Monday, June 30, 2008

फिर से नाच रहा है मोर

फिर से नाच रहा है मोर
चिरप्रतीक्षित वर्षा ॠतु आई है,
मैंढक मिलकर शोर मचाते
ले जल काली बदरी आई है।


गरज रहे हैं बादल काले
चमक रही नभ में बिजली है,
सूर्य जा छिपा बादल के पीछे
सतरंगी रंग नभ में छाए हैं।


चिहुँक रहे हैं पंछी सारे
भंवरे भी आज बौराए हैं,
खिल रही हैं सारी कलियाँ
तितली ने रंग बिखराए हैं।


हरित प्रहरी से वृक्ष झूमते
मादक सुमन सुगन्ध छाई है,
हर मन हो रहा आज बाँवरा
सावन ने प्रणय धुन बजाई है।


रिमझिम पड़ती बौछारों से
नई कोंपलें चहुँओर उग आईं हैं,
धरती का आँचल हरा हो गया
अम्बर ने नए वस्त्र पहनाए हैं।


पंख फैलाकर मोर नाचता
मोरनी को उसे लुभाना है,
झूम झूमकर नाच नाचकर
प्रिया को आज रिझाना है।


घुघूती बासूती

पुनश्चः वर्षा पर एक और कविता .....वर्षा तुम जल्दी आना

घुघूती बासूती

Sunday, June 29, 2008

मेरा एवरेस्ट

बहुत ही बाली उम्र से

थी पाने की तमन्ना

अपने उस एवरेस्ट को,

सुबह उठने से सोने तक

सामने कुछ नज़र आता था

तो बस वह एवरेस्ट था,

नींद भी आती थी तो बस

उसके ख़यालों के ही साथ,

नींद में भी सपनों में वही

रचा बसा होता था मेरे।

माँ ने टोका,

जानती हूँ मैं प्यार तुझे है

उस एवरेस्ट से,

पर कठिन है डगर

रास्ते में आएँगे तूफान,

जानती हूँ तेरा मैं साहस

चाहेगी जो पा ही लेगी तू ,

परन्तु सोच ले कि

चाहता है तेरा आना

क्या तेरा एवरेस्ट भी ?

जाना ही यदि है तो जा

कर ले पूरी तैयारी,

यूँ ही नहीं जाते हैं

करने विजय एवरेस्ट पर।

पिताजी ने रोका,

नहीं है ये एवरेस्ट तेरे

किसी भी काम का,

मंजिलें और भी बहुत हैं

उन पर चलेगी तो

सफलता चूमेगी तेरे पाँव को,

गिना दिये उन्होंने नाम

कुछ इच्छित चोटियों के।

दीदी ने समझाया,

उम्र तेरी कम बहुत है

और एवरेस्ट दूर है,

ना जिद कर ओ पगली

यह राह नहीं तेरी देखी,

चुन ले तू अभी

कोई सरल सी चोटी,

पाँव मज़बूत हो जाएँ

तो फिर करना

नज़र उस ओर तू ,

फिर भी चाहेगी जाना

तो हम भी चलेंगे

कुछ राह तेरे साथ में।

मन ने समझाया,

मन ने बहलाया,

कभी रुलाया,

झुनझुना थमाया,

भय दिखाया,

बहुत मनाया।

परन्तु ना मानी मैं,

चलती चली गई,

चढ़ती ही गई,

टूटती साँसों से,

भरती आँखों से,

नाक की सीध में

बस चलती चली गई,

रास्ता भी ले ही गया

मुझे मेरे एवरेस्ट तक।

क्या हवा थी

(क्या सच में हवा थी?)

क्या दृष्य था ?

जम रहा रुधिर था मेरा

जम रही हर साँस थी,

पाँव मेरे घायल हुए थे

हाथ मेरे सुन्न थे,

आ गई थी मैं

एवरेस्ट पर अपने

अब और क्या था चाहिए।

सबकुछ तो सपने सा था

(या ऐसा सोच मन को भरमाया)

प्रसन्नचित्त थी मैं,

लगता था फूल बरसा

रहे थे नभ से तारे सब,

बिखरी चाँदी चहुँ ओर थी

चुँधिया रहीं थीं आँखें,

चुँधियाई आँखों से रही

देख होते सपने साकार।

झपकाईं आँखें थीं मैंने

देखा ऊपर से सब संसार,

घोर अकेली हो गई थी मैं

कहीं नहीं था पहचाना संसार,

कुछ पल का था उजियाला

फिर हुआ भयंकर अंधकार।

देर से जाना मैंने

एवरेस्ट वही था,

मैं वही थी,

चाहत वही थी,

पर यह नहीं था

एवरेस्ट सपनों का मेरे।

राशन पानी सब चूक गया था

पाँवों की शक्ति भी चूक गई थी,

आँखों की ज्योति क्षीण हुई थी

अब ना देख पाती कोई चोटी

ना कोई मैं घाटी ही और,

यहीं बैठकर सुस्ताती हूँ मैं

यहीं बैठकर जम जाती हूँ मैं,

साँसें कुछ कुछ रुक गईं हैं

आकांक्षाएँ सारी बर्फ हुईं हैं,

देख रही हूँ हाथों की रेखाएँ

क्या इनको ही मैंने बदला था।

यह क्या,

ये हिम कंकड़ हैं कैसे

हा, पहले आँसू हैं ये जीवन के

पर ये ना बने हैं मोती

ना इन्हें किसी ने पोछा

शिरोधार्य करती हूँ

ये एवरेस्ट की भेंट मैं ।

घुघूती बासूती

Friday, June 27, 2008

पानी

डूब रही हूँ गहरे काले पानी में
गहरा,काला,गंधाता,गंदला पानी
रोके हुए हूँ साँसों को
मृत सा कर दिया है चेतना को
पकड़ रही हूँ तिनकों सा सड़े पानी को
फिसल रहा है हाथों से तिनकों सा
वही गहरा,काला,गंधाता,गंदला पानी।


परन्तु इस दशा में भी प्रश्न
वही शत्रु प्रश्न आता है मन में
क्या डूबते हुए भी
क्या बिल्कुल मरते हुए भी
नाक में भरे होने पर पानी के
क्या सूँघा जा सकता है गंधाए हुए पानी को?


शायद हाँ,या शायद ना
परन्तु मेरी तो रग रग में
भर रही है जो यह गंध
उसे तो झुटला नहीं सकती मैं।

पानी जो जीवन है
पानी जो शीतल भी है
पानी जो मुझमें व तुममें भी है
क्यों वह ही जीवन देने की बजाय
गंधाने लगता है
डुबाने लगता है
सतरंगी या बेरंगी होने की बजाय
क्योंकर वह काला हो जाता है?


इसी पानी में तो था कभी नशा कितना
इसी पानी ने कभी निखारा था मुझे
इसी पानी में कभी निहारा था मैंने स्वयं का चेहरा
यही पानी आज क्यों है विष से बुझा?


डूब तो रही हूँ
परन्तु चाहूँगी पाना डूबने से पहले
अपने सारे प्रश्नों के पानी से उत्तर
वही पानी जो कभी कलकल कर गाता था गीत कई
वही पानी जो शीतलता से लुभाता था कभी
वही पानी जो नशे में अपने डुबाता था कभी
वही पानी जो छुअन से अपनी
इक कंपन सा दे जाता था
वही पानी जो निखारता था कभी
जिसमें देख स्वयं का प्रतिबिम्ब
कभी कितना था इतराया मैंने।


आज जाते जाते, डूबते उतराते
मुझे बता दे ओ पानी,
कहाँ छिपाया था तूने यह रूप अपना?
क्यों न दिखाया यह रूप तब जब
मोहित हो समाई मैं तेरे बाहुपाश में
या फिर आज भी छिपाए ही रहता
मैं यूँ ही जी लेती भ्रांतियों में
कुछ तो बता दे मुझे मेरे जाने से पहले
क्यों सिखाया तूने मुझे पीना तुझको
क्यों बुलाया तूने पहलू में मुझे अपने?


घुघूती बासूती

Thursday, June 26, 2008

पति पत्नी की लड़ाई में कोई क्या करे?

उसका फिर फोन आया। दो साल से आता ही रहता था। हर बार इधर उधर की बात करने के बाद केवल एक ही बात कहती थी, मैडम आपसे बात करनी है। हाँ करो ना, मैं सुन रही हूँ। सब ठीक तो है ना! हाँ ठीक है। मैं एक दिन आऊँगी आपके पास। फिर वही घुमा फिराकर स्कूल की बातें। सदा यह लगता रहता था कि कुछ कहना चाहती है। एक दिन घर आई भी तो तब जब मैं हाथ में ताला लिए दरवाजे से बाहर जा रही थी। कम्पनी के मेहमान चाय पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। घर आई मेहमान को जाने दूँ या कम्पनी में आए मेहमानों को प्रतीक्षा करवाऊँ? दोनों ही स्थितियां गलत थीं। फिर भी आओ अन्दर आओ कहकर पानी पूछा। क्या बात है? कैसे आना हुआ? देखो मुझे बाहर जाना है, फोन करके आतीं तो यह न होता। थोड़ी देर बात कर सकती हूँ। तभी गेस्ट हाउस से फोन आ गया। मेहमान खाने की मेज पर पहुँच मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।


वह जानती है इन मेहमानों के महत्व को। सो बोली कोई बात नहीं, आप जाइए, मैं फिर आऊँगी। फिर भी मैंने कहा ,मैं कार मंगवा दूँ घर छुड़वाने को? मुझे लगता है तुम्हें कुछ आवश्यक बात करनी है। इन मेहमानों के जाते ही मुझे फोन करके बात करने आ जाना।


बात आई गई हो गई। वह फिर नहीं आई। फोन पर कभी कभी बातें होती रहीं। सदा लगता था कि वह कुछ कहना चाहती है। एक दो बार उसके घर भी गई। परन्तु सदा कोई ना कोई पड़ोसिन मुझे आया देख मिलने को पहुँच जाती। हमारे भी घर आइए कहकर खींचकर अपने घर भी ले जाती। जहाँ हम रहते हैं वहाँ के कुछ अलिखित नियम होते हैं। अपना व्यवहार सबसे समान रखना होता है। किसी विशेष व्यक्ति से मोह, प्रेम नहीं दिखा सकते। यदि एक के घर गए तो सबके घर जाना चाहिए। सो किसी के घर केवल सही अवसर पर ही जा सकते हैं, जैसे, किसी खुशी या दुख में, या किसी के बीमार होने पर। या फिर जब उसने कई लोगों को अपने घर बुलाया हो, कोई जन्मदिन, हल्दी कुमकुम या फिर भजन कीर्तन, कथा आदि के लिए। अन्यथा जब उसके पति की अगली पदोन्नति होगी तो उसका श्रेय उसके काम को ना मिलकर मित्रता को दिया जाएगा।


फिर दो तीन महीने पहले उसका फोन आया। उस बार मैंने स्वयं कहा कि देखो तुम कुछ कहना चाहती हो। हर बार नहीं कह पाती। इस बार कह ही दो। तब उसने बताया कि वह अपने पति से परेशान है। सुनता नहीं, झगड़ा करता है, आरोप लगाता है, हर समय लड़ने पर उतारू रहता है। बच्छी के सामने लड़ाई करता है। बच्ची उसकी बेहद कमजोर व बीमार सी रहती है। मैंने भी ध्यान दिया था कि वह कुम्हला गई है। अब कारण समझ आया। लड़ाई क्यों होती है पूछने पर उसने कहा कि कारण वह भी नहीं जानती। वह पूछती रहती है कि उसकी गल्ती क्या है परन्तु वह बताता नहीं। मैंने पूछा हाथ तो नहीं उठाता ना। तो वह बात गोल सी करती हुई बोली कि नहीं परन्तु खींचना, हाथ मरोड़ना, धक्का आदि देता है, कि उसकी बाँहों में नील पड़ जाते हैं। मुझे क्या करना चाहिए तो पता नहीं था। परन्तु पूछा कि साथ रहना चाहती हो या अलग हो जाना। तो बोली क्या करूँ समझ नहीं आता। मैंने पूछा घर में बात की है, अपने माता पिता व उसके माता पिता को बताया है तो वह बोली हाँ। क्या वे लोग तुम्हारी सहायता करेंगे, पास रखेंगे पूछने पर बोली माता पिता रखेंगे। मैं क्या कहूँ समझ नहीं आ रहा था। उससे कहा कि हाथ मत उठाने दो। रोक लिया करो। कह दो कि हाथ उठा तो तुम कानूनी कार्यवाही करोगी। नौकरी मत छोड़ना। आगे की जो तुम पढ़ाई कर रही हो वह जारी रखना। लोगों से मिलती रहो, क्लब आओ, अपना व बेटी का ध्यान रखो, झगड़े से बचो। जिन कारणों से झगड़ा होता है उन कारणों को हटाने क कोशिश करो। बेटी के सामने झगड़ें तो बोलना कि बाद में बहस करना, बच्ची के सामने नहीं।


कल फिर फोन आया। वह गर्भवती है। दुर्घटना हुई है। वह ससुराल व मायके गई थी। वहीं पता चला। वहाँ सबने गर्भ गिराने से रोक लिया। यहाँ होती तो कुछ कर पाती। अभी भी एक माह तक और यह किया जा सकता है। वह बोली कि वहाँ भी लड़ाई होती थी। तलाक देने को कह रहा था। माता पिता ने पहले तो भेजने से मना किया परन्तु ऐसा कुछ नहीं होगा व तलाक की बात गुस्से में कही कहकर उसने वापिस बुला लिया। वह बोली कि मैं खाना बनाती हूँ और वह खाना नहीं खाता, बाहर खा आता है। मैंने कहा बाहर खाता है तो खाए। तुम स्वयं खाओ व बच्ची को खिलाओ। हाथ मत उठाने दो। तलाक की बात अच्छे से कर लो। वह अपना निर्णय ले ले। यदि तलाक की बात करनी है तो बच्चे को संसार में लाने को मना करो। यदि मारपीट करना चाहे तो घर से बाहर चली जाओ। ताकि बात सब तक पहुँच सके और फिर कोई कार्यवाही की जा सके। वह कहती है कि उसकी कोई दीदी वकील है सो मैंने कहा उससे ही सलाह करो व पति की उससे बात करवाओ। मैंने घरेलू हिंसा कानून के बारे में भी उसे दीदी से बात करने को कहा। परन्तु यह सब तो तब की बात है जब कोई विवाह तोड़ने का मन बना चुका हौ। जबर्दस्ती तो कानून का भय दिखाकर कोई किसी के साथ जीवन नहीं निर्वाह कर सकता।


अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे में कोई क्या कर सकता है। ध्यान रहे मैं समाजसेविका नहीं हूँ। न ही कानून जानती हूँ। जब तक वह खुलकर न कहे और पति को यह ना बता दे कि उसने मुझसे बात की है तब तक उसके पति से इस विषय पर बात नहीं कर सकती। मेरा कोई अधिकार नहीं है। यदि वे घर से बाहर कोई तमाशा नहीं करें तो मेनेजमेंट भी कुछ नहीं कह सकता क्योंकि यह उनका निजी मामला है। सबसे बड़ी बात यह है कि मैंने केवल उसका पक्ष सुना है। उसके पति का अपना पक्ष होगा जो मैं नहीं जानती। स्त्री है, दुखी है अतः मुझे भी दुख है, परन्तु बिना पति की बात जाने उसे अपने मन में कसूरवार भी घोषित नहीं कर सकती। बाहर से देखने में वह भला मानस दिखता है व उसका सबसे अच्छा व्यवहार है। परन्तु कोई व्यक्ति बाहर के जीवन में क्या है और अपने परिवार, विशेषकर पति /पत्नी से कैसा व्यवहार करता है यह कोई नहीं जान सकता। यह बात केवल भुक्तभोगी ही जान सकता है।


असमंजस में हूँ।


घुघूती बासूती

Wednesday, June 25, 2008

एक मित्र ऐसा भी !

मैंने अपनी पिछली पोस्ट में घुघूता जी की तबीयत खराब होने की बात कही थी। जब मेरे एक स्कूल के मित्र को यह पता चला तो उसने तुरन्त फोन किया। फोन घुघूता जी ने ही उठाया । उनसे उनका हालचाल पूछने के बाद उसने मुझसे बात की। कहाँ दिखाने के लिए ले जा रही हूँ पूछा। अहमदाबाद बताने पर कहा कि यदि मेरी आवश्यकता है तो निसंकोच बता दे। मैं कल तुम्हारे वहाँ पहुँचने तक वहाँ पहुँच जाऊँगा। अपने को अकेला मत महसूस करना। मेरे न कहने पर बोला, ठीक है, वहाँ जाकर हालचाल बताती रहना व जब भी लगे कि किसी की आवश्यकता है तो मुझे बुला लेना। उसने यह भी कहा कि हमारी कक्षा का एक दूसरे सेक्शन का सहपाठी एक बड़े हस्पताल में हृदय रोग विभाग का हैड है, यदि कहो तो उसके पास ले चलेंगे।


अहमदाबाद जाकर यहाँ के डॉक्टर के कहे अनुसार सी टी एन्जिओ करवाया। उसमें बहुत सारे ब्लॉक नजर आए। हृदय रोग विशेषग्य के पास गए तो उन्होंने एन्जिओग्रेफी करवाने को कहा। सी टी एन्जिओ से तो यही लग रहा था कि बाइपास ही करवाना होगा। सो अहमदाबाद के सबसे अच्छे हृदय सर्जन की खोज आरम्भ हुई। मधुमेह भी बढ़ जाने के कारण उसके विशेषग्य से भी मिले। एन्जिओग्रेफी करवाई तो डॉक्टर बोले बहुत अच्छा समाचार है केवल दवाइयों व जीवनशैली में बदलाव की आवश्यकता है। यह कहकर वे चले गए। जब रिपोर्ट मिली तो उसमें लिखा था जल्दी बाइपास करवाया जाए। हृदय का एक चित्र बना था जिसपर यहाँ १००%,वहाँ ७०% तो कहीं फिर १००% तो कहीं और ३०% ब्लॉक दिखाए गए थे। मैंने हाउस सर्जन से जाकर पूछा कि रिपोर्ट आपने तैयार की है तो वह बोला हाँ। तो बाइपास करवाना है क्या? वह बोला हाँ। मैंने कहा कि मुझे तो विशेषग्य ने कहा था कि उसकी आवश्यकता नहीं है। वह बोला नहीं मुझे कहा गया है कि सर्जरी का दिन निश्चित करना है। अब मैं परेशान ! कहा कि विशेषग्य को फोन करके पता करो। कुछ समय बाद वह एक नई रिपोर्ट लेकर आया। बोला कि पहली रिपोर्ट में गलती से किसी और के बाइपास की बात लिख दी थी। आपका नहीं होगा। फिर भी १००%,वहाँ ७०% तो कहीं फिर १००% तो कहीं और ३०% ब्लॉक तो मुझे नजर आ ही रहे थे सो विशेषग्य को फोन किया। वे बोले अभी मैं समय नहीं दे सकता फोन पर ही बता सकता हूँ कि सब ठीक है। मेरे समय माँगने पर अगली शाम का समय दिया।


अगली शाम तक इस स्थिति में प्रतीक्षा कर पाना कठिन था। सो घुघूता जी के अहमदाबाद दफ्तर जाकर सब रिपोर्ट्स के ज़ैरोक्स तैयार करवाए व अपने डॉक्टर व एक मित्र के पुत्र डॉक्टर के पास भेजने लगी। तब तक मित्र का फोन आ गया। अपनी समस्या बताई तो उसने कहा कि तुरन्त सब रिपोर्ट्स ई मेल से डॉक्टर सहपाठी को भेजो। वह उसे फोनकर देखने को कहेगा। वही किया। उससे पहले कि हमारे भेजा कुरियर किसी अन्य को मिलता उस सहपाठी जिसको मैं पहचानती भी नहीं थी का रात को संदेश आया, सब ठीक है। इलाज व दवाइयाँ भी। मित्र का भी फोन आया कि वह सहपाठी के पास जाकर सब बात करके आया है और चिन्ता की बात नहीं है।


अगले दिन जाकर विशेषग्य से मिले तो उन्होंने सबकुछ समझाया। खैर,जिसका काम उसी को साजे...।
परन्तु सोचती हूँ कि रिपोर्ट देते समय वे स्वयं रहते तो अकारण चिन्ता नहीं करनी पड़ती। परन्तु जितने मरीज आजकल हैं तो डॉक्टरों के पास समय ही कहाँ है?


विशेष बात यह है कि यह मित्र मुझे ३५ साल बाद दो साल पहले दिल्ली में मिला था। स्कूल छोड़ने के बाद पहली बार ! हमारा स्कूल रियुनियन था सो उसने मेरी उस एकमात्र स्कूल की सहेली जिससे मैं अब भी सम्पर्क में थी मेरा फोन नम्बर लेकर बात की। फिर दिल्ली में मिलने आया और लगता ही नहीं कि अब हमें स्कूल छोड़े ३७ साल हो गए हैं। वही स्कूल के दिनों का स्नेह है। जहाँ हम स्कूल को छोड़कर आए थे लगता है जैसे उतने वर्षों में कुछ नहीं बदला । अब बहुत से स्कूल के मित्रों व सखियों से सम्पर्क बन गया है। स्कूल के मधुर व मासूम दिन याद आते हैं। बस बाल सफेद हो रहे हैं,चेहरे प्रौढ़ हो रहे हैं, हम वैसे के वैसे ही हैं।


एक और मित्र जिसके लिए आना लगभग असंभव था वह भी यदि आवश्यकता हो तो आने को कह रहे थे। एक बच्चा जो नेट पर ही मुझे मिला और कई साल से मुझे माँ कह रहा है वह भी लगातार पता करता रहा। वह भी हर प्रकार की सहायता करने को कह रहा था।


मुझे बहुत से ब्लॉग जगत के मित्रों के संदेश व पति के स्वास्थ्य लाभ के लिए शुभकामनाएँ पिछली पोस्ट पर मिली थीं। मैं उन सबकी बहुत आभारी हूँ। कठिन घड़ी में यह स्नेह ही सबसे बड़ा सम्बल होता है।


घुघूती बासूती

Sunday, June 15, 2008

केवल कुछ मन के उद्गार और कुछ भी नहीं !

संसार में इतने अच्छे लोग भी हैं, जानकर एकबार फिर जीने को मन होता है। मनुष्यता पर विश्वास जागता है और लगता है कि जीने में कोई बुराई नहीं है। ठीक है कि हत्याएं होती हैं , कि पिता पुत्री को मारता है, कि पिता पुत्री से व्यभिचार करता है, कि जन्म से पहले बेटियाँ मार दी जाती हैं, परन्तु फिर भी संसार में भले लोग अभी भी शेष हैं, क्या यह जीने के लिए काफी सहारा नहीं है?


मैं एक बहुत ही छोटी जगह रहती हूँ। लगभग १२५ परिवार, या ५०० लोग हैं यहाँ ! शेष लोग गाँवों या पास के शहर से काम करने आते हैं। परन्तु हममें स्नेह है। पति का पद ऐसा है कि मुझे मैडम शब्द से नवाज़ा, जाता है। मुझे यह बिल्कुल गवारा नहीं है। कहती रहती हूँ कि भाभी या दीदी कहिये। या फिर नाम से पुकारिए। पति का पद तो जब तक है तब तक है, परन्तु मेरा नाम या श्रीमती घुघूता तो सदा ही रहेगा। पद तो आते जाते हैं।


गुरूवार से मेरे पति की तबीयत ठीक नहीं है। शायद कुछ हृदय रोग ने पकड़ा /जकड़ा है। इस छोटी सी जगह में कोई एम बी भी एस डॉक्टर आने को तैयार नहीं होता। यदि कोई रिटायर्ड डॉक्टर भी आने को तैयार हो तो हमारा अहो भाग्य हो। खैर,पास के शहर या कहें कि कस्बे में थोड़ा बहुत इलाज हो जाता है परन्तु गम्भीर समस्या के लिए ४ घंटे दूर राजकोट या ८ घंटे दूर अहमदाबाद ही जाना पड़ता है।


गुरूवार को पति को पास के शहर जाना पड़ा। वहाँ केवल ई सी जी की सुविधा है। डॉक्टर तो बहुत अच्छे व भले हैं परन्तु जब उनके पास उपकरण ही ना हों तो वे क्या कर सकते हैं!


क्या आप विश्वास करेंगें कि वे फीस लेने में आनाकानी करते हैं?मुझे कोई ना कोई नया तरीका अपनाकर किसी तरह उनका उपकार चुकाना पड़ता है। तरीका अपने घर से दो तीन बार १० किलो बढ़िया केसर आम की पेटी हो सकती है,या फिर अपने नववर्ष की पार्टी में निमन्त्रण या फिर सबसे सरल तरीका उन्हें अपनी मित्रता व प्रेम देना हो सकता है!आप शहरियों के पास सब साधन हो सकते हैं, किन्तु क्या आपके पास ऐसे मित्र डॉक्टर हो सकते हैं? हर बार वे यही कहते हैं कि फीस देकर मुझे क्यों शर्मिंदा करती हो? जानती हो ना कि आप लोगों की मित्रता मेरे लिए क्या मूल्य रखती है!

कल (यह तो आज ही हो गया!) हम अहमदाबाद के लिए निकल रहे हैं। हमारे डॉक्टर ने सोमवार को एक बड़े हॉस्पिटल में समय ले रखा है। जानते हैं कि उन्होंने क्या किया? हर मरीज को भेजने के लिए डॉक्टर को १००० रूपए मिलते हैं। वे फोन पर ही कह देते हैं कि यह छूट मेरे मरीज को दे देना मुझे नहीं!

मेरा उनसे वास्ता करीब पौने चार साल पहले पड़ा था। तब हम यहाँ नए नए आए थे। मुझे जॉइन्ट सेल आर्टराइटिस हो गया था। पति अपनी फैक्ट्री में मैजर रिपैर्स में इतने व्यस्त थे कि मुझे स्वयं ही सब कुछ सम्भालना पड़ा था। उन्हें पता भी नहीं चला कि कब मुझे इलाज के लिए भागना पड़ा। तबसे वे मेरी चिकित्सा कर रहे हैं। स्नेह का नाता ऐसा बना है कि पैसे का नाम लेते ही वे बौखला जाते हैं। तब ही उन्होंने मुझे बताया था कि वे जानते हैं कि कष्ट क्या होता है। उनके छोटे पुत्र को जन्मजात कोई बीमारी है । जब वह गर्भ मे् ही था तब उन्हें व उनकी पत्नी को बच्चा गिराने की सलाह दी गई थी। परन्तु वे उसे इस संसार में लाए व अपने प्रेम व अथाह सेवा व इलाज से उसे आज लगभग पूरा ठीक कर चुके हैं।

मैं भगवान में तो विश्वास नहीं करती परन्तु मनुष्य की अच्छाई में पूरा विश्वास करती हूँ। केवल यही कामना करती हूँ कि कोई चमत्कार हो जाए,कोई धनवान हमारे पास के छोटे से कस्बे में एक बड़ा सा हस्पताल बनवा दे और हमारे मित्र डॉक्टर की निगरानी में लोगों का इलाज हो सके। हम तो कार लेकर अहमदाबाद इलाज के लिए चले जाएँगे(मेरा सौभाग्य कि इतना समय हमें मिला ),परन्तु बहुत से लोगों के पास न तो इतना समय होगा न ही इतनी सुविधा होगी। कल या परसों क्या होगा, नहीं जानती परन्तु पूरा विश्वास है कि सब ठीक ही होगा। मुझमें सबकुछ झेलने की क्षमता है। अपनी इच्छा शक्ति से हमारे लिए शुभकामनाएं भेजिए। उससे भी अधिक हमारे आसपास के मरीजों के लिए अच्छा इलाज हो यह शुभकामना भेजिए।


घुघूती बासूती

Thursday, June 05, 2008

क्या प्यार ऐसा होता है ?

क्या प्यार ऐसा होता है
अंधेरों में रास्ता दिखाता
जब तुम सोचो कि तुम्हारे
पैरों के नीचे से धरती
खिसकी जा रही है
तब तुम्हारे पैरों के नीचे
अपने हाथ को रखता
सहारा देता
पीठ थपथपाता
सराहता
गुनगुनाता
जब नींद ना आए
तो लोरी सुनाता
बहलाता
सहलाता
जब तुम दर्द से
चीखना चाहो
तब होंठों पर
मुस्कान बिखराता
दर्द पर मरहम लगाता
जलते मन पर
हिम का फाहा बन
बिछ जाता
टूटे हृदय के
टुकड़ों को सहेजता
जोड़ता
नया बनाता
जब मृत्यु की चाहत हो
तब जिजीविषा जगाता
जीने के कारण गिनाता
बिखरे सपनों को
फिर से बुनता
दुःस्वप्नों में बन
एक मुस्कान है आता
आँखों में बन चमक
छा जाता
बन वर्षा की बूँदें
वीरान जीवन की
बंजर धरती पर
बौछारों सा आता
प्रेम से नहलाता
जीवन सजाता
आशाएँ छिटकाता
भटकन में
राहें दिखलाता
प्यासी आत्मा को
बन सुधा बूँदें
तृप्त कर जाता
यदि प्यार यह सब है
तो प्यार ही
जीवन का अमृत है।

घुघूती बासूती

Tuesday, June 03, 2008

नन्नी कली सोने चली

कल आगाज़ पर सुरा बेसुरा में कुछ बेहद मधुर गीतों को सुन रही थी। कुछ गीत यादों में एक बहुत विशेष स्थान बना लेते हैं। इनमें से एक है ' नन्ही कली सोने चली। मेरी आवाज सदा से बहस, भाषण, वादविवाद के लिए सही रही है, गाने के लिए कभी नहीं। आवाज कितनी ही बुलन्द क्यों ना हो, कितनी ही बेसुरी क्यों न हो, शायद ही कोई माता पिता, विशेषकर माँ हो जिसने अपने बच्चे को लोरी न सुनाई हो। सो मैं भी अपनी दोनों बेटियों को लोरी सुनाती थी। बस वे ही यादें ताजा हो गईं।


बड़ी बेटी ने अपने जीवन के पहले २५ दिन केवल दिन में सोना उचित समझा और रात में जागना। रात को ठीक ९ बजे जाग जाती थी व सुबह ६ बजे सो जाती थी। २६वें दिन से उसने अपना दिन का सोने का कार्यक्रम भी रद्द कर दिया। अब केवल एक आध घंटे को दिन में दो तीन बार सो लेती थी। यह कार्यक्रम उसने तीन वर्ष की आयु तक चालू रखा। मेरे पड़ोस में ही हमारी फैक्ट्री के डॉक्टर रहते थे जो मेरी बिटिया की इस आदत का विश्वास नहीं करते थे। दिन भर तो उनकी पत्नी , हमारी व उनकी कामवाली उसे जागते देखती थीं व कई बार वे स्वयं भी। एक रात उन्होंने कहा कि आज रात मैं भी आपके घर आकर देखूँगा कि वह कैसे नहीं सोती है। जब उन्होंने देखा कि रात के बजे तक भी वह नहीं सोई तो उन्होंने उसे फिनारगन या ऐसी ही कोई दवा पिलाई उन्होंने एक उपन्यास उठाया और बेटी पर नजर रखना आरम्भ कर दिया। रात को तीन कॉफी पीकर उन्होंने स्वयं को जगाए रखा। जब सुबह के ५ बजे तक भी वह नहीं सोई तो बोले, 'भाभी अब मैं मान गया आपकी बात' और घुघूताजी, मुझे व सवा महीने की मेरी बिटिया से विदा लेकर अपने घर चले गए।

बिटिया सारी रात गोदी में रहना व चलते हुए हिलाए जाना पसन्द करती थी। डॉक्टर स्पॉक की बच्चों को पालने की पुस्तक उन दिनों बहुत प्रसिद्ध थी। परन्तु मैं कभी भी उनके तरीकों, याने बच्ची को रोते हुए तब तक के लिए छोड़ देना जब तक कि वह सो न जाए, का उपयोग नहीं कर पाई। मैं उसे सुलाने के लिए कन्धे पर उसका सिर रखकर चलते चलते थपथपाती थी और वह मुझे पीठ पर थपथपाती थी। यदि मैं गति तेज करती थी तो वह और तेज कर देती थी। मैं उसे लोरी सुनाती थी तो वह भी आआआआआ करके मुझे सुनाती थी। मेरे स्वर के साथ सदा स्वर मिलाकर ! साल सवा साल की हुई तो लोरी सुनाने को कहती और स्वयं खिलौनों से खेलती रहती। यदि सोने को कहो तो रोने लगती।

जब बड़ी बिटिया साढ़े तीन वर्ष की हुई तो छोटी बिटिया का आगमन हुआ। सोने में बहुत अधिक परेशान तो नहीं किया । उसकी सदा माँग होती ' नन्नी कली ' सुनाओ। मैं सुनाती तो वह सोने की बजाय टुकुर टुकुर मुझे देखती रहती और पूरा ध्यान रखती कि मैं कोई पंक्ति उल्टी सीधी या आगे पीछे तो नहीं गा रही, या जो पंक्ति दो बार गानी है वह एक बार में ही तो नहीं निपटा रही। एक गल्ती होने पर'नईं ऐसे नहीं'कहती। गल्ती का अर्थ होता था, एक बार फिर से शुरू से शुरू करना और ध्यान रखना कि इस बार कोई गल्ती हो।


आज भी जब उन दृष्यों को याद करती हूँ तो बरबस हँस पड़ती हूँ। बिटिया को आश्चर्य होता है कि मैं दो थप्पड़ क्यों नहीं लगा देती थी। परन्तु गोद में छोटी सी, कोमल सी टुकुर टुकुर ध्यान से देखती सुनती उस बच्ची पर कोई कैसे हा्थ उठा सकता था!

आज बार बार 'नन्नी कली' सुनते सुनते मैं एक बार फिर वे पल जी उठी।


घुघूती बासूती

Monday, June 02, 2008

मैं टिपिया नहीं सकती

मन तो बहुत होता है कि टिप्पणी दूँ, बहुत बार लिख भी देती हूँ, परन्तु पोस्ट नहीं कर पाती। जैसे ही 'टिप्पणी दो' पर क्लिक करती हूँ , 'यह पेज दिखाया नहीं जा सकता' आ जाता है। समस्या यह है कि यदि टिप्पणी लिख ली होती है तो जब तक वह अपने सही ठिकाने पर नहीं पहुँचती तब तक चैन नहीं आता। अब पता नहीं कि मेरा कम्प्यूटर नाराज है या मेरा नेट कनैक्शन। वैसे कभी कभार दस बीस बार कोशिश करने पर सफल भी हो जाती हूँ। वैसे जैसे स्थान पर मैं रहती हूँ वहाँ बैठकर नेट पर जा पाती हूँ यही संसार का आँठवा आश्चर्य है व भारत की प्रगति का सबसे बड़ा सबूत !

कुछ दिन पहले अनाम बन्धुओं ने कई ब्लॉग्स पर न जाने कैसी कैसी टिप्पणियाँ देना आरम्भ किया कि कई मित्र एक दूसरे को सलाह देने लगे कि टिप्पणी मॉडरेटर लगा दो। मैंने भी चुपचाप लगाने में ही भलाई समझी। मैं सदा से इसके विरुद्ध रही थी, सो बड़े बेमन से मॉडरेटर लगा तो दिया परन्तु जब अनुमति देने का समय आया तो अनुमति देना असम्भव हो गया। अनुमति पर क्लिक करते ही 'यह पेज दिखाया नहीं जा सकता' आ जाता। ब्लॉगर.कॉम पर जाने का यत्न भी लगभग व्यर्थ ही जाता है। आज तक मनुष्यों को एक्सपायर करते देखा सुना था परन्तु मेरा कम्प्यूटर तो जिस तिस पेज को भी 'एक्सपायर हो गया' कहता रहता है। मैं भी कुछ दिन अफसोस मनाती रही परन्तु अब आदत हो गई है सो कोई पेज या कोई ब्लॉग या टिप्पणी का पृष्ठ एक्सपायर हो जाए या स्वयं को दिखाने से मना कर दे, मैं सहज भाव से( 'आया है सो जाएगा,राजा,रंक फकीर' गुनगुनाते हुए ) सह लेती हूँ। वैसे याहू मैसेंजर भी नहीं खुलता व शायद वहाँ के मित्र सोचते हों कि मैं ही एक्सपायर कर गई !

अब तो यह हालत है कि यदि कभी बिटिया, उसका पति या मेरा कोई मित्र नेट पर मिल जाता है तो उससे ही कह देती हूँ कि जरा ये टिप्पणियाँ तो मॉडरेट कर देना। या फिर यदि जिसके ब्लॉग पर टिप्पणी करनी हो वह मिल जाए तो उस ही से कह देती हूँ कि भाई/बहन( बेटा/बिटिया) यह रही तुम्हारे हिस्से की टिप्पणी ! कई भले मानस तो जाकर अपने ब्लॉग पर चिपका आते हैं, कई नहीं। जब ब्लॉग नहीं खुलते तब भी यही होता है। मैं बता देती हूँ कि भलेमानस, तुम्हारा ब्लॉग खोलने की चेष्टा में हूँ। अच्छे व सहायक प्रवृत्ति के बच्चे अपना लेख ही गूगल टॉल्क पर चिपका कर पढ़वा देते हैं। शेष तो 'हम क्या करें' जैसा शायद मन ही मन बुदबुदा कर निकल जाते हैं।

वैसे कुछ दिनों में यह समस्या सुलझ जाएगी या फिर मैं स्वयं ही सुलझ जाऊँगी और ब्लॉगजगत को नमस्कार कर नेट से विदा ले लूँगी। देखिये कौन सुलझता है। फिलहाल तो मैं ब्लॉगर.कॉम को मनाने जा रही हूँ। शायद मान जाए और मेरी यह दुख भरी चिट्ठी/आप तक ले जाए।
रूठे रूठे ब्लॉगर.कॉम मनाऊँ कैसे..... गुनगुनाते हुए बाय ।

घुघूती बासूती

पुनश्चः इसका अर्थ यह नहीं कि आप टिप्पणी ना करें। सोचिये,मैं लोगों से टिप्पणी मॉडरेट करने को कहूँ और वे कहें,'कैसी टिप्पणी? यहाँ तो एक भी नहीं है।'बड़ी बेइज्जती खराब हो जाएगी। :(

घुघूती बासूती