवन को जीने योग्य ही नहीं रहने देते। जब निजी अधिकार ही नहीं रहेंगे तो जीवन का हम करेंगे भी क्या सिवाय एक बोझ की तरह ढोने के ? जी तो तिलचच्टे भी लेते हैं। पशुओं में ही शक्तिशाली का पूरे समूह पर शासन होता है। क्या यही स्थिति हम मनुष्यों में लाना चाहते हैं? स्त्रियों के नौकरी करने, बिन ब्याही माँ बनने से तो अपने परिवारों, समाज के नष्ट होने का भय हमें हो रहा है, परन्तु हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यदि निजी अधिकार रहे तो हम अपने बच्चों को बचपन में अपने जीवन मूल्य सिखा सकते हैं और यदि सफल रहे तो इन मूल्यों को बचाने की आशा कर सकते हैं परन्तु यदि समाज में ऐसा कट्टरपन आ गया तो वह समय दूर नहीं जब अपने मूल्य सिखाने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा क्योंकि हमें, हमारे बच्चों को इन कट्टरपंथियों के मूल्यों के अनुसार खाना, पीना, रहना, पढ़ना या न पढ़ना, जीना होगा। मुझे नहीं लगता की ऐसे समाज में नई पीढ़ी को लाना एक खुशी मनाने का अवसर रह जाएगा। वह केवल और केवल एक अन्य मानव को पशु से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर करना ही होगा। हमारे बच्चे दुखी होंगे कि वे पैदा ही क्यों हुए, वह भी तब जब उनमें कुछ सोचने की शक्ति रह जाएगी। हो सकता है वे भी कट्टरपंथियों की तरह हमारे ही सिर पर डंडा लेकर खड़े हो जाएँ, हमारी शिकायत हमारे उन आकाओं से करें कि हम घर में उनके आदेशानुसार नहीं जी रहे। जरा कल्पना कीजिए। कल्पना करने में कोई हानि नहीं है। यदि मैं आज से छह वर्ष पहले ही आने वाले समय की कल्पना कर बेटी से विवाह का प्रमाण पत्र लेकर चलने को कहती थी, इसलिए नहीं कि मुझे उसके किसी पुरुष के साथ चलने पर आपत्ति थी अपितु इसलिए कि मैं आने वाले खतरे के कदमों की आहट सुन पा रही थी। बेहतर होगा कि हम अपने पिता, भाई, चाचा, मामा आदि से अपने खून के रिश्ते का प्रमाणपत्र भी फोटो सहित लेकर घूमें। हो सके तो डी एन ए टेस्टिंग की रिपोर्ट व माता पिता के विवाह का प्रमाणपत्र भी साथ लेकर चलें। अन्यथा ऐसा ना हो कि उज्जैन या किसी भी अन्य शहर की तरह हमारे शहर के लोग भी हमें भाई के साथ कहीं जाने पर पीट डालें, चोटी से पकड़कर घुमा डालें। इससे पहले कि हममें से किसी को अश्विनी बनकर अपने साथ हुए घोर अन्याय की पीड़ा से छुटकारा पाने को गले में फाँसी का फंदा डालना पड़े या तो ऐसे अन्यायों के विरुद्ध हमें बोलना होगा या फिर प्रमाणपत्र आदि से लैस होकर सड़कों पर चलना होगा या किसी के घर जाना होगा। बेहतर व अधिक सुरक्षित तो यह होगा कि घर से बाहर ही ना जाएँ, पुत्रियों को जन्म ही न दें, यदि दुर्भाग्य से दे दें तो उन्हें घर में ही रखें।
जिन्हें यह चिन्ता हो रही है कि आँकड़े बताते हैं कि स्त्रियों को स्वतन्त्रता मिलने के बाद अमेरिका में विवाह के बाहर बच्चों के जन्म में वृद्धि हुई है वे साऊदी अरब या ऐसे ही किसी देश के आँकड़ों पर भी नजर डालें। वहाँ यह संख्या शून्य है। फिर हम वहाँ के कानून यहाँ लागू क्यों नहीं कर देते? वहाँ अपराध भी बहुत कम है। वहाँ यह नहीं होता कि कोई स्त्री तो राष्ट्रपति बन जाती है, कोई प्रधानमंत्री, कोई मुख्यमंत्री तो कोई किसी अन्य धर्म के पुरुष के साथ बात करने, यात्रा करने या प्रेम करने के अपराध में बस से घसीटी जाती हो, कोई किसी लड़के मित्र के घर में बाहर से बन्द कर दी जाती हो, फिर पुलिस द्वारा चोटी से पकड़कर चकरघन्नी की तरह घुमाई जाती हो। वहाँ राजकुमारी को भी उन अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया जाता है जिनके लिए एक आम स्त्री को। वहाँ कोई लड़की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री बनने के सवप्न सजाने का दुस्साहस नहीं करती होगी। यहाँ हम पहले अपनी बेटियों को समानता, आकाश छूने के स्वप्न दिखाते हैं और यदि वह हमारे या समाज के अपेक्षित नहीं चलती तो या तो उनकी हत्या हम स्वयं अपने कथित सम्मान की रक्षा के लिए कर देते हें या हमारे संस्कृति के रक्षक उन्हें प्रताड़ित कर मृत्यु को गले लगाने को बाध्य कर देते हैं। ये घटनाएं अपने आप में अपवाद हो सकती हैं, परन्तु यदि नहीं रोकी गईं तो ये आम हो जाएँगी और तब हमें अपनी बेटियों की भ्रूण हत्या करना एक बेहतर और दयालु समाधान लगेगा।
तब तक,
चलिए हम पिंक चड्ढी वालों के विरोध के तरीके का विरोध करें। क्योंकि उनका तरीका संस्कृति के रक्षकों से अधिक खतरनाक है। हम यह ना देखें कि वे अपने वस्त्र उतारकर देने को नहीं कह रहीं, बाजार से नई या फिर अपनी अलमारी से पुरानी भेजने को कह रही हैं।(अब यदि उस ही ब्लॉग में कोई कुछ अधिक कह रहा है तो क्या किया जा सकता है? यदि वे ऐसी टिप्पणियों को नहीं छापती तो कहा जाएगा कि विरोध के स्वर वे सह नहीं सकतीं।) हमें बाध्य भी नहीं कर रहीं ऐसा करने को। वे जो कर रही हैं उसका अर्थ हम नहीं समझेंगे। वे इसे क्यों कर रही हैं यह समझने में सोचना पड़ता है, उन्हें समझना पड़ता है, उनके स्थान पर स्वयं को रखकर देखना पड़ता है। यह सोचना पड़ता है कि यदि मैं युवा होती, स्त्री होती तो ये सब परिस्थितियाँ मुझे कैसी लगतीं। वे केवल और केवल एक काम कर रही हैं, इस हास्यास्पद तरीके से कट्टरपंथियों को हास्यास्पद बना रही हैं। हाँ, शायद उन्होंने जानबूझकर इसे ऐसा बनाया ताकि लोगों का ध्यान आकर्शित कर सकें। (बहुत से लोगों ने कट्टरता के विरोध में लिखा, शायद शालीनता से ही लिखा था, मैंने भी लिखा था, परन्तु उसका कितना प्रभाव पड़ा। यह तरीका जैसा भी था ना हिंसक था ना जबर्दस्ती थी। हमें सही लगे तो ठीक न लगे तो ठीक। ) परन्तु नहीं, वे अधिक खतरनाक हैं। आओ, अपनी बेटियों की उनसे रक्षा करें, न कि उनसे जो उन्हें किसी भी क्षण पकड़कर पीट सकते हैं, चोटी से पकड़कर घुमा सकते हैं। वह तो एक बहुत ही मामूली सा अपराध होगा। पब में जाना आवश्यक तो नहीं है, किसी विशेषकर अन्य जाति धर्म के पुरुष से प्रेम करना आवश्यक तो नहीं है, किसी सहपाठी से पुस्तक लेने (या हो सकता है कि वह बतियाने गई हो या प्रेम की पींग चढ़ाने)आवश्यक तो नहीं है। शराब पीने को कोई भी बहुत अच्छा तो नहीं कहेगा, बहुत सी अन्य वस्तुएँ, काम, व्यवहार, यहाँ तक कि परम्पराएँ भी गलत होती हैं। हमें ना भी लगें तो किसी अन्य को लग सकती हैं। हमें जो गलत लगता है वह अपने बच्चों को बाल्यावस्था में ठीक से समझा सकते हैं। अपने मूल्य उन्हें सिखा सकते हैं। जब वे वयस्क हो जाएँगे तो वे इतने समझदार हो चुके होंगे कि अपने निर्णय स्वयं ले सकेंगे। या हम यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय युवा कभी वयस्क माने जाने लायक बुद्धि विकसित नहीं कर पाते? देखते जाइए कल कोई बहुत से अन्य कामों को गलत करार कर देगा। किसी को लड़कियों का लड़कों के साथ चाय पीना भी गलत लग सकता है किसी को लड़कियों का लड़कियों के साथ या अकेले भी चाय पीना गलत लग सकता है। शायद बोतल बंद पानी पीना गलत लग सकता है। शायद उनका पैदा होना ही गलत लग सकता है। हम कहाँ सीमा रेखा खींचेंगे और हम होते कौन हैं किसी का जीवन नियन्त्रित करने वाले? देखते जाइए कल आपको अपने टखने भी दिखाने होंगे जबर्दस्ती दिखाने होंगे।
कोई कह रहा है प्रेम का प्रदर्शन ना करो। घर के अंदर करो। सही है परन्तु घर के अंदर किससे प्रेम करोगे? घर में तो आपके परिवार के लोग रहते हैं,अन्य परिवार, गोत्र (स्त्री पुरुष का प्रेम और विवाह अपने परिवार,गोत्र वाले से तो नहीं हो सकता हमारे समाज व कानून के अनुसार!) के लोग नहीं और यदि किसी अन्य के घर पुस्तक लेने भी जाओगी तो बाहर से दरवाजा बन्द कर दिया जाता है। पार्क में साथ बैठो तो मजनूँ पीटो पुलिस या कोई भी दल पीट देगा, रैस्टॉरैन्ट या पब में बैठने पर भी पिट सकते हो। तब साफ यह क्यों नहीं कहा जाता कि प्रेम मत करो, करो परन्तु उससे जिससे आपके अभिवावक आपका विवाह करें। तो सीधे सीधे यह कहा जा सकता है कि भारत में व्यक्ति को अपनी पसन्द से विवाह करने की अनुमति भले ही हो परन्तु विपरीत लिंग के लोगों के साथ घूमने बात करने की नहीं है। विवाह करने का निर्णय कोई एक दिन में तो लेगा नहीं परन्तु यदि कोई युगल साथ दिखा तो भले मानुष पकड़कर उनका विवाह करवा देंगे। माँग में सिन्दूर भरवा देंगे। तब क्या होगा जब स्त्री सिन्दूर या मंगलसूत्र में विश्वास न करती हो? या उसको विश्वास करने या न करने का अधिकार ही नहीं है? या फिर युवा यदि मिलें तो विक्टोरियन यूरोप की तरह किसी chaparone की तरह घर की किसी वृद्धा को साथ लेकर चलें?
क्या इन युवतियों को इस बात से कोई अन्तर पड़ा होगा कि उन्हें आतंकित करने वाला उनके धर्म के हैं, उनके देशवासी हैं,उनकी संस्कृति के रक्षक हैं? यदि कोई विदेशी या विदेशी संस्कृति वाला यह करता तो क्या अधिक कष्ट होता? शायद कम होता। यदि एक धर्म इतना कट्टरवादी होता जा रहा है तो दूसरा धर्म क्यों पीछे रहे? होड़ लगेगी क्या कि कौन कितना कट्टरवादी हो सकता है, कितना अन्य के जीवन में हस्तक्षेप कर सकता है? जिस संस्कृति की रक्षा की बात हम करते हैं, उस संस्कृति की विशेषता ही उनका उदार होना रहा था। या हम उस संस्कृति को अपना कहना चाह रहे हैं जो विदेशी आक्रमणों के बाद किन्हीं मजबूरियों में अपनाई गईं? हमारी संस्कृति में तो जिस मर्जी भगवान को पूजो, या ना पूजो, भगवान के अस्तित्व को न मानने वाले भी थे। शास्त्रार्थ होते थे। परन्तु वह काम कठिन है जोर जबर्दस्ती सरल व टिकाऊ व सस्ता उपाय है।
यह तर्क दिया जा रहा है कि आज तक तो तुम नहीं बोलीं,जब स्त्रियों को जलाया जाता है, जब कश्मीर में लड़कियों को बुरका पहनने को कहा जाता है,जब दहेज की माँग होती है, जब फतवे दिए जाते हैं, तो आज क्यों बोल रही हो? कल नहीं बोले तो क्या आज अपना बोलने का अधिकार खो दिया? वैसे सही आगाह कर रहे हैं, क्योंकि यदि आज भी नहीं बोले तो भविष्य में बोलने का अधिकार ही छीना जा चुका होगा। इस तर्क के अनुसार तो जब हमने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली तो फिर अंग्रेजों की क्यों नहीं? अग्रेजों को भगाना भी गलत रहा होगा, उनके हमें गुलाम बनाने के अधिकार का हनन था। भगाना था तो पहले मुगलों को भगाते, भूतकाल में जाकर भगाते। सोचने की बात है कि संसार में बहुत कुछ गलत होता है, हम सहमत नहीं होते,हम प्रत्येक गलत को गलत मानते हैं परन्तु जब हमारे अपने अधिकारों का हनन होता है या हमारे जीने के तरीके पर आक्रमण होता है तो हम अधिक खुल कर बोलते हैं। कोई किसी अन्य के ब्लॉग पर जाकर गाली देता है, हम उसे गलत मानते हैं, हो सकता है लिख भी दें कि यह गलत है परन्तु जब कोई हमारे ब्लॉग पर आकर गाली देता है तो हम उसका अधिक मुखर होकर विरोध करते हूँ,अधिक आहत होते हैं। यह स्वाभाविक है। क्या जब अध्यापक अपनी माँगों के लिए जलूस निकालते हैं,धरना देते हैं तो बैंक कर्मचारी भी धरने पर आ बैठते हैं? तो क्या जब वे अपनी किसी माँग के लिए धरना दें तो हम कहेंगे कि जब अध्यापकों के अधिकारों की लड़ाई हो रही थी तब आप चुप थे सो अब भी चुप बैठिए। अब क्यों नारे लगा रहे हो?
हम सहमत होएँ असहमत होएँ यह हमारा अपना अधिकार है। सब नया सही नहीं, सब पुराना भी सही नहीं। हमें अपने मूल्य स्वयं बनाने होंगे। सबका दृष्टिकोण अलग होता है। यही तो मानव व मानव में अन्तर है। प्रत्येक बरगद के पेड़ की आवश्यकता एक होती है,प्रत्येक हिरण की आवश्यकता एक होती है। उनमें दृष्टिकोण नामक वस्तु शायद ही पाई जाती है। परन्तु मानव के पास अपना दृष्टिकोण होता है। हमें एक दूसरे के दृष्टिकोण का आदर करना व उन्हें उन्हें मानने के अधिकार का आदर करना होगा ही। अन्यथा हम तो रहेंगे परन्तु हमारा दृष्टिकोण रखने का अधिकार नहीं। और वह दिन ऐसा होगा कि हम उसकी यदि कल्पना करें तो हमारा हृदय दहल जाएगा। हमारी अपनी वंश बेल को बनाए रखने की प्रकृति प्रदत्त इच्छा भी सिहर जाएगी। अपनी संतानों को ऐसा जीवन देने से पहले हम बार बार सोचेंगे। मुझसे असहमत होइए, आपका स्वागत है, परन्तु जरा उस भयंकर संसार की कल्पना भी कीजिए। बस एक बार फिर अपने पिछले लेख की तरह यहाँ भी लिखूँगी कि जब कट्टरवाद आएगा तो केवल लड़कियों को, स्त्रियों को, युवाओं को ही अपने चंगुल में नहीं लेगा एक दिन अच्छे बड़े बुजुर्गों को भी अपनी चपेट में ले लेगा। सोचिए हम कहाँ जा रहे हैं? हाँ लगे हाथ अपने बच्चों को कुछ जीवन मूल्य भी सिखा दें।
घुघूती बासती
Thursday, February 12, 2009
' खूब पुन्न कमाएगी तू तो!'
बात तब की है जब हम मध्यप्रदेश में रहते थे। हमारा मकान कॉलोनी में आखिरी था और उसके बाद कारखाने का क्षेत्र खत्म होकर कस्बे का बाज़ार शुरू हो जाता था। हमसे काफी पहले वहाँ किसी सज्जन ने जनहित के लिए हमारे बगीचे से पाइप आगे बढ़वाकर दीवार के बाहर एक नल लगवा दिया था। बात तो बहुत बढ़िया थी, जनहित में भी थी, परन्तु जनहित कभी कभी स्वहित का शत्रु बन जाता है।
नल से पानी भरना, बहुत अच्छा, नल पर लोगों का स्नान करना, कपड़े धोना, कोई बात नहीं, दीवार तो थी ही, सो उस तरफ हमें नजर थोड़े ही आता था कि क्या हो रहा है। परन्तु कपड़े धोने वाले कपड़े दीवार पर सूखने डाल देते थे फिर जब वे उड़कर हमारे बगीचे में आते तो दीवार फाँदकर कपड़े लेने बगीचे के अन्दर आ जाते। नहाने वाले अपनी बारी की प्रतीक्षा में हमारी दीवार पर बैठे रहते, गप्पें मारते। बरतनों,बाल्टियों के शोर में उनकी बातों, या जब कोई संगीतमय अनुभव करे, तो गानों का भी शोर सम्मिलित हो जाता। यहाँ तक भी ठीक था परन्तु यदि कभी पानी चले जाता तो उन्हें लगता कि इसमें कोई ना कोई गड़बड़ हमारे बगीचे की ओर से हुई है, वे नल को हिलाते, पाइप को जोर जोर से हिलाते जैसे पाइप को सोए से जगा रहे हों। जब बात तब भी नहीं बनती तो चिल्ला चिल्लाकर पूछते कि पानी क्यों बंद हो गया। फिर छलांग लगाकर अंदर आकर जाँच पड़ताल करते।
बात यहाँ तक भी रहती तो गनीमत थी। नल पर तो लगभग सदा ही नहाने वाले पुरुषों का तांता लगा रहता। सो बहुत सी स्त्रियाँ सीधे हमारे बगीचे के नल से ही पानी भरने लगतीं। एक बार एक अधेड़ सी स्त्री बगीचे के नल से पानी भरने आई। मैंने कहा कि आप बाहर वाले नल से पानी क्यों नहीं भर लेतीं। उन्होंने मेरे पुरखों तक को जो गालियाँ दीं और मुझे भी पानी पिलाने के पुण्य के बारे में जो ज्ञान दिया वह आज तक याद है। वैसे तो मुझे चेहरे याद नहीं रहते परन्तु उसका चेहरा आज तक याद है। 'खूब पुन्न कमाएगी तू तो! लोग तो प्याऊ लगाते हैं और तू हमें पानी भरने से रोक रही है। सीधे नरक जाएगी तू तो!खूब पुन्न कमाएगी तू तो!'
आज भी जब पाप पुण्य शब्द सुनती हूँ तो उसका चेहरा और 'खूब पुन्न कमाएगी तू तो!'सहज ही याद आ जाते हैं। एक आदमी भी याद आ जाता है जो पेड़ों पर फूल वापिस चिपका सकता था। परन्तु जो मुझे नरक जाने की दुआएँ देता रहा।
मुझे बगीचे का बहुत शौक है,सो सदा जहाँ भी जाती हूँ, ढेरों फूलों के पौधे, फलों के पेड़ अवश्य लगाती, लगवाती हूँ। वहाँ भी गुलाब के पौधे लगाए थे। मित्रों के बगीचों से फूलों के बीज इकट्ठा करना, गुलाब की कलम लेना, मैं सदा ही करती रही हूँ। सो जब मेरे गुलाब के पौधों में कलियाँ लगीं मुझे बहुत खुशी हुई। परन्तु फूल खिले देखने को मैं सदा ही तरसती रह जाती थी। पिछली शाम कुछ कलियाँ दिखतीं और जब तक मैं बच्चों को तैयार कर स्कूल के लिए निकलने लगती फूल तोड़े जा चुके होते थे। एक बार मैंने एक आदमी को फूल तोड़ते हुए देख लिया। मैंने उससे पूछा कि वह फूल क्यों तोड़ रहा है। उसने इसे मेरे सामान्य ज्ञान की कमी मानते हुए उसमें वृद्धि करते हुए कहा कि पूजा के लिए तोड़ रहा है। मैंने कहा कि इस तरह किसी के बगीचे से फूल मत तोड़ा करो। यह गलत है। तो उसने मुझे कहा'अब तो तोड़ चुका, कहो तो वापिस चिपका दूँ?'मन तो बहुत कर रहा था कि कहूँ कि हाँ वापिस चिपका दो। परन्तु स्कूल जाने को देर हो रही थी और मैं उसे यह जादूगरी कर दिखाने का निमन्त्रण न देकर केवल दो चार बातें अपने नास्तिक होने व नरक में जाने की सुनकर स्कूल चली गई।
आज तक मुझे समझ नहीं आया कि क्या दूसरों के बगीचे से तोड़े हुए फूलों से उन आस्तिकों के भगवान खुश होते होंगे? क्या सच में बाहर नल लगा होने पर भी अपने बगीचे से पानी भरने को मना करना, थोड़े से व्यक्तिगत एकान्त की कामना करना बहुत बड़ा अपराध था? क्या निजी नामक शब्द हमारे देश में सामाजिक अपराध है?
आज ये सब बातें श्री सुरेश चिपलूनकर जी के लेख को पढ़कर याद आ गईं। शायद कुएँ वाले महाशय को भी कभी शान्ति नहीं मिलती होगी। दिन रात कुँए पर उत्सव सा माहौल बना रहता हो या फिर वहाँ पानी को लेकर युद्ध होते हों। जो भी हो मुझे पता है मरकर मुझे कहाँ जाना है। तभी तो जब एक अन्य स्थान पर भी मेरे बगीचे से ठीक मेरे सोने के कमरे के पीछे जब सुबह छह बजे 'पानी भरो' कार्यक्रम तेलुगु में लड़ाई झगड़ों व जोर जोर की बातचीत के साथ सम्पन्न होता तो मैं चुपचाप उस नरक, जहाँ का भय मुझे पहले भी दिखाया गया था, की कल्पना करती रहती, कहती कुछ नहीं थी।
घुघूती बासूती
नल से पानी भरना, बहुत अच्छा, नल पर लोगों का स्नान करना, कपड़े धोना, कोई बात नहीं, दीवार तो थी ही, सो उस तरफ हमें नजर थोड़े ही आता था कि क्या हो रहा है। परन्तु कपड़े धोने वाले कपड़े दीवार पर सूखने डाल देते थे फिर जब वे उड़कर हमारे बगीचे में आते तो दीवार फाँदकर कपड़े लेने बगीचे के अन्दर आ जाते। नहाने वाले अपनी बारी की प्रतीक्षा में हमारी दीवार पर बैठे रहते, गप्पें मारते। बरतनों,बाल्टियों के शोर में उनकी बातों, या जब कोई संगीतमय अनुभव करे, तो गानों का भी शोर सम्मिलित हो जाता। यहाँ तक भी ठीक था परन्तु यदि कभी पानी चले जाता तो उन्हें लगता कि इसमें कोई ना कोई गड़बड़ हमारे बगीचे की ओर से हुई है, वे नल को हिलाते, पाइप को जोर जोर से हिलाते जैसे पाइप को सोए से जगा रहे हों। जब बात तब भी नहीं बनती तो चिल्ला चिल्लाकर पूछते कि पानी क्यों बंद हो गया। फिर छलांग लगाकर अंदर आकर जाँच पड़ताल करते।
बात यहाँ तक भी रहती तो गनीमत थी। नल पर तो लगभग सदा ही नहाने वाले पुरुषों का तांता लगा रहता। सो बहुत सी स्त्रियाँ सीधे हमारे बगीचे के नल से ही पानी भरने लगतीं। एक बार एक अधेड़ सी स्त्री बगीचे के नल से पानी भरने आई। मैंने कहा कि आप बाहर वाले नल से पानी क्यों नहीं भर लेतीं। उन्होंने मेरे पुरखों तक को जो गालियाँ दीं और मुझे भी पानी पिलाने के पुण्य के बारे में जो ज्ञान दिया वह आज तक याद है। वैसे तो मुझे चेहरे याद नहीं रहते परन्तु उसका चेहरा आज तक याद है। 'खूब पुन्न कमाएगी तू तो! लोग तो प्याऊ लगाते हैं और तू हमें पानी भरने से रोक रही है। सीधे नरक जाएगी तू तो!खूब पुन्न कमाएगी तू तो!'
आज भी जब पाप पुण्य शब्द सुनती हूँ तो उसका चेहरा और 'खूब पुन्न कमाएगी तू तो!'सहज ही याद आ जाते हैं। एक आदमी भी याद आ जाता है जो पेड़ों पर फूल वापिस चिपका सकता था। परन्तु जो मुझे नरक जाने की दुआएँ देता रहा।
मुझे बगीचे का बहुत शौक है,सो सदा जहाँ भी जाती हूँ, ढेरों फूलों के पौधे, फलों के पेड़ अवश्य लगाती, लगवाती हूँ। वहाँ भी गुलाब के पौधे लगाए थे। मित्रों के बगीचों से फूलों के बीज इकट्ठा करना, गुलाब की कलम लेना, मैं सदा ही करती रही हूँ। सो जब मेरे गुलाब के पौधों में कलियाँ लगीं मुझे बहुत खुशी हुई। परन्तु फूल खिले देखने को मैं सदा ही तरसती रह जाती थी। पिछली शाम कुछ कलियाँ दिखतीं और जब तक मैं बच्चों को तैयार कर स्कूल के लिए निकलने लगती फूल तोड़े जा चुके होते थे। एक बार मैंने एक आदमी को फूल तोड़ते हुए देख लिया। मैंने उससे पूछा कि वह फूल क्यों तोड़ रहा है। उसने इसे मेरे सामान्य ज्ञान की कमी मानते हुए उसमें वृद्धि करते हुए कहा कि पूजा के लिए तोड़ रहा है। मैंने कहा कि इस तरह किसी के बगीचे से फूल मत तोड़ा करो। यह गलत है। तो उसने मुझे कहा'अब तो तोड़ चुका, कहो तो वापिस चिपका दूँ?'मन तो बहुत कर रहा था कि कहूँ कि हाँ वापिस चिपका दो। परन्तु स्कूल जाने को देर हो रही थी और मैं उसे यह जादूगरी कर दिखाने का निमन्त्रण न देकर केवल दो चार बातें अपने नास्तिक होने व नरक में जाने की सुनकर स्कूल चली गई।
आज तक मुझे समझ नहीं आया कि क्या दूसरों के बगीचे से तोड़े हुए फूलों से उन आस्तिकों के भगवान खुश होते होंगे? क्या सच में बाहर नल लगा होने पर भी अपने बगीचे से पानी भरने को मना करना, थोड़े से व्यक्तिगत एकान्त की कामना करना बहुत बड़ा अपराध था? क्या निजी नामक शब्द हमारे देश में सामाजिक अपराध है?
आज ये सब बातें श्री सुरेश चिपलूनकर जी के लेख को पढ़कर याद आ गईं। शायद कुएँ वाले महाशय को भी कभी शान्ति नहीं मिलती होगी। दिन रात कुँए पर उत्सव सा माहौल बना रहता हो या फिर वहाँ पानी को लेकर युद्ध होते हों। जो भी हो मुझे पता है मरकर मुझे कहाँ जाना है। तभी तो जब एक अन्य स्थान पर भी मेरे बगीचे से ठीक मेरे सोने के कमरे के पीछे जब सुबह छह बजे 'पानी भरो' कार्यक्रम तेलुगु में लड़ाई झगड़ों व जोर जोर की बातचीत के साथ सम्पन्न होता तो मैं चुपचाप उस नरक, जहाँ का भय मुझे पहले भी दिखाया गया था, की कल्पना करती रहती, कहती कुछ नहीं थी।
घुघूती बासूती
Sunday, February 01, 2009
वसन्त पंचमी, तख्ती, काली स्याही,गाचनी,पाठशाला और मैं।
वसन्त पंचमी ! कभी इसका आना यूँ इतना चुपचाप न होता था। तब पीले वस्त्र पहनते थे। कम से कम रूमाल तो पीला रंगा ही जाता था। खेतों में सरसों के फूल होते थे। अब तो सरसों ही देखे जमाना बीत गया। आज वसन्त पंचमी आई भी और चली गई।
आज के दिन ही तो मंदिर से शास्त्री जी को बुलवाकर मेरी पढ़ाई का शुभारंभ हुआ था। लकड़ी की तख्ती हल्दी मिली गाचनी (मुल्तानी मिट्टी) से पोती गई थी। एक दवात में चमचमाती हुई काली स्याही थी। हाथ में कलम पकड़ा कर ॐ लिखवाया गया था। फिर मंदिर में पढ़ने भेजा जाने लगा था।
वह मंदिर! जब भी मंदिर शब्द सोचती हूँ तो पिताजी व उनके कुछ साथियों द्वारा मिलकर सालों चंदा इकट्ठा करके बनाया वही अपने जन्म स्थान का मंदिर याद आता है। कितना भव्य मंदिर था!मंदिर के प्रांगण में शिव की मूर्ति जिसकी जटा से गंगा की तरह हर समय पानी निकलता रहता था। साथ में छोटा सा तालाब सा था। फिर एक बड़ा सा हॉल और फिर राधा और कृष्ण की मूर्तियाँ !बाहर की तरफ से ही दोनों ओर दो छोटे शिव और दुर्गा के मंदिर थे। मंदिर के साथ एक तरफ शहतूत के पेड़ों वाला बड़ा सा बाग था। दूसरी तरफ लम्बा चौड़ा मैदान और स्टेज। वहीं पर राम लीला हुआ करती थी। वहीं पर वसन्त पंचमी के दिन बच्चों का कविता पाठ, भजन गायन आदि का कार्यक्रम हुआ करता था।
मंदिर में ही एक छोटी सी पाठशाला थी। जहाँ के.जी.(कच्ची,पक्की )से लेकर छठी कक्षा तक की पढ़ाई होती थी। मंदिर के किनारे ही शास्त्री जी के रहने को घर था और धर्मशाला के कुछ कमरे थे। मंदिर के बाहर मंदिर द्वारा बनाई किराये पर दी कई सारी दुकानें थीं।
पिताजी जब सन ४४या ४५ में पंजाब के उस कारखाने में गए थे तो आसपास के गाँव में मन्दिर नहीं था,पाठशाला नहीं थी। कारखाने का अपना स्कूल था परन्तु गाँव के बच्चे वहाँ नहीं पढ़ सकते थे। दुकानें भी एक दो व बहुत दूर थीं। उस समय के पंजाब में खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों के अलावा कुछ नहीं मिलता था। शायद अरहर की दाल भी नही। साड़ी,धोती भी नहीं मिलती थी। हिन्दी का समाचार पत्र, पत्रिका भी नहीं। स्त्रियाँ घरों से बाहर नहीं निकलती थीं। परदा प्रथा जोरों पर थी।
तब पिताजी व उनके मित्रों ने मिलकर मंदिर,पाठशाला व दुकानें आदि बनवाईं। रामलीला शुरू करवाई। स्त्रियों ने मंदिर के नाम से ही,पर बाहर निकलना तो शुरू किया। मंदिर की दुकानों में ही कपड़ों,मिठाई, अनाज,मोची की दुकान आदि बनीं। कचेड़ू मोची होता था। जूते वही बनाता था। जूते बनवाना भी क्या बड़ा काम होता था! पिताजी हमें लेकर उसकी दुकान पर जाते। वह नाप लेता। हम अपनी पसन्द बताते,ऐसे नहीं वैसे चाहिए। पिछली बार जैसे नहीं। वह बनाने में सप्ताह से अधिक लेता। बीच बीच में जाकर कैसे बन रहे हैं देख आते,आधे बने में नाप भी जाँच आते। कचेड़ू चाचा कहलाते थे। अधिक जिद करने पर उनकी डाँट भी खा लेते थे।
जब मैं पाठशाला जाने लगी तब मंदिर की पाठशाला की फीस आठ आने होती थी। गरीब बच्चों को वह भी माफ थी। कारखाने के स्कूल से पहले, दो साल सभी बच्चे वहीं जाते थे। पढ़ाई भी कितनी सही होती थी। एक हाथ में लिपी हुई तख्ती जिसपर पेन्सिल से लाइनें खींची जाती थीं। दूसरे हाथ में दवात जिसमें सूखी स्याही पानी में मिलाकर घोली जाती थी। कलम बनाना भी एक कला होती थी। कलम पिताजी बनाया करते थे। चाकू से छीलकर उसमें एक टक (छेद)लगाया जाता था। गाचनी साथ स्कूल ले जाई जाती थी। जब लिखने के बाद तख्ती भर जाती थी तो उसे धोने के लिए ले जाते थे। फिर गाचनी से पोतकर घूम घूमकर तख्ती को सुखाते थे। साथ में गाते थे....
सूख सूख फट्टी
चंदन घट्टी,
राजा आया
महल बनाया
महल के ऊपर
झंडा लगाया
झंडा गया टूट
फट्टी गई सूख।
फट्टी=पंजाबी में तख्ती
कुछ पंक्तियाँ लिखना,फिर उनके सूखने की प्रतीक्षा करना,फिर दूसरी तरफ लिखना फिर सूखने की प्रतीक्षा करना,फिर मास्टरजी को दिखाना,फिर बाहर जाकर धोना,लीपना पोतना,सुखाना,घूम घूम कर गाना गाना, फिर वापिस कक्षा में आना!आज के बच्चों की तरह बैंच पर कैद होकर नहीं रहना पड़ता था। लिखने से अधिक बच्चे तख्ती धोना, लीपना, सुखाना,लम्बे से रूलर से लाइन लगाना,कलम बनाना,चाकू का उपयोग करना,स्याही घोलना आदि सीखते थे। बस्ते में होता था एक कायदा (क ख ग घ व संख्या की पुस्तक,पहाड़े की पतली सी पुस्तक),एक दो कलम,एक रूलर,एक पुड़िया स्याही की (बहुत चमकती थी सूखी स्याही!बद्री की दुकान से स्याही,तख्ती,कलम आदि खरीदते थे)। प्यास लगी तो नल से पानी पीते थे और भूख लगने तक घर पहुँच जाते थे। महीने दो महीने में मंदिर के अध्यक्ष, जो कभी पिताजी तो कभी कोई अन्य चाचाजी होते थे पाठशाला का निरीक्षण करने आते। हम धीर, गंभीर होकर डिक्टेशन लेते,जिसे वे जाँचते।
शाला में केवल पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जाता था। किसी प्रकार की धार्मिक पढ़ाई नहीं होती थी। भजन बस आज वसन्त पंचमी के दिन एक प्रतियोगिता में गाए जाते थे। अन्यथा कविता,कहानी पाठ होता था ही साथ में। वह प्रतियोगिता जीतकर किसी पौराणिक कथा या कविता की पुस्तक जीतना भी कितना महत्वपूर्ण होता था!
और स्कूल का रास्ता! रास्ते में बहुत सारी सीढ़ियाँ उतरनी चढ़नी पड़ती थीं। फिर रेल की पटरियाँ पार करनी होती थीं। सारे बच्चे मिलकर यह रास्ता तय करते थे। हर बच्चे को घर से आवाज देकर बुलाकर साथ लेकर जाते थे। एक बार एक नए रास्ते से गए। वहाँ एक पागल मिल गया। वह बड़े बड़े पत्थर उठाकर मारने को हमारे पीछे भागा था। क्या रोमांच हुआ था उससे बचकर स्कूल पहुंचने में!रास्ते में चमेली का मिलना और उसके किस्से फिर कभी।
बस यूँ ही लिखकर वसंत पंचमी फिर से जी ली। ना पीला पहना,ना देखा,ना खाया।
घुघूती बासूती
आज के दिन ही तो मंदिर से शास्त्री जी को बुलवाकर मेरी पढ़ाई का शुभारंभ हुआ था। लकड़ी की तख्ती हल्दी मिली गाचनी (मुल्तानी मिट्टी) से पोती गई थी। एक दवात में चमचमाती हुई काली स्याही थी। हाथ में कलम पकड़ा कर ॐ लिखवाया गया था। फिर मंदिर में पढ़ने भेजा जाने लगा था।
वह मंदिर! जब भी मंदिर शब्द सोचती हूँ तो पिताजी व उनके कुछ साथियों द्वारा मिलकर सालों चंदा इकट्ठा करके बनाया वही अपने जन्म स्थान का मंदिर याद आता है। कितना भव्य मंदिर था!मंदिर के प्रांगण में शिव की मूर्ति जिसकी जटा से गंगा की तरह हर समय पानी निकलता रहता था। साथ में छोटा सा तालाब सा था। फिर एक बड़ा सा हॉल और फिर राधा और कृष्ण की मूर्तियाँ !बाहर की तरफ से ही दोनों ओर दो छोटे शिव और दुर्गा के मंदिर थे। मंदिर के साथ एक तरफ शहतूत के पेड़ों वाला बड़ा सा बाग था। दूसरी तरफ लम्बा चौड़ा मैदान और स्टेज। वहीं पर राम लीला हुआ करती थी। वहीं पर वसन्त पंचमी के दिन बच्चों का कविता पाठ, भजन गायन आदि का कार्यक्रम हुआ करता था।
मंदिर में ही एक छोटी सी पाठशाला थी। जहाँ के.जी.(कच्ची,पक्की )से लेकर छठी कक्षा तक की पढ़ाई होती थी। मंदिर के किनारे ही शास्त्री जी के रहने को घर था और धर्मशाला के कुछ कमरे थे। मंदिर के बाहर मंदिर द्वारा बनाई किराये पर दी कई सारी दुकानें थीं।
पिताजी जब सन ४४या ४५ में पंजाब के उस कारखाने में गए थे तो आसपास के गाँव में मन्दिर नहीं था,पाठशाला नहीं थी। कारखाने का अपना स्कूल था परन्तु गाँव के बच्चे वहाँ नहीं पढ़ सकते थे। दुकानें भी एक दो व बहुत दूर थीं। उस समय के पंजाब में खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों के अलावा कुछ नहीं मिलता था। शायद अरहर की दाल भी नही। साड़ी,धोती भी नहीं मिलती थी। हिन्दी का समाचार पत्र, पत्रिका भी नहीं। स्त्रियाँ घरों से बाहर नहीं निकलती थीं। परदा प्रथा जोरों पर थी।
तब पिताजी व उनके मित्रों ने मिलकर मंदिर,पाठशाला व दुकानें आदि बनवाईं। रामलीला शुरू करवाई। स्त्रियों ने मंदिर के नाम से ही,पर बाहर निकलना तो शुरू किया। मंदिर की दुकानों में ही कपड़ों,मिठाई, अनाज,मोची की दुकान आदि बनीं। कचेड़ू मोची होता था। जूते वही बनाता था। जूते बनवाना भी क्या बड़ा काम होता था! पिताजी हमें लेकर उसकी दुकान पर जाते। वह नाप लेता। हम अपनी पसन्द बताते,ऐसे नहीं वैसे चाहिए। पिछली बार जैसे नहीं। वह बनाने में सप्ताह से अधिक लेता। बीच बीच में जाकर कैसे बन रहे हैं देख आते,आधे बने में नाप भी जाँच आते। कचेड़ू चाचा कहलाते थे। अधिक जिद करने पर उनकी डाँट भी खा लेते थे।
जब मैं पाठशाला जाने लगी तब मंदिर की पाठशाला की फीस आठ आने होती थी। गरीब बच्चों को वह भी माफ थी। कारखाने के स्कूल से पहले, दो साल सभी बच्चे वहीं जाते थे। पढ़ाई भी कितनी सही होती थी। एक हाथ में लिपी हुई तख्ती जिसपर पेन्सिल से लाइनें खींची जाती थीं। दूसरे हाथ में दवात जिसमें सूखी स्याही पानी में मिलाकर घोली जाती थी। कलम बनाना भी एक कला होती थी। कलम पिताजी बनाया करते थे। चाकू से छीलकर उसमें एक टक (छेद)लगाया जाता था। गाचनी साथ स्कूल ले जाई जाती थी। जब लिखने के बाद तख्ती भर जाती थी तो उसे धोने के लिए ले जाते थे। फिर गाचनी से पोतकर घूम घूमकर तख्ती को सुखाते थे। साथ में गाते थे....
सूख सूख फट्टी
चंदन घट्टी,
राजा आया
महल बनाया
महल के ऊपर
झंडा लगाया
झंडा गया टूट
फट्टी गई सूख।
फट्टी=पंजाबी में तख्ती
कुछ पंक्तियाँ लिखना,फिर उनके सूखने की प्रतीक्षा करना,फिर दूसरी तरफ लिखना फिर सूखने की प्रतीक्षा करना,फिर मास्टरजी को दिखाना,फिर बाहर जाकर धोना,लीपना पोतना,सुखाना,घूम घूम कर गाना गाना, फिर वापिस कक्षा में आना!आज के बच्चों की तरह बैंच पर कैद होकर नहीं रहना पड़ता था। लिखने से अधिक बच्चे तख्ती धोना, लीपना, सुखाना,लम्बे से रूलर से लाइन लगाना,कलम बनाना,चाकू का उपयोग करना,स्याही घोलना आदि सीखते थे। बस्ते में होता था एक कायदा (क ख ग घ व संख्या की पुस्तक,पहाड़े की पतली सी पुस्तक),एक दो कलम,एक रूलर,एक पुड़िया स्याही की (बहुत चमकती थी सूखी स्याही!बद्री की दुकान से स्याही,तख्ती,कलम आदि खरीदते थे)। प्यास लगी तो नल से पानी पीते थे और भूख लगने तक घर पहुँच जाते थे। महीने दो महीने में मंदिर के अध्यक्ष, जो कभी पिताजी तो कभी कोई अन्य चाचाजी होते थे पाठशाला का निरीक्षण करने आते। हम धीर, गंभीर होकर डिक्टेशन लेते,जिसे वे जाँचते।
शाला में केवल पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जाता था। किसी प्रकार की धार्मिक पढ़ाई नहीं होती थी। भजन बस आज वसन्त पंचमी के दिन एक प्रतियोगिता में गाए जाते थे। अन्यथा कविता,कहानी पाठ होता था ही साथ में। वह प्रतियोगिता जीतकर किसी पौराणिक कथा या कविता की पुस्तक जीतना भी कितना महत्वपूर्ण होता था!
और स्कूल का रास्ता! रास्ते में बहुत सारी सीढ़ियाँ उतरनी चढ़नी पड़ती थीं। फिर रेल की पटरियाँ पार करनी होती थीं। सारे बच्चे मिलकर यह रास्ता तय करते थे। हर बच्चे को घर से आवाज देकर बुलाकर साथ लेकर जाते थे। एक बार एक नए रास्ते से गए। वहाँ एक पागल मिल गया। वह बड़े बड़े पत्थर उठाकर मारने को हमारे पीछे भागा था। क्या रोमांच हुआ था उससे बचकर स्कूल पहुंचने में!रास्ते में चमेली का मिलना और उसके किस्से फिर कभी।
बस यूँ ही लिखकर वसंत पंचमी फिर से जी ली। ना पीला पहना,ना देखा,ना खाया।
घुघूती बासूती
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