Monday, August 11, 2008
माँ
लावण्यमयी माँ
त्यागमयी माँ
गरिमामयी माँ
सौम्या माँ
साड़ी में लिपटी माँ
बिन्दिया वाली माँ
लम्बे काले बालों वाली माँ।
आज की सफेद बालों वाली माँ
बिन बिन्दिया वाली माँ
बिन चरयो वाली माँ
बिन चूड़ी वाली माँ
बिन बिछिये वाली माँ
हल्के रंग पहनने वाली माँ
बैंगन, उरद ना खाने वाली माँ
हल्दी कुमकुम में ना जाने वाली माँ
दाँए हाथ में मौली बँधवाने वाली माँ।
दुर्भाग्यवती माँ
पिताजी की पत्नी माँ
पिताजी के नाम से जानी जाने वाली माँ
पिताजी की पूर्व सौभाग्यवती माँ
पिताजी की विधवा माँ
मेरे भाई की माँ
मेरे भतीजे की दादी माँ ।
हाँ, मेरी भी माँ
मेरी माँ के रूप में ना जानी जाने वाली माँ
मेरी बच्चियों की भी नानी माँ
उनकी नानी के नाम से ना जानी जाने वाली माँ
मेरे नाना की बेटी मेरी माँ
मेरे मामा की बहन मेरी माँ
मेरी मौसियों की भी बहन मेरी माँ
उनकी बहन के नाम से ना जानी जाने वाली माँ।
आज जब मंदिर जाती हो
या जब घर में पूजा होती है
तो क्या आशीर्वाद देते हैं
पंडितजी तुम्हें माँ ?
क्या अचानक सौभाग्यवती भवः
की जगह बुद्धिमती भवः कहते हैं ?
या फिर कहते हैं चिरंजीवी भवः ?
पूरे जीवन इस आशीर्वाद के बिन
तुम जीयी और खूब लम्बी उम्र जीयीं
पिताजी तो चिरंजीवी भवः सुनते सुनते चले गए
और तुम सौभाग्यवती सुनते सुनते
दुर्भाग्यवती बन गईं।
तुम्हें पुत्रवती भवः के आशीर्वाद भी खूब मिले होंगे
किन्तु फिर भी तुम्हारी गोद में
मैं आ ही गई
तब तुम क्या रोई थीं माँ
या केवल उदास हुईं थीं ?
माँ, तुम्हारा तो नाम ही खो गया
याद नहीं कभी किसीने तुम्हें
तुम्हारे नाम से पुकारा हो
माँ, तुम्हारा तो व्यक्तित्व ही
पिताजी से था
क्या किसीने कभी तुमसे पूछा कि
तुम क्या चाहती हो ?
पढ़ना है या बालिका वधू बनना है
नौकरी करनी है या गृहणी बनना है
कितने बच्चों की माँ बनना है
माँ बनना भी है या नहीं
मैंने भी नहीं पूछा कि क्या
मैं तुम्हारी कोख में आ जाऊँ ?
बस आ गई।
और अब तुम्हारे जीवन के
ये अनुत्तरित प्रश्न मुझे कचोटते हैं
क्या ये सब प्रश्न
तुम्हारे मन में भी उठते थे?
या तुमने उनको दबाना सीख लिया था
या फिर उन्हें सुनना
अपनी ही आवाज को सुनना
बन्द कर दिया था
कभी कभी सोचती हूँ माँ
कि इक दिन शायद मैं भी
तुम सी हो जाऊँ
प्रश्न करना छोड़ दूँ
क्या प्रश्न करना छोड़कर तुम संतुष्ट हो?
क्या मैं संतुष्ट हो जाऊँगी
जब आँखें मूँदकर चलूँगी
पति से दस कदम पीछे
जब अपनी खोज करना छोड़ दूँगी
जब अपनी पहचान को ढूँढना छोड़ दूँगी
कुछ विक्षिप्त सी स्थिति होगी
जब खोए हुए स्वयं को
ढूँढना भी छोड़ दूँगी
एक मेरी निजता ही तो मेरी है
नाम किसी का
घर किसी का
पता किसी का
एक मैं ही तो मेरी अपनी हूँ।
घुघूती बासूती
Friday, August 08, 2008
वनफूल
नगरों में ना जी पाऊँगी,
तेरे कंक्रीट के उस वन में
मैं, वनफूल, न खिल पाऊँगी।
मैं तो हूँ घुघुति, चिड़िया पहाड़िन
तेरे मैदानों में न चहकूँगी
जलते, तपते उस देश में तेरे
मैं, वनफूल, कभी न महकूँगी।
मैं तो हूँ हिरणी उपवन की
तेरी काली सड़कों पर ना भागूँगी,
आपाधापी और भीड़ भाड़ में
मैं, वनफूल, कभी न रह पाऊँगी।
मैं तो हूँ जंगली फूल का पौधा
तेरे गमले में न बढ़ पाऊँगी,
तेरे उस फ्लैट की बाल्कनी में
मैं ,वनफूल, न मुसकाऊँगी।
मैं सुगन्ध मिट्टी की भीनी, सौंधी
काँच की बॉटल में न समाऊँगी,
तेरी मॉल व बहुमंजिला दुकानों में
मैं, वनफूल, न सुगन्ध बिखराऊँगी।
मैं अमरलता आम्रकुँजों की
नकली पेड़ों पर न लिपट पाऊँगी,
तेरी आलीशान सजी बैठक में
मैं, वनफूल, गुलदस्ता ना बन पाऊँगी।
मैं तो हूँ चंचल झरने की धारा
तेरे स्विमिंगपूल में न समा पाऊँगी,
तेरे महल की ऊँची दीवारों पर
मैं, वनफूल, बन तस्वीर न सज पाऊँगी।
मैं तो हूँ वनफूल पिया रे
तेरी महफिल में न सज पाऊँगी,
रह तेरी गगनचुम्बी अट्टालिका में
मैं, वनफूल, न इठला पाऊँगी।
घुघूती बासूती
Wednesday, August 06, 2008
ज्वलनशील नारियाँ
नारियों के,
भारतीय नारियों के जलने पर
क्यों अफसोस है
वे तो सदा से ज्वलनशील रही हैं
उसमें न हमारा कोई दोष है,
नहीं तो कोई
उसके जीवित जलने की कल्पना
भी कैसे करता?
तब, जब हम चला रहे थे
अग्नि बाण
जब उत्कर्ष के चरम पर था
हमारा इतिहास
तब भी माद्री बन रही थी
जीवित मशाल।
तब जब हम थे भाग रहे
मुगलों से मुँह छिपा
जब पतन की गर्त में था
हमारा इतिहास
तब भी हम गौरान्वित थे,
क्या हुआ जो हम
न बचा सके अपनी
बेटियों की लाज,
ब्याह रहे थे उन्हें मुगलों से
पाने को कुछ स्वर्ण ग्रास
तब भी पत्नियाँ तो थीं हमारी
सीता, सती व सावित्री
कूद रहीं थीं पद्मिनियाँ
जलने को जौहर की आग में।
फिर जब बन रहे थे
पढ़ अंग्रेजी
जैन्टलमैन बाबू हम
तब भी इन ज्वलनशील नारियों
ने डुबाया था नाम देश का
आना पड़ा था इक
राजा राममोहन रॉय को,
जब भी कोई भद्र
मरणासन्न बूढ़ा खोलता था
करवा कन्यादान
किन्हीं नन्हीं बालाओं के
माता पिता के स्वर्गद्वार
तब उसके मरने पर
बैठ जातीं थीं चिता पर
ये नन्हीं बालाएँ
प्यार में उस वृद्ध के।
आज जब हम
दौड़ में बहुत आगे हैं
हमने आइ टी में रचा है
इक नया इतिहास
तब भी क्या करें
ये ज्वलनशील नारियाँ हमारी
कभी भी
इक माचिस की तीली की
छुअन से जल जाती हैं,
हम नहीं चाहते परन्तु ये
न जाने क्यों भस्म हो
जल मर जाती हैं?
हम भी तो हैं फूँकते
न जाने कितने अरब
सिगरेट और बीड़ियाँ
क्या जली है मूँछ भी
कभी गलती से हमारी आज तक?
फिर न जाने क्या गलत है
डी एन ए में
भारतीय ही नारी के
क्यों ज्वलनशील है वह
हम नहीं हैं जानते।
घुघूती बासूती
Tuesday, August 05, 2008
शब्द जादुई हुआ करते हैं
समझने वाले के लिए,
केवल एक आवाज होते हैं
न समझने वाले के लिए,
एक आह्वान भी हो सकते हैं
आतताइयों से लड़ने को,
एक नारा भी हो सकते हैं
चुनाव लड़ने को,
एक मरहम भी हो सकते हैं
चोट खायों के लिए,
एक गाली भी हो सकते हैं
किन्हीं दुर्भाग्यवानों के लिए,
जीने मरने का कारण
वे बन सकते हैं,
मरते हुए को
जिला सकते हैं,
शब्द जादुई हुआ करते हैं।
घुघूती बासूती
राजेन्द्र राजन की एक कविता 'शब्द वही हो तो भी' पर टिप्पणी ।
Saturday, August 02, 2008
‘गंदा बच्चा’
मैं और मेरी सहेली लगभग सदा साथ रहते थे। एक बार हम मेरे घर की ओर जा रहे थे। हम आपस में बात कर रहे थे जिसमें ‘गंदा बच्चा’ शब्द आया। सामने से एक लम्बा सा, बच्चा ना दिखने वाला, लड़का आ रहा था । वह हमसे उलझ गया कि वह गंदा बच्चा नहीं है। हमने कितना कहा कि तुम्हें नहीं कहा परन्तु वह तो अड़ गया कि उसे ही कहा है। जब वह बिल्कुल नहीं माना तो मैंने कहा, "ठीक है, तुम्हें ही कहा था । अब क्या किया जाए ?" उपाय तो उसके भी पास कोई नहीं था। वह भन्नाता, झल्लाता अपने रास्ते, जो हमारे रास्ते पर ही पड़ता था, चला गया।
स्वाभाविक है कि उसके बाद से उसका नाम हमारे लिए गंदा बच्चा ही हो गया। उसको देखते से ही मन में यही शब्द आता था। यदि वह मुझे या मेरी सहेली को कभी दिखता तो हम कहते कि आज गंदा बच्चा दिखा था। हम ही क्या हमारी अन्य सहेलियों के लिए भी उसका यही नामकरण हो चुका था। दूर से भी कोई उसे आता देखता तो एक दूसरे को बता दिया जाता कि गंदा बच्चा आ रहा है।
एक बार हमारे कॉलेज में मेला था। हम सबके पास अलग अलग स्टॉल थे। लड़कियों के कॉलेज में मेला हो और शहर भर के लोग ना आएँ यह कैसे हो सकता था ? खूब भीड़ जमा थी। मेरी सहेली का घर पास ही था और उसके पास स्कूटी भी थी। सो जब किसी चीज की आवश्यकता पड़ी तो वह अपने घर से लाने के लिए स्कूटी पर चली गई।
रास्ते में एक राउन्ड एबाउट, ट्रेफिक आइलैंड पर स्कूटी घुमाने पर उसकी स्कूटी फिसलकर, स्किड हो गई। उसकी बाँह , घुटने आदि भी छिल गए और कपड़े गंदे हो गए व घुटनों से पैन्ट्स फट भी गईं। जब वह गिरी तो एक व्यक्ति उसे उठाने आया। उसने सहेली की स्कूटी पकड़ ली और स्कूटी को साथ लेकर उसको घर तक छोड़ आया। हाँ, आपने सही अनुमान लगाया, यह और कोई नहीं वही गंदा बच्चा था।
शायद उसने सच में यह सोचा कि हम उसे गंदा बच्चा कह रहे हैं या शायद हमसे बात करने के लिए उसने यह बहाना बनाया, पता नहीं। परन्तु जो भी हो वह एक अच्छा व्यक्ति था।
घुघूती बासूती