Monday, January 26, 2009

कट्टरपंथ यूँ ही अचानक नहीं आता होगा , वह दबे कदम आता होगा और आपको टखने दिखाने को मजबूर करता होगा।

कट्टरपंथ यूँ ही अचानक नहीं आता होगा, वह दबे कदम आता होगा। ऐसा नहीं होता होगा कि एक सुबह आप जागें और पाएँ कि आपके यहाँ कट्टरपंथी शासन है। कट्टरता बस दबे पाँव आती होगी और जब कोई रोक टोक नहीं होती होगी तो धीरे धीरे अपने पैर पसारती होगी। जब तक आप जागें या सम्भले आप पाते होंगे कि अब आप घिर चुके हैं, अब विरोध का अर्थ है मृत्यु दंड, खंबे पर आपका शव लटका दिया जाएगा ताकि अन्य भी भयभीत रहें।

जब इसकी शुरुआत होती होगी तब बहुत से लोगों को लगता होगा कि गलत नहीं हो रहा। क्या गलत है यदि नग्न चित्रों को फाड़ दिया जाए, जला दिया जाए, हमारे लोकनायकों या भगवान की बुराई वाली पुस्तकें जला दी जाएँ, या फिर टी वी पर घटिया सीरियल देखने को मना किया जाए, या फिर स्त्रियों से विशेष परिधान पहनने को कहा जाए या कोई परिधान पहनने को मना किया जाए ? अच्छा ही तो है, हमारी तो सुनती नहीं, अब पाबंदी लगेगी, चाहे किसी स्वनिर्मित दल द्वारा या विद्धालय द्वारा, तो हमारा काम तो सरल हो जाएगा। क्या बुराई है यदि युवाओं, विशेषकर युवतियों को शराब पीने से रोका जाए ? युवतियों को तो सिगरेट से भी, लड़कों के साथ घूमने से भी, अपने मन के विवाह से भी, अन्य जाति धर्म में विवाह से भी रोकने से परिवार का काम सरल हो जाएगा। कुछ तो अंकुश लगेगा इन निरंकुश होती स्त्रियों पर ! लड़के कहाँ माता पिता की बात सुनते हैं ? अब जब आवारागर्दी पर रोक लगेगी तो माता पिता को कितना आराम मिलेगा ! यदि उन्हें नेट पर कुछ विशेष चीजें देखने से रोका जाए तो नेट का बिल भी कम होगा और वे अपनी पढ़ाई, काम धाम में भी ध्यान देंगे। कुछ विशेष सिनेमा बन्द कराए जाएँ तो भी क्या बुरा होगा ? क्यों हम कानून का सहारा कुछ रोकने में लें जब यह रोकथाम का सरल, सस्ता व टिकाऊ रास्ता उपलब्ढ़ है यही तो लोग सोचते होंगे। ये भी सोचते होंगे कि क्यों अंधे कानून का सहारा लें जो लड़के लड़कियों, स्त्री परुष युवा व वृद्ध में कोई अन्तर ही नहीं करता ?

शायद शुरुआत यूँ ही होती होगी। बहुत से उन आचरणों पर रोक लगाकर जिसे समाज का एक काफी बड़ा वर्ग गलत मानता हो। सब चुप रहते होंगे। बहुत कम लोग विरोध करते होंगे। फिर कट्टर विचारधारा वाले शक्तिशाली होते जाते होंगे। उनकी संख्या बढ़ती जाती होगी। उनमें ऐसे लोग भी सम्मिलित होते जाते होंगे जिनकी कोई विशेष विचारधारा नहीं होती होगी। उन्हें बस लोगों पर पाबंदियाँ लगाने में अपनी शक्ति परिक्षण व प्रयोग का आनन्द मिलता होगा। तोड़ फोड़ मारपीट का आनन्द मिलता होगा। लोगों में व्याप्त होते भय से स्वयं की शक्ति पर अभिमान होता होगा। वे देखते होंगे कि सरकार, लोकतन्त्र , कानून कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता। जितनी उनकी शक्ति बढ़ती होगी, जितना अधिक वे समाज पर अपना नियन्त्रण करते जाते होंगे उतना ही उन्हें रोकना कठिन होता जाता होगा। हमारा संविधान भी हमें हमारे अधिकार वापिस नहीं दिला पाता होगा। अधिकार कागजों में लिखे रह जाते होंगे। अलिखित कानून असली कानून बन जाता होगा।

एक दिन पुरुषों से भी कहा जाता होगा कि पैंट नहीं सलवार पहनो या पाजामा या धोती या ऐसा ही कुछ। तब पुरुष वर्ग हड़बड़ाता होगा कि स्त्रियों पर पाबंदी तो ठीक थी, उन पर ही तो हमारी संस्कृति, हमारे सांस्कृतिक पारम्परिक परिधानों को सुरक्षित रखने का उत्तरदायित्व था। यह क्या हो गया ? लड़कियों से स्त्रियों, स्त्रियों से लड़कों, लड़कों से पुरुषों तक पाबन्दियाँ कब और कैसे आ गईं। परन्तु अब तक वे असहाय हो चुके होते होंगे। अब उनके टखने न दिखने पर उन्हें भी गोली मार दी जाती होगी। उनका शव भी उनके विद्धालय के प्रागंण की शोभा बढ़ा रहा होता होगा। अब जब वे सोचते होंगे तो आश्चर्य करते होंगे कि टखने न दिखना भी अपराध हो गया ! क्यों, कैसे,कब से ! हम तो सोते रह गए !

तब शायद कोई साहसी लड़की कहती होगी कि यह सिलसिला तब से शुरू हुआ जबसे मुझपर पाबंदियाँ लगीं। तब तो आपको कोई विशेष कष्ट नहीं हुआ था। या फिर नहीं भी कहती होगी क्योंकि अब उसे सोचना नहीं आता होगा, अपनी बात कही भी जा सकती है, यह आभास ही नहीं बचा होगा। तब बुजुर्ग पुरुष भी पाबंदियों को जीते होंगे और एक नए कट्टरपंथी समाज के नागरिक बन अपने अपने टखने दिखाने में लग जाते होंगे।

एक सामान्य सहज काफी स्वतन्त्र समाज अब एक शिकंजे में जकड़ा कट्टर समाज बन जाता होगा। जहाँ पुत्रियाँ अनपढ़ होती होंगी, जहाँ जिस किसी से भी उनका जबर्दस्ती विवाह करा दिया जाता होगा। जहाँ अब पुनः स्वतन्त्रता लाने को विदेशी बुलाने पड़ते होंगे परन्तु इतना अधिक अंधकार छा चुका होता होगा, अंधकार इतना ठोस हो चुका होता होगा कि अब रोशनी की कोई भी किरण उसे सरलता से बींध नहीं सकती होगी। एक समाज जिसने अपने बच्चों को उचित मूल्य सिखाने के अपने कर्त्तव्य से बचने को मूल्य सिखाने का ठेका अन्य लोगों को देकर आराम से जीना चाहा होगा, वह तब शायद उस ऊँट की कहानी याद करता होगा जिसे जरा सा तंबू के अन्दर आने की अनुमति मिलने पर ऊँट ने पूरा तंबू घेर लिया था और मनुष्य को बाहर खदेड़ दिया था। तब शायद किसी को इसमें एक irony,एक paradox,एक विडंबना नजर आती होगी कि कल तक जो स्त्रियों के टखने ढकने में लगे थे वे आज पुरुषों के टखने खोलने में लगे हैं। और तब, तब बुजुर्ग पुरुष भी अपनी सलवार, पाजामा, धोती या जो कुछ भी ऊपर खोंसकर या कटवाकर अपने टखने दिखाने लगते होंगे। शायद कोई अति सावधान अपने टखनों पर बड़े बड़े अक्षरों से लिख भी देता होगा 'टखने'!

घुघूती बासूती

Wednesday, January 21, 2009

और कुन्टा किन्टे सफल हो गया

बहुत पहले एलेक्स हेली की रूट्स पढ़ी थी। आज तक पढ़ी सभी पुस्तकों में जो सर्वश्रेष्ठ कह सकती हूँ उनमें से एक, बल्कि लगभग सबको पीछे छोड़ती हुई है वह। कहानी के नायक कुन्टा किन्टे को आज तक नहीं भुला पाई हूँ। यदि दुखों की पराकाष्ठा के बारे में कभी सोचती हूँ तो वही सामने आ खड़ा होता है। इतना जीवन्त चरित्र शायद ही कभी पढ़ने को मिले। लेखक उस पुस्तक में हमें एक ऐसे अमेरिका में ले जाता है जहाँ अश्वेतों के पास केवल पसीना व आँसू ही होते हैं। ऐसे वातावरण में भी कुन्टा किन्टे में जो आत्मसम्मान देखने को मिलता है वह दुर्लभ है। तब बार बार मैं यही सोचती थी कि गुलामों का जीवन जीने वाले वे लोग क्या सोचकर अपनी संतानों को इस संसार में लाते थे। क्या उन्हें अपने बच्चों के लिए कहीं कोई आशा की किरण नजर आती थी या फिर बस यूँ ही पशुओं की तरह उन्हें संसार में ले आते थे? क्यों श्वेतों के लिए नए गुलामों की व्यवस्था करते जाते थे?


आज बाराक ओबामा को शपथ लेते देख कर लगा कि कहीं दूर खड़ा कुन्टा किन्टे मुस्कुरा रहा है और शायद उसकी चोटों,जंजीरों से बँधे पैरों व लंगड़ाते हुए चलते उसके पैरों को मलहम लग गया है। यदि आत्मा नामक कोई वस्तु सच में होती है तो कुन्टा किन्टे की आत्मा तृप्त हो गई होगी। शायद स्वतंत्र होने को तड़पती उसकी आत्मा आज मुक्त हो गई होगी। शायद उसकी बिटिया के पड़पोते,पड़पोतियाँ, परनाती,परनातिनें उसकी यातनाओं को सार्थक कर गर्व से सिर उठाकर जीकर उसकी आत्मा को निहाल करने की स्थिति में पहुँच रहे हैं।


ओबामा अन्य नेताओं की तरह ही सफल या असफल या थोड़े सफल, थोड़े असफल सिद्ध हो सकते हैं। क्या सिद्ध होंगे यह तो भविष्य में पता चलेगा। परन्तु उनकी विजय ने बहुतों के लकवाग्रस्त पंखों में फिर से नई जान फूँक उड़ान भरने की एक संभावना तो जगा ही दी है। यही संभावना बहुत से नए ओबामाओं को जन्म देगी।


ओबामा की विजय में मुझे उस दिन की आशा भी दिख रही है जब भारत में भी कोई दलित या कोई स्त्री केवल अपने बल पर गगन चूमेंगे। इसके लिए न तो उसे कोई नया क्रान्तिकारी दल बनाना होगा और न ही दलित या स्त्री मतदाताओं को अपनी ओर अपने दलित या स्त्री होने के कारण खींचना होगा। केवल अपने बल पर वह मुख्यधारा की राजनीति में अपना स्थान बना पाएँगे। वे केवल अपनी योग्यता के बल पर कुछ कर पाएँगे न कि किसी की बेटी,बहू या पत्नी होने के कारण या फिर अपनी जाति के कारण पदासीन होंगे।


भारत में रोहिंगटन मिस्त्री के उपन्यास 'ए फ़ाइन बैलेंस' के अपनी जाति से ऊपर उठने वाले पात्र को अपने पुरुषत्व की बलि नहीं देनी पड़ेगी।


मुझे भविष्य के किसी कल के लिए ढेरों संभावनाएँ दिख रही हैं। शायद रसोई हर स्त्री की नियति न होकर हर उस व्यक्ति की नियति बन जाए जिसे भूख लगती हो। शायद घर की दीवारें कैद करने की बजाए घर के होने की सुखद अनुभूति बन जाएँ। शायद जंजीरें घिस रही हैं। शायद वे टूट ही जाएँ। शायद शायद शब्द सच में संभावनाओं से भर जाए।


शायद अब जब मैं फिर से रूट्स पढ़ूँ तो आँखों में आँसू न आएँ, गला रूँध ना जाए,मैं कुन्टा किन्टे को चुपके से यह कह सकूँ कि हिम्मत ना हारो,किज़ी,तुम्हारी बेटी की आने वाली पीढ़ियाँ, तुम्हारे उत्तराधिकारी आकाश की ऊँचाइयाँ छूएँगे। उसके वे उत्तराधिकारी जो अमेरिका में हैं, अफ्रीका में हैं, भारत में हैं और संसार की आधी जनसंख्या भी हैं।


घुघूती बासूती

यह भी देखिएः Rachida Dati and Being a Woman

घुघूती बासूती

Thursday, January 15, 2009

काले कउवा, मधुमेही कउवा ! आ रे कउवा, खा ले शुगराइटी घुघुतवा !





बचपन में आज के दिन बहुत उत्साह होता था। कल उत्तराखंड में कुमाँऊनी बच्चे काले कउवा नामक त्योहार मनाते हैं। आज सभी घरों में भाँति भाँति की आकृति के शक्करपारे जिन्हें कुमाँऊनी में घुघुत (घुघूती के पति घुघूत नहीं, घुघूती व घुघूत तो पक्षी हैं!) कहते हैं, बनाते हैं। ये डमरू,खजूर,लवंग,ढोलक तलवार, ढाल, दाड़िम के फूल व न जाने किन किन आकार के होते हैं। बहुधा बच्चे अपनी माँ से अपने मन पसन्द के आकार के घुघुत बनवाते हैं। इन्हें सूई से धागे में पिरो कर मालाएँ बनाईं जाती हैं। संक्रान्ति के अगले दिन बच्चे सुबह सुबह उठकर काले कउवों की खोज में निकल जाते हैं। पहाड़ों में वैसे भी काले कउवे बहुत पाए जाते हैं। बच्चे काले कउवों को बुला बुलाकर उन्हें ये घुघुत खिलाते हैं। साथ में अपनी भी पेटपूजा करते जाते हैं। वे कुछ इस तरह से कउवों को बुलाते हैं..
ले कउवा बड़
मुकें दे सुणों घड़।
(ले कउए वड़ा
मुझे दे दे सोने का घड़ा।)


पहाड़ की गरीबी देखकर तो यह नहीं लगता कि कउवों ने कभी किसी की बात मानी हो, वड़े तो खूब चाव से खा जाते हैं परन्तु कभी बच्चों की माँगें पूरी नहीं करते।
आज शाम शायद मैं भी घुघुत बनाउँगी। परन्तु न तो कउवे आएँगे न उन्हें खिलाने को कोई बच्चा घर में होगा। सोचती हूँ, जब घुघूती और घुघूत को ही मिलकर ये घुघुत खाने हैं तो क्यों ना शक्कर की जगह शुगराइट शक्कर के विकल्प में उपयोग करूँ। तलने की जगह ओवन में बेक करूँ। मेरे घुघूत को मधुमेह जो है। घी तेल भी मना है। कउवे नहीं आएँगे तो किसी भी चिड़िया या गिलहरी को खिला दूँगी। जब कउवे सोने के घड़े देने से मुकर जाते हैं तो मैं भी क्यों न ऐसे वैकल्पिक घुघुत ही उन्हें खिलाऊँ ? और यदि वे न आएँ तो किसी और को क्यों न खिलाऊँ ?


बहुत पहले मैंने यहाँ कउवे न होने की बात की थी और कउवों की तरह ही, हमारे ब्लॉग जगत से गायब काकेश जी से 'काकेश जी से विनति' में कउवों को यहाँ भेजने की गुहार लगाई थी। उन्होंने मेरी विनति सुनी भी थी। (सबूत के तौर पर मैंनेकुछ फोटो भी लिए हैं। ) कुछ समय के लिए कउवों ने यहाँ दर्शन भी दिए परन्तु अब फिर से वे गायब हो गए हैं। जिनकी भी कउवों के सीधी हॉटलाइन पर बात होती हो उनसे फिर निवेदन है कि कउवों को, विशेषकर मधुमेही व हृदयरोग से ग्रस्त कउवों को, कमसे कम कल के लिए, यहाँ भेज दें। उनका शक्कर विहीन, बेक्ड घुघुतों से स्वागत होगा।


उनके स्वागत में घुघुत पिरोए,


घुघूती बासूती

एक और सम्बन्धित पोस्टः
'मकर संक्रान्तिः घुघुतिया और मेले ही मेले'

घुघूती बासूती

Sunday, January 11, 2009

मुर्गे की बाँग, ब्लॉगवाणी, भारत सरकार और oxymoron

मुर्गे की बाँग, ब्लॉगवाणी, भारत सरकार और oxymoron

जो बात बहुत समय से मन में आती थी, हाल ही में मैंने उस छोटी से बात को यूँ ही एक लेख का रूप दे दिया। बात बस इतनी सी थी.. ..'कहते तो हो 'बहुत बढ़िया' तो फिर पसन्द पर क्लिक क्यों नहीं करते ?'


बहुत संभव है, बल्कि यही सच होगा कि ब्लॉगवाणी वाले बहुत समय से सोच रहे होंगे कि ऐसी सुविधा दी जाए कि पसन्द का विजेट सीधे से ब्लॉग पर ही लगा हो । जो चाहें वे उसे अपने ब्लॉग पर चिपका लें। हमने भी चिपका लिया। परन्तु मुर्गे की तर्ज पर हम यह भी सोच रहे हैं कि हमारे बाँग देने से ही सवेरा हुआ। सवेरा तो यूँ भी होने ही वाला था। विशेषकर तब तो होकर ही रहता जब कि कई सारे सूरज आकाश में अपनी चमक बिखराने को लालायित हैं। सूरज की सार्थकता, महत्व को कम तो नहीं करना चाहती, पूँजीवाद की लाख बुराइयाँ हों, परन्तु कई लाभ तो हैं ही, सबसे बड़ा यह कि सब अपना अपना सूरज चुन सकते हैं। ऐसे में सूरज भी अपने ही गर्व में जब तब बादलों के पीछे नहीं छिपते। जानते हैं कि हम नहीं तो कोई और सही और ग्राहक जाकर किसी और सूरज की धूप ताप आएगा।

हमारे ये ब्लॉगजगत के सूरज, कई कई एग्रीगेटर्स, बहुत सारे चिट्ठों को एक स्थान पर एकत्रित कर पाठकों को चिट्ठे देखने की सुविधा व चिट्ठाकारों को अपने चिट्ठे लोगों तक पहुँचाने का एक बढ़िया मंच प्रदान करते हैं। अब सवेरा चाहे मेरे अंदर बैठे मुर्गे(क्या शाकाहारियों के अंदर भी एक मुर्गा बैठा होता है? या शाकाहारियों के अंदर ही, क्योंकि वहाँ सुरक्षित जो महसूस करता होगा) की बाँग देने से हुआ हो या बस जब होने ही वाला था तो सही समय पर हमने बाँग दे दी, कारण जो भी रहा हो, परन्तु जिन पाठकों ने कहा था कि पसन्द की सुविधा चिट्ठे में ही होनी चाहिए उनकी माँग/इच्छा तो आज ब्लॉगवाणी ने पूरी कर ही दी।


यह देखकर मेरा पूँजीवादी मन बाग बाग हो गया। एक और सुविधा! हम उस जमाने की उपज हैं जब स्कूटर का अर्थ होता था वैस्पा या लैम्ब्रेटा और पसन्द का अर्थ होता था कि जो भी पाँच सात साल में मिल जाए वही घर के दरवाजे की शोभा बढ़ा रहा होता था। कार याने,एम्बैसेडर या फिएट!(यह भी आम आदमी या औरत नहीं खरीदते थे, केवल बड़ी हस्तियाँ या बहुत पैसे वाले खरीदते थे। तब जीवन में मिलने वाली सुविधाओं के पेड़ पर स्कूटर बहुत ऊपर और कार बहुत बहुत ऊपर टंगे होते थे। ) टैलिफोन भी एक विलास का सामान होता था। तभी तो आज भी हमें सब कारें एक सी ही नजर आती हैं। ब्रॉन्ड के नाम पर वे ही दो कारें याद रहती हैं। सदा की तरह मैं विषय से भटक रही हूँ (यदि कोई विषय था तो!)। तो हुआ यूँ कि मैं अपने एक मित्र को अपनी बाँगपूँजीवाद का महत्व बता रही थी। सोचने की बात है कि निजी क्षेत्र माँग उठते से ही उसे पूरा करने की चेष्टा करता है। लोगों ने widget माँगा और उन्हें मिल गया। यह बात और है कि ब्लॉगवाणी के पाठक अधिक से अधिक कुछ हजार हैं और सरकार के नागरिक , सौ करोड़ से अधिक ! परन्तु फिर ब्लॉगवाणी या किसी निजी संस्था के पास साधन भी तो सरकार से बहुत कम ही होते हैं। सरकार के पास चाहे हमारी हजारों माँगे हैं तो फिर उन्हें पूरा करने के लिए कर्मचारियों की एक बहुत बड़ी फौज भी तो है। यह बात और है कि वे यह न सोचते हों कि वे हमारी माँगें पूरी करने के लिए हैं न कि उनकी अपनी !


तभी यह भी कह गई कि काश भारत सरकार भी हमारी जमाने से लगाई जाती चुनाव में 'इनमें से कोई नहीं'का विकल्प दें वाली गुहार ब्लॉगवाणी की तरह सुन लेती! हम बहुधा किसी अपेक्षाकृत कम बुरे व्यक्ति को अपना मत देने से बच भी जाते और अच्छे नागरिक की तरह मतदान भी कर आते। अब प्रश्न यह उठा कि क्या मैं बाज़ार की तरह सरकार व शासन के भी विकल्प चाहती हूँ, extra constitutional authority चाहती हूँ। स्वाभाविक है कि उत्तर था, नहीं बिल्कुल नहीं। परन्तु यह भी सच है कि जिसका विकल्प न हो वह अपना काम मजे से धीमी गति से करता है, यदि करता हो तो। सरकार का विकल्प चाहती तो नहीं परन्तु यह भी सच है कि जहाँ भी शून्य(vacuum)बना नहीं, कुछ ना कुछ उस स्थान को भरने को आ ही जाता है। चाहे वह नक्सलवादी हों,धर्म वाले हों या गाँव का जमींदार!घर में भी आप अपने बच्चों की ओर ध्यान न दीजिए और देखिए वह पड़ोस की चाची,मामी या मित्रों में आपके विकल्प के रूप में सलाहकार ढूँढ ही लेंगे। विद्यालय में अध्यापक नहीं पढ़ाते तो उनका शून्य ट्यूशन कक्षा के ट्यूटर भर देते हैं। शून्य असंभव है। सुदूर गाँवों,आदिवासी क्षेत्रों में न्याय तो क्या बस व पानी, बिजली भी नहीं मिलती। सो उस शून्य को भरने कहीं नक्सलवादियों,कहीं अलगाववादियों, कहीं धार्मिक नेताओं के कंगारू कोर्ट लग जाते हैं। तुरन्त न्याय मिलता है। न्याय चाहे क्रूरता की परिकाष्ठा छूता हो, जैसे भरी सभा में दस डंडे,निर्वस्त्र कर देना,या खौलते तेल में हाथ डलवाना। जिस भी ब्राँड का हो परन्तु न्याय तो है ही। चाहे 'अन्यायी न्याय' ही क्यों न हो। 'अन्यायी न्याय!' एक और oxymoron ! अब इसका अर्थ मत पूछिए। यह दो कारों, दो स्कूटरों के विकल्प और कोई भी फोन न मिल पाने, बिना टी वी(जब टी वी ही नहीं तो चेनल्स कहाँ से होतीं!) के जमाने का शब्द है। जब विकल्प न होते थे तो लोग ऐसी ही oxymoronish बातें घुमा फिराकर करते थे। हम अब भी करते हैं। चलिए क्यों शब्दकोष देखने का कष्ट करवाएँ, मैं ही बता देती हूँ..'a figure of speech in which apparently contradictory terms appear together'. ग्रीक से बने इस शब्द का शाब्दिक अनुवाद है pointedly foolish. यदि rotundly foolish होता तो हम कह सकते थे कि काफी कुछ हमारी तरह! यह rotund लैटिन से है। अब और अर्थ नहीं बताएँगे नहीं तो अनर्थ की सीमा तक लिखते जाएँगे।


खैर,जाते जाते,धन्यवाद ब्लॉगवाणी


खेद के साथ कहना पर रहा है कि अपने नेटवर्क की गति कुछ ऐसी चल रही है कि लगता है वीरगति प्राप्त ही होने को है,सो किसी के भी चिट्ठे को पसन्द करने का पावन काम तो क्या पढ़ना भी नहीं हो पाया।


घुघूती बासूती

जाते जाते....

यह भी बढ़िया हैः

'पापा क्यों रोए ?'

और मेरे अंग्रेजी ब्लॉग में आज एक नन्ही सी बाल कविता की नन्ही सी पैरोडी भी पढ़िए।
'The latest nursery rhyme from Hyderabad'


घुघूती बासूती

Saturday, January 10, 2009

क्या समाचार चैनेल्स को भी अब सिनेमा की तरह वयस्क और युनिवर्सल का प्रमाणपत्र दिया जाना चाहिए ?

एक जमाना था जब बच्चों को कहा जाता था ज्ञान बढ़ाना है तो समाचार सुनो, यदि साथ ही साथ भाषा भी बेहतर बनानी हो तो समाचार पत्र पढ़ो। आज यदि मेरे घर में कोई बच्चा होता तो मैं कभी नहीं चाहती कि वह टी वी पर समाचार देखे सुने। यदि ना कहती तो शायद वह और अधिक देखना सुनना चाहता। ऐसे में यदि उसे टी वी देखना ही होता तो मैं चाहती कि चाहे केकता कपूर के कीरियल देख ले, सास बहू व परिवार की स्त्रियों का या तो भोलापन या खलनायिकी देख लें परन्तु समाचार यदि दूरदर्शन के न हों तो समाचार कदापि न देखे।

आज समाचारों में लाइव हत्या दिखाई जा रही थी। वाह क्या बात है, एक पुरुष एक स्त्री की कनपटी पर पिस्तौल लगाए खड़ा है, दर्शक साँस रोके देख रहे हैं मारेगा या मरेगा या छोड़ देगा। क्या कुछ शर्तें नहीं लग रहीं थीं ? एस एम एस नहीं भेजे जा रहे थे चैनल्स को कि स्त्री मरेगी या बचेगी ? सही जवाब देने वाले को २७ इंच का रंगीन टी वी नहीं दिया जा रहा था ?

दर्शक खाना भी खा रहे थे और यह मनोरंजन भी देख रहे थे। डॉक्टर साहब बता रहे थे हत्यारे का मनोविज्ञान और पुलिस को कैसे उससे निपटना चाहिए। यदि डॉक्टर साहब से एक मरीज इतना समय माँगता तो क्या वे दे पाते ?

मैं सोच रही थी कि इस विभत्स नाटक के पात्र यदि जवित बचेंगे तो क्या समाचार चैनेल वाले उन्हें पारिश्रमिक भी देंगे? मर गए तो परिवार वालों को ? इतना मनोरंजन करने के लिए तो मिलना ही चाहिए।

ओह, ओह, स्त्री पर गोली चला दी गई। ओह , ओह पुरुष अपराधी को भी गोली या गोलियाँ मार दी गईं। हो गया इन्सटेन्ट न्याय ! बढ़िया मनोरंजन हो गया ! पैसा वसूल हो गया ! खाना भी खतम हो गया।

किसी समय में डिस्कवरी चैनेल में किसी पशु का शिकार यदि हो रहा होता था तो खाना मेरे गले नहीं उतरता था, आज मनुष्य का शिकार होते देख रही थी। और प्रेम से पति के साथ खाना भी खा रही थी। घुघूत जी को टी वी देखना होता है ना ! कहाँ गईं मेरी, आपकी हम सबकी संवेदनाएँ ?

क्या किया जाए ? क्या समाचार सुनना बंद कर दिया जाए ? या समाचार लगाने से पहले बच्चे, बूढ़ों, हृदय के रोगियों को वहाँ से हटा दिया जाए ? या फिर इन्हें वयस्क चैनेल घोषित कर दिया जाए ?


घुघूती बासूती

Wednesday, January 07, 2009

छोटा शहर, मेरा शहर






लगभग ७ वर्ष छोड़कर सारा जीवन बहुत छोटी सी जगहों में गुजारा है। बहुधा तो इन्हें गाँव भी नहीं कहा जा सकता। बस एक कारखाना और कहीं कुछ सौ तो कहीं केवल एक सौ मकान व उनमें रहने वाले कर्मचारी! जैसे यहाँ एक कारखाना, एक दुकान, एक प्रेस वाला, एक बैंक की शाखा, एक स्कूल, एक चिकित्सा केन्द्र, एक स्पोर्ट्स क्लब और उसी में चलाया जाता एक महिला मंडल। कारखाने को छोड़ दें तो यह सबकुछ आमने सामने, अगल बगल तीन इमारतों में है। भूल गई कि एक मंदिर भी है।


शहर में रहने वाले अपनी पसन्द से जीते हैं, कहाँ काम करेंगे यह उनकी पसन्द, कहाँ कैसे मकान/ फ्लैट में रहेंगे यह उनकी पसन्द, किस दुकान (मॉल)से क्या खरीदेंगे,किससे कपड़े धुलवाएंगे या ड्राई क्लीन/प्रेस करवाएंगे,किस बैंक में खाता खोलेंगे,कहाँ पढ़ेंगे,पढ़ाएँगे,कहाँ किससे इलाज करवाएंगे,कोई क्लब/मंडल जाएंगे या नहीं जाएँगे या जाएँगे तो कौन से यह सब उनकी पसन्द होता है ।


यहाँ जो है उसमें ही जाना है और जाना भी अवश्य है। नहीं जाओगे तो बॉयकॉट करना सा लगेगा। हाँ,यदि बच्चों को छात्रावास में रखकर पढ़वाना है तो छूट है। परन्तु मैं स्वयं ऐसे ही स्कूल में पढ़ी और बच्चों को भी पढ़वाया और ठीकठाक पढ़ ही लिए सब। यदि कोई विशेष खरीददारी करनी हो कहीं बीस तो कहीं ३० कि.मी.दूर के शहर या कस्बे में जाना होता है। वैसे उसमें भी कुछ विशेष तो केवल हमें लगेगा,महानगरों वालों को नहीं।


अजीब सा चित्र बनता है ना मन में! परन्तु चाहे सबकुछ सीमित सा है परन्तु प्रकृति की छटा,खुला आकाश,बिजली पानी,धरती का विस्तार,अपनापन,सुरक्षा की भावना,यह सब सीमित नहीं है। सबसे बड़ी बात है कि चारों ओर साफ सफाई है।


ऐसा जीवन जीने के बाद जब सेवानिवृत्ति का समय पास आने लगता है तो कहीं ना कहीं जाकर रहने का मन बनाना पड़ता है। उसमें भी कई समस्याएं सामने आतीं हैं। सबसे बड़ी समस्या स्थान चुनने की आती है। हम जैसे लोग जो सारा जीवन खानाबदोशों की तरह एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त जाते रहे वे किस शहर को चुनें ? उसपर यदि परिवार के सदस्य अलग अलग प्रान्तों के हों तब तो यह निर्णय और भी कठिन हो जाता है। सबसे सरल लगता है कि जहाँ भी हो उसके सबसे नजदीकी शहर में रहो। परन्तु हमारे छोटे शहर! खुली नालियाँ,कचरे के ढेर और उनमें पलते सुअर! फिर भी इन शहरों के दुकानदार,दर्जी,डॉक्टर ही तो जाने पहचाने होते हैं। काश,ये शहर साफ सुथरे भर होते। हम जैसे लोग,जिन्हें सड़क पार करना भी नहीं आता,वे यहाँ रहकर कितने सुखी रह सकते थे! छोटा शहर, छोटी जरुरतें,छोटे खर्चे,सस्ता मकान,बड़े दिल,क्या बढ़िया रहता! वर्षों से मैं ऐसे ही किसी पास के शहर में बसने के स्वप्न देख रही हूँ। ऐसे ही एक शहर की कुछ फोटो मेरी बिटिया ने खींची। देखेंगे तो आप भी पसन्द करेंगे। परन्तु जहाँ के ये चित्र हैं यदि वहाँ की दुर्गंध भी आप सूँघते तो भाग ही जाते! इतने दुर्गंध भरी जगह के देखिए बहुत ही सुन्दर दृष्य!


घुघूती बासूती

Sunday, January 04, 2009

कहते तो हो 'बहुत बढ़िया' तो फिर पसन्द पर क्लिक क्यों नहीं करते ?

मुझे चिट्ठों पर दी गई पाठकों की टिप्पणियाँ पढ़ना भी बहुत अच्छा व मनोरंजक लगता है। बहुत से मित्र बहुत अच्छे से विश्लेषण कर टिप्पणी देते हैं। कोई कोई कभी कभार कटु टिप्पणी भी दे जाता है। परन्तु टिप्पणी के मामले में तो मुझे लगता है, यही सोचना चाहिए कि जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला।


बस एक बात जो मुझे समझ नहीं आती वह यह है कि बहुत से पाठक बहुत से चिट्ठों पर टिप्पणी में कहते हैं बहुत बढ़िया। परन्तु उसी चिट्ठे पर पसन्द में एक भी चटका ( या चटखा ? )नहीं लगा होता। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि वे ये चिट्ठे ब्लॉगवाणी पर न पढ़कर किसी अन्य स्थान पर पढ़ते हैं। फिर भी मैं तो यदि किसी चिट्ठे पर लिखी रचना को पसन्द करूँ तो कोशिश यही रहती है कि याद से पसन्द भी दर्शा दूँ। इस काम को करने के लिए मुझे भले ही वापिस ब्लॉगवाणी पर चिट्ठा सूची पर ही क्यों न जाना पड़े। जिस चिट्ठे पर एक भी पसन्द दर्ज न हो, जहाँ तक हो सके, मैं उसे पढ़कर यदि पसन्द आए तो पसन्द करने का पुनीत काम अवश्य कर आती हूँ। यह बात बहुत से मित्रों को बचकानी चाहे लगे परन्तु हम इतने बड़े (या छोटे से ही) साहित्यकार तो नहीं बने कि पाठकों की पसन्द नापसन्द या टिप्पणियों का हम पर कोई प्रभाव ही न पड़े। मुझ पर तो पड़ता है। टिप्पणी के साथ साथ पसन्द का भी अपना ही महत्व है।


बोलिए पसन्द ? नापसन्द ? कोई टिप्पणी ?


घुघूती बासूती

Saturday, January 03, 2009

हमारे महिला मंडल की पिकनिक (स्कूली दिनों को याद करते हुए पिकनिक से लौटकर गृहकार्य में लिखा पिकनिकी विवरण)




हमारा महिला मंडल हर साल पिकनिक मनाता है। हर साल १०० से १५० कि. मी.से कम की दूरी में हमें एक नया स्थान खोजना होता है। इस बार हमने मांगरोल नामक एक छोटे से शहर के एक कल्याण धाम नामक आश्रम व मंदिर को चुना । क्रिसमस के दिन हम सुबह ५:५० पर घर से निकले और ६ बजे बस में बैठ गए। कुछ आगे चलकर अन्य स्त्रियों व बच्चों को बस में चढ़ाया। कुल मिलाकर ३४ स्त्रियाँ व २० बच्चे थे। सबकी उपस्थिति ली गई। जैसा कि सदा होता है एक महिला व उसके बच्चे देर से आए। परन्तु हमारी चाय, कॉफी व नाश्ता उससे भी देर से आए। सो लगभग ६:३० पर हमारी बस,एक जीप व एक कार पिकनिक के लिए निकल पड़ी। रास्ते भर अन्ताक्षरी व हँसी मजाक चलता रहा। लगभग ७:४५ बजे बस रोककर सबको बस में ही चाय नाश्ता दिया गया। नाश्ते में स्वादिष्ट मेथी की पूरियाँ व आलू की सब्जी थी। साथ में गरमागरम चाय व कॉफी भी। खापीकर हम फिर से चल पड़े,या कहिए बस चल पड़ी,हम अपनी सीट पर ही बैठे रहे। लगभग ८:४५ पर हम लोग मांगरोल पहुँच गए। मन्दिर के परिसर के बाहर हमारी बस खड़ी हुई। सब लोगों ने मन्दिर के दर्शन किए। वहाँ बहुत सुन्दर झाँकियाँ भी बनी हुई थीं जिन्हें देख बच्चे बहुत खुश हुए।


परिसर में ही एक तालाब, झूले, स्लाइड आदि थे। हमारे साथ एक चौकीदार भी था जिसे हमने बच्चों की रखवाली पर तैनात कर दिया। फिर हम अपने खेल खेलने लगे। पहले खेल में दो दल बनाए गए। फिर नियत समय के अन्दर उन्हें चार डिब्बों में से मिलेजुले दानों में से राजमाह, मटर, काले चने, सफेद चने आदि के दाने अलग अलग डिब्बों में रखने थे। ये डिब्बे थोड़ी दूरी पर रखे गए थे। सो काफी दौड़भाग व मेहनत की गई। दोनों दलों के लिए छोटे छोटे पुरुस्कार थे। यह खेल खेलते खेलते ही काफी समय बीत गया। अब हमने चाय कॉफी पी। फिर बच्चों के लिए 'पासिंग द पार्सल' खेल रखा गया। प्रत्येक आउट होने वाले बच्चे को चिट उठाकर उसमें लिखा हुआ काम जैसे,गाना, नाचना, कविता या चुटकुला सुनाना आदि करना था और फिर उसे चिट में लिखा पुरुस्कार मिलता था। फिर एक और खेल खेला गया। इसमें एक एक पैसों से भरा कप दिया गया। ५,१०,२०,२५,५० पैसे,१ रुपये, २ रुपये व ५ रुपये के सिक्के दिए गए थे। १० संख्याएँ लिख दी गईं थीं, जैसे १ रुपया १५ पैसे, ९ रुपये ८५ पैसे आदि। दो मिनट का समय दिया गया था। पाँच पुरुस्कार रखे गए थे।


तब तक खाना तैयार हो गया था। गरमागरम मटर पनीर,गुजराती ऊँधिया,दाल,रायता,पूरी,भात,मूँग की दाल का हलवा सबने मिलकर खाया। फिर हाउजी याने तंबोला खेला गया। कुछ गप्पशप के बाद चाय कॉफी पीकर हम एक्वेरियम देखने निकले। फिर तरह तरह के पत्थर, रत्न व समुद्री जीवों का संग्रहालय देखा। ताराघर बंद था। फिर बच्चों को छुकछुक गाड़ी व झूलों पर बैठाया। वहाँ पर एक वृद्धाश्रम भी था जहाँ वृद्ध आराम से टहल रहे थे व गुजराती अन्दाज में हौले हौले झूला झूल रहे थे। एक गौशाला भी थी। हमने दोनों देखे। तबतक वापिस आने का समय हो गया। सबको रास्ते के लिए नाश्ता प्लास्टिक के डिब्बों में पैक करा हुआ दिया। जो लगभग सभी अपने साथ घर ले आए। वापिसी में सब थक गए थे सो अन्ताक्षरी का कार्यक्रम नहीं हुआ।


इस तरह हँसते,खेलते मस्ती करते हुए हमने अपनी और मैंने यहाँ पर अपनी पाँचवी पिकनिक मनाई। हमारे यहाँ मनोरंजन के साधन बहुत कम हैं सो हम यूँ ही कभी पिकनिक, कभी मेला (अन्नपूर्णा), कभी नवरात्रियों में गर्बा,रावण दहन,गुजराती नव वर्ष की पार्टी,अंग्रेजी नव वर्ष की पार्टी,मिलकर होली खेलने आदि का आयोजन कर अपना मन बहलाव व मेल मिलाप करते रहते हैं। ३१ को नव वर्ष का आयोजन होगा,(हो गया, अब मेरी पोस्ट करने के आलस के चक्कर में वह तो रुका नहीं ) जिसमें हम परिवार सहित जाएँगे(गए)। फिर एक दिन महिला मंडल में भी इसका आयोजन होगा। बस ऐसे ही हँसते,खेलते,मिलते मिलाते जीवन का एक और वर्ष निकल जाएगा।


घुघूती बासूती