Sunday, March 29, 2009

गाय के नाम पर ही सही

गाय के नाम पर ही सही

न जाने कितने समय से हमें बताया जा रहा है कि पॉलीथीन की थैलियाँ हमारे पर्यावरण के लिए बहुत घातक हैं। परन्तु कोई भी अपनी इस जरा सी सुविधा को त्यागने को तैयार नहीं है। हरेक को सामान पॉलीथीन में ही चाहिए। अब तो हाल यह है कि आप न चाहें तो भी दाल, चावल, गेहूँ, हर वस्तु पहले से ही पॉलीथीन में पैक होकर आती है। फिर जब आप खरीददारी कर चुकें तो इस सब सामान को रखने को एक और बड़ा सा पॉलीथीन मिलता है। सब्जी वाले अलग पतली कमजोर पॉलीथीन की थैलियों में सब्जी देने को तैयार रहते हैं। मुझ जैसे लोग को अपने कपड़े के थैले आगे करते हैं उन्हें वे आश्चर्य से देखते हैं।

मुझे सुपर मार्केट्स, मॉल आदि से भी कोई समस्या नहीं है। समस्या है तो उनकी हर सामान के लिए दिए जाने वाली बड़ी बड़ी पॉलीथीन की थैलियों से ! यहाँ जाओ तो आराम से सब्जी आदि खरीदी जा सकती है। सब्जी तुलवाने के लिए डालने के लिए पॉलीथीन की थैलियों का अनन्त गोल गोल लिपटा हुआ थान सा रहता है। एक एक सब्जी के लिए निकाले जाओ, डाले जाओ। फिर जब बिल बन रहा होता है तब इनको बड़े बड़े पॉलीथीन की थैलियों में डाला जाता है। कहीं कहीं तो इन्हें गरम लोहे पर लगाकर इस तरह पैक किया जाता है कि इनका दोबारा उपयोग नहीं कर सकते।

कमी थी तो हर वस्तु पाउच में आती है। शैम्पू से लेकर, सुपारी, गुटखे तक सबकुछ। उपयोग करिए और फैंकिए। कहीं भी फैंकिए। साफ करने के लिए कौन आएगा इसकी चिन्ता मत करिए। कुछ कुछ गीता के ज्ञान के अंदाज में। हे भारतीय, तू तो बस अपना गुटखा खा और पाउच सड़क पर फैंक, सफाई की तू चिन्ता मत कर (कैंसर की भी नहीं)। खैर, कैंसर की पीड़ा तो आपका निजी मामला है किन्तु यह सड़क, यह धरती, यह तो सार्वजनिक है। इसपर तो रहम कीजिए। पाउच गरीबों के लिए शायद वरदान साबित हुए हैं। मुझे याद है कर्नाटक में यदि शनिवार को स्कूल छूटते समय दुकान पर पहुँच जाओ तो छात्र छात्राओं की भीड़ शैम्पू के पाउच खरीदने को लग जाती थी। सौ रुपए के लगभग की शैम्पू की बोतल न खरीद पाने वाले एक रुपए का पाउच तो खरीद ही सकते थे। परन्तु दुख तब होता है जब हम बड़ी बोतल खरीद सकते हैं और फिर भी पाउच खरीदते हैं। काश, ये शैम्पू भी होम्योपैथिक दवाओं की शीशियों जैसी शीशियों में मिलते। काँच का कम से कम पुनः उपयोग तो हो सकता है।

हमारे माता पिता भी तो कपड़े के थैलों में समान लाते थे। क्या अपने साथ थैली ले जाना इतना कठिन हो गया है? हम अपनी कार, स्कूटर आदि में कपड़े के थैले या पहले के घर में पड़े पॉलीथीन के थैले रख सकते हैं ताकि जब भी कुछ खरीदना हो इनका उपयोग कर सकें।

सारे शहर, गाँव पॉलीथीन की थैलियों से अटे पड़े हैं। सड़कें, नालियाँ, कूड़े के ढेर सब इनसे भरे हुए हैं। नालियों में पानी आगे नहीं सरकता। मुझे याद है कि जब एक नदी में बाढ़ आई थी तो उसके बाद आस पास की सारी झाड़ियाँ, पेड़ वनस्पति इनसे सुशोभित थे। पहले जहाँ जंगली पौधों पर फूल दिखते थे अब वहाँ पॉलीथीन की थैलियाँ दिखती हैं। बरसात का पानी नालियों, नालों से निकल नहीं पाता। पहले तो केवल भूमि के कटाव व बहाव से नदियाँ कम गहरी होती जा रही थीं अब ये पॉलीथीन की थैलियाँ और आ गईं हैं।

लाख कानून बना लें, इनकी खपत दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। राजकोट में कुछ समय पहले भी कपड़े की थैलियों का अभियान चलाया गया था। २४ दिसम्बर के टाइम्स औफ इंडिया में खबर आई थी कि पॉलीथीन के उपयोग पर रोक लगाने व कपड़े की थैलियों का प्रचार करने के लिए राजकोट नगर निगम कम दामों में सब्जी बेचने वालों व दुकानदारों को कपड़े की थैलियाँ मुहैया कराएगी। 'एश्वर्य महिला उद्योग सहकारी मंडल' पुराने व फालतू बचे कपड़ों की धुलाई कर इनसे पाँच किलो समान लायक कपड़े के थैले एक रुपए में उपलब्ध करा रहा है। परन्तु यह कितना सफल हुआ कह नहीं सकती।

हमारे देश में कुछ भला करना हो तो लोगों को विज्ञान या लोक कल्याण या पर्यावरण की दुहाई देना बेकार है। यदि किसी उद्देश्य को पाना हो तो बात को थोड़ा सा धार्मिक रंग दे दो और देखो बात बनने की सम्भावना बढ़ जाती है। अब लगता है कुछ बात बनेगी। सबको पता तो था किन्तु अब और बताया जा रहा है कि कचरे के साथ हमारी गौ माताएँ पॉलीथीन भी खा लेती हैं। इससे वे कितना पौष्टिक दूध दे पाती हैं यह तो पता नहीं किन्तु जब उनके पेट में इसकी मात्रा बढ़ती जाती है तो उन्हें कष्ट होता है। अब सैकड़ों लोगों के सामने पशु चिकित्सक ऐसी गायों का औपरेशन करके ये पॉलीथीन की थैलियाँ निकाल रहे हैं। हाल में ही एक गाय के पेट में से ३५ किलो तो दूसरी के पेट से ८० किलो पॉलीथीन व प्लास्टिक निकाला गया।(क्या यह सम्भव है?) 'श्री खिरक गौसेवा चैरिटेबल ट्र्स्ट' अब लोगों में जन जागरण फैलाएगा कि पॉलीथीन व प्लास्टिक हमारे पर्यावरण व हमारी गायों के लिए कितना हानिकारक है। अब यदि गाय के प्रति श्रद्धा के कारण ही लोग पॉलीथीन का उपयोग कम कर दें तो यह धर्म व धार्मिक भावनाओं का एक सकारात्मक उपयोग होगा। पोरबंदर व वैरावल के मछुआरे नाविक मुरारी बापू के आग्रह पर शार्क‍- व्हैल की रक्षा करने का वचन ले चुके हैं व जब ये मछलियाँ इनके जाल में फंसती हैं तो वे उन्हें स्वतन्त्र करने को अपने पचास हजार रुपए के जाल भी काट देते हैं। उन्होंने मछुआरों को बताया कि जैसे आपकी बेटियाँ गर्भावस्था में अपने मायके आती हैं वैसे ही ये मछलियाँ भी प्रजनन के लिए आपके तट पर आती हैं। उनकी बात मानने से शार्क‍- व्हैल की लुप्त होती जाति की रक्षा हो रही है। यदि 'श्री खिरक गौसेवा चैरिटेबल ट्र्स्ट'के धार्मिक प्रचार से हमारी गायों के साथ साथ हमारी धरती की भी रक्षा हो जाए तो मैं उनकी आभारी रहूँगी।

घुघूती बासूती

Friday, March 27, 2009

वृद्धावस्था और आधुनिक श्रवण कुमार

शास्त्री जी ने अभी हाल के ही अपने एक लेख ‘बूढ़े लोगों का क्या काम समाज में !’ में वृद्धों की समस्या व समाज के उनके प्रति बदलते रवैये की बात की थी। यह सच है कि आज का समाज समझ नहीं पा रहा कि वृद्धों का क्या किया जाए। वृद्ध स्वयं समझ नहीं पा रहे कि वे अपने इस इलास्टिक से लम्बे खिंचते जीवन का क्या करें। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र ने एक तरफ जहाँ उन्हें लम्बी आयु दी है वहीं यह लम्बी आयु कई वृद्धों के लिए अभिशाप बन गई है। जो वृद्धावस्था की कगार पर खड़े हैं वे भी इस चिन्ता से ग्रस्त हैं कि न जाने कितना जीना पड़े। पैंशन पाने वाले लोगों का अनुपात बहुत कम है। वे कम से कम जीवन यापन के लिए धन की चिन्ता से तो मुक्त हैं। किन्तु भारत की एक बड़ी जनसंख्या पैंशन जैसी सुविधा का केवल स्वप्न देख सकती है। अपने जीवन में ईमानदारी से कमाया धन कम ही लोगों के लिए अस्सी, नब्बे वर्ष जीने के लिए पूरा पड़ सकता है। बहुत कम लोग होंगे जिन्हें बैंक में या फिर बीमा कम्पनी के सिवाय धन का अच्छा निवेश करना आता है। भूतकाल का कमाया पैसा कभी भी भविष्य की मंहगाई के लिए समुचित नहीं हो सकता। फिर लम्बी आयु के साथ दवाई का खर्चा भी जुड़ा हुआ है।


यदि जीवन यापन के लिए पैसे की समस्या को छोड़ भी दें तो भी पति पत्नी में से एक तो पहले संसार से विदा लेगा ही। फिर दूसरे का क्या होगा? कैसे अकेले जियेंगे आदि प्रश्न मुँह बाये खड़े रहते हैं। संयुक्त परिवार इसका एक हल था किन्तु वह था, है नहीं। अधिकतर परिवार अब एकल परिवार हैं। बच्चों के साथ रहना सबके लिए न तो संभव है और न ही व्यावहारिक। संयुक्त परिवार को जो हल मानते हैं वे भी आज के एक या दो बच्चों तक सीमित परिवार में पुराने समय के पुत्रों के साथ रहने वाले चलन को हल नहीं मान सकते। क्योंकि जब दो या एक ही संतान होगी तो बहुतों को पुत्रियों के साथ रहना होगा, जो पुराने जमाने वाले चलन को मानने वालों को मान्य नहीं होगा। या फिर बहुतों की बहू के माता पिता भी बेटे बहू के साथ रहेंगे, यह स्वीकारना होगा। सो इस इलाज को तो खारिज किया जा सकता है।


चीन में एक संतान का तो कानून ही बन गया था। ऐसे में एक नवदम्पत्ति के साथ दोनों के माता पिता व दादा दादी व नाना नानी भी रहेंगे क्या ? यदि हिसाब लगाएँ तो दो जोड़ी माता पिता, दो जोड़ी नाना नानी, दो जोड़ी दादा दादी हर दम्पत्ति के हिस्से में आएँगे। कुल हो गए बारह, एक दर्जन ! क्या कोई भी भला मानुष कितनी भी अच्छी संतान से दर्जन भर वृद्धों की देखभाल की अपेक्षा कर सकता है ? आप कहेंगे सब तो इतना लम्बा नहीं जीयेंगे। सही है। यदि संतानोत्पत्ति की औसत आयु २५ वर्ष रखी जाए तो माता पिता की पीढ़ी ५० से साठ की होगी और नाना नानी, दादा दादी की ७० से ८० की। अब अपने आस पास देखिए, आपको लगभग सभी लोग जो एक बार ६० या ६५ की आयु पार कर जाते हैं ७० या ८० वर्ष की उम्र तक आराम से जीते मिलेंगे। एक दर्जन को घटाकर आधा भी कर दें तो भी आधा दर्जन वृद्धों की देखभाल भी कोई हँसी मजाक तो होगी नहीं। सो जो संयुक्त परिवार में विश्वास करते हैं, उसे आदर्श मानते हैं वे भी इसे व्यावहारिक तो नहीं मान सकते। भारत में हममें से बहुत दो संतानों वाले हैं तब भी यदि सभी संतानें आदर्श हुईं तो भी कम से कम तीन या चार वृद्धों का ध्यान तो हरेक को रखना ही होगा। सो इस परिकल्पना/ hypothesis को भी खारिज करना होगा।


इस समस्या को सुलझाने के कुछ व्यावहारिक व सरल सम्भव उपायों पर चर्चा किसी और दिन करूँगी। आज तो इससे जुड़ा एक रोचक व क्रान्तिकारी प्रसंग सुनाती हूँ।


एक २८ वर्ष के युवक ने एक ५२ वर्ष की स्त्री से विवाह किया है। आश्चर्य की बात यह है कि न तो उम्र का मेल है, न पढ़ाई का और न ही वर्ग का। अल्पेश जहाँ अच्छा खासा कमाता है वहीं गंगा के तीन पुत्र व दो पुत्रियाँ हैं। वह पाँच वर्ष से विधवा थी। वह अपने पुत्रों द्वारा उपेक्षित उनके दोमंजिले मकान की छत पर तम्बू तानकर जीवन यापन कर रही थी। अल्पेश की माँ मानसिक रोगी है व उसे देखभाल की आवश्यकता है। अल्पेश के पिता की उसके बचपन में ही मृत्यु हो गई थी। दादा दादी या नाना नानी ने उसे पाला व शायद उसकी माँ की भी देखभाल की।


अल्पेश के लिए विवाह के प्रस्ताव तो आ रहे थे किन्तु उसे लगता था कि शायद ही कोई लड़की उसकी माँ के साथ रहना पसन्द करेगी। अन्त में उसे पत्नी या माँ में से एक को चुनना पड़ेगा। गँगा उनके घर आती थी और उसकी माँ से घुली मिली हुई थी। सो अल्पेश को लगा कि वही उसके लिए उचित रहेगी। उन दोनों में आपसी समझ, आदर व प्यार भी है। वे 'बिना मूल्य अमूल्य सेवा नामक विवाह संस्था' में गए। उन्हें ऊँच नीच बताया गया। गंगा अब माँ नहीं बन सकेगी बताया गया। अलग अलग से समझाने पर भी उनका आपसी विश्वास नहीं डगमगाया। सो बहुत सादगी से उनका विवाह किया गया। सो इस तरह से एक आधुनिक श्रवण ने अपनी माँ की सुविधा के लिए ऐसा निर्णय लिया।


भविष्य में क्या होगा कोई नहीं कह सकता किन्तु बात चकित करने वाली अवश्य है।


घुघूती बासूती

Tuesday, March 24, 2009

स्त्री कहाँ सुरक्षित है? यदि अपने घर में नहीं तो फिर कहाँ?

मुम्बई से खबर आई है कि एक पिता अपनी पुत्री का नौ वर्ष तक बलात्कार करता रहा। तबसे करता रहा जबसे वह बारह वर्ष की हुई। अब भी करता रहता यदि अब वह उसकी सत्रह वर्ष की छोटी बहन याने अपनी छोटी बेटी का भी बलात्कार करना शुरू न करता। बलात्कार का कारण चाहे किसी तांत्रिक का यह कहना हो कि इससे उसके व्यवसाय में वृद्धि होगी या जो भी रहा हो प्रश्न तो यही उठता है कि यदि स्त्री अपने ही घर में अपनों से सुरक्षित नहीं है तो कहाँ सुरक्षित है? यदि रक्षक ही भक्षक बन जाए, यदि बाड़ ही खेत को खाने लगे तो कोई क्या कर सकता है?


घर वह जगह है जहाँ से संसार भर से त्रस्त व्यक्ति भी चैन से निश्चिन्त हो सकता है। जहाँ उसे हर तरह की स्वतंत्रता मिलती है। जहाँ वह आराम से पैर ऊपर करके या लटका के या जैसे भी बैठ सकता है। जहाँ वह कुछ भी पहनता है, कैसे भी रहता है, एक बार घर का दरवाजा बन्द किया तो बस केवल सुरक्षा का एहसास होता है। परन्तु जब समाज जिस व्यक्ति को गृहस्वामी कहता है वह अपनी ही पुत्रियों पर यूँ अपना स्वामित्व जताए तो उस पुत्री की तो घर के भीतर पाँव रखते ही रूह काँपती होगी। घर से अधिक असुरक्षित स्थान तो उसके लिए कोई हो ही नहीं सकता।


यह बात जो दुःस्वप्न से भी अधिक भयानक है पढ़कर आश्चर्य होता है कि कोई इतना भी नराधम हो सकता है। जो धन की प्राप्ति के लिए अपनी ही बारह वर्ष की बिटिया का बलात्कार करे व उस तांत्रिक से भी करवाए। स्वयं उसे उसके घर पहुँचाकर आए ! कहाँ तो पिता अपनी पुत्री की रक्षा के लिए जान भी देने को तैयार रहते हैं और कहाँ ऐसे पिता ! एक माँ स्त्री होकर यह सब होने दे। यदि यह खबर सच है तो हमारे समाज को अपना सिर लज्जा से झुका लेना चाहिए।


जिन नेट पर मिलने वाले अज्ञात लोगों से हम अपनी बच्चियों व बच्चों को खबरदार करते हैं आखिर में उनमें से ही एक अज्ञात पुरुष ने उसे इतना साहस दिलाया कि वह अपने मामा को यह सब बता पाई। भला हो उसका कि उसने उसका लाभ उठाने की चेष्टा नहीं की। कि वह उसे जीने की राह दिखाता गया। वह तो आत्महत्या करना चाहती थी।


यदि यह खबर सच न भी हो तो भी यह सर्वविदित सत्य है कि लड़कियों का अपने घर में ही अपने ही सगे सम्बन्धियों द्वारा यौन शोषण होता रहता है। यह न केवल गरीब बस्तियों में होता है किन्तु पढ़े लिखे सभ्य कहलाने वाले परिवारों में भी होता है। सभ्य परिवारों में तो अवसर भी हैं व एकान्त भी। फिर यदि इस विषय पर बच्चे माता पिता से चर्चा भी करें तो पारिवारिक सम्मान पुलिस को रपट लिखवाने में आड़े आता है। क्या परिवार का सम्मान बच्चे की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण है? जो व्यक्ति ऐसा अपराध करके एक बार बच निकलता है क्या वह अधिक आश्वस्त होकर यह अपराध बार बार नहीं दोहराएगा? इस घटना में तो जब माता पिता ही बच्ची पर यह अत्याचार कर रहे थे तो बच्ची जाती भी तो कहाँ?


क्या विकसित देशों की तरह भारत में भी बच्चों को स्कूलों में बताया जाए कि यदि परिवार में कोई उनपर अत्याचार करे तो पुलिस को फोन करो? क्या यहाँ भी अध्यापक बच्चे की शिकायत पर पुलिस को बुलाएँ और बच्चे को शुरू से बताया जाए कि अपने परिवार में होने वाले अत्याचार के बारे में अध्यापक को बताएँ? भारत में परिवार को जो पवित्र दर्जा दिया गया है जिसमें प्रायः पड़ोसी तो क्या पुलिस भी हस्तक्षेप करने के कतराती है क्या वह गलत है? क्या कोई भी संस्था चाहे वह परिवार ही क्यों न हो बच्चे से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है? सोवियत संघ व चीन में छात्रों को अपने माता पिता की जासूसी करने को उकसाया जाता था और हमें यह घृणित लगता था। परन्तु जब परिवार के रक्षक ही बच्चों का जीवन नारकीय बना दें तो बच्चे क्या करें?


पाटन में अध्यापकों द्वारा छात्रा का बलात्कार व यौन शोषण यदि दिल दहलाने वाला था तो यह किस श्रेणी में रखा जाएगा? कौन सी सजा ऐसे पिता व इसमें सहयोग देने या आँख बन्द रखने वाली माँ के लिए सही हो सकती है? वह लड़की अपने पिता को फाँसी दिलवाना चाहती है। क्या फाँसी की सजा भी ऐसे पिता के लिए पर्याप्त सजा होगी? शायद यह अपराध उन अपराधों की श्रेणी में आता है जहाँ संसार का कोई भी कानून पर्याप्त या उपयुक्त सजा नहीं दे सकता।


गौर करने की बात है कि यौन उत्पीड़न केवल बच्चियों का ही नहीं होता। लड़के भी इसका शिकार होते हैं, चाहे इसकी दर कम होती है। परिवार के सभी सदस्यों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे के साथ कोई ऐसा दुर्व्यवहार तो नहीं कर रहा। बच्चे अन्तर्मुखी तो नहीं होते जा रहे। शुरू से ही उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि हर गलत व्यवहार का वे विरोध करें व उनका शरीर केवल उनका है, जिसे जो चाहे जैसे उनकी इच्छा के विरुद्ध छू नहीं सकता। उन्हें विस्वास दिलाना होगा कि उनकी बातें सुनी जाएँगी, उनपर अविश्वास नहीं किया जाएगा। समाज की चाहे यह दुखती रग ही क्यों न हो इसे अब पकड़कर इसका इलाज करना ही होगा।


न्याय शीघ्रातिशीघ्र मिलना चाहिए और प्राथमिक खबर से भी अधिक खबर न्याय मिलने की प्रसारित की जानी चाहिए। इसके दो लाभ होंगे, एक तो पीड़ित बच्चा व उसका परिवार न्याय माँगने का साहस व प्रेरणा जुटा पाएगा और दूसरा यह कि लोगों को अपराध करने पर दंड अवश्य मिलेगा यह भय होगा। अपराधी को भय दिलाना व पीड़ित को साहस दिलाना न्यायपालिका व संचार माध्यमों का उद्देश्य होना चाहिए। इस सबके साथ ही पीड़ित बच्चों की समुचित मानसिक व भावनात्मक सहारे की भी आवश्यकता का ध्यान रखना होगा।


घुघूती बासूती

Wednesday, March 18, 2009

जेड गुडी के सन्दर्भ में.... मृत्यु क्या है, किसकी झेलनी सरल है अपनी या किसी अपने की ? अपना जाना कठिन है या अपनों को छोड़कर जाना ?

अधिकतर लोग केवल एक दो अपनों के सामने संसार को छोड़कर जाते हैं। कुछ भाग्यवान चुपचाप सोए हुए में चले जाते हैं। कुछ दुर्भाग्यवान जानते हैं कि अन्त समय आ गया है किन्तु वे अकेले होते हैं। और अकेले में ही संसार से विदा हो जाते हैं।

मृत्यु सत्य है, पहला और अन्तिम सत्य। संसार में केवल यही एक घटना है जिसका घटना निश्चित है। आश्चर्य की बात है कि जिन बातों की निश्चितता के बारे में हमें कोई पक्का विश्वास नहीं होता उनकी तैयारी हम करते हैं। उनसे निपटने के लिए माता पिता, अध्यापक व अन्य विशेषज्ञ हमें तैयार करवाते हैं। स्कूलों में फायर ड्रिल होती है, भूकम्प आने पर क्या किया जाए सीखते हैं, कई लोग सी पी आर (Cardiopulmonary resuscitation) सीखते, सिखाते हैं ताकि यदि किसी की हृदयगति रुके तो उसकी सहायता कर सकें, कुछ आपात स्थिति के लिए फर्स्ट एड सीखते हैं। परन्तु कोई हमें मृत्यु (अपनी या अपने प्रियजन की ) का सामना कैसे करें नहीं सिखाता, न ही कैसे मरें सिखाता।

परन्तु लगता है अब उस समय का अन्त हो रहा है। अब हम टी वी पर, नेट पर लोगों को मृत्यु का सामना करते, मरते देख सकते हैं। कुछ महीने पहले एक विडीओ चैट रूम में लोगों ने एक व्यक्ति को आत्महत्या करते देखा। अब हम उन्हें इस अन्तिम सत्य से भी धन कमाकर अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करते देख सकते हैं। एक स्त्री हैं जेड गुडी। रिएलिटी टी वी की जानी मानी कलाकार हैं। सर्वाइकल कैंसर से किसी भी क्षण उनकी मृत्यु हो सकती है। कुछ ही दिन पहले उनका विवाह हुआ। उनकी बीमारी, विवाह आदि के फोटो व विडीओ देखे जा सकते हैं। उनकी बिगड़ती हालत देखी जा सकती है।

मृत्यु व जन्म जैसे निजी क्षण भी अब सार्वजनिक हो रहे हैं। सही या गलत कहना तो कठिन है। क्या यह हमें अपने सबसे बड़े सत्य का सामना करने के लिए बेहतर तैयार कर पाएँगे ?

मृत्यु को भारतीय संस्कृति में आत्मा के परिधान बदलने के समान माना गया है। क्योंकि आत्मा को अमर माना जाता है सो उसके घिसे पुराने वस्त्रों को बदल नए वस्त्र धारण करने के लिए कुछ समय के प्रस्थान को दुखी होने का कारण तो नहीं माना जा सकता। शायद इसीलिए भारतीय मृत्यु को अपेक्षाकृत अधिक सहजता से स्वीकार करते हैं, विशेषकर तब जब मृतक एक लम्बा सुखी जीवन जीकर विदा लेता है। कई भारतीय समाजों में तो ऐसे वृद्ध की अन्तिम यात्रा बैंड बाजे के साथ निकलती है।

शायद यही कारण है कि हम भारतीय अधिक कष्ट में होने पर मृत्यु को गले लगाने को अधिक आतुर होते हैं। प्रायः यह भी देखा जाता है कि यदि कोई अधिक कष्ट में हो या बचने पर उसका जीवन अधिक कष्टप्रद या अपाहिज होने की सम्भावना हो तो लोग यहाँ तक कहते सुने जाते हैं कि इससे तो बेहतर होता की मर जाता। पश्चिमी समाज में ऐसा भाग्यवाद ( fatalism ) कम ही देखा जाता है। भारत में किसी स्टीफन हॉकिंग देखने की सम्भावना कम ही है।

यदि जन्म से पहले को अस्तित्व से पहले की स्थिति माना जाए तो मृत्यु को अस्तित्व के बाद की स्थिति माना जा सकता है। तो ये दोनों स्थितियाँ एक दूसरे का प्रतिबिम्ब भी मानी जा सकती हैं। यदि दुखों व कष्टों से बचना चाहा जाए तो मृत्यु मुक्ति है। क्योंकि मृत्यु के बाद कोई हानि नहीं पहुँचाई जा सकती। वैसे जन्म के साथ ही मृत्यु की क्रिया भी आरम्भ हो जाती है। कोशिकाएँ मरती हैं, उम्र बढ़ती नहीं हर पल के साथ कम होती जाती है। मृत्यु इस क्रिया की सम्पूर्णता भी कही जा सकती है।

श्रीमद्भगवद् गीता के अनुसार ..
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतो‍‌Sयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥


अर्थात यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मती है और न ही मरती है व न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाली ही है; क्योंकि यह अजन्मी, नित्य,सनातन व पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर यह मारी नहीं जाती।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोSपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥


अर्थात जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करती है।

यदि यह सब सोचकर चला जाए तो जेड गुडी का अपने मरने की प्रक्रिया को सारे संसार में प्रसारित करना, उससे अपने दो पुत्रों के लिए धन कमाकर छोड़ जाना भी शायद गलत नहीं है। वे तो केवल अपने जीवन रूपी नाटक के पटाक्षेप को अपने पिछले कुछ वर्षों के जीवन की तरह हमें दिखा रही हैं। यही उनका कर्म रहा है व वे उसे अन्त तक कर रही हैं। क्या वे कर्मयोगी कहलाएँगी?

यदि आत्मा है और आत्मा को शान्ति अशान्ति जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है तो उनकी आत्मा को शान्ति प्राप्त हो यही कामना की जा सकती है। वैसे समाचारों के अनुसार वे अभी भी मृत्यु से संघर्षरत हैं। उन्हें कम से कम कष्ट हो और यदि वे लोगों के मन से मृत्यु का भय भी निकाल सकें तो और भी बेहतर होगा।

घुघूती बासूती

Monday, March 16, 2009

यह भी खूब रही। फरवरी में बनाया लोगों का अप्रैल फूल !

२२ फरवरी को हमारे समाचार पत्र, टाइम्स औफ इंडिया, में समाचार आया 'बेकारी की मारी अध्यापिका ने अपनी ही चिता जला ली!'

स्वाभाविक है सबको सहानुभूति हुई। खबर थी कि सन्जी या सजनू डाँगर नामक २१ वर्षीया युवती ने तीन साल तक अध्यापिका की नौकरी न मिलने से परेशान होकर अपने जीवन का इस दुखद किन्तु विचित्र तरीके से अन्त कर लिया। जब उसके परिवार के लोग सो गए तो वह अपने परीक्षा परिणाम के प्रमाण पत्र लेकर श्मशान गई। उसे ८० प्रतिशत अंक मिले थे किन्तु नौकरी नहीं। उसने अपनी माँ के लिए भी एक पत्र लिखा कि नौकरी न मिलने से वह अपने जीवन का अंत कर रही है।

प्रमाण पत्र और अपनी चप्पलें उसने चिता से कुछ दूर रखीं और फिर लकड़ियाँ चिता पर रखी और खुद भी उस पर बैठी और आग लगा ली।

परिवार भी दुखी, सारा गाँव भी दुखी, पाठक भी दुखी।

२८ फरवरी को खबर थी कि वह चिता की राख से प्रकट हो गई है।

पुलिस को शक तब हुआ जब राख में से एक भी हड्डी नहीं मिली। उसके फोन रिकॉर्डस में पुलिस को एक नम्बर मिला जिसपर एस एम एस व फोन किए गए थे। उस नम्बर पर फोन मिलाने पर कमलेश पटेल से बात की गई। सजनू ने कुछ समय उसके साथ स्कूल में पढ़ाया था। उसने कहा कि वह सजनू को अच्छी तरह नहीं जानता।

तीन दिन बाद सजनू ने अपने घर फोन करके बताया कि उसने कमलेश के साथ विवाह कर लिया है।
पढ़कर समझ नहीं आया कि हँसे या मूर्ख बनने पर दुखी हों।

पता नहीं गाँव वाले व उसके माता पिता भी इसी पशोपेश में हैं कि नहीं।

घुघूती बासूती

Saturday, March 14, 2009

खोया बचपन, गुमनाम जीवन

बच्चों का खो जाना एक हृदयविदारक घटना होती है। जिस परिवार का बच्चा खो जाता हैं उनका जीवन तो जीते जी नरक बन जाता होगा। मुझे लगता है खोने में मिलने की आशा की किरण चाहे रहती है परन्तु जब बच्चा सालों साल घर नहीं लौटता होगा तो अनिश्चितता और बच्चे के साथ क्या हो रहा होगा सोच सोचकर माता पिता व परिवार के सदस्यों की हालत बहुत दुखद होती होगी। मृत्यु होने पर रो धोकर उस सत्य को अन्त में मान लिया जाता है। उस दुख के साथ जीना सीख लिया जाता है।

हर बड़े शहर में माता पिता सदा इस बात के प्रति सजग भी रहते हैं और भयभीत भी कि उनका बच्चा कहीं खो न जाए। मुझे याद है जब मैं अपनी सवा साल की बेटी को लेकर पहली बार मुम्बई पहुँची तो सबसे पहले उसे अनजान व्यक्ति की धारणा सिखाई। निर्लज्जता से यह बताया कि कुछ लोग अपने होते हैं कुछ पराए। इससे पहले उसे यही पता था कि सभी अपने होते हैं। पहले ही दिन वह जाकर एक भिखारिन से बड़े प्रेम से बातें करने लगी। लगभग उसका हालचाल पूछने के अंदाज में। तब स्ट्रैंज मैन, स्ट्रैंज वुमैन व अंकल, आँटी में अंतर बताया। बिजली के बिल की लाइन में खड़ी वह मुझसे पूछती कि क्या यह व्यक्ति अंकल है या स्ट्रैंज मैन !

कल जब मैंने पढ़ा कि अहमदाबाद स्टेशन में बाल सहाय केन्द्र के पोस्टर लगाए गए हैं और पुलिस कर्मचारियों को जब कोई अकेला बच्चा नजर आता है तो वे उससे पूछताछ कर उसको घर पहुँचाने की कोशिश करते हैं, बहुत खुशी हुई। पुलिस इंस्पैक्टर डी बी जाडेजा को जब नौ वर्ष की एक बच्ची स्कूल यूनिफॉर्म में कन्धे पर बैग लटकाए स्टेशन पर घूमती दिखी तो उन्होंने उसे बुलाया, उसके रोने पर उसे चुप कराया और बाल सहाय केन्द्र का बोर्ड उसे दिखाया। फिर पूछने पर उसने बताया कि उसे जबर्दस्ती स्कूल भेजा जाता था सो वह अपने घर हिम्मतनगर से भाग आई थी। उसे उसके घर पहुंचाया गया।

छह महीने पहले एक बारह वर्ष का बच्चा इस केन्द्र में आया और उसने बताया कि चार लोगों ने उसका अपहरण कर लिया था और वह उनसे बचकर भाग आया है। पुलिस को उसकी कहानी पर शक तो हुआ परन्तु उन्होंने राजकोट में उसके घर फोन कर पता किया तो पता चला कि माँ के उसकी शैतानी पर डाँटने पर वह घर छोड़कर आ गया था। अब सहायता लेने के लिए उसने कहानी बनाई थी। खैर, जो भी हो उसे अपने माता पिता से वापिस मिला दिया गया।

सरकार व पुलिस की सहायता से यह केन्द्र चलाया जा रहा है। सन २००८ में इस केन्द्र ने ११५ बच्चों को उनके माता पिता के पास पहुँचाया। यदि यह केन्द्र ना होता तो इन ११५ बच्चों का भविष्य क्या होता सोचकर ही कंपकंपी हो आती है।

भारतीय मानवाधिकार समिति के अनुसार भारत में प्रति वर्ष ४५,००० बच्चे खो जाते हैं। इनमें से ११,००० कभी नहीं मिलते। नेशनल सेन्टर फोर मिसिंग चिल्ड्रन के अनुसार घर छोड़कर भागने वाले बच्चों की संख्या १०,००,००० प्रति वर्ष है। अर्थात हर ३० सेकेन्ड में एक बच्चा घर छोड़कर चला जाता है। एक अनुमान के अनुसार केवल १० प्रतिशत मामलों में ही पुलिस के पास रिपोर्ट दर्ज करवाई जाती है। कैसी विडंबना है कि बच्चे अपने ही घर को छोड़कर दर दर की ठोकरें खाने को तैयार रहते हैं। यदि इसमें से कुछ प्रतिशत बच्चे भी असामाजिक तत्वों के हाथ आ जाते होंगे तो भी स्थिति की भयावहता का अनुमान लगाया जा सकता है। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि बच्चों को फिल्म व डॉक्यूमेन्ट्री के द्वारा घर छोड़ने के भयानक परिणामों से अवगत कराता जाए? यह बात भी सोचने की है कि बच्चे घर छोड़कर क्यों जाते हैं? आज जब हम वयस्क संतान पर वृद्ध माता पिता की देखभाल का उत्तरदायित्व कानूनन डालना चाहते हैं तो माता पिता अपने ही जन्मे बच्चे के उत्तरदायित्व से कैसे मुक्त किए जा सकते हैं?

मुझे लगता है आज के कम्प्यूटर के युग में खोए बच्चों को जब तक कोई अपहृत नहीं कर लेता अपने घर पहुँचाना इतना कठिन भी नहीं होना चाहिए। यदि सभी खोए बच्चों का एक फोटो सहित डैटा बेस बना लिया जाए तो जब भी कोई बच्चा रेलवे स्टेशन में या सड़कों में अकेला जीवन यापन करता दिखे तो उसकी फोटो को यहाँ डालकर मिलान किया जा सकता है। यदि यह सुविधा सब थानों में ना भी हों तो भी मुख्य नगरों में बनाई जा सकती है और उनकी सहायता छोटे थाने भी ले सकते हैं। ऐसे सॉफ्ट वेयर होंगे भी और बनाने असंभव भी नहीं होंगे।

इसके लिए एक और काम भी किया जा सकता है। जैसे सभी करदाताओं को पैन नम्बर दिया जाता है वैसे ही जन्म का पंजीकरण करवाते समय एक स्टील के पैन्डेन्ट या ऐसी ही शरीर में पहनने योग्य वस्तु में बच्चे की नागरिक संख्या भी दी जा सकती है। वहीं इस संख्या के साथ पंजीकरण केन्द्र के कम्प्यूटर में माता पिता का पता आदि भी लिखा जा सकता है। यह सब जानकारी कम्प्यूटर में रहे और समय समय पर पता बदलने के साथ माता पिता उसे सही करवाते रहें तो समस्या का सरल समाधान हो सकता है। पैन्डेन्ट बच्चे के गले में तब तक पहनाया जा सकता है जब तक वह बड़ा ना हो जाए। बड़े होने पर भी वह पर्स में रखा जाए तो दुर्घटना आदि होने पर तुरन्त पता चल सकता है कि वह कौन है और परिवार को सूचना दी जा सकती है। सब खोए बच्चों का अपहरण नहीं हुआ होता। शायद बाद में वे गलत हाथों में पड़ जाते होंगे। ऐसे में एक बड़ी संख्या में बच्चों को उनके घर पहुँचाया जा सकता है। शायद यह उपाय व्यवहारिक न हो तो ऐसे में हमें व्यवहारिक उपाय ढूँढने होंगे। इसके लिए लोगों से सुझाव माँगे जा सकते हैं।

काम कठिन तो हो सकता है किन्तु कोई भी कीमत बच्चों की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती। खोए बच्चों का बचपन तो खो ही जाता है और यदि वे जीवित रहें तो उनका शेष जीवन भी शायद गुमनामी में ही बीतता होगा।

नोटः ये आंकड़े समाचार पत्र व नैट से लिए गए हैं। गल्तियों की संभावना हो सकती है।

घुघूती बासूती

Wednesday, March 11, 2009

आजा, मन रंग डालें मिलकर।




आजा, मन रंग डालें मिलकर।

मन कहता है, आज ये मेरा
रंग डालूँ तुझे रंगों से अपने
बैंगनी, हरे, लाल,नीले, पीले
रंगों से सजा दूँ चेहरा तेरा।

खेलूँ रंग यूँ साथ मैं तेरे
भीगे तू भी संग में मेरे
ना पहचाने जाएँ ये चेहरे
घुल मिल जाएँ तेरे मेरे।

खेलूँ होली ऐसी मैं यूँ रमकर
रंग जाए मन अन्तः भी तेरा
मैं भी रंग जाऊँ रंग में तेरे
खेलें होली दो मन जमकर।

तेरा मेरा भेद आज मिटाकर
इक दूजे की आत्मा भिगाकर
खेलें होली हम जग से हटकर
आजा, मन रंग डालें मिलकर।

छूट जाएँगे सब रंग चेहरे से
बदल जाएँगे कपड़े भी तन के
बीत जाएगा यह दिन होली का
कल हो जाएँगे सब पहले से।

भीगें जो दो मन इस होली में
सूखें नहीं कभी इस जीवन में
रंग लगाए इस बार जो हमने
छूट ना पाएँ वे कभी जीवन में।

घुघूती बासूती

सभी को होली की शुभकामनाएँ !
घुघूती बासूती

Sunday, March 08, 2009

यदि अमानुषिकता का कोई तमगा हो तो ये छह अध्यापक सबको मात देते हुए यह तमगा गर्व से जीत सकते हैं।

महिला दिवस पर......

पाटन में गुरु के चोले में घूमते थे बलात्कारी ! अब आजीवन कारावास की सजा भोगेंगे ये गुरु !


यदि अमानुषिकता की, गुरु के नाम को कलंकित करने की कोई प्रतिस्पर्धा हो तो पाटन के टीचर्स ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट के ये छह अध्यापक सबको मात देते हुए गर्व (शायद उन्हें गर्व ही था ) से यह स्पर्धा जीत सकते हैं। दुर्भाग्य से यह लज्जाजनक घटना मेरे राज्य में किसी एक अध्यापक के किन्हीं कमजोर क्षणों की कहानी नहीं है। न ही एक अपराधी की एक विरले अपराध की कहानी। यहाँ तो दाल में कुछ काला नहीं सारी की सारी दाल काली ही नहीं, दुर्गंधयुक्त थी। और यह एक दिन नहीं परोसी गई, बार बार परोसी गई। इसे निगलने का दुर्भाग्य था अध्यापिका बनने के सपने सजाए छात्रा किशोरियों का।


सोचिए, कौन माता पिता अपनी बेटियों को केवल बारहवीं पढ़ाकर अध्यापिका बनाना चाहेंगे ? अधिकतर लोग कम से कम स्नातक करवाकर ही अध्यापन की ट्रेनिंग देना चाहेंगे। ये कोई समाज के प्रतिष्ठित, धनवान लोग तो शायद नहीं होंगे। साधारण लोग व अधिकतर ये वे लोग होंगे जो गरीबी से बाहर निकलने की ईमानदार व सम्मानित राह खोजते होंगे। बहुत से दलित या पिछड़ी जातियों के भी होंगे। सरकारी कॉलेज, फीस शायद न या नाम मात्र की (गुजरात में सरकारी संस्थानों में फीस नाम मात्र की है और लड़कियों के लिए नहीं ही है।), छात्रावास की बहुत कम खर्चे में समुचित व्यवस्था, कल के सुनहरे सपने, जब अनपढ़ माता पिता भी गर्व से कह सकते कि उनकी बेटी अध्यापिका है। बहुत सी छात्राओं के लिए उनकी अध्यापिकाएँ ही रोल मॉडेल रही होंगी। शायद बहुत सी के लिए जीवन में सबसे सम्मानित व पढ़ी लिखी व्यक्ति उनकी अध्यापिका ही रही होगी।


चमकती आँखों मे भविष्य के सुनहरे स्वप्न लिए ये किशोरियाँ पाटन के DIET-PTC ( District Institute of education and Training BTC ट्रेनिंग की तरह) के छात्रावास में दो वर्ष के लिए पढ़ने के लिए गईं होंगी। उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि जिन अध्यापकों के कन्धों पर इन्हें अध्यापिका बनाने का भार है और जिनके संरक्षण में रहकर वे ट्रेनिंग लेने आई हैं वे उन्हें सैक्स ट्रेनिंग देने को लालायित हैं। ये कामान्ध अध्यापक, एक नहीं, दो नहीं, पूरे छह, इन्हें अपनी छात्राएँ कम व अपनी वासना का खिलौना अधिक मानते रहे। समाचार पत्रों में ५ फरवरी २००८ से इस विषय में लज्जाजनक समाचार आते रहे हैं।


बहुत से शिक्षाविद् यह मानते हैं कि केवल वार्षिक परीक्षा छात्रों की क्षमता का सही आंकलन नहीं करती। वर्ष भर छात्रों के द्वारा कक्षा में की गई मेहनत, गृहकार्य, कक्षा में प्रतिदिन दिए गए उत्तर व टेस्ट में लिए गए अंक आदि छात्र का बेहतर आंकलन करते हैं। इसकी अपेक्षा वार्षिक परीक्षा में कोई भी कक्षा में अनुपस्थित रहने वाला,सोने वाला या ऊधमी छात्र भी अन्तिम दिनों में घोटा लगाकर या नकल करके अच्छे अंक पा सकता है। इसीलिए बहुत से संस्थानों में आंतरिक मूल्यांकन का प्रावधान रखा जाता है। इसका दुरुपयोग अपने प्रिय छात्र को अधिक अंक देने के लिए किया जा सकता है यह तो कल्पना की जा सकती है। किन्तु छात्राओं के साथ बलात्कार, यौन उत्पीड़न के लिए किया जा सकता है यह तो किसी ने दुःस्वप्न में भी नहीं सोचा होगा। यहाँ आंतरिक मूल्यांकन ५ या १०% ना होकर ४५ % थी। यह इतनी अधिक है कि छात्राओं को अच्छे अंक देने का प्रलोभन और उससे प्राप्त होने वाली सरकारी प्राइमरी स्कूल में नौकरी का प्रलोभन या खराब अंक देने का भय दिखाकर अध्यापक अपनी मनमानी करते रहे और किसी को भी पता नहीं चला। यहाँ अध्यापकों ने घिनौनेपन की सारी सीमाएँ पार करते हुए जो किया वह देख तो शायद पॉर्न निर्माता भी दाँतों तले उँगली दबा लें।


यहाँ छात्राओं को कूट शब्द सिखाए जाते थे और सलाह दी जाती थी कि ये शब्द वे अपनी वरिष्ठ छात्राओं से सीखें। प्रत्येक कूट शब्द जैसे, चाय, कॉफी, भोजन, ओ के, TLM ( Teaching Learning Material) का कोई विशेष अर्थ होता था जिसका वे कक्षा में बेबाकी से उपयोग करते रहते थे। विज्ञान का अध्यापक कक्षा में कहता था कि कुछ TLM(अन्तः वस्त्र ) दिखाओ तो मैं तुम्हें अच्छे अंक दूँगा। छात्राओं को चाय, कॉफी,ओ के व भोजन (जिनका यह अर्थ बिल्कुल नहीं था ) का निमन्त्रण अधिक अंक पाने के लिए दिया जाता था। वहाँ कम्प्यूटर कक्ष इनकी विलासिता व अमानवीय ढंग से यातना देने का केन्द्र बना हुआ था। जाँच के दौरान कम्प्यूटरों में प्रचुर मात्रा में पॉर्न सामग्री जो छात्राओं को दिखाई जाती थी मिली।


इन अध्यापकों का भाँडाफोड़ तब हुआ जब एक १९ वर्षीया, शायद तब १८ वर्षीया छात्रा बार बार बेहोश होने लगी। यह छात्रा गरीब, दलित, भूमिहीन कृषि मजदूर की पांच संतानों में से एक थी। ९ नवम्बर २००८ से इस छात्रा का चार बार छह अध्यापकों द्वारा सामूहिक बलात्कार हुआ था। उसे धमकाया जाता था कि उनकी बात न मानने पर उसे अनुत्तीर्ण कर दिया जाएगा। उसकी मानसिक व शारीरिक बुरी हालत के कारण उसकी सहपाठिनों को उसके बलात्कार की बात उससे पता चली। ३१ जनवरी को छात्राओं ने अपने अध्यापकों के विरुद्ध लिखित शिकायत कॉलेज अधिकारियों को दी। ४ फरवरी को एक छात्रा ने फोन करके अपने तथा बहुत से अन्य अभिभावकों को कॉलेज बुलाया। जब उन्हें सारी बात पता चली तो उन्होंने अध्यापकों की जमकर पिटाई की और उन्हें पुलिस को सौंप दिया। ५ फरवरी को यह समाचार समाचार पत्रों में आया।


यह केस एक विशेष फास्ट ट्रैक सेशन कोर्ट में ले जाया गया। यहाँ गवाही देते समय व वकील द्वारा क्रॉस एक्ज़ामिनेशन के दौरान यह छात्रा दो बार बेहोश हो गई। चार्जशीट में ३७ छात्राओं के बयान भी हैं। ६ मार्च २००९ यानि लगभग १३ महीने में माननीया सुश्री न्यायाधीश एस सी श्रीवास्तव ने इन छह अध्यापकों को आजीवन कारावास की सजा व १०,००० रुपए पीड़िता को देने का आदेश दिया।


यह न्याय पीड़िता के शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक घावों को भर नहीं सकता परन्तु देश में न्याय है व साहस से अपनी लड़ाई लड़ने से और कुछ नहीं तो वहशियों को दंडित कर सलाखों के पीछे पहुँचाया जा सकता है, यह सांत्वना और विश्वास तो देता ही है। अब कम से कम यह आशा तो की जा सकती है कि हमारी बच्चियों का शोषण करने वालों में से जैसे छह को अपनी सही जगह पर पहुँचाया गया वैसे ही ऐसे अन्य अपराधियों को भी पहुँचाया जाएगा।


इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक दिल दहला देने वाली घृणित बात जो है वह यह है कि इन वहशियों ने छात्राओं पर अपने नियन्त्रण का दुरुपयोग कर अपने अध्यापक जैसे सम्मानित पद व छात्राओं व समाज के विश्वास का भी बलात्कार किया। एक लड़की या स्त्री सड़क पर चलते हुए अपने पर होने वाले हमले के प्रति संशकित व जागरुक रहती है। जब यह हमला घर में पिता, भाई, संरक्षक या विद्यालय में अध्यापक ही जिनपर उसका अटूट विश्वास होता है, कर दें तो वह कैसे बच सकती है? ऐसे में यह केवल स्त्री का ही नहीं, विश्वास व समाज की नींव का ही नृशंस बलात्कार है। शायद ये आततायी हत्यारों से भी गए गुजरे हैं।


क्या कोई उस असहाय किशोरी की मनोदशा की कल्पना कर सकता है? कैसे वह तिल तिलकर प्रतिदिन अन्दर ही अन्दर थोड़ा थोड़ा मरती होगी। कैसे वह अगले दिन उनकी कक्षा में जाने का साहस जुटा पाती होगी। जिस अध्यापन को उसने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था उसी में इतनी क्रूरता व गंदगी देख उसके हृदय पर क्या बीतती होगी।


प्रश्न अनेक हैं। क्या छात्राओं के कॉलेज में कुछ अध्यापिकाएँ नहीं होनी चाहिएँ थीं? क्या हमारे प्रदेश में अध्यापिकाओं की कमी है? यदि है तो देश के अन्य भागों से उनकी नियुक्ति करना क्या असंभव था? क्या हमारी बच्चियों को आदमखोरों के हवाले इतनी सुगमता से किया जा सकता है?


यह लेख एक वर्ष पहले भी लिखा जा सकता था परन्तु सबकुछ इतना अविश्वनीय था और मैं अपराध सिद्ध होने की प्रतीक्षा कर रही थी। अभी भी यही कामना है कि कोई निर्दोष दोषी ना सिद्ध हुआ हो। किन्तु इतनी छात्राओं ने उनके विरुद्ध गवाही दी है। कम्प्यूटर में सबूत मिले हैं। फिर भी अपनी तरफ से समाचार पत्रों द्वारा दिए गए तथ्यों के आधार पर यह लेख लिखा है। यदि कोई गल्ती हुई हो तो अनजाने में ही हुई है, जानबूझकर या नमक मिर्च लगाने के उद्देश्य से नहीं।


माता पिता से विनती करती हूँ कि अपनी बच्ची/ बच्चे को सिखाएँ कि कोई भी स्पर्श या बात यदि उन्हें असहज करे तो वे उसका विरोध करें व माता पिता को बताएँ। छोटी हरकतों से ही ऐसी प्रवृत्ति के लोग बड़ी हरकतों पर उतर आते हैं। उन्हें आरम्भ में ही रोकने व उनसे प्रश्न करने से उनकी हिम्मत शायद इतना आगे बढ़ने की न हो पाए। किसी पर भी इतना विश्वास न करें कि वह उनका अनुचित लाभ उठा सके। आज न तो लड़कियाँ सुरक्षित हैं न छोटे लड़के।


आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पीड़िता व अन्य छात्राओं को बधाई व शुभकामनाएँ! भविष्य में भी वे ऐसे ही साहस के साथ अन्याय के विरुद्ध लड़ें व अच्छी अध्यापिकाएँ सिद्ध हों यही कामना करती हूँ।


घुघूती बासूती

Tuesday, March 03, 2009

हमारे मोहल्ले की हालत खराब होती जा रही है।

एक परिवार में बंटवारा हुआ। मकान, खेत,बगीचे बंट गए। बंटवारा तो हुआ परन्तु एक भाई अपने परिवार का ध्यान रखने की बजाए हर समय दूसरे भाई से ईर्ष्या द्वेष में ही जलता रहा। जब उसे अपने बच्चों को पढ़ाना लिखाना अच्छा मनु्ष्य बनाना चाहिए था वह उन्हें केवल दूसरे भाई व उसके बच्चों के प्रति आक्रोश दिलाता रहा, अपने पर हुए सच्चे झूठे अन्यायों की कहानी सुनाता रहा। वह अपने किसी बच्चे को बहुत अधिक लाड़ करता और किसी से सौतेला व्यवहार करता। वह अपने दर्जन भर बच्चों में से दो तीन को केवल अपने पड़ोसी भाई व उसके बच्चों को गालियाँ देना, उनपर आते जाते थूकना, पत्थर फेंकना, गुलेल से निशाना लगाना, उनकी खड़ी फसलों को आग लगाना, याने कुल मिलाकर घृणा का पाठ पढ़ाता रहा।

समय बीतता गया। घृणा सीखे बच्चे बड़े होते गए। बड़े होने के साथ साथ उनकी घृणा भी बड़ी होती गई। उनकी गुलेलें भी बड़ी होती गईं। पत्थर चट्टानों में बदलते गए। वे इतने उद्दंड हो गए थे कि अब वे घर में भी गालियाँ देने लगे। घर में भी वातावरण खराब होता जा रहा था। जिन बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा था उन्होंने विद्रोह कर दिया। वे अपना अलग हिस्सा माँगने लगे। यह देख पिता ने इन बच्चों पर अत्याचार बढ़ा दिया। अत्याचार की जब सब सीमाएँ पार होने लगीं तब पड़ोसी ने भी उन बच्चों की दुर्दशा देख उनकी सहायता की और उन्हें उनका अलग हिस्सा दिलवा दिया। इससे नाराज सौतेला व्यवहार करने वाले ईर्ष्यालु भाई के मन में पहले से ही जो भाई के प्रति घृणा थी वह और भी भयंकर रूप से सुलग गई। अब वह और भी खुले रूप से उद्दंड बच्चों को भड़काने लगा, उन्हें पड़ोसियों पर और भी अधिक हमले करने को कहने लगा। घर में उनकी उद्दंडता को वह यही सोचकर बर्दाश्त करता रहा कि पड़ोसियों का जीना तो वे हराम कर ही रहे हैं।

पड़ोसियों ने तो इन उद्दंडों की बदमाशियों के साथ जीना सीख ही लिया था। यह भी सच था कि उसका बहुत सा पैसा, शक्ति और समय बाढ़ लगाने, बाढ़ के पास अपने कुछ बच्चों को हर समय पहरा देने के काम में लगाने में बर्बाद हो रहा था। कई बार उसने ईर्ष्यालु भाई को समझाने, उससे समझौता करने की कोशिश की परन्तु अब तक उद्दंड बच्चे बड़े होकर इतने शक्तिशाली हो चुके थे कि यदि उनके परिवार के कुछ लोग शान्ति चाहते भी तो वे शान्ति व समझौतों को कभी भी लागू नहीं होने देते। जब जब शान्ति वार्ता होती वे पड़ोस के खेत व घर पर और भी बड़ी चट्टानें फेंकते, आग लगाते। अब तो थूकने, गाली देने व पीटने की आदत इतनी पक्की हो गई थी कि वे किसी को भी पीट देते चाहे वह उनके अपने परिवार का हो या मोहल्ले का कोई भी व्यक्ति हो। अब घर के लोग भी उनसे डरने लगे थे। ईर्ष्यालु भाई उन्हें समझाता कि हमला हम पर नहीं केवल पड़ोसी पर करो परन्तु अब वे उसके वश में नहीं रह गए थे। वे पूरे मोहल्ले पर आतन्क फैलाने लगे थे। जो भी उनकी किसी भी सनक को मानने से मना करता वे उसे पीट पीट कर मार देते।

पड़ोस तो परेशान था ही अब तो सारा मोहल्ला व उनका घर भी उनसे आतंकित था। प्रतिदिन उद्दंड लोग सारे परिवार को नए नए कानून बनाकर देते थे। यह नहीं खा सकते, वह नहीं कर सकते, यह नहीं पढ़ सकते, वह नहीं पहन सकते। पूरा परिवार आतंकित था परन्तु वे अब भी उद्दंड लोगों की पड़ोसियों को धमकाने, परेशान करने की उपयोगिता से मुँह नहीं मोड़ पा रहा था। परिवार के कुछ शान्तिप्रिय लोग उस पल को कोसते थे जब ईर्ष्यालु भाई ने इद्दंडों को उद्दंड होना सिखाया था व उनकी हर उद्दंडता पर उन्हें पुरुस्कृत किया था। वह मोहल्ले भर को बताया था कि उद्दंड बच्चे तो बिल्कुल निर्दोष हैं सारी गलती पड़ोसी की है। पड़ोसी तो मारे ही जाते थे अब घर के लोग भी उनकी उद्दंडता की भेंट चढ़ने लगे थे।

अब मोहल्ले का एक दूर वाला अमीर घर जो अब तक ईर्ष्यालु भाई का साथ देता रहा था इन उद्दंड लोगों का निशाना बनने लगा। अब अमीर घर के लोग भी उद्दंड लोगों से निपटने में ईर्ष्यालु भाई का साथ देने लगा। परन्तु ईर्ष्यालु भाई को अपने उद्दंड बच्चों से अब भी इतना मोह था कि जब जब वे अधिक पिटने, हारने लगते वह उनकी मरहम पट्टी करने से अपने को रोक नहीं पाता। उसे यह भी भय था कि यदि वे खत्म हो गए तो पड़ोसी को परेशान कौन करेगा। वे स्वयं मोहल्ले भर में कभी कभी गुहार लगाते हैं कि हमारे उद्दंड बच्चों से हमें बचाओ। परन्तु जब कोई बचाने में सहायता करता है तो ईर्ष्यालु भाई को फिर से अपने उद्दंड बच्चों से प्यार उमड़ आता है। वह बचना भी चाहता है परन्तु उन्हें बचाना भी चाहता है।

अब यह हाल हो गया है कि यदि परिवार के कुछ बच्चे गुल्ली डंडा भी खेलने लगते हैं तो उद्दंड लोग उन्हें धमकाने लगते हैं। मोहल्ले के कोई बच्चे उनसे खेलने उनके घर आए तो वे उन्हें भी पीटना चाहते। बहुत बचा बचाकर उन बच्चों के साथ खेल खेला जाता। परन्तु एक दिन उन्होंने उन बच्चों को गालियाँ ही नहीं दीं, उनपर थूका ही नहीं अपनी गुलेलों से उन्हें घायल भी कर दिया। मोहल्ले के सारे बच्चे तो पहले ही उनके घर खेलने आने से डर के मारे बचते थे, अब तो सबने ही तौबा कर ली है।

पता नहीं ईर्ष्यालु भाई अब क्या सोच रहा है? उसके अपने घर के ही इतने लोग इन उद्दंडों के हत्थे चढ़ते जा रहे हैं कि उनका अपना जीना हराम हो गया है। हाल में ही उनकी एक लाडली बिटिया को ही उन्होंने मार दिया था। शायद वह कभी न कभी निर्णय ले ले व उद्दंड बच्चों को सजा के रूप में एक अंधेरे कमरे में बंद करना चाहे। परन्तु लगता है कि जब वह ऐसा करना चाहेगा तो उद्दंड बच्चे उसे ही अंधेरे कमरे में बंद कर देंगे। देखें क्या होता है। स्थिति तो बहुत चिंताजनक होती जा रही है।

वहीं एक और गड़बड़ हो गई । जब सौतेले व्यवहार से तंग आकर कुछ बच्चों ने अपना अलग घर बना लिया था तब कुछ उद्दंड बच्चे भी उनके साथ उनके घर रहने आ गए। अब उन्होंने वहाँ भी अपना जाल फैला लिया है। वहाँ से भी वे पड़ोस पर पत्थर फेंकते हैं, गुलेल चलाते हें व आग लगाते हैं। हाल में ही उनमें से कुछ ने अपने ही घर में आग लगा दी और बहुत से परिवार के सदस्यों को मार डाला। वहाँ के भी हाल खराब हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब तक शान्त बैठे पड़ोसी के बच्चे भी पिटते पिटते तंग आ गए हैं। उनमें से कुछ को लगता है कि उन्हें भी उद्दंड बच्चों की तरह उद्दंड बच्चे बन पड़ोसी को उत्तर देना चाहिए। वहाँ के कुछ असंतुष्ट बच्चे भी उद्दंड बच्चों के मित्र बनते जा रहे हैं, कभी नाराजगी में तो कभी पैसे के लिए वे इनका साथ भी देते हैं और अपनी माँ का ही आंचल खींच, फाड़ देते हैं। अपने ही भाई बहनों पर गुलेल चला देते हैं। पिता को गाली देते हैं।

सारे मोहल्ले में स्थिति बिगड़ती जा रही है। किसी को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। सब परेशान हैं। दोनों भाइयों के घरों, भतीजे के घर व सारे मोहल्ले में ही असुरक्षा व्याप्त होती जा रही है। थोड़ी बहुत गल्तियाँ सब घरों ने की हैं। समझ नहीं आता क्या किया जाए क्योंकि हमारे पास मोहल्ला तो एक ही है यहाँ से कहीं और तो जा नहीं सकते। इसे ही सुधारने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं है। परन्तु सुधारें कैसे?

घुघूती बासूती