आज मैं मतदान करूँगी। लंगड़ाते हुए जाऊँगी किन्तु अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज करवाऊँगी। मेरे पैर के अँगूठा टूट गया है। अधिक चलना व खड़ा होना मना है किन्तु मैं जाऊँगी। जाकर मैं भी हूँ यह दर्शाऊँगी, अपने अस्तित्व का प्रमाण अवश्य दूँगी। ताकि मेरी आवाज का भी मूल्य हो।
बहुत समय पहले, ९० के दशक में हम कर्नाटक में रहते थे। हम प्रायः एक जगह दो या तीन वर्ष ही रहते थे। कभी कभी तो ७ महीने या ९ महीने में भी स्थानांतरण हुआ है। भारत के बहुत से राज्यों में जगह जगह हम रहे हैं। बच्चियों की पढ़ाई कॉलोनी के स्कूलों में जैसे तैसे होती रही। उन्होंने कभी नवम्बर में आन्ध्रा प्रदेश में जाकर तेलुगु सीखी तो कभी ग्रीष्म अवकाश के अन्तिम दिनों में नई जगह जाकर सारा गृहकार्य निपटाया। बड़ी बिटिया ने बारहवीं(नर्सरी व के जी मिलाकर ) तक बारह स्कूलों में पढ़ा था। सात राज्यों (दो राज्यों में दो दो बार अन्यथा ९ कहलाते)व दो देशों में अपनी पढ़ाई पूरी की थी। जब वह सातवीं कक्षा में आई तो भाभी ने कहा कि अब बच्चियों को लेकर किसी एक स्थान पर ही रहो। ताकि वे कहीं की तो अधिवासी(डोमिसाइल) कहलाएँ। बच्चियाँ बाबा के बिना रहने को तैयार नहीं थीं, उसपर कौन इस बात की गारंटी दे सकता था कि मैं पाँच साल एक जगह रहूँ और जब मैडिकल आदि के दाखिले का समय आए तब तक नियम कानून पाँच साल से बढ़कर सात या दस साल या कुछ भी के डोमिसाइल के न बन जाएँ। सो हम भटकते रहे।
९० के दशक में हम कर्नाटक में रहते थे। कुछ नियम ऐसे थे कि आशा जगी कि उसे वहाँ दाखिला मिल सकता था। वहीं से बड़ी बिटिया ने बारहवीं की। बहुत अच्छे अंक पाए। ऐसे जिनसे उससे कम अंक पाने वाले उसके अधिकतम सहपाठी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पा गए। जैसा कि मुझे भय था वैसा ही हुआ। उसकी परीक्षाओं के दौरान ही नियम बदले और वह फ्री सीट की अधिकारी नहीं रही। दान देकर सीट पाना उसे स्वीकार नहीं था। स्कॉलरशिप की अधिकारी वह बी एस सी करने लगी। फिर एम एस सी की। स्वर्ण पदक पाया। पी एच डी की। अब पोस्ट डॉक्टॉरल रिसर्च कर रही है।
पति के काम के कारण मंत्रियों से भी मुलाकात हो जाती थी। सो मैंने राज्य के शिक्षामंत्री से बिटिया के अंक व उसे दाखिला न मिलने की विसंगति पर बात करने की ठानी। हमारा भला न भी हो तो हमारे जैसे लोगों जो विभिन्न राज्यों में भटकते हुए,चाहे अपने स्वार्थ में ही, देश व देशवासियों के लिए कारखाने चलाकर स्टील,उर्वरक,रसायन (केमिकल),दवाइयाँ, सीमेंट आदि का उत्पादन करते हैं। हम कठिन से कठिन परिस्थितियों में रहते हैं। सरकारी नौकरी न भी हो तो भी किसी को तो शहरों से दूर रहकर यह सब उत्पादन तो करना ही है। फिर हमारे लिए डोमिसाइल की मुसीबत क्यों होनी चाहिए? मैं उनसे यही बात कहना चाहती थी। कम से कम किसी प्रतिशत से अधिक अंक पाने पर तो दाखिला मिलना ही चाहिए।
उनका जो उत्तर था वह मैं कभी नहीं भूल सकती। उनका कहना था," ठीक है कि आप कर देते हैं, राज्य की उन्नति के लिए काम करते हैं। किन्तु आप हमारा वोट बैंक नहीं हो। कितनी बार आप वोट देते हैं? हम वह कार्य करते हैं जिससे वोट देने वाली जनता खुश रहे। आपसे सहानुभूति है किन्तु हमें अपने मतदाताओं को देखना है करदाताओं या उत्पादनकर्ताओं को नहीं।"
उस दिन से मैंने यह निश्चय किया कि चाहे अकेला चना भाड़ न भी फोड़ सकता हो वह मतदान कर अपने अस्तित्व का प्रमाण अवश्य देगा। सो मैं मतदान अवश्य करती हूँ। यदि आप भी चाहते हैं कि आप हाशिये में न ठेले जाएँ, आपकी समस्याओं पर कोई ध्यान दे तो मत अवश्य दें। हम जैसे मध्यम वर्ग के लोगों, जाति पर विश्वास न करने वाले लोगों ने मतदान में उत्साह न दिखाकर अपने आप को किनारे कर लिया है। किसी दल को हमारी समस्याओं, हमारे विचारों, हमारे मूल्यों से कोई लेना देना नहीं रह गया है। और दोषी हम स्वयं हैं। यदि हम चुनावी प्रक्रिया से अपने को अलग रखेंगे तो यही होगा। अतः मेरा निवेदन है कि मतदान करें। अन्धों में काने को चुनें। सब अन्धे हों तो जिसकी श्रवणशक्ति बेहतर हो उसे चुनें। सब बहरे हों तो जिसकी घ्राण शक्ति बेहतर हो उसे चुनें। जो भी हो मतदान अवश्य करें। अपनी आवाज का मूल्य पहचानिए।
अब मतदान केन्द्र जाना है सो शेष कल।
घुघूती बासूती
Thursday, April 30, 2009
Saturday, April 25, 2009
स्त्रियों को नाम का अधिकार कहाँ है, यह तो संसार की अन्य वस्तुओं की तरह पुरुषों का एकाधिकार है।
पितृसत्तात्मक इस समाज में नाम पर भी स्त्री का अधिकार कहाँ है ? आपका कुछ खो जाए तो ढूँढ सकते हो, पुलिस में रपट लिखवा सकते हो परन्तु जिसका नाम ही खो जाए वह कहाँ ढूँढे, कहाँ रपट लिखवाए? रपट लिखवाने को भी तो एक नाम चाहिए ! अब नाम खोजती स्त्री किस नाम से लिखे ? उस नाम से जिससे वह बचपन से पुकारी जाती थी, जिस नाम को उसने जीवन के बीस पच्चीस वर्षों तक जिया, जिस नाम से उसने न जाने कितने तमगे जीते या उस नाम से जो मंगलसूत्र के साथ उसको पकड़ा दिया गया कि लो बिटिया अब इसे ही अपना सबकुछ समझो ? कहना सरल है किन्तु जीना कठिन।
विवाह के साथ बहुत कुछ खोया और पाया जाता है। जीवन में खोना व पाना सदा साथ साथ चलता है। यह स्वीकार भी किया जा सकता है। किन्तु अपनी पहचान खोना ! यह एक अक्षम्य व बर्बर समाज ही किसी से करवा सकता है। दुर्भाग्य से यह 'किसी' सदा स्त्री ही होती है। नाम खोने की पीड़ा वही समझ सकता है, जिसने अपना नाम खोया हो और जिसके लिए नाम का कोई महत्व रहा हो। अधिकतर पुरुष यही कहेंगे कि इसमें क्या बड़ी बात है। भाई, पल भर को अपने आप को अपनी सास के या पड़ोसी के नाम से जानने की कोशिश करके देखो। जीवन भर आप कहलाए थे समर दादाभाई हँसमुख और अचानक आपका नाम हो जाता है समर नान्जीभाई उदास !( या समर नान्जीबहन उदास और आप हैं पुरुष !)बोलिए कैसा लगेगा यह नया नाम ? क्या आपका हाथ हर बार किसी कागज पर यह नाम लिखते या यह हस्ताक्षर करते काँपेगा या नहीं ? हमारी पीढ़ी तो फिर भी भाग्यवान है कि सिमरन दादाभाई हँसमुख से केवल सिमरन नान्जीभाई उदास जैसी कुछ हो जाती है,सौभाग्य से सिमरन को तो अपने से चिपकाए रहती है। हमारी माँ की पीढ़ी का तो पहला नाम सिमरन तक बदल कर मंगला, श्यामा या गोपा या उस पल जो भी सुहाया कर दिया जाता था। सिमरन को स्मरण भी नहीं रहता था कि वह कभी सिमरन थी। यदि स्मरण करती थी तो सिवाय पीड़ा व नाम तक अपना न कह पाने की विवशता के कुछ भी हाथ नहीं आता था।हेम पान्डे जी ने अपने चिट्ठे शकुनाखर में छद्मनामधारी ब्लॉगर्स पर आधारित एक कहानी लिखी। उसपर बहुत सी टिप्पणियाँ आईं। वहीं ज्ञानदत्त पाण्डेय जी छद्मनामधारी मानव के बारे में कहते हैं.........
'मुझे नहीं लगता कि छद्मनाम से लिखने वाले या अपने बारे में कम से कम उजागर करने वाले बहुत सफल ब्लॉगर होते हैं। आपकी जिन्दगी में बहुत कुछ पब्लिक होता है, कुछ प्राइवेट होता है और अत्यल्प सीक्रेट होता है। पब्लिक को यथा सम्भव पब्लिक करना ब्लॉगर की जिम्मेदारी है। पर अधिकांश पहेली/कविता/गजल/साहित्य ठेलने में इतने आत्मरत हैं कि इस पक्ष पर सोचते लिखते नहीं।और उनकी ब्लॉगिंग बहुत अच्छी रेट नहीं की जा सकती।'
उनसे मैं यही कहूँगी कि सारी समस्या ही इस सोचने से उपजी है। यदि सोचती नहीं तो मैं भी गर्व के साथ अपना लेखन उस नाम के साथ ठेलती जाती जो मेरा नहीं है, परन्तु मैं ढो रही हूँ। संसार की अधिकतर स्त्रियाँ बहुत आराम से अपने नए नाम को अपना लेती हैं क्योंकि वे जन्मजात रानी बेटियाँ होती हैं, परम्पराओं को वे आराम से ओढ़ती, जीती हैं, प्रश्न नहीं करती, न समाज से न अपने आप से। परन्तु कभी कभी गलत नक्षत्र में कुछ ऐसी बेटियाँ भी जन्म ले लेती हैं ( वैसे बेटी का जन्म हो तो शुभ नक्षत्र तो हो ही नहीं सकते ! ) जो प्रश्न पूछने के असाध्य रोग से ग्रसित होती हैं। मैं उन्हीं अरानी बेटियों में से एक हूँ। प्रश्न करना और उनके उत्तर पाना और न पाने पर उन्हें खोजना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानती हूँ। वैसे स्त्री और जन्मसिद्ध अधिकार शब्द एक दूसरे के साथ शोभा नहीं देते। स्त्री और कर्त्तव्य या त्याग कैसे एक दूसरे की शोभा बढ़ाते हैं। कुछ वैसे ही जैसे...
शशिनाच निशा, निशयाच शशि
शशिना निशयाच विभाती नभः।
( स्मरण के आधार पर लिखा है, अशुद्धियाँ हो सकती हैं।)
अर्थात चन्द्रमा से रात्रि की शोभा बढ़ती है और रात्रि से चन्द्रमा की। चन्द्रमा और रात्रि से आकाश की शोभा बढ़ती है।
ठीक ऐसे ही हे स्त्री,
त्याग या कर्त्तव्य से स्त्री की शोभा बढ़ती है और स्त्री से त्याग की। त्याग व स्त्री (या कहिए त्यागमयी स्त्री से,वैसे किसी अन्य प्रकार की स्त्री की कल्पना ही हृदय दहला देने वाली होती है ना!)से समाज की शोभा बढ़ती है।
सो हे स्त्री, तू त्याग किए जा, नाम से लेकर अधिकारों तक का। इसी में तेरा व समाज का कल्याण है।
मैं छद्म नाम से इसलिए लिखती हूँ क्योंकि आज जो मेरा नाम है उससे मैं नहीं लिख सकती। कोई रोकटोक की बात नहीं है। मैं सौभाग्यवती हूँ कि लिखने और उस नाम से लिखने की मुझे अनुमति मिली हुई है। बहुत सी स्त्रियों को तो शायद कम्प्यूटर पर समय खोटा करने की अनुमति भी नहीं मिलती होगी। मैं उस नाम से इसलिए नहीं लिख सकती क्योंकि मुझे वह नाम अपना लगता ही नहीं। जो नाम अपना था उसे तो मैंने सौभाग्यवती कहलाने की कीमत के रूप में चुका दिया सो अब वह मेरा कहाँ से रह गया? वैसे दिल को बहलाने को यह भी सोच सकती हूँ कि उस नाम से क्या प्यार जो स्वयं पितृसत्ता के अन्तर्गत मुझे कुछ वर्षों के लिए दिया गया था, तब तक के लिए जब तक मैं अपने घर(अर्थात अपने पति के घर) की तरह अपना असली नाम, कुल, गोत्र नहीं प्राप्त कर लेती। ठीक वैसे ही जैसे जब तक माता पिता बच्चे के लिए एक उपयुक्त नाम नहीं ढूँढ लेते वे उसे छोटू या पप्पू जैसे किसी वैकल्पिक नाम से बुलाते हैं। यहाँ बहुत सी कहावतें याद आती हैं,स्त्री तो धान की रोप की तरह है जब तक उखाड़कर नई जगह न लगाओ पनप नहीं सकती,पराया धन आदि आदि।
खैर,मेरी नाम खोने की समस्या थोड़ी अधिक गम्भीर इसलिए भी है कि विवाह से पहले के अधिकतर मित्र मुझे मेरे सरनेम से ही बुलाते थे। अब वह ही मेरा नहीं रह गया है। तो यह ओढ़ा हुआ नाम और भी अटपटा लगता है। अपने इसी अनुभव के कारण मैंने अपनी बेटियों को सदा हस्ताक्षर करते समय अपने नाम को महत्व देने को ही कहा सरनेम को बिल्कुल नहीं ताकि विवाह के बाद उनकी यातना मुझसे कुछ कम ही रहे।
बहुत से पुरुष व कुछ स्त्रियाँ पूछेंगी कि यदि मुझे नाम बदलने से इतना ही कष्ट था तो मैंने विवाह किया ही क्यों? विवाह तो मैंने व मेरे पति दोनों ने ही किया। किसी जोर जबर्दस्ती से नहीं,अपनी इच्छा से किया फिर नाम की कीमत मुझे ही क्यों चुकानी पड़ी?
मुझे याद आता है कि पी एच डी करती मेरी दीदी के विवाह के लिए जब वर ढूँढा जा रहा था तो दीदी ने वर की पढ़ाई आदि के अतिरिक्त एक और माँग की थी कि जहाँ तक हो सके कोशिश की जाए कि हमारे ही सरनेम वाला वर ढूँढा जाए। किन्तु एक तो कुमाऊँनी समाज बहुत छोटा व सीमित है उसपर एक ही सरनेम के लोग प्रायः एक ही गोत्र के होते हैं सो उसकी यह इच्छा पूरी करना बहुत कठिन हो गया था। अब वह वर्षों से पी एच डी की मेहनत कर जिस डॉक्टर शब्द को अपने नाम के आगे लगाना चाहती थी वह अन्त में लगा किसी पराए से नाम के आगे !
यह नाम बदलने की परम्परा तब इतनी कष्टप्रद व क्रूर नहीं लगती होगी जब लड़कियों का विवाह बहुत छोटी उम्र में हो जाता होगा। जब उन्होंने अपना नाम किसी कागज में वर्षों वर्ष लिखा नहीं होता होगा, जब वे अपने हस्ताक्षर की अभ्यस्त नहीं हुई होती होंगी,जब उन्होंने अपने उस नाम से ढेरों प्रमाणपत्र नहीं पाए होते होंगे।
वैसे वर्तमान में बहुत सी स्त्रियाँ अपने पुराने नाम को ही रखे रहती हैं। ऐसी स्त्रियों की संख्या कम है परन्तु निरन्तर बढ़ रही है। कुछ अपने पुराने सरनेम के आगे पति का सरनेम भी लगा लेती हैं। वैसे कुछ बहुत ही कम लोग एक नए सरनेम का सृजन कर लेते हैं जो दोनों के सरनेम के जोड़तोड़ से बना होता है।
प्रायः जब इस सरनेम बदलने की बहस छिड़ती है तो लोग कहते हैं कि पति पत्नी का अलग अलग सरनेम होगा तो बच्चों का क्या होगा? पारिवारिक एकता का क्या होगा? किन्तु क्यों हर ऐसे मुद्दे, जैसे विजातीय धर्म के विवाह आदि के मुद्दे को सुलझाने में स्त्री के सरनेम या धर्म की ही बलि माँगी जाती है? क्यों विवाह सुख पाते तो पति पत्नी दोनों हैं किन्तु कीमत प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्री से ही माँगी जाती है? परोक्ष में पुरुष भी काफी त्याग करते होंगे परन्तु सहज रूप से विवाह हो या मातृत्व सुख नाम, नौकरी आदि की बलि केवल स्त्री ही चढ़ाती है। कम से कम अपेक्षा तो उसी से की जाती है।
सो मैं इस छद्मनाम से इसलिए लिखती हूँ क्योंकि कम से कम यह नाम मेरा चुना हुआ तो है। यदि मुझसे मेरे नाम का अधिकार छिन गया तो यह नाम कम से कम मुझे एक छद्म नाम चुनने का अधिकार तो देता है। मेरे हर उस पहचान पत्र, जिसमें मेरा कोई विशेष योगदान नहीं है, में मेरा नहीं मेरे पति का नाम है। मेरे हर उस प्रमाणपत्र जिसमें मेरी प्रतिभा, मेरी मेहनत लगी थी, में मेरा खोया हुआ नाम है। कम से कम मेरा लेखन, मेरी रचनाएँ तो मेरी निजी हों। इसमें से तो मेरे प्रदेश,मेरे पहाड़,मेरी संस्कृति की सुगन्ध आती रहे। मुझे यह नाम अधिक अपना लगता है। मेरा या किसी भी छद्मनामधारी का लेखन इसलिए निम्नस्तरीय तो नहीं हो सकता कि वह छद्मनाम से लिखा जा रहा है। यदि वह निम्न स्तरीय है तो नाम के कारण नहीं अपितु इसलिए है क्योंकि मेरा या उनका लेखन परिपक्व नहीं हुआ है या भाषा का प्रवाह व ज्ञान कम है या हममें लेखन प्रतिभा है ही नहीं। चुनाव के इस मौसम में नाम के चुनाव के इस छोटे से अधिकार से तो मुझे वंचित नहीं रखा जा सकता ना !
घुघूती बासूती
पुनश्चः इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए हेम पाण्डे जी ने एक और लेख... लिखा है।
घुघूती बासूती
विवाह के साथ बहुत कुछ खोया और पाया जाता है। जीवन में खोना व पाना सदा साथ साथ चलता है। यह स्वीकार भी किया जा सकता है। किन्तु अपनी पहचान खोना ! यह एक अक्षम्य व बर्बर समाज ही किसी से करवा सकता है। दुर्भाग्य से यह 'किसी' सदा स्त्री ही होती है। नाम खोने की पीड़ा वही समझ सकता है, जिसने अपना नाम खोया हो और जिसके लिए नाम का कोई महत्व रहा हो। अधिकतर पुरुष यही कहेंगे कि इसमें क्या बड़ी बात है। भाई, पल भर को अपने आप को अपनी सास के या पड़ोसी के नाम से जानने की कोशिश करके देखो। जीवन भर आप कहलाए थे समर दादाभाई हँसमुख और अचानक आपका नाम हो जाता है समर नान्जीभाई उदास !( या समर नान्जीबहन उदास और आप हैं पुरुष !)बोलिए कैसा लगेगा यह नया नाम ? क्या आपका हाथ हर बार किसी कागज पर यह नाम लिखते या यह हस्ताक्षर करते काँपेगा या नहीं ? हमारी पीढ़ी तो फिर भी भाग्यवान है कि सिमरन दादाभाई हँसमुख से केवल सिमरन नान्जीभाई उदास जैसी कुछ हो जाती है,सौभाग्य से सिमरन को तो अपने से चिपकाए रहती है। हमारी माँ की पीढ़ी का तो पहला नाम सिमरन तक बदल कर मंगला, श्यामा या गोपा या उस पल जो भी सुहाया कर दिया जाता था। सिमरन को स्मरण भी नहीं रहता था कि वह कभी सिमरन थी। यदि स्मरण करती थी तो सिवाय पीड़ा व नाम तक अपना न कह पाने की विवशता के कुछ भी हाथ नहीं आता था।हेम पान्डे जी ने अपने चिट्ठे शकुनाखर में छद्मनामधारी ब्लॉगर्स पर आधारित एक कहानी लिखी। उसपर बहुत सी टिप्पणियाँ आईं। वहीं ज्ञानदत्त पाण्डेय जी छद्मनामधारी मानव के बारे में कहते हैं.........
'मुझे नहीं लगता कि छद्मनाम से लिखने वाले या अपने बारे में कम से कम उजागर करने वाले बहुत सफल ब्लॉगर होते हैं। आपकी जिन्दगी में बहुत कुछ पब्लिक होता है, कुछ प्राइवेट होता है और अत्यल्प सीक्रेट होता है। पब्लिक को यथा सम्भव पब्लिक करना ब्लॉगर की जिम्मेदारी है। पर अधिकांश पहेली/कविता/गजल/साहित्य ठेलने में इतने आत्मरत हैं कि इस पक्ष पर सोचते लिखते नहीं।और उनकी ब्लॉगिंग बहुत अच्छी रेट नहीं की जा सकती।'
उनसे मैं यही कहूँगी कि सारी समस्या ही इस सोचने से उपजी है। यदि सोचती नहीं तो मैं भी गर्व के साथ अपना लेखन उस नाम के साथ ठेलती जाती जो मेरा नहीं है, परन्तु मैं ढो रही हूँ। संसार की अधिकतर स्त्रियाँ बहुत आराम से अपने नए नाम को अपना लेती हैं क्योंकि वे जन्मजात रानी बेटियाँ होती हैं, परम्पराओं को वे आराम से ओढ़ती, जीती हैं, प्रश्न नहीं करती, न समाज से न अपने आप से। परन्तु कभी कभी गलत नक्षत्र में कुछ ऐसी बेटियाँ भी जन्म ले लेती हैं ( वैसे बेटी का जन्म हो तो शुभ नक्षत्र तो हो ही नहीं सकते ! ) जो प्रश्न पूछने के असाध्य रोग से ग्रसित होती हैं। मैं उन्हीं अरानी बेटियों में से एक हूँ। प्रश्न करना और उनके उत्तर पाना और न पाने पर उन्हें खोजना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानती हूँ। वैसे स्त्री और जन्मसिद्ध अधिकार शब्द एक दूसरे के साथ शोभा नहीं देते। स्त्री और कर्त्तव्य या त्याग कैसे एक दूसरे की शोभा बढ़ाते हैं। कुछ वैसे ही जैसे...
शशिनाच निशा, निशयाच शशि
शशिना निशयाच विभाती नभः।
( स्मरण के आधार पर लिखा है, अशुद्धियाँ हो सकती हैं।)
अर्थात चन्द्रमा से रात्रि की शोभा बढ़ती है और रात्रि से चन्द्रमा की। चन्द्रमा और रात्रि से आकाश की शोभा बढ़ती है।
ठीक ऐसे ही हे स्त्री,
त्याग या कर्त्तव्य से स्त्री की शोभा बढ़ती है और स्त्री से त्याग की। त्याग व स्त्री (या कहिए त्यागमयी स्त्री से,वैसे किसी अन्य प्रकार की स्त्री की कल्पना ही हृदय दहला देने वाली होती है ना!)से समाज की शोभा बढ़ती है।
सो हे स्त्री, तू त्याग किए जा, नाम से लेकर अधिकारों तक का। इसी में तेरा व समाज का कल्याण है।
मैं छद्म नाम से इसलिए लिखती हूँ क्योंकि आज जो मेरा नाम है उससे मैं नहीं लिख सकती। कोई रोकटोक की बात नहीं है। मैं सौभाग्यवती हूँ कि लिखने और उस नाम से लिखने की मुझे अनुमति मिली हुई है। बहुत सी स्त्रियों को तो शायद कम्प्यूटर पर समय खोटा करने की अनुमति भी नहीं मिलती होगी। मैं उस नाम से इसलिए नहीं लिख सकती क्योंकि मुझे वह नाम अपना लगता ही नहीं। जो नाम अपना था उसे तो मैंने सौभाग्यवती कहलाने की कीमत के रूप में चुका दिया सो अब वह मेरा कहाँ से रह गया? वैसे दिल को बहलाने को यह भी सोच सकती हूँ कि उस नाम से क्या प्यार जो स्वयं पितृसत्ता के अन्तर्गत मुझे कुछ वर्षों के लिए दिया गया था, तब तक के लिए जब तक मैं अपने घर(अर्थात अपने पति के घर) की तरह अपना असली नाम, कुल, गोत्र नहीं प्राप्त कर लेती। ठीक वैसे ही जैसे जब तक माता पिता बच्चे के लिए एक उपयुक्त नाम नहीं ढूँढ लेते वे उसे छोटू या पप्पू जैसे किसी वैकल्पिक नाम से बुलाते हैं। यहाँ बहुत सी कहावतें याद आती हैं,स्त्री तो धान की रोप की तरह है जब तक उखाड़कर नई जगह न लगाओ पनप नहीं सकती,पराया धन आदि आदि।
खैर,मेरी नाम खोने की समस्या थोड़ी अधिक गम्भीर इसलिए भी है कि विवाह से पहले के अधिकतर मित्र मुझे मेरे सरनेम से ही बुलाते थे। अब वह ही मेरा नहीं रह गया है। तो यह ओढ़ा हुआ नाम और भी अटपटा लगता है। अपने इसी अनुभव के कारण मैंने अपनी बेटियों को सदा हस्ताक्षर करते समय अपने नाम को महत्व देने को ही कहा सरनेम को बिल्कुल नहीं ताकि विवाह के बाद उनकी यातना मुझसे कुछ कम ही रहे।
बहुत से पुरुष व कुछ स्त्रियाँ पूछेंगी कि यदि मुझे नाम बदलने से इतना ही कष्ट था तो मैंने विवाह किया ही क्यों? विवाह तो मैंने व मेरे पति दोनों ने ही किया। किसी जोर जबर्दस्ती से नहीं,अपनी इच्छा से किया फिर नाम की कीमत मुझे ही क्यों चुकानी पड़ी?
मुझे याद आता है कि पी एच डी करती मेरी दीदी के विवाह के लिए जब वर ढूँढा जा रहा था तो दीदी ने वर की पढ़ाई आदि के अतिरिक्त एक और माँग की थी कि जहाँ तक हो सके कोशिश की जाए कि हमारे ही सरनेम वाला वर ढूँढा जाए। किन्तु एक तो कुमाऊँनी समाज बहुत छोटा व सीमित है उसपर एक ही सरनेम के लोग प्रायः एक ही गोत्र के होते हैं सो उसकी यह इच्छा पूरी करना बहुत कठिन हो गया था। अब वह वर्षों से पी एच डी की मेहनत कर जिस डॉक्टर शब्द को अपने नाम के आगे लगाना चाहती थी वह अन्त में लगा किसी पराए से नाम के आगे !
यह नाम बदलने की परम्परा तब इतनी कष्टप्रद व क्रूर नहीं लगती होगी जब लड़कियों का विवाह बहुत छोटी उम्र में हो जाता होगा। जब उन्होंने अपना नाम किसी कागज में वर्षों वर्ष लिखा नहीं होता होगा, जब वे अपने हस्ताक्षर की अभ्यस्त नहीं हुई होती होंगी,जब उन्होंने अपने उस नाम से ढेरों प्रमाणपत्र नहीं पाए होते होंगे।
वैसे वर्तमान में बहुत सी स्त्रियाँ अपने पुराने नाम को ही रखे रहती हैं। ऐसी स्त्रियों की संख्या कम है परन्तु निरन्तर बढ़ रही है। कुछ अपने पुराने सरनेम के आगे पति का सरनेम भी लगा लेती हैं। वैसे कुछ बहुत ही कम लोग एक नए सरनेम का सृजन कर लेते हैं जो दोनों के सरनेम के जोड़तोड़ से बना होता है।
प्रायः जब इस सरनेम बदलने की बहस छिड़ती है तो लोग कहते हैं कि पति पत्नी का अलग अलग सरनेम होगा तो बच्चों का क्या होगा? पारिवारिक एकता का क्या होगा? किन्तु क्यों हर ऐसे मुद्दे, जैसे विजातीय धर्म के विवाह आदि के मुद्दे को सुलझाने में स्त्री के सरनेम या धर्म की ही बलि माँगी जाती है? क्यों विवाह सुख पाते तो पति पत्नी दोनों हैं किन्तु कीमत प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्री से ही माँगी जाती है? परोक्ष में पुरुष भी काफी त्याग करते होंगे परन्तु सहज रूप से विवाह हो या मातृत्व सुख नाम, नौकरी आदि की बलि केवल स्त्री ही चढ़ाती है। कम से कम अपेक्षा तो उसी से की जाती है।
सो मैं इस छद्मनाम से इसलिए लिखती हूँ क्योंकि कम से कम यह नाम मेरा चुना हुआ तो है। यदि मुझसे मेरे नाम का अधिकार छिन गया तो यह नाम कम से कम मुझे एक छद्म नाम चुनने का अधिकार तो देता है। मेरे हर उस पहचान पत्र, जिसमें मेरा कोई विशेष योगदान नहीं है, में मेरा नहीं मेरे पति का नाम है। मेरे हर उस प्रमाणपत्र जिसमें मेरी प्रतिभा, मेरी मेहनत लगी थी, में मेरा खोया हुआ नाम है। कम से कम मेरा लेखन, मेरी रचनाएँ तो मेरी निजी हों। इसमें से तो मेरे प्रदेश,मेरे पहाड़,मेरी संस्कृति की सुगन्ध आती रहे। मुझे यह नाम अधिक अपना लगता है। मेरा या किसी भी छद्मनामधारी का लेखन इसलिए निम्नस्तरीय तो नहीं हो सकता कि वह छद्मनाम से लिखा जा रहा है। यदि वह निम्न स्तरीय है तो नाम के कारण नहीं अपितु इसलिए है क्योंकि मेरा या उनका लेखन परिपक्व नहीं हुआ है या भाषा का प्रवाह व ज्ञान कम है या हममें लेखन प्रतिभा है ही नहीं। चुनाव के इस मौसम में नाम के चुनाव के इस छोटे से अधिकार से तो मुझे वंचित नहीं रखा जा सकता ना !
घुघूती बासूती
पुनश्चः इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए हेम पाण्डे जी ने एक और लेख... लिखा है।
घुघूती बासूती
Friday, April 17, 2009
क्या हमारे बच्चे पिटने के लिए स्कूल जाते हैं ?
आज ही के टाइम्स औफ़ इन्डिया में पढ़ा कि राजकोट के एक स्कूल की दो शिक्षिकाओं ने परीक्षा देते एक एक 11 वर्षीय छात्र को स्टील के स्केल से इतना मारा कि उसके शरीर पर छाले बन गए। वह दर्द से चिल्लाता रहा और वे उसे मारती रहीं। उनके अनुसार उसने उनके पर्स से 15रुपए चुराए थे। हो सकता है कि बच्चे ने यह अपराध किया भी हो। किन्तु इस या किसी भी अपराध की ऐसी सजा !
कल टी वी पर एक बच्ची को घंटों धूप में खड़ा रखने से उसके बेहोश व शायद कौमा में पहुँचने की खबर थी।
हमारे देश में बच्चों का एक बहुत बड़ा प्रतिशत स्कूल जाता ही नहीं है। जो स्कूल जाते हैं यदि अध्यापक उनपर अपना सारा क्रोध मार पीट कर निकालेंगे तो बहुत से बच्चे स्कूल जाने से कतराएंगे। हर दिन समाचार पत्रों में बच्चों के साथ स्कूल में हुई मारपीट के समाचार छपते हैं। समाचार तो तब ही बनते हैं जब बच्चे हस्पताल पहुँच जाते हैं। मारपीट के वे मामले जिनसे केवल बच्चों का मन ही आहत होता है समाचार नहीं बनते। परन्तु न जाने कितने ऐसे बच्चे स्कूल जाने की बजाए कहीं कुछ काम पकड़ लेना बेहतर समझ लेते होंगे। ऐसे ही बच्चे फिर काम के स्थान पर हिंसा व बर्बरता का शिकार बनते होंगे।
जो समाज अपने बच्चों पर हिंसा करता है वह कहीं से भी सभ्य नहीं कहला सकता। इस बर्बरता के बीच बए हुए बच्चे यह सीखते हैं कि शक्तिशाली किसी पर भी अपना बल प्रयोग कर सकता है और बलप्रयोग ही मामले सुलझाने क एक मात्र तरीका है। जब हम कहीं अपने देश की बुराई होते या दिखाते देखते हैं तो हम यूँ भड़क उठते हैं जैसे हमारा देश व समाज आदर्श हों। यदि हममें इतना ही देशप्रेम भरा हुआ है तो सबसे पहले हमें अपने बच्चों पर अत्याचार करने पर रोक लगानी होगी। इसके लिए कानून तो अवश्य होंगे परन्तु कानून अपराध होने के बाद केवल सजा दे सकते हैं। हमें यह देखना होगा कि बच्चों पर ये अत्याचार होते ही क्यों हैं।
इसके कई कारणों में से एक कारण ऐसे लोगों का भी अध्यापक बनना है जिनमें अध्यापक होने की वह मूलभूत विशेषता की कमी है जो एक अध्यापक में आवश्यक है। जितने धैर्य व बच्चों के प्रति प्रेम की इस पेशे में आवश्यकता है उतनी और कहीं नहीं। यह सच है कि बच्चे बहुत बार इतना उकसाते व क्रोध दिलाते हैं कि अध्यापक अपना धैर्य खो बैठता है। परन्तु यही धैर्य तो एक आम व्यक्ति को एक अध्यापक से अलग करता है। यदि हममें यह योग्यता नहीं है तो हमें अध्यापन में आना ही नहीं चाहिए। मुझे याद है कि अध्यापन आरम्भ करने से पहले मैंने अपने से यह वायदा किया था कि जिस दिन मेरा मन किसी को मारने का हुआ या मेरा हाथ उठा उसी दिन मैं अध्यापन बंद कर दूँगी। एक बच्चा तो जैसे मार खाना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता था। जिस दिन मेरा हाथ उठने ही वाला था मेरे आँसू ही लगभग निकल गए। गई तो मैं क्रोध में उसपर हाथ उठाने ही को थी परन्तु उसके पास पहुँचकर उसे अपने गले से लगा लिया। वह भी मेरी विवशता को समझ रो पड़ा।
मेरी बच्चियाँ दो साल तक जिस स्कूल में पढ़ती थी व जहाँ कुछ समय बाद मैं भी पढ़ाती थी वहाँ एक अध्यापिका अपनी चूड़ियाँ उतार कर बच्चों पर पिल पड़ती थीं। एक अध्यापक की हथेलियों में कोई रोग था जिससे वे इतनी भयंकर रूप से रफ़ थीं कि बच्चों को जब थप्पड़ मारते तो खून निकल आता था। मुझे याद है कि मुझे बच्चियों को कहना पड़ा था कि यदि वे तुम्हें मारने लगें तो घर भाग आना बाद में जो होगा हम सम्भाल लेंगे। यहीं पर बाद में जब मैंने पढ़ाना शुरू किया तो कई क्रोधी स्वभाव वाली अध्यापिकाओं को क्रोध आने पर दस तक गिनने की सलाह देनी पड़ी। यह सलाह काफ़ी सीमा तक कारगार भी सिद्ध हुई। परन्तु जब स्कूल के चपड़ासी को अध्यापकों से अधिक वेतन मिलता था मैं अध्यापकों को अधिक दोष भी नहीं दे सकती थी। बहुत से निजी स्कूलों में अध्यापकों का जमकर शोषण होता है।
यदि हमारे देश में इस सबसे महत्वपूर्ण काम के सही मूल्य को सही आँका जाए तो सबसे अधिक वेतन अध्यापकों को ही दिया जाए। यदि ऐसा हो तो इस पेशे में सबसे बुद्धिमान व सबसे धैर्यवान लोगों का ही चुनाव होगा। तब धैर्यविहीन व बच्चों से प्रेम न करने वाले लोग भी केवल वेतन पाने के लिए अध्यापन में नहीं आ पाएँगे। होना तो यह चाहिए कि यह काम कोई विवशता से न अपनाए केवल अध्यापन व बच्चों से प्रेम के आधार पर अपनाए। शायद केवल कोई डिग्री ही इसका आधार न होकर सही मानसिक योग्यता को भी चयन का आधार बनाना चाहिए। होना तो यह चाहिए कि देश के सबसे अधिक प्रतिभावान छात्र बी एड आदि में प्रवेश पाने के लिए लालायित हों और फिर उनकी भावनात्मक व मानसिक परिपक्वता के आधार पर ही उन्हें प्रवेश मिले। ऐसे में हम भी अध्यापकों से अच्छा पढ़ाने की आशा कर सकते हैं। यदि मूँगफ़ली दोगे तो बन्दर ही मिलेंगे वाली कहावत भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में प्राय: चरितार्थ होती दिखती है।
जब हम अपनी साइकिल तक योग्य मैकेनिक के हाथ में ही सौंपना पसन्द करते हैं तो हम अपने बच्चों को सबसे योग्य पात्रों के हाथ में क्यों नहीं देना चाह्ते ? योग्य पात्र को वेतन देने में कंजूसी करेंगे तो ऐसे भी लोग अध्यापन में आएँगे जो जल्लाद होने की योग्यता रखते हैं। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी को सही दिशा मिले तो अध्यापन को वह आदर देना ही होगा जो किसी जमाने में भारत में गुरू को मिलता था। साथ ही साथ अध्यापकों को भी समय समय पर तनाव की स्थिति में काउन्सलिंग की सुविधा मिलनी चाहिए।
घुघूती बासूती
कल टी वी पर एक बच्ची को घंटों धूप में खड़ा रखने से उसके बेहोश व शायद कौमा में पहुँचने की खबर थी।
हमारे देश में बच्चों का एक बहुत बड़ा प्रतिशत स्कूल जाता ही नहीं है। जो स्कूल जाते हैं यदि अध्यापक उनपर अपना सारा क्रोध मार पीट कर निकालेंगे तो बहुत से बच्चे स्कूल जाने से कतराएंगे। हर दिन समाचार पत्रों में बच्चों के साथ स्कूल में हुई मारपीट के समाचार छपते हैं। समाचार तो तब ही बनते हैं जब बच्चे हस्पताल पहुँच जाते हैं। मारपीट के वे मामले जिनसे केवल बच्चों का मन ही आहत होता है समाचार नहीं बनते। परन्तु न जाने कितने ऐसे बच्चे स्कूल जाने की बजाए कहीं कुछ काम पकड़ लेना बेहतर समझ लेते होंगे। ऐसे ही बच्चे फिर काम के स्थान पर हिंसा व बर्बरता का शिकार बनते होंगे।
जो समाज अपने बच्चों पर हिंसा करता है वह कहीं से भी सभ्य नहीं कहला सकता। इस बर्बरता के बीच बए हुए बच्चे यह सीखते हैं कि शक्तिशाली किसी पर भी अपना बल प्रयोग कर सकता है और बलप्रयोग ही मामले सुलझाने क एक मात्र तरीका है। जब हम कहीं अपने देश की बुराई होते या दिखाते देखते हैं तो हम यूँ भड़क उठते हैं जैसे हमारा देश व समाज आदर्श हों। यदि हममें इतना ही देशप्रेम भरा हुआ है तो सबसे पहले हमें अपने बच्चों पर अत्याचार करने पर रोक लगानी होगी। इसके लिए कानून तो अवश्य होंगे परन्तु कानून अपराध होने के बाद केवल सजा दे सकते हैं। हमें यह देखना होगा कि बच्चों पर ये अत्याचार होते ही क्यों हैं।
इसके कई कारणों में से एक कारण ऐसे लोगों का भी अध्यापक बनना है जिनमें अध्यापक होने की वह मूलभूत विशेषता की कमी है जो एक अध्यापक में आवश्यक है। जितने धैर्य व बच्चों के प्रति प्रेम की इस पेशे में आवश्यकता है उतनी और कहीं नहीं। यह सच है कि बच्चे बहुत बार इतना उकसाते व क्रोध दिलाते हैं कि अध्यापक अपना धैर्य खो बैठता है। परन्तु यही धैर्य तो एक आम व्यक्ति को एक अध्यापक से अलग करता है। यदि हममें यह योग्यता नहीं है तो हमें अध्यापन में आना ही नहीं चाहिए। मुझे याद है कि अध्यापन आरम्भ करने से पहले मैंने अपने से यह वायदा किया था कि जिस दिन मेरा मन किसी को मारने का हुआ या मेरा हाथ उठा उसी दिन मैं अध्यापन बंद कर दूँगी। एक बच्चा तो जैसे मार खाना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता था। जिस दिन मेरा हाथ उठने ही वाला था मेरे आँसू ही लगभग निकल गए। गई तो मैं क्रोध में उसपर हाथ उठाने ही को थी परन्तु उसके पास पहुँचकर उसे अपने गले से लगा लिया। वह भी मेरी विवशता को समझ रो पड़ा।
मेरी बच्चियाँ दो साल तक जिस स्कूल में पढ़ती थी व जहाँ कुछ समय बाद मैं भी पढ़ाती थी वहाँ एक अध्यापिका अपनी चूड़ियाँ उतार कर बच्चों पर पिल पड़ती थीं। एक अध्यापक की हथेलियों में कोई रोग था जिससे वे इतनी भयंकर रूप से रफ़ थीं कि बच्चों को जब थप्पड़ मारते तो खून निकल आता था। मुझे याद है कि मुझे बच्चियों को कहना पड़ा था कि यदि वे तुम्हें मारने लगें तो घर भाग आना बाद में जो होगा हम सम्भाल लेंगे। यहीं पर बाद में जब मैंने पढ़ाना शुरू किया तो कई क्रोधी स्वभाव वाली अध्यापिकाओं को क्रोध आने पर दस तक गिनने की सलाह देनी पड़ी। यह सलाह काफ़ी सीमा तक कारगार भी सिद्ध हुई। परन्तु जब स्कूल के चपड़ासी को अध्यापकों से अधिक वेतन मिलता था मैं अध्यापकों को अधिक दोष भी नहीं दे सकती थी। बहुत से निजी स्कूलों में अध्यापकों का जमकर शोषण होता है।
यदि हमारे देश में इस सबसे महत्वपूर्ण काम के सही मूल्य को सही आँका जाए तो सबसे अधिक वेतन अध्यापकों को ही दिया जाए। यदि ऐसा हो तो इस पेशे में सबसे बुद्धिमान व सबसे धैर्यवान लोगों का ही चुनाव होगा। तब धैर्यविहीन व बच्चों से प्रेम न करने वाले लोग भी केवल वेतन पाने के लिए अध्यापन में नहीं आ पाएँगे। होना तो यह चाहिए कि यह काम कोई विवशता से न अपनाए केवल अध्यापन व बच्चों से प्रेम के आधार पर अपनाए। शायद केवल कोई डिग्री ही इसका आधार न होकर सही मानसिक योग्यता को भी चयन का आधार बनाना चाहिए। होना तो यह चाहिए कि देश के सबसे अधिक प्रतिभावान छात्र बी एड आदि में प्रवेश पाने के लिए लालायित हों और फिर उनकी भावनात्मक व मानसिक परिपक्वता के आधार पर ही उन्हें प्रवेश मिले। ऐसे में हम भी अध्यापकों से अच्छा पढ़ाने की आशा कर सकते हैं। यदि मूँगफ़ली दोगे तो बन्दर ही मिलेंगे वाली कहावत भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में प्राय: चरितार्थ होती दिखती है।
जब हम अपनी साइकिल तक योग्य मैकेनिक के हाथ में ही सौंपना पसन्द करते हैं तो हम अपने बच्चों को सबसे योग्य पात्रों के हाथ में क्यों नहीं देना चाह्ते ? योग्य पात्र को वेतन देने में कंजूसी करेंगे तो ऐसे भी लोग अध्यापन में आएँगे जो जल्लाद होने की योग्यता रखते हैं। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी को सही दिशा मिले तो अध्यापन को वह आदर देना ही होगा जो किसी जमाने में भारत में गुरू को मिलता था। साथ ही साथ अध्यापकों को भी समय समय पर तनाव की स्थिति में काउन्सलिंग की सुविधा मिलनी चाहिए।
घुघूती बासूती
Thursday, April 16, 2009
कौन कहता है कि उम्र के साथ मनुष्य खड़ूस नहीं होता जाता ?
कौन कहता है कि उम्र के साथ मनुष्य खड़ूस नहीं होता जाता ? बिल्कुल हो जाता है। मैं हूँ न इसकी जीती जागती उदाहरण ! दो साल से भी अधिक समय से मेरे मित्र मुझे कहते रहे हैं कि बाराहा का उपयोग करो किन्तु मैं हूँ कि अपनी तख्ती को ही सीने से चिपकाए बैठी रही। मुझ मूर्ख से ढंग से डाउनलोड नहीं हो पाया तो वह भी करवाया। फिर भी मैं तख्ती पर लिखती रही। पोस्ट लिखने तक तो ठीक था, टिपियाने का काम भी उसी पर लिख कॉपी पेस्ट करती रही। किसी ने फिर हिन्दी राइटर की सलाह दी। सलाह तो नेक थी, हिन्दी राइटर का उपयोग करना भी कोई रॉकेट साइंस सा नहीं था परन्तु वही पुराने का मोह ! चिपकी रही तख्ती से। तब तक जब तक मेरे कम्प्यूटर ने परेशान होकर कहना नहीं शुरू कर दिया कि वर्चुअल मैमोरी बहुत कम है। बार बार कहना शुरू किया। इतना कि मैं परेशान हो गई। टिपियाने की बीमारी तो है ही। उस पर हर पल तख्ती से कॉपी पेस्ट करते करते मैं तो नहीं शायद मेरा कम्प्यूटर परेशान हो गया था। या उसे अपनी मालकिन की मूर्खता पर शर्म आ रही थी। सो जब पानी सिर के ऊपर आ गया तो उसने असहयोग आन्दोलन शुरू कर दिया। कहते हैं न लातों के भूत बातों से नहीं मानते तो मैं क्यों बिना धमकाए मानती ? खैर देर आयद दुरस्त आयद। आज मैंने बाराहा का भी उपयोग किया और हिन्दी राइटर का भी। एक बार भी मेरे कम्प्यूटर ने मुझे चेतावनी नहीं दी।
आप पूछेंगे कि इसका उम्र से क्या सम्बन्ध। तो सम्बन्ध यह है कि जब उम्र कम होती है तो हर नई वस्तु आजमाए बिना रहा नहीं जाता। जब उम्र बढ़ती है तो हर नई वस्तु का उपयोग टाला जाता है। यह उम्र केवल वर्षों से नहीं नापी जाती आपके जीवन के प्रति मनोभावों, नजरिए, नए के प्रति जिज्ञासा व उत्साह से नापी जाती है। मेरी उम्र के बहुत से मित्र हर दिन नया आजमाते हैं और मैं नए से कतराती हूँ। सो वे किसी भी उम्र में युवा हैं व मैं :( वृद्धा,खड़ूस वृद्धा ! खैर, इस मामले में तो खड़ूसपन खत्म हुआ। नया अपनाने में कष्ट भी हुआ। मुझे यह जो पॉप अप खिड़की शब्द लेकर उपस्थित हो जाती है जरा भी नहीं सुहाती। उससे खीज होती है। बिन माँगे सुझाव सी लगती है। शायद इसे भी चुप कराने का कोई उपाय होगा। खड़ूसपन से छुटकारा पाने का एक और सबूत मेरा बाराहा का उपयोग करके पंजाबी लिखना था।
फिर भी अंत में यही कहूँगी कि तख्ती का उपयोग अधिक सरल था। उसमें हर अक्षर को लिखने के लिए a का उपयोग नहीं करना पड़ता। kसे क बनता है न कि ka से। हलन्त के लिए x लगाना होता है। फिर हलन्त आता ही कितनी बार है ? सो मुझे वह तरीका अधिक पसन्द है। फिर वह पुराना मित्र है। जब मुझे हिन्दी लिखने का शौक चर्राया था तब अपने छोटे पुत्रीवर को बताया। उसने ढूँढ कर मुझे www.hindikalam.com के बारे में बताया। वह हिन्दी लिखना पढ़ना न के बराबर ही जानता है परन्तु मेरी सहायता तो की। बाद में बड़ा पुत्रीवर जब घर आया तो मेरे कम्प्यूटर में यह तख्ती नामक औजार या जो भी कहो डाल गया। तब से मैं इसकी भक्त बनी रही।
आज तख्ती से क्षमा माँगते हुए बड़े दुख से उसे कहना पड़ा कि बहुत हुआ साथ तुम्हारा। अब कुछ नया भी आजमाऊँगी। यह लेख हिन्दी राइटर की सहायता से लिखा है। वैसे www.hindikalam.com का यह लाभ है कि जब किसी अन्य के कम्प्यूटर का उपयोग करना हो तो औन लाइन जाकर हिन्दी लिखी जा सकती है। परिवार में मेरे सिवा कोई हिन्दी लिखता पढ़ता नहीं है,(मेरा लिखा भी नहीं !) सो अन्य के कम्प्यूटर पर यही काम आता है।
घुघूती बासूती
आप पूछेंगे कि इसका उम्र से क्या सम्बन्ध। तो सम्बन्ध यह है कि जब उम्र कम होती है तो हर नई वस्तु आजमाए बिना रहा नहीं जाता। जब उम्र बढ़ती है तो हर नई वस्तु का उपयोग टाला जाता है। यह उम्र केवल वर्षों से नहीं नापी जाती आपके जीवन के प्रति मनोभावों, नजरिए, नए के प्रति जिज्ञासा व उत्साह से नापी जाती है। मेरी उम्र के बहुत से मित्र हर दिन नया आजमाते हैं और मैं नए से कतराती हूँ। सो वे किसी भी उम्र में युवा हैं व मैं :( वृद्धा,खड़ूस वृद्धा ! खैर, इस मामले में तो खड़ूसपन खत्म हुआ। नया अपनाने में कष्ट भी हुआ। मुझे यह जो पॉप अप खिड़की शब्द लेकर उपस्थित हो जाती है जरा भी नहीं सुहाती। उससे खीज होती है। बिन माँगे सुझाव सी लगती है। शायद इसे भी चुप कराने का कोई उपाय होगा। खड़ूसपन से छुटकारा पाने का एक और सबूत मेरा बाराहा का उपयोग करके पंजाबी लिखना था।
फिर भी अंत में यही कहूँगी कि तख्ती का उपयोग अधिक सरल था। उसमें हर अक्षर को लिखने के लिए a का उपयोग नहीं करना पड़ता। kसे क बनता है न कि ka से। हलन्त के लिए x लगाना होता है। फिर हलन्त आता ही कितनी बार है ? सो मुझे वह तरीका अधिक पसन्द है। फिर वह पुराना मित्र है। जब मुझे हिन्दी लिखने का शौक चर्राया था तब अपने छोटे पुत्रीवर को बताया। उसने ढूँढ कर मुझे www.hindikalam.com के बारे में बताया। वह हिन्दी लिखना पढ़ना न के बराबर ही जानता है परन्तु मेरी सहायता तो की। बाद में बड़ा पुत्रीवर जब घर आया तो मेरे कम्प्यूटर में यह तख्ती नामक औजार या जो भी कहो डाल गया। तब से मैं इसकी भक्त बनी रही।
आज तख्ती से क्षमा माँगते हुए बड़े दुख से उसे कहना पड़ा कि बहुत हुआ साथ तुम्हारा। अब कुछ नया भी आजमाऊँगी। यह लेख हिन्दी राइटर की सहायता से लिखा है। वैसे www.hindikalam.com का यह लाभ है कि जब किसी अन्य के कम्प्यूटर का उपयोग करना हो तो औन लाइन जाकर हिन्दी लिखी जा सकती है। परिवार में मेरे सिवा कोई हिन्दी लिखता पढ़ता नहीं है,(मेरा लिखा भी नहीं !) सो अन्य के कम्प्यूटर पर यही काम आता है।
घुघूती बासूती
Monday, April 13, 2009
मौसमी परीक्षा
हमारे एक मित्र को एक परीक्षा पत्र बनाना था। जैसे वर्ष में छह ॠतुएँ आती हैं वैसे ही पाँच वर्ष में एक बार लोकसभा चुनाव की यह पावन ॠतु भी आती है। ॠतु अनुरूप उन्होंने जो परचा बनाया वह कुछ इस प्रकार था....
जंबू द्वीप के एक खंड में चुनाव होने वाले हैं। वहाँ कुल ४३५ सीटें हैं। लगभग इतने ही या दो चार कम या अधिक राजनैतिक दल भी हैं। लगभग सभी दल चुनाव लड़ रहे हैं। दलों के नाम हैं.....
कगश
टपलच
मतबल
बलतम
तगड़प
रतजग
लहचह
छरम
शरम
गरम
भरम
नरम
टपक
सनक
अनबन
बनठन
जतन
बरतन
ठकनक
करतब
परमच
मनक
यखट
नटकट
नटनट
टनटन
हरसद
दरद
आदि आदि।
यदि कगश दल को ७३ सीटें मिलती हैं और उसके बाद के हर दल को उससे १ कम फिर अगले को २ कम , ३ कम क्रमशः सीट मिलती हैं तो किस दल को शून्य सीटें मिलेंगी। कहाँ से क्रमशः १, ३, ५, ७ सीटें बढ़ती जाएँगी ? याद रहे ये दल एक पंक्ति में नहीं हैं अपितु वृत्त की परिधि में हैं। प्रत्येक दल अपने से क्रमशः तीसरे दल के साथ सरकार नहीं बनाएगा। प्रत्येक दल को अपने से क्रमशः सातवें दल के साथ गठबंधन करने की इच्छा है। किन्तु प्रत्येक दल क्रमशः अपने से चौथे दल के साथ बात करने वाले से कट्टी है। बताइए कौन सा गठबन्धन २१८ के जादुई आँकड़े को सबसे सरलता से पार कर जाएगा और क्यों ?
प्रश्न को हल करने वाले को चरटकनपट वाला राज्य कुशासन या सुशासन के लिए ५ वर्ष तक राज्य करने को दिया जाएगा।
सप्लाई से पहले कंडीशन्स एप्लाई होंगी।
दुर्भाग्य से एक ही बालक परीक्षा देने आया और तीन घंटे समाप्त होने पर यह लिखकर चला गया।
मुझे शासन नहीं चाहिए, न चरटकनपट का, न उठक या पटक का। मैं तो भटक कर यहाँ आ गया। मैं तो चला नारे लगाने और मतदान करने।
परीक्षार्थी का नामः उज़बक (अर्थ के लिए शब्दों का सफर पढ़िए।)
हमारे मित्र बहुत दुखी हैं। अब नया प्रश्नपत्र बना रहे हैं।
बहुत बकबक (ओह यह तो मेरे प्रिय दल का नाम है !) हो गई अब द ल ब द ल दल के बारे में समाचार पढ़ने जाती हूँ। नमस्कार।
घुघूती बासूती
जंबू द्वीप के एक खंड में चुनाव होने वाले हैं। वहाँ कुल ४३५ सीटें हैं। लगभग इतने ही या दो चार कम या अधिक राजनैतिक दल भी हैं। लगभग सभी दल चुनाव लड़ रहे हैं। दलों के नाम हैं.....
कगश
टपलच
मतबल
बलतम
तगड़प
रतजग
लहचह
छरम
शरम
गरम
भरम
नरम
टपक
सनक
अनबन
बनठन
जतन
बरतन
ठकनक
करतब
परमच
मनक
यखट
नटकट
नटनट
टनटन
हरसद
दरद
आदि आदि।
यदि कगश दल को ७३ सीटें मिलती हैं और उसके बाद के हर दल को उससे १ कम फिर अगले को २ कम , ३ कम क्रमशः सीट मिलती हैं तो किस दल को शून्य सीटें मिलेंगी। कहाँ से क्रमशः १, ३, ५, ७ सीटें बढ़ती जाएँगी ? याद रहे ये दल एक पंक्ति में नहीं हैं अपितु वृत्त की परिधि में हैं। प्रत्येक दल अपने से क्रमशः तीसरे दल के साथ सरकार नहीं बनाएगा। प्रत्येक दल को अपने से क्रमशः सातवें दल के साथ गठबंधन करने की इच्छा है। किन्तु प्रत्येक दल क्रमशः अपने से चौथे दल के साथ बात करने वाले से कट्टी है। बताइए कौन सा गठबन्धन २१८ के जादुई आँकड़े को सबसे सरलता से पार कर जाएगा और क्यों ?
प्रश्न को हल करने वाले को चरटकनपट वाला राज्य कुशासन या सुशासन के लिए ५ वर्ष तक राज्य करने को दिया जाएगा।
सप्लाई से पहले कंडीशन्स एप्लाई होंगी।
दुर्भाग्य से एक ही बालक परीक्षा देने आया और तीन घंटे समाप्त होने पर यह लिखकर चला गया।
मुझे शासन नहीं चाहिए, न चरटकनपट का, न उठक या पटक का। मैं तो भटक कर यहाँ आ गया। मैं तो चला नारे लगाने और मतदान करने।
परीक्षार्थी का नामः उज़बक (अर्थ के लिए शब्दों का सफर पढ़िए।)
हमारे मित्र बहुत दुखी हैं। अब नया प्रश्नपत्र बना रहे हैं।
बहुत बकबक (ओह यह तो मेरे प्रिय दल का नाम है !) हो गई अब द ल ब द ल दल के बारे में समाचार पढ़ने जाती हूँ। नमस्कार।
घुघूती बासूती
Sunday, April 12, 2009
सैन्डल अनन्त, सैन्डल स्कैन्डल अनन्ता !
न जाने क्या बात है कि स्त्रियाँ जो वर्षों से करती आ रही हैं उसे ही थोड़ा सा तोड़ मरोड़ के नए रूप में जब पुरुष करता है तो उसकी इतनी चर्चा होने लगती है। अब देखिए लगभग जब से सैन्डल का आविष्कार हुआ स्त्रियाँ उसका शस्त्र के रूप में उपयोग करती आई हैं। कभी किसी ने उसकी इतनी चर्चा नहीं की। मजाल है कि किसी ने उसे टी वी, समाचार पत्रों का प्रमुख समाचार बनाया हो या किसी पिटे या पिटने का कारण बने प्रत्याशी को चुनाव में खड़ा करते करते बैठाया हो। और यह तब जब निशाना सदा बराबर बैठा हो। परन्तु पुरुषों ने अपने जूते का अस्त्र के रूप में क्या उपयोग किया हंगामा ही हो गया। सारा संसार, टी वी, समाचार पत्र जूतामय हो गए। वह भी तब जब निशाना सदा ही चूका है। यदि सही लगता तो न जाने कितना हल्ला मचाते। फिर भी कहते हैं कि स्त्रियों के साथ बराबरी का व्यवहार होता है। हुँह !
कभी ध्यान से देखिए सैन्डल सुन्दर होते हैं। उनमें कभी जरी, कभी सितारे, मोती तो कभी अर्ध मूल्यवान (मध्यम मूल्यवान ) पत्थर जड़े होते हैं। वे नाजुक दिखते हुए भी खोपड़ी में छेद करने की क्षमता रखते हैं। उनमें से दुर्गन्ध नहीं आती। वे जूतों की तरह तंगदिल नहीं होते। यहाँ तक की वे जूतों की तरह बड़बोले न होकर बेजुबान होते हैं। तभी तो कोई उन्हें महत्व ही नहीं देता। जमाना अपना राग स्वयं अलापने का आ गया है। तभी तो जहाँ देखो जूता पुराण चल रहा है।
हमारी कुछ सहेलियों को लगा कि यह समता के सिद्धान्त के विरुद्ध है। यदि शस्त्र का कोई महत्व नहीं इस संसार में तो हम अपने सैन्डल को भी अस्त्र बनाकर ही रहेंगी। फिर यह हमारे सैन्डल की इज्जत का प्रश्न है सो वार चूकने भी नहीं देंगी। सो सोचा गया कि गर्मियों की छुट्टियों के चलते वैसे ही कोचिंग की कक्षाएँ उजाड़ पड़ी हैं, अध्यापिकाएँ खाली बैठी हैं। क्यों न कमरों व अध्यापिकाओं का सदुपयोग किया जाए और सैन्डल के साथ हुए अन्याय का बदला लिया जाए। सो अब वे अपनी कक्षा में सैन्डल को अस्त्र बनाने का प्रशिक्षण देंगी। साथ में स्त्रियों को निशानेबाजी की कला भी सिखाएँगी।
हम लोग यूँ ही ख्याली पुलाव बनाने में समय बर्बाद नहीं करतीं। बस फटाफट विज्ञापन व बैनर बन गए। अभी भी देर नहीं हुई है। यदि लड़कियों को कुछ लगकर प्रशिक्षण दिया जाए तो भाषणों का दौर खत्म हो इससे पहले ही हमारी लड़कियाँ सैन्डल रूपी अस्त्र के उपयोग में दक्ष हो जाएँगी। लड़कियों को छूट दी गई है कि अपने व अपने सैन्डल के मनपसन्द चेहरे /सिर का चित्र ब्लैकबोर्ड पर बनाएँ और फिर निशाना साधें।
दो दिन तो हो गए प्रशिक्षण मिलते हुए। लड़कियाँ तो हर क्षेत्र में अवसर मिलते ही अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर देती हैं। अभी से ही उनका निशाना अचूक हो गया है। अब तो वे और सैन्डल दोनों ही अपना कमाल दिखाने को व्यग्र हो रहे हैं। बस आवश्यकता है तो एक ठो उपयुक्त सिर की। है कोई सुझाव ?
घुघूती बासूती
कभी ध्यान से देखिए सैन्डल सुन्दर होते हैं। उनमें कभी जरी, कभी सितारे, मोती तो कभी अर्ध मूल्यवान (मध्यम मूल्यवान ) पत्थर जड़े होते हैं। वे नाजुक दिखते हुए भी खोपड़ी में छेद करने की क्षमता रखते हैं। उनमें से दुर्गन्ध नहीं आती। वे जूतों की तरह तंगदिल नहीं होते। यहाँ तक की वे जूतों की तरह बड़बोले न होकर बेजुबान होते हैं। तभी तो कोई उन्हें महत्व ही नहीं देता। जमाना अपना राग स्वयं अलापने का आ गया है। तभी तो जहाँ देखो जूता पुराण चल रहा है।
हमारी कुछ सहेलियों को लगा कि यह समता के सिद्धान्त के विरुद्ध है। यदि शस्त्र का कोई महत्व नहीं इस संसार में तो हम अपने सैन्डल को भी अस्त्र बनाकर ही रहेंगी। फिर यह हमारे सैन्डल की इज्जत का प्रश्न है सो वार चूकने भी नहीं देंगी। सो सोचा गया कि गर्मियों की छुट्टियों के चलते वैसे ही कोचिंग की कक्षाएँ उजाड़ पड़ी हैं, अध्यापिकाएँ खाली बैठी हैं। क्यों न कमरों व अध्यापिकाओं का सदुपयोग किया जाए और सैन्डल के साथ हुए अन्याय का बदला लिया जाए। सो अब वे अपनी कक्षा में सैन्डल को अस्त्र बनाने का प्रशिक्षण देंगी। साथ में स्त्रियों को निशानेबाजी की कला भी सिखाएँगी।
हम लोग यूँ ही ख्याली पुलाव बनाने में समय बर्बाद नहीं करतीं। बस फटाफट विज्ञापन व बैनर बन गए। अभी भी देर नहीं हुई है। यदि लड़कियों को कुछ लगकर प्रशिक्षण दिया जाए तो भाषणों का दौर खत्म हो इससे पहले ही हमारी लड़कियाँ सैन्डल रूपी अस्त्र के उपयोग में दक्ष हो जाएँगी। लड़कियों को छूट दी गई है कि अपने व अपने सैन्डल के मनपसन्द चेहरे /सिर का चित्र ब्लैकबोर्ड पर बनाएँ और फिर निशाना साधें।
दो दिन तो हो गए प्रशिक्षण मिलते हुए। लड़कियाँ तो हर क्षेत्र में अवसर मिलते ही अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर देती हैं। अभी से ही उनका निशाना अचूक हो गया है। अब तो वे और सैन्डल दोनों ही अपना कमाल दिखाने को व्यग्र हो रहे हैं। बस आवश्यकता है तो एक ठो उपयुक्त सिर की। है कोई सुझाव ?
घुघूती बासूती
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Saturday, April 11, 2009
जाको राखे साँइया
बचपन से सुनती आई हूँ 'जाको राखे साँइया मार सके न कोय।' सदा आश्चर्य होता था कि यह साँई कैसे निर्णय करता है कि किसको रखना है किसको मारना है। ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग उसके प्रिय बन जाते हैं और कुछ नहीं। क्या वहाँ साँई के घर में भी पक्षपात होता है? कल एक समाचार पढ़ा तो वही बचपन की सुनी कहावत याद आ गई 'जाको राखे साँइया मार सके न कोय।'
एक २२ वर्षीय रूसी आदमी अपने दो मित्रों के साथ वोडकापान कर रहा था। एलेक्सी व उसके मित्रों ने मिलकर तीन बोतलों को खाली कर दिया। कितने मिली लीटर की बोतलें थीं यह तो नहीं पता परन्तु नशा कुछ इतना चढ़ा कि उसने रसोई की खिड़की खोली और बाहर छलाँग लगा दी। उसकी घबाराई पत्नी सीढ़ियाँ उतर कर बाहर भागी। परन्तु उसके पहुँचने से पहले ही एलेक्सी उठा और वापिस घर पहुँच गया। जब तक एम्बुलैंस पहुँची उसने फिर से रसोई की खिड़की से छंलाग लगा दी। उसे हल्की चोटें ही लगीं। साँई जी की याद मुझे इसलिए आई क्योंकि वह पाँचवी मंजिल से कूदा था और एक बार नहीं, दो बार!
जब नशा उतरा तो उसे उसके कारनामे बताए गए। एलेक्सी पीने की आदत छोड़ने की सोच रहा है।
परन्तु मैं सोच रही हूँ कि क्या कारण होगा कि साँई उस पर इतना मेहरबान हुआ। छोटे छोटे बच्चे अजीब अजीब कारणों से मर जाते हैं। बिजली गिरने से, नाले में या नाली के ढक्कन चुरा लिए जाने से उसमें गिरने से, घर में आधी बाल्टी पानी में डूबकर, दंगों में, जुलाब लगने से या जन्म लेते समय ही मर जाते हैं। उन्होंने क्या बुरा किया होगा और एलेक्सी ने क्या भला किया होगा?
लगता है साँई के यहाँ या तो सबकुछ अललटप्पू (अटकलपच्चू,यादृच्छिक, random) है या वहाँ के कामकाज में भारी धाँधली है। या तो उसके यहाँ भी कर्मचारियों की कमी है या उनका भी कोई मजदूर संघ है जो हड़ताल किए हुए है। हो सकता है कि उनका मानव संसाधन विभाग बहुत खस्ता हाल है। वैसे भगवान के दरबार में यह मानव संसाधन विभाग कहलाएगा या देवता संसाधन विभाग या फिर भगवान (कनिष्ठ) संसाधन विभाग? कुछ समझ नहीं आता।
लगता है कि हमारे पूर्वज भी किसी ऐसी ही घटना से प्रेरित हुए होंगे और उन्हें भगवान का विचार नकारना पसन्द नहीं आया होगा। तब उन्होंने पुनर्जन्म व कर्म के सिद्धान्त की कल्पना की होगी। शायद ये एलेक्सी साहब पिछले जन्म के जबर्दस्त पुण्यात्मा रहे हों।
मुझे तो सबकुछ अललटप्पू (अटकलपच्चू,यादृच्छिक, random) है वाले सिद्धांत में ही अधिक दम लगता है। हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक सबकुछ क्रिया और प्रतिक्रिया के सिद्धांत और अधिकतर सबकुछ अललटप्पू वाले सिद्धांत पर चलता रहता है। कब कौन सा सिद्धान्त उपयोग होता है यह सिवाय सबकुछ अललटप्पू सिद्धांत के और किसी बात पर निर्भर नहीं करता।
एक अनुमान और है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि मदिरापान से मन के साथ साथ शरीर भी हल्का हो जाता है या फिर मन की तरह शरीर भी उड़ने लगता है? परन्तु प्रत्येक परिकल्पना को सिद्धान्त घोषित करने से पहले उसे जाँचना पड़ता है। यहाँ कई कठिनाइयाँ हैं। एक तो अपने पास यह प्रयोग करने को एक ही शरीर है। दूसरा दुमंजिले से अधिक ऊँची कोई इमारत नहीं है। (अपनी तो इकमंजिला ही है, अब किसी अन्य के मकान की छत पर चढ़कर या उसकी रसोई की खिड़की खोलकर तो यह प्रयोग हो नहीं सकता!) तीसरा गुजरात में ऐसा प्रयोग करना असंभव है। सो मैं तो सिद्ध न कर पाने की स्थिति में अपना मत, मतदान की इस पावन ॠतु में, अललटप्पू सिद्धांत को ही देती हूँ।
वैधानिक चेतावनीः
कृपया कोई भी परिकल्पना सिद्ध करने की चेष्टा न करें। यह चेष्टा प्राणलेवा हो सकती है।
किसी पशु पर भी यह सिद्ध करने की चेष्टा न करें।
घुघूती बासूती
एक २२ वर्षीय रूसी आदमी अपने दो मित्रों के साथ वोडकापान कर रहा था। एलेक्सी व उसके मित्रों ने मिलकर तीन बोतलों को खाली कर दिया। कितने मिली लीटर की बोतलें थीं यह तो नहीं पता परन्तु नशा कुछ इतना चढ़ा कि उसने रसोई की खिड़की खोली और बाहर छलाँग लगा दी। उसकी घबाराई पत्नी सीढ़ियाँ उतर कर बाहर भागी। परन्तु उसके पहुँचने से पहले ही एलेक्सी उठा और वापिस घर पहुँच गया। जब तक एम्बुलैंस पहुँची उसने फिर से रसोई की खिड़की से छंलाग लगा दी। उसे हल्की चोटें ही लगीं। साँई जी की याद मुझे इसलिए आई क्योंकि वह पाँचवी मंजिल से कूदा था और एक बार नहीं, दो बार!
जब नशा उतरा तो उसे उसके कारनामे बताए गए। एलेक्सी पीने की आदत छोड़ने की सोच रहा है।
परन्तु मैं सोच रही हूँ कि क्या कारण होगा कि साँई उस पर इतना मेहरबान हुआ। छोटे छोटे बच्चे अजीब अजीब कारणों से मर जाते हैं। बिजली गिरने से, नाले में या नाली के ढक्कन चुरा लिए जाने से उसमें गिरने से, घर में आधी बाल्टी पानी में डूबकर, दंगों में, जुलाब लगने से या जन्म लेते समय ही मर जाते हैं। उन्होंने क्या बुरा किया होगा और एलेक्सी ने क्या भला किया होगा?
लगता है साँई के यहाँ या तो सबकुछ अललटप्पू (अटकलपच्चू,यादृच्छिक, random) है या वहाँ के कामकाज में भारी धाँधली है। या तो उसके यहाँ भी कर्मचारियों की कमी है या उनका भी कोई मजदूर संघ है जो हड़ताल किए हुए है। हो सकता है कि उनका मानव संसाधन विभाग बहुत खस्ता हाल है। वैसे भगवान के दरबार में यह मानव संसाधन विभाग कहलाएगा या देवता संसाधन विभाग या फिर भगवान (कनिष्ठ) संसाधन विभाग? कुछ समझ नहीं आता।
लगता है कि हमारे पूर्वज भी किसी ऐसी ही घटना से प्रेरित हुए होंगे और उन्हें भगवान का विचार नकारना पसन्द नहीं आया होगा। तब उन्होंने पुनर्जन्म व कर्म के सिद्धान्त की कल्पना की होगी। शायद ये एलेक्सी साहब पिछले जन्म के जबर्दस्त पुण्यात्मा रहे हों।
मुझे तो सबकुछ अललटप्पू (अटकलपच्चू,यादृच्छिक, random) है वाले सिद्धांत में ही अधिक दम लगता है। हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक सबकुछ क्रिया और प्रतिक्रिया के सिद्धांत और अधिकतर सबकुछ अललटप्पू वाले सिद्धांत पर चलता रहता है। कब कौन सा सिद्धान्त उपयोग होता है यह सिवाय सबकुछ अललटप्पू सिद्धांत के और किसी बात पर निर्भर नहीं करता।
एक अनुमान और है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि मदिरापान से मन के साथ साथ शरीर भी हल्का हो जाता है या फिर मन की तरह शरीर भी उड़ने लगता है? परन्तु प्रत्येक परिकल्पना को सिद्धान्त घोषित करने से पहले उसे जाँचना पड़ता है। यहाँ कई कठिनाइयाँ हैं। एक तो अपने पास यह प्रयोग करने को एक ही शरीर है। दूसरा दुमंजिले से अधिक ऊँची कोई इमारत नहीं है। (अपनी तो इकमंजिला ही है, अब किसी अन्य के मकान की छत पर चढ़कर या उसकी रसोई की खिड़की खोलकर तो यह प्रयोग हो नहीं सकता!) तीसरा गुजरात में ऐसा प्रयोग करना असंभव है। सो मैं तो सिद्ध न कर पाने की स्थिति में अपना मत, मतदान की इस पावन ॠतु में, अललटप्पू सिद्धांत को ही देती हूँ।
वैधानिक चेतावनीः
कृपया कोई भी परिकल्पना सिद्ध करने की चेष्टा न करें। यह चेष्टा प्राणलेवा हो सकती है।
किसी पशु पर भी यह सिद्ध करने की चेष्टा न करें।
घुघूती बासूती
Saturday, April 04, 2009
स्त्रियाँ, कपड़े, स्वात घाटी, स्त्रियों के प्रति यूज एन्ड थ्रो की मानसिकता
राजतन्त्र में राजकुमार ग्वालानी जी लिखते हैं 'कम होने लगे कपड़े बढ़ने लगे लफड़े !'
यदि कोई चोर चोरी करने का कारण अपनी चोरी की आदत, डाकू डाका डालने का कारण अपनी डाका डालने की आदत, अपहरणकर्ता अपहरण का कारण अपनी अपनी आपराधिक मानसिकता को न देकर लोगों की सुन्दर कारों, उनके अपार धन को दे तो आप दोष किसे देंगे? संसार की कौन सी अदालत उन्हें अपने अपराध से बरी कर देगी ? समाज किसे दोषी कहेगा? अपराधी को या अपराध का न्यौता देती कारों व धन को ? जब किसी की जेब कटी तो आपने कभी किसी को कहते सुना है कि भाई जेब क्यों लिए घूम रहा था ? या जेब में पैसे रखे ही क्यों थे ? फिर बलात्कार व स्त्री के यौन उत्पीड़न में उसे ही दोषी करार देने की यह प्रवृत्ति कब और कैसे विकसित हुई ?
यहाँ तो स्थिति यह है कि अपराधी तो बेचारा अपराध करने को बाध्य किया गया। स्त्री तो अपराध करवाने की ताक पर ही बैठी थी। कुछ ऐसे जैसे उसके प्रति अपराध करके अपराधी ने उसे व समाज को धन्य किया। समाज की अन्य स्त्रियों को सिखलाया कि स्त्री हो ढकी छिपी रहो अन्यथा.......!
आज वैसे ही टी वी के दो दृष्य मन को अस्थिर किए हुए थे। एक था स्वात घाटी पर कोड़ों से पिटती उस लड़की का और दूसरा था दहेज के लिए पीटी गई कानपुर की उस युवती का। 'इन दोनों मामलों में भी कसूर अवश्य इन स्त्रियों का रहा होगा।' कसूर सदा कमजोर का होता है। मुझे बचपन की पढ़ी वह मेमने व भेड़िए की कहानी याद आती है। भेड़िया कुछ भली किस्म का भेड़िया रहा होगा। उसे मेमने को खाने के लिए कोई कारण मेमने को देना पड़ा। कारण कुछ यूँ था कि तुमने नदी से पानी पिया सो नदी के पानी को जूठा कर दिया। मेमना कहता है कि नहीं, नदी का बहाव तो मेरी तरफ है सो आपका पानी जूठा कैसे हो सकता है। भेड़िया कहता है कि फिर तुम्हारे पिता ने मेरा पानी जूठा किया था उसलिए मैं तुम्हें खाऊँगा। अब भेड़िया शक्तिशाली था फिर भी मेमने को खाने का कोई कारण तो दे रहा था, हमें उसकी इस महानता पर उसपर मुग्ध हो जाना चाहिए। इसी तरह पुरुष शक्तिशाली है फिर भी स्त्री के बलात्कार के कारण तो देता है, हमें भी उसकी महानता पर मुग्ध होना चाहिए। रायपुर की लड़कियों के साथ कुछ घटा तो हम जानते हैं कि दोषी कौन होगा या यह कहिए कौन होगी। दोषी होगी वह बिना बाँह की टी शर्ट जैसा कि हमारे मित्र अपने ब्लॉग में कह रहे हैं.....
'उन सभी लड़कों की नजरें उस कन्या को ऐसे देख रही थी मानो उसको कच्चा ही चबा जाएंगे। उन लड़कों की यह हरकत थी तो गलत पर इसका क्या किया जाए कि उन लड़कों को ऐसी हरकत करने के लिए उस कन्या के कपड़े ही उकसा रहे थे। हमारे कहने का मतलब यह है कि उस कन्या ने जींस के ऊपर जो सफेद टी-शर्ट पहन रखी थी, वह टी-शर्ट एक तो बिना अस्तीन के थी ऊपर से तुरा यह कि वह इतनी ज्यादा झीनी थी कि कन्या ने टी-शर्ट ने अंदर क्या पहना है, वह सब साफ-साफ नजर आ रहा था। अब ऐसे में वो लड़के भी क्या करते।'
भाई, हमें तो आपके बनियान रोज ही दिखते हैं, कभी कभी तो केवल बनियान में घूमते पुरुष भी दिखते हैं, कई बार तो बिना बनियान के भी। जो हम करते हैं वही वे लड़के भी कर सकते थे। हम या तो अनदेखा कर देते हैं या नजरें दूसरी तरफ कर लेते हैं। अब इतनी भी मजबूरी क्या कि लड़की के अन्तः वस्त्र दिखे नहीं कि आप फिसले और लड़की का पीछा करना आपकी मजबूरी हो गई !
आज वैसे ही मन में समाचार देखकर इतना अवसाद भर गया था कि जो लिखा वह यह था.......
'स्त्रियों को तो स्त्री भ्रूण हत्या करने वालों को धन्यवाद कहना चाहिए।
जब आप स्वात घाटी पर पिटती किसी लड़की का विडीओ देखती हैं, उसका बुर्का उठाकर , कुर्ता उठाकर (ताकि कोड़ों की मार अधिक पड़े) उसे पीटते धार्मिक लोगों को देखती हैं, जब कानपुर की किसी बहू का ससुराल वालों द्वारा बिगाड़ा चेहरा देखती हैं, उसका सूजा नीला पड़ा चेहरा, न खुलती आँखें देखती हैं और ऐसे ही न जाने कितने हृदय विदारक समाचार देखती सुनती हैं तब क्या आपको नहीं लगता कि स्त्री भ्रूण हत्या करने वाले अधिक कोमल हृदय हैं ? मेरा सिर तो उनके सम्मान में झुक जाता है। मन से केवल यही शब्द निकलते हैं आभार, आभार, आभार ! न रहेगा बांस न बजेगा बाँसुरी की तर्ज पर जब स्त्रियाँ रहेंगी ही नहीं तो उनपर अत्याचार ही कैसे होगा ?
पुरुषों का क्या होगा यह सोचना पुरुषों को ही होगा। वैसे भी वे ही तो सदा से संसार के भाग्य नियंता, धर्म नियंता, वैज्ञानिक आदि आदि रहे हैं। शायद वे इसका भी इलाज ढूँढ ही लेंगे। जब वे धर्म बना सकते हैं, स्त्री का समाज में स्थान नियत कर सकते हैं, संसार को बनाने व मिटाने के साधन निर्माण कर सकते हैं तो वे स्त्रियों का विकल्प भी ढूँढ ही लेंगे। उन्हें विकल्प ढूँढने दीजिए। हमारी खैर तो इसी में है कि हम इस संसार से विदा ले लें।
युग बीत गए हैं कि हम उनकी व्यक्तिगत वैले(valet)सम्पत्ति,बनी रही हैं। उनकी, उनके धर्म,जाति,नस्ल का विस्तार करने का साधन बनी रही हैं। जिस व्यवस्था में हमारा कोई स्थान नहीं है, जिससे हमें कुछ लेना देना नहीं है, उस व्यवस्था में कभी कभार स्वामी की स्वामीभक्ति के रूप में मिले कुछ अधिकारों का अपनी ही स्त्री जाति पर दुरुपयोग करके हमें क्या मिलेगा?'
वैसे भी जब स्त्रियाँ नहीं रहेंगी तो किन्हीं लड़कों को किसी सफेद टी शर्ट के अन्दर से क्या दिख रहा है परेशान कर उन्हें उस लड़की का पीछा करने को मजबूर भी नहीं होना पड़ेगा।
अब जरा देखते हैं कि स्त्रियों के कपड़े बलात्कार के लिए कहाँ तक दोषी होते हैं।
मेरे सामने एक खबर है १२ फरवरी के टाइम्स औफ इन्डिया की। संगीता नामक एक लड़की का शव उसके बापूनगर, अहमदाबाद के स्कूल के बाथरूम से बरामद किया गया। इस लड़की का बलात्कार हुआ था। ‘कारण कपड़े ही रहे होंगे। ये सात साल की लड़कियाँ बेहद भड़काऊ कपड़े पहनकर स्कूल जाने लगी हैं। अब पुरुष क्या करे !’
दूसरी खबर १३ मार्च के टाइम्स औफ इन्डिया की है। इस खबर के अनुसार एक चचेरे चाचा ने अपनी भतीजी का बलात्कार कर उसका सिर पत्थरों से फोड़कर उसकी हत्या कर दी। हत्या से पहले व बलात्कार के बाद उसने उसके गुप्तांगों को चाकू से काट भी डाला। फिर उसने उसके शरीर को गाढ़ भी दिया। यहाँ हो सकता है कि घटनाएँ इसी क्रम में न हुई हों।
‘कारण ? कारण तो वही सर्वविदित कपड़े ही रहा होगा। बानास्खांता जिले की ये गाँव की सात साल की लड़कियाँ बहुत ही भड़काऊ वस्त्र पहनने लगी हैं। इतने भड़काऊ कि चाचा तक का निष्कलंक चरित्र तक डगमगा गया ! इतना डगमगाया कि उसे भतीजी को एकांत में ले जाना पड़ा और जब उसने विरोध किया तो उसे यह सब करना पड़ा।‘ हाँ उसके इस कृत्य में छह और पुरुषों ने उसका साथ दिया था। मुझे तो आश्चर्य है कि उसके गाँव के अन्य पुरुषों में कितना संयम रहा होगा जो उसके इन कपड़ों के बावजूद उन्होंने अब तक उसका कुछ नहीं बिगाड़ा था।
कपड़ों वाली थ्योरी को सिद्ध करती एक और खबर मैंने कुछ दिन पहले पढ़ी थी। मुम्बई में सड़क के किनारे रहने वाली एक लड़की अपनी माँ की बगल में सोई हुई थी। रात को जब माँ की नींद टूटी तो वह गायब थी। माँ ने उसे ढूँढना शुरू किया। रात में तो वह नहीं मिली किन्तु सुबह की रौशनी में लोगों को एक नाली में फेंकी गई वह मिली। उसका भी बलात्कार हुआ था। ‘कारण कपड़े ही रहे होंगे। दो साल की वह लड़की ठीक कपड़े नहीं पहने होगी।‘ सो उसका उपयोग कर उसे फेंक दिया गया। यूज एन्ड थ्रो का इससे बढ़िया उदाहरण कहीं देखने को नहीं मिलेगा।
वैसे स्त्रियों के मामले में यूज एन्ड थ्रो की मानसिकता नई नहीं है। तभी तो पत्नियों के हत्यारों की भी शादी हो जाती है। माता पिता तो अपनी दूसरी बेटी का विवाह तक उसी के साथ कर देते हैं।
घुघूती बासूती
पुनश्चः
कल रात लिखा यह लेख नेट की समस्या के कारण आज पोस्ट कर पा रही हूँ।
नोटः
कृपया इसी विषय पर महेन जी द्वारा लिखित फैशन बलात्कार और कुंठा १ और फैशन बलात्कार और कुंठा २ लेख भी पढ़िए।
घुघूती बासूती
घुघूती बासूती
यदि कोई चोर चोरी करने का कारण अपनी चोरी की आदत, डाकू डाका डालने का कारण अपनी डाका डालने की आदत, अपहरणकर्ता अपहरण का कारण अपनी अपनी आपराधिक मानसिकता को न देकर लोगों की सुन्दर कारों, उनके अपार धन को दे तो आप दोष किसे देंगे? संसार की कौन सी अदालत उन्हें अपने अपराध से बरी कर देगी ? समाज किसे दोषी कहेगा? अपराधी को या अपराध का न्यौता देती कारों व धन को ? जब किसी की जेब कटी तो आपने कभी किसी को कहते सुना है कि भाई जेब क्यों लिए घूम रहा था ? या जेब में पैसे रखे ही क्यों थे ? फिर बलात्कार व स्त्री के यौन उत्पीड़न में उसे ही दोषी करार देने की यह प्रवृत्ति कब और कैसे विकसित हुई ?
यहाँ तो स्थिति यह है कि अपराधी तो बेचारा अपराध करने को बाध्य किया गया। स्त्री तो अपराध करवाने की ताक पर ही बैठी थी। कुछ ऐसे जैसे उसके प्रति अपराध करके अपराधी ने उसे व समाज को धन्य किया। समाज की अन्य स्त्रियों को सिखलाया कि स्त्री हो ढकी छिपी रहो अन्यथा.......!
आज वैसे ही टी वी के दो दृष्य मन को अस्थिर किए हुए थे। एक था स्वात घाटी पर कोड़ों से पिटती उस लड़की का और दूसरा था दहेज के लिए पीटी गई कानपुर की उस युवती का। 'इन दोनों मामलों में भी कसूर अवश्य इन स्त्रियों का रहा होगा।' कसूर सदा कमजोर का होता है। मुझे बचपन की पढ़ी वह मेमने व भेड़िए की कहानी याद आती है। भेड़िया कुछ भली किस्म का भेड़िया रहा होगा। उसे मेमने को खाने के लिए कोई कारण मेमने को देना पड़ा। कारण कुछ यूँ था कि तुमने नदी से पानी पिया सो नदी के पानी को जूठा कर दिया। मेमना कहता है कि नहीं, नदी का बहाव तो मेरी तरफ है सो आपका पानी जूठा कैसे हो सकता है। भेड़िया कहता है कि फिर तुम्हारे पिता ने मेरा पानी जूठा किया था उसलिए मैं तुम्हें खाऊँगा। अब भेड़िया शक्तिशाली था फिर भी मेमने को खाने का कोई कारण तो दे रहा था, हमें उसकी इस महानता पर उसपर मुग्ध हो जाना चाहिए। इसी तरह पुरुष शक्तिशाली है फिर भी स्त्री के बलात्कार के कारण तो देता है, हमें भी उसकी महानता पर मुग्ध होना चाहिए। रायपुर की लड़कियों के साथ कुछ घटा तो हम जानते हैं कि दोषी कौन होगा या यह कहिए कौन होगी। दोषी होगी वह बिना बाँह की टी शर्ट जैसा कि हमारे मित्र अपने ब्लॉग में कह रहे हैं.....
'उन सभी लड़कों की नजरें उस कन्या को ऐसे देख रही थी मानो उसको कच्चा ही चबा जाएंगे। उन लड़कों की यह हरकत थी तो गलत पर इसका क्या किया जाए कि उन लड़कों को ऐसी हरकत करने के लिए उस कन्या के कपड़े ही उकसा रहे थे। हमारे कहने का मतलब यह है कि उस कन्या ने जींस के ऊपर जो सफेद टी-शर्ट पहन रखी थी, वह टी-शर्ट एक तो बिना अस्तीन के थी ऊपर से तुरा यह कि वह इतनी ज्यादा झीनी थी कि कन्या ने टी-शर्ट ने अंदर क्या पहना है, वह सब साफ-साफ नजर आ रहा था। अब ऐसे में वो लड़के भी क्या करते।'
भाई, हमें तो आपके बनियान रोज ही दिखते हैं, कभी कभी तो केवल बनियान में घूमते पुरुष भी दिखते हैं, कई बार तो बिना बनियान के भी। जो हम करते हैं वही वे लड़के भी कर सकते थे। हम या तो अनदेखा कर देते हैं या नजरें दूसरी तरफ कर लेते हैं। अब इतनी भी मजबूरी क्या कि लड़की के अन्तः वस्त्र दिखे नहीं कि आप फिसले और लड़की का पीछा करना आपकी मजबूरी हो गई !
आज वैसे ही मन में समाचार देखकर इतना अवसाद भर गया था कि जो लिखा वह यह था.......
'स्त्रियों को तो स्त्री भ्रूण हत्या करने वालों को धन्यवाद कहना चाहिए।
जब आप स्वात घाटी पर पिटती किसी लड़की का विडीओ देखती हैं, उसका बुर्का उठाकर , कुर्ता उठाकर (ताकि कोड़ों की मार अधिक पड़े) उसे पीटते धार्मिक लोगों को देखती हैं, जब कानपुर की किसी बहू का ससुराल वालों द्वारा बिगाड़ा चेहरा देखती हैं, उसका सूजा नीला पड़ा चेहरा, न खुलती आँखें देखती हैं और ऐसे ही न जाने कितने हृदय विदारक समाचार देखती सुनती हैं तब क्या आपको नहीं लगता कि स्त्री भ्रूण हत्या करने वाले अधिक कोमल हृदय हैं ? मेरा सिर तो उनके सम्मान में झुक जाता है। मन से केवल यही शब्द निकलते हैं आभार, आभार, आभार ! न रहेगा बांस न बजेगा बाँसुरी की तर्ज पर जब स्त्रियाँ रहेंगी ही नहीं तो उनपर अत्याचार ही कैसे होगा ?
पुरुषों का क्या होगा यह सोचना पुरुषों को ही होगा। वैसे भी वे ही तो सदा से संसार के भाग्य नियंता, धर्म नियंता, वैज्ञानिक आदि आदि रहे हैं। शायद वे इसका भी इलाज ढूँढ ही लेंगे। जब वे धर्म बना सकते हैं, स्त्री का समाज में स्थान नियत कर सकते हैं, संसार को बनाने व मिटाने के साधन निर्माण कर सकते हैं तो वे स्त्रियों का विकल्प भी ढूँढ ही लेंगे। उन्हें विकल्प ढूँढने दीजिए। हमारी खैर तो इसी में है कि हम इस संसार से विदा ले लें।
युग बीत गए हैं कि हम उनकी व्यक्तिगत वैले(valet)सम्पत्ति,बनी रही हैं। उनकी, उनके धर्म,जाति,नस्ल का विस्तार करने का साधन बनी रही हैं। जिस व्यवस्था में हमारा कोई स्थान नहीं है, जिससे हमें कुछ लेना देना नहीं है, उस व्यवस्था में कभी कभार स्वामी की स्वामीभक्ति के रूप में मिले कुछ अधिकारों का अपनी ही स्त्री जाति पर दुरुपयोग करके हमें क्या मिलेगा?'
वैसे भी जब स्त्रियाँ नहीं रहेंगी तो किन्हीं लड़कों को किसी सफेद टी शर्ट के अन्दर से क्या दिख रहा है परेशान कर उन्हें उस लड़की का पीछा करने को मजबूर भी नहीं होना पड़ेगा।
अब जरा देखते हैं कि स्त्रियों के कपड़े बलात्कार के लिए कहाँ तक दोषी होते हैं।
मेरे सामने एक खबर है १२ फरवरी के टाइम्स औफ इन्डिया की। संगीता नामक एक लड़की का शव उसके बापूनगर, अहमदाबाद के स्कूल के बाथरूम से बरामद किया गया। इस लड़की का बलात्कार हुआ था। ‘कारण कपड़े ही रहे होंगे। ये सात साल की लड़कियाँ बेहद भड़काऊ कपड़े पहनकर स्कूल जाने लगी हैं। अब पुरुष क्या करे !’
दूसरी खबर १३ मार्च के टाइम्स औफ इन्डिया की है। इस खबर के अनुसार एक चचेरे चाचा ने अपनी भतीजी का बलात्कार कर उसका सिर पत्थरों से फोड़कर उसकी हत्या कर दी। हत्या से पहले व बलात्कार के बाद उसने उसके गुप्तांगों को चाकू से काट भी डाला। फिर उसने उसके शरीर को गाढ़ भी दिया। यहाँ हो सकता है कि घटनाएँ इसी क्रम में न हुई हों।
‘कारण ? कारण तो वही सर्वविदित कपड़े ही रहा होगा। बानास्खांता जिले की ये गाँव की सात साल की लड़कियाँ बहुत ही भड़काऊ वस्त्र पहनने लगी हैं। इतने भड़काऊ कि चाचा तक का निष्कलंक चरित्र तक डगमगा गया ! इतना डगमगाया कि उसे भतीजी को एकांत में ले जाना पड़ा और जब उसने विरोध किया तो उसे यह सब करना पड़ा।‘ हाँ उसके इस कृत्य में छह और पुरुषों ने उसका साथ दिया था। मुझे तो आश्चर्य है कि उसके गाँव के अन्य पुरुषों में कितना संयम रहा होगा जो उसके इन कपड़ों के बावजूद उन्होंने अब तक उसका कुछ नहीं बिगाड़ा था।
कपड़ों वाली थ्योरी को सिद्ध करती एक और खबर मैंने कुछ दिन पहले पढ़ी थी। मुम्बई में सड़क के किनारे रहने वाली एक लड़की अपनी माँ की बगल में सोई हुई थी। रात को जब माँ की नींद टूटी तो वह गायब थी। माँ ने उसे ढूँढना शुरू किया। रात में तो वह नहीं मिली किन्तु सुबह की रौशनी में लोगों को एक नाली में फेंकी गई वह मिली। उसका भी बलात्कार हुआ था। ‘कारण कपड़े ही रहे होंगे। दो साल की वह लड़की ठीक कपड़े नहीं पहने होगी।‘ सो उसका उपयोग कर उसे फेंक दिया गया। यूज एन्ड थ्रो का इससे बढ़िया उदाहरण कहीं देखने को नहीं मिलेगा।
वैसे स्त्रियों के मामले में यूज एन्ड थ्रो की मानसिकता नई नहीं है। तभी तो पत्नियों के हत्यारों की भी शादी हो जाती है। माता पिता तो अपनी दूसरी बेटी का विवाह तक उसी के साथ कर देते हैं।
घुघूती बासूती
पुनश्चः
कल रात लिखा यह लेख नेट की समस्या के कारण आज पोस्ट कर पा रही हूँ।
नोटः
कृपया इसी विषय पर महेन जी द्वारा लिखित फैशन बलात्कार और कुंठा १ और फैशन बलात्कार और कुंठा २ लेख भी पढ़िए।
घुघूती बासूती
घुघूती बासूती
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