गाली विमर्श से मुझे इस विषय से सम्बन्धित कुछ यादगार बातें याद आ रही हैं और कुछ प्रतिदिन की प्रतिक्रियाएँ।
पहले प्रतिदिन वालीः
पति किसी मनुष्य या वस्तु को साला कहता है। पत्नी कहती है , 'ओह, तो यह भी मेरा भाई है। क्या उसे साला कहने के पीछे भावना उसे मेरा भाई घोषित करने की है या उसकी बहन को अपनी पत्नी ?' स्वाभाविक है भावना दूसरी ही रहती है। इसके बाद वह अपने तरकश में से अगला तीर निकालता है जिसके अन्तर्गत वह जिसे गाली दे रहा है उसका सम्बन्ध उसकी बहन से स्थापित करता है। ठीक इससे पहले वह उसे अपनी पत्नी का भाई घोषित कर चुका होता है। अब पत्नी पूछती है कि 'क्या तुम मेरे और उसके बीच सम्बन्ध स्थापित कर रहे हो या सम्बन्ध हैं यह तुम्हारा आशय है?' पति पत्नी को घूरता है, उसकी मंद बुद्धि व गालियों के क्षेत्र में उसके अज्ञान पर मुस्कराता है। परन्तु वही पत्नी जब गालियाँ देकर अपने गालियों के क्षेत्र में ज्ञान की वृद्धि का सबूत देती है तो पति नाराज, दुखी, निराश हो जाता है।
वैसे सिवाय नपुंसक क्रोध या सही समय पर सही बेहतर शब्द न मिल पाने के या कल्पना के अभाव के गाली देने के और क्या कारण हो सकते हैं? मुझे नहीं लगता कि लोग उसका अर्थ सोचकर गाली देते हैं और यह तो और भी भयानक स्थिति है। इसका अर्थ है कि आप जो भी कह रहे हैं वह बिना सोचे समझे कह रहे हैं। तर्क से उसे तो समझाया जा सकता है या बहस की जा सकती है जो तार्किक बात कर रहा हो, किन्तु जो बिना सोचे, साँस लेने की क्रिया के समान, गाली दे रहा हो उससे क्या तर्क किया जाए?
अब यादगार बातें:
मुझे एक नवयुवती की कही बात याद आ रही है, ' चाची गाली देकर तो देखो । देखो , कैसी केथार्सिस की फीलिंग होती है।' केथार्सिस याने भाव-विरेचन (?) याने कुछ वैसी संतुष्टि जो मवाद भरे फोड़े के फूटने पर होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह सही कह रही थी। यह गाली भी गुस्से का केथार्सिस ही होता होगा। देखा जाए तो स्त्रियों से अधिक इसकी आवश्यकता किसे हो सकती है? सदियों से दबाई,छिपाई हमारी इच्छाएँ,भावनाएँ,हमारा गुस्सा सच में केथार्सिस माँगता ही माँगता है। फिर भी क्या हम इसके लिए कोई सकारात्मक रास्ता नहीं ढूँढ सकते या कम से कम क्रोध में वह तो कहें जो हम कहना चाह रहे हैं न कि किसी के किसी से शारिरिक सम्बन्ध स्थापित करें,जो हमारा उद्देश्य बिल्कुल भी नहीं है। क्या यह कहना अधिक सही नहीं होगा कि 'मैं तुम्हें पीटना चाहता/चाहती हूँ।' अधिक रसमय बनाना हो तो मार मार कर भुर्ता तो है ही। या 'मैं तुम्हारा सिर फोड़ देना चाहता/चाहती हूँ।' या 'मैं तुम्हारी हत्या कर देना चाहता/ चाहती हूँ।'
गालियाँ कुछ कुछ उच्चारण के लहजे सी होती हैं। जिस समाज के बीच आप रहते हैं उस समाज के उच्चारण की तरह इसका रंग भी आप पर चढ़ जाता है। मुझे याद है बचपन में हमारी बदली ऐसी जगह हुई जहाँ गालियों के बिना पुरुषों,लड़कों का बात करना लगभग निषेध सा दिखता था। मैंने..पान खाया। ..पान तो ... बेकार था। हैं बे ..., क्यों बे ..., कल तू... क्यों नहीं आया ? अब जैसा कि समाज में होता आया है,(रूप देखकर तो ॠषियों का मन भी डोलने लगता है,ॠषि पत्नियों का नहीं, 'boys will be boys' की तर्ज पर ) यह सब सीखकर भाई ने भी गाली दी। माँ गाली सुनकर सन्न रह गईं। कुछ उपाय तो करना ही था। सो उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बेटे को दिए ऐसे बेकार संस्कारों के लिए पश्चात्ताप करना होगा। उन्होंने जाकर सिर से स्नान किया। फिर सारा दिन भूखे रहकर रामायण का पाठ किया। वह दृष्य अविस्मरणीय है,माँ के लम्बे बाल जो खुले होने पर धरती पर भी फैले हुए थे,सामने रखी रामायण और पश्चात्ताप में जलता भाई! यह उपाय रामबाण साबित हुआ। शायद ही कोई पुत्र हो जो गालियों का आनन्द उठाने के लिए माँ को भूखा रामायण का पाठ करवाए। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि पिताजी की क्या भूमिका रही थी।
वैसे मैं उस माँ का अनुसरण करने को नहीं कह रही,परन्तु यदि हम चाहते हैं कि हमारी पुत्रियाँ ये शब्द ना उपयोग करें तो हमें स्वयं चाहे हम स्त्री हों या पुरुष इन शब्दों से परहेज करना होगा। अन्यथा हमें ये शब्द दिन रात सुनने ही होंगे,और न केवल पुरुष के मुँह से स्त्री के मुँह से भी। अब निर्णय आपका अपना है।
साबुन से मुँह धोना भी एक इलाज है। स्त्रियों को समझाने वाले कितने पुरुष अपनी बुरी आदत को छोड़ने के लिए इस उपाय का उपयोग करेंगे?
घुघूती बासूती
Monday, December 29, 2008
Tuesday, December 23, 2008
नामो के नाम एक स्त्री की चिट्ठी
आज ज्ञानसिंधु जी द्वारा लिखित 'छात्राओं के लिए प्रश्नपत्र' पढ़कर बहुत समय पहले लिखा अपना एक लेख याद आ गया । आज उसे यहाँ दे रही हूँ।
नामो, बधाई हो, सुना है, तुम्हारा विवाह हो रहा है ।
एक स्त्री होने के नाते मैं तुम्हें कुछ बातें बताना चाहती हूँ । पापा जो चुपके से तुम्हारे तकिये के नीचे चिट्ठी रख गए, वह मैंने भी पढ़ी । लगभग हर पिता मौखिक या लिखित में अपनी पुत्री को ये बातें बताता या बतवाता है । ठीक भी है़, नए घर जा रही बिटिया के लिए मन में डर तो रहता ही है । उस चिट्ठी को ध्यान से पढ़ना, बहुत सी काम की बातें उसमें हैं । परन्तु बहुत सी और भी काम की बातें छोड़ दी गईं हैं । तुम्हारे पापा अन्य पापाओं की तरह आशावादी हैं । सोचते हैं कि यदि तुम अच्छा व्यवहार करोगी तो सब अच्छा ही होगा । मैं भी यही चाहूँगी । परन्तु हर बार ऐसा होता नहीं। सो अच्छा व्यवहार तो करना ही ,परन्तु यदि तुम्हारे पापा किसी फैक्ट्री में या किसी महत्वपूर्ण पद पर काम करते हों तो उन्हें शायद यह भी पता हो कि कुछ भी काम करने से पहले जब योजना बनाई जाती है तो योजना १ के साथ योजना २ और यदि काम अधिक महत्वपूर्ण हो तो योजना ३ भी बनाई जातीं हैं। प्रचलित भाषा में उन्हें प्लैन बी और सी कहा जाता है ।
सो नामो, प्लैन ए तो वह है जो तुम्हारे पापा तुम्हें बता रहे हैं । अब यदि जैसा तुम, तुम्हारे पापा व हम सब चाह रहे हैं वैसा न हो पाए तो प्लैन बी भी तैयार रहना चाहिए । प्लैन ए के अन्तर्गत यह मानकर चला जा रहा है कि तुम हर काम करने से पहले आज्ञा माँगोगी । यदि नहीं मिली तो ? चलो घूमने जाने की आज्ञा माँगोगी और नहीं मिली तो चल जाएगा । यदि बुखार आया और डॉक्टर के पास जाने की आज्ञा नहीं मिली तो ? यदि अपने मित्र व सखी से मिलना हो और पति या सास ससुर ने आज्ञा नहीं दी तो ? एक बार, दो बार तो मिले बिन रह जाओगी, परन्तु अनन्त काल तक ? एक आध बुखार तो मायके से साथ लाई गोलियों के सहारे झेल जाओगी, परन्तु अनन्त काल तक ? तो नामो, ऐसे में ' मैं डॉक्टर के पास जा रही हूँ, या मित्रों को घर बुला रही हूँ या उनसे मिलने जा रही हूँ ' यह सूचना दे देना ।
आशा है, तुम्हें कोई कष्ट नहीं देगा़, पीड़ा नहीं देगा । परन्तु यदि दी तो ? ऐसे में नामो, पहले जानने का यत्न करना कि तुम्हारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है । हो सके तो बातों से हल निकालना । यदि हल न निकले तो कोशिश करना कि तुममें इतना आत्मविश्वास हो कि वे तुम्हें सताने की हिम्मत न करें । परन्तु बहुत से लोग परपीड़ा में ही सुख पाते हैं, यदि वे ऐसे लोग हों तो वहाँ रहने में कोई तुक नहीं होगी । ऐसे में रोना, पिटना यानि स्वयं को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित मत होने देना । पहले से ही माता पिता से बात करके रखना कि तुम्हें दहेज नहीं चाहिए बल्कि अपने घर यानी जिसे लोग मायका कहते हैं, वहाँ तब तक रहने का अधिकार चाहिए होगा, जब तक तुम अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जातीं । नामो, जिस शहर तुम ब्याहकर जा रही हो, उस शहर में किसी ऐसे व्यक्ति का पता अपने साथ जरूर रखना जिसे समय असमय सहायता के लिए बुला सको । चाहे कुछ भी हो जाए, न किसी को तुम्हें मानसिक या शारीरिक क्षति पहुँचाने देना न स्वयं अपने को क्षति पहुँचाना । विवाह जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग है परन्तु केवल वह ही जीवन की परिभाषा नहीं है । विवाह असफल होने पर भी जिया जाता है और जीवन को प्यार करके आत्मसम्मान के साथ जिया जाता है ।
सबको प्यार देना, सबका सम्मान करना परन्तु उन सबसे पहले स्वयं को प्यार करना, स्वयं को सम्मान देना । आत्मसम्मान की कीमत पर पाया गया विवाहित जीवन कभी सुखी नहीं हो पाता । देर सबेर यह याद आ ही जाता है कि तुम भी मनुष्य हो और वह मनुष्य ही क्या जिसमें आत्मसम्मान न हो ?
मेरी सीख अपने नाम की तरह तुम्हें उल्टी तो अवश्य लगेगी, परन्तु नामो, जीवन में बहुत कुछ उलट पुलट होता रहता है, सो प्लैन बी और सी को कभी मत भूलना।
यदि तुम्हारे मना कहने पर भी माता पिता विवाह पर खर्चा करें और जब तुम्हें उनकी आवश्यकता पड़े तो तुम्हारे विवाह को ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मानें तो नामो, प्लैन सी की आवश्यकता होगी। इसके अन्तर्गत नामो, विवाह तब तक मत करना जब तक आत्मनिर्भर न हो जाओ। नौकरी चाहे दूसरे ही शहर की क्यों न हो तब तक मत छोड़ना जब तक तुम यह सुनिश्चित नहीं कर लेती कि उस घर में तुम्हारा स्वागत है, तुम वहाँ भली भांति जी सकोगी। तुम लम्बी अवधि का बिना वेतन के अवकाश ले सकती हो। नौकरी होने से मित्र भी होते हैं जो मुसीबत के समय में साथ दे सकते हैं।
वैसे तो आशा है तुम्हारे मंगेतर की माँ भी उसे ऐसा ही एक पत्र लिख चुकी होगी और वह भी अपने उत्तरदायित्व अच्छे से समझ गया होगा। ऐसा हुआ होगा तो नामो, सबकुछ बढ़िया ही रहेगा ऐसी आशा की जा सकती है।
तुम्हारी हितचिन्तक,
तीघूघु तीसूबा
पुनश्चः यह लेख लिखने की प्रेरणा मुझे 'मोना के नाम पापा की अनमोल चिट्ठी' पढ़कर मिली थी।
घुघूती बासूती
नामो, बधाई हो, सुना है, तुम्हारा विवाह हो रहा है ।
एक स्त्री होने के नाते मैं तुम्हें कुछ बातें बताना चाहती हूँ । पापा जो चुपके से तुम्हारे तकिये के नीचे चिट्ठी रख गए, वह मैंने भी पढ़ी । लगभग हर पिता मौखिक या लिखित में अपनी पुत्री को ये बातें बताता या बतवाता है । ठीक भी है़, नए घर जा रही बिटिया के लिए मन में डर तो रहता ही है । उस चिट्ठी को ध्यान से पढ़ना, बहुत सी काम की बातें उसमें हैं । परन्तु बहुत सी और भी काम की बातें छोड़ दी गईं हैं । तुम्हारे पापा अन्य पापाओं की तरह आशावादी हैं । सोचते हैं कि यदि तुम अच्छा व्यवहार करोगी तो सब अच्छा ही होगा । मैं भी यही चाहूँगी । परन्तु हर बार ऐसा होता नहीं। सो अच्छा व्यवहार तो करना ही ,परन्तु यदि तुम्हारे पापा किसी फैक्ट्री में या किसी महत्वपूर्ण पद पर काम करते हों तो उन्हें शायद यह भी पता हो कि कुछ भी काम करने से पहले जब योजना बनाई जाती है तो योजना १ के साथ योजना २ और यदि काम अधिक महत्वपूर्ण हो तो योजना ३ भी बनाई जातीं हैं। प्रचलित भाषा में उन्हें प्लैन बी और सी कहा जाता है ।
सो नामो, प्लैन ए तो वह है जो तुम्हारे पापा तुम्हें बता रहे हैं । अब यदि जैसा तुम, तुम्हारे पापा व हम सब चाह रहे हैं वैसा न हो पाए तो प्लैन बी भी तैयार रहना चाहिए । प्लैन ए के अन्तर्गत यह मानकर चला जा रहा है कि तुम हर काम करने से पहले आज्ञा माँगोगी । यदि नहीं मिली तो ? चलो घूमने जाने की आज्ञा माँगोगी और नहीं मिली तो चल जाएगा । यदि बुखार आया और डॉक्टर के पास जाने की आज्ञा नहीं मिली तो ? यदि अपने मित्र व सखी से मिलना हो और पति या सास ससुर ने आज्ञा नहीं दी तो ? एक बार, दो बार तो मिले बिन रह जाओगी, परन्तु अनन्त काल तक ? एक आध बुखार तो मायके से साथ लाई गोलियों के सहारे झेल जाओगी, परन्तु अनन्त काल तक ? तो नामो, ऐसे में ' मैं डॉक्टर के पास जा रही हूँ, या मित्रों को घर बुला रही हूँ या उनसे मिलने जा रही हूँ ' यह सूचना दे देना ।
आशा है, तुम्हें कोई कष्ट नहीं देगा़, पीड़ा नहीं देगा । परन्तु यदि दी तो ? ऐसे में नामो, पहले जानने का यत्न करना कि तुम्हारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है । हो सके तो बातों से हल निकालना । यदि हल न निकले तो कोशिश करना कि तुममें इतना आत्मविश्वास हो कि वे तुम्हें सताने की हिम्मत न करें । परन्तु बहुत से लोग परपीड़ा में ही सुख पाते हैं, यदि वे ऐसे लोग हों तो वहाँ रहने में कोई तुक नहीं होगी । ऐसे में रोना, पिटना यानि स्वयं को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित मत होने देना । पहले से ही माता पिता से बात करके रखना कि तुम्हें दहेज नहीं चाहिए बल्कि अपने घर यानी जिसे लोग मायका कहते हैं, वहाँ तब तक रहने का अधिकार चाहिए होगा, जब तक तुम अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जातीं । नामो, जिस शहर तुम ब्याहकर जा रही हो, उस शहर में किसी ऐसे व्यक्ति का पता अपने साथ जरूर रखना जिसे समय असमय सहायता के लिए बुला सको । चाहे कुछ भी हो जाए, न किसी को तुम्हें मानसिक या शारीरिक क्षति पहुँचाने देना न स्वयं अपने को क्षति पहुँचाना । विवाह जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग है परन्तु केवल वह ही जीवन की परिभाषा नहीं है । विवाह असफल होने पर भी जिया जाता है और जीवन को प्यार करके आत्मसम्मान के साथ जिया जाता है ।
सबको प्यार देना, सबका सम्मान करना परन्तु उन सबसे पहले स्वयं को प्यार करना, स्वयं को सम्मान देना । आत्मसम्मान की कीमत पर पाया गया विवाहित जीवन कभी सुखी नहीं हो पाता । देर सबेर यह याद आ ही जाता है कि तुम भी मनुष्य हो और वह मनुष्य ही क्या जिसमें आत्मसम्मान न हो ?
मेरी सीख अपने नाम की तरह तुम्हें उल्टी तो अवश्य लगेगी, परन्तु नामो, जीवन में बहुत कुछ उलट पुलट होता रहता है, सो प्लैन बी और सी को कभी मत भूलना।
यदि तुम्हारे मना कहने पर भी माता पिता विवाह पर खर्चा करें और जब तुम्हें उनकी आवश्यकता पड़े तो तुम्हारे विवाह को ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मानें तो नामो, प्लैन सी की आवश्यकता होगी। इसके अन्तर्गत नामो, विवाह तब तक मत करना जब तक आत्मनिर्भर न हो जाओ। नौकरी चाहे दूसरे ही शहर की क्यों न हो तब तक मत छोड़ना जब तक तुम यह सुनिश्चित नहीं कर लेती कि उस घर में तुम्हारा स्वागत है, तुम वहाँ भली भांति जी सकोगी। तुम लम्बी अवधि का बिना वेतन के अवकाश ले सकती हो। नौकरी होने से मित्र भी होते हैं जो मुसीबत के समय में साथ दे सकते हैं।
वैसे तो आशा है तुम्हारे मंगेतर की माँ भी उसे ऐसा ही एक पत्र लिख चुकी होगी और वह भी अपने उत्तरदायित्व अच्छे से समझ गया होगा। ऐसा हुआ होगा तो नामो, सबकुछ बढ़िया ही रहेगा ऐसी आशा की जा सकती है।
तुम्हारी हितचिन्तक,
तीघूघु तीसूबा
पुनश्चः यह लेख लिखने की प्रेरणा मुझे 'मोना के नाम पापा की अनमोल चिट्ठी' पढ़कर मिली थी।
घुघूती बासूती
Monday, December 22, 2008
अमूल्य
जब कुछ
पाने का
देना पड़ता है
बहुत अधिक मूल्य
जैसे पसीना,
ढेरों आँसू,
बहुतायत में आहें
या अपना स्वाभिमान।
तब वह वस्तु
या वह व्यक्ति
अमूल्य बन जाता है,
न भी हो
बहुत कुछ उसमें ऐसा
तो भी हम कुछ यत्न
कुछ कल्पना कर
बना देते हैं उसे अमूल्य ।
न बनाएँ तो
जीवन मिथ्या गंवाया
सा लगने लगेगा ना
अपना इतना सब
यूँ ही
खोने देने की
पीड़ा भी तो
कुछ अधिक होगी ।
सो मानने लगते हैं
कि अमुक वस्तु या व्यक्ति
था और है
और रहेगा अमूल्य
अन्यथा अपने आँसुओं,
पसीने, आहों और
टूटे स्वाभिमान का
हो जाएगा अवमूल्यन ।
घुघूती बासूती
पाने का
देना पड़ता है
बहुत अधिक मूल्य
जैसे पसीना,
ढेरों आँसू,
बहुतायत में आहें
या अपना स्वाभिमान।
तब वह वस्तु
या वह व्यक्ति
अमूल्य बन जाता है,
न भी हो
बहुत कुछ उसमें ऐसा
तो भी हम कुछ यत्न
कुछ कल्पना कर
बना देते हैं उसे अमूल्य ।
न बनाएँ तो
जीवन मिथ्या गंवाया
सा लगने लगेगा ना
अपना इतना सब
यूँ ही
खोने देने की
पीड़ा भी तो
कुछ अधिक होगी ।
सो मानने लगते हैं
कि अमुक वस्तु या व्यक्ति
था और है
और रहेगा अमूल्य
अन्यथा अपने आँसुओं,
पसीने, आहों और
टूटे स्वाभिमान का
हो जाएगा अवमूल्यन ।
घुघूती बासूती
Thursday, December 18, 2008
निःसारता
एक उम्र गुजर जाती है
उम्र गुजरने का एहसास होने में,
सब कुछ बिखर जाता है
बिखराव का एहसास होने में ।
रेत सा फिसल जाता है जीवन
देर हो जाती है समझ आने में,
हाथ हो जाता है खाली बिल्कुल
निःसारता की समझ आने में ।
घुघूती बासूती
उम्र गुजरने का एहसास होने में,
सब कुछ बिखर जाता है
बिखराव का एहसास होने में ।
रेत सा फिसल जाता है जीवन
देर हो जाती है समझ आने में,
हाथ हो जाता है खाली बिल्कुल
निःसारता की समझ आने में ।
घुघूती बासूती
Saturday, December 13, 2008
को छू रे तू भागवान !
आज महेन जी का ब्लॉग खोलने में बहुत कठिनाई हो रही थी । जब कोई काम कठिन हो जाए तो मैं उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाती हूँ । सो यदि आराम से उनका ब्लॉग खुल जाता तो बस एक रचना पढ़कर टिपिया कर चली आती । परन्तु यहाँ तो युद्ध स्तर पर प्रयत्न हो रहे थे । ब्लॉगवाणी में अब नीचे दिए हुए उनके ब्लॉग के नाम को क्लिक किया । सारी पोस्ट्स की सूची नजर आई । नजर 'जागर' शब्द पर पड़ी । यह तो ठेठ कुमाँऊनी शब्द है । परन्तु ब्लॉग तो खुल ही नहीं रहा था । हारकर url टाइप करके पहुँची । वहाँ गोपालबाबू का गाया 'घुघूती ना बासा' सुना । फिर 'जागर' सुनी । फिर जागर की हाइपरलिंक से 'Kumaoni Culture' पर पहुँची । वहाँ कई पोस्ट्स पढ़ीं । वहीं पर 'रामी (रामी बौराणी*)' पढ़ने को मिली । वह किस्सा पढ़कर मुझे अपने एक प्रिय किस्से ' को छू रे तू भागवान' की याद गई । चलिए आप भी सुनिए ।
माँ बताती थीं कि जैसा कि पहाड़ों में होता था, एक लड़की की बहुत छोटी उम्र में शादी हो गई । बच्ची थी सो गौना नहीं हुआ । वह शादी के खेल व दूल्हे को भूल भाल गई और अपने मायके में ही बड़ी होने लगी ।
पहाड़ों में मकानों के बड़े बड़े आँगन होते हैं । जिनके चारों तरफ पत्थरों से बनी दीवार होती है । उसके ऊपर स्लेट या ऐसे ही सपाट पत्थर लगाए होते हैं । ऊँचाई चौड़ाई भी ऐसी होती है कि आराम से बैठा जा सकता है । मकान आमतौर पर दुमंजिले होते हैं और नीचे की मंजिल में गाय भैंसें बाँधी जाती हैं । सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर रहने वाले कमरों में जाया जाता है । अन्दर की ओर से छत लकड़ी की होती है । बाहर से स्लेट के पत्थर होते हैं । दरवाजे बेहद नीचे होते हैं जिनको पार करने में मुझ जैसे छोटे कद वालों का सिर भी टकरा जाता था और कका से सुनने को मिलता था 'चेलियाँ की चौड़ नजर' या कुछ ऐसा ही जिसका अर्थ होता है कि लड़कियों को सिर झुकाकर रहना चाहिए ।
अब मेरी कल्पना में माँ वाली कहानी जीवन्त हो उठती है । लड़की जो अब किशोरी हो गई है दीवार पर बैठी है। शायद हिसालू या किलमोड़े या काफल ( तीनों पहाड़ी जंगली फल हैं ) या अखरोट व चूड़ा खा रही है। (अहा वह स्वाद !) या शायद दीवार पर बैठी धूप तापती हुई चौलाई का साग साफ कर रही है । या फिर आँगन में बनी ओखली में धान कूटकर चावल या चूड़ा बना रही है । एक अजनबी उनके घर आया व सीधे अन्दर ही आता गया । आँगन में आने से पहले कोई पुकार नहीं लगाई, न खाँसा ही, न किससे मिलना है ही कहा, न लड़की से उसके पिता जोशज्यू के बारे में ही पूछा । सो लड़की अपना काम या खाना छोड़कर अजनबी को सम्बोधित करके कहती है, " को छू रे तू भागवान, न पूछणीं न गाछणीं लमालम भीतरी उणीँ ?" अर्थात "कौन है रे तू भाग्यवान, न पूछ रहा है न पता कर रहा है और सीधे घर में ही घुसा आ रहा है ?"
इससे पहले कि अजनबी कोई उत्तर देता लड़की की इजा(माँ) घर से बाहर आती है और लड़की से बोलती है," ना चेली यस नी कुणीं, यो तो तेर पाण्डेज्यूँ छन ।"( न बेटी ऐसा नहीं कहते, ये तो तेरे पाण्डेजी हैं, (पाण्डे पति का सरनेम है) ।) लड़की अपने उस अजनबी पति को सिर से पैर तक निहारती है और घर के अन्दर चली जाती है।
आज भी यह किस्सा मुझे रोज याद आता है । जब भी दरवाजे पर मेरे पति आते हैं तो मैं यही शब्द " को छू रे तू भागवान, न पूछणीं न गाछणीं लमालम भीतरी उणीँ ?" कहकर उनका स्वागत करती हूँ । परन्तु दुख इस बात का होता है कि मुझे टोकने को कोई इजा नहीं होती ।
घुघूती बासूती
( कुमाँऊनी बन्धु क्षमा करें, मुझे कुमाँऊनी बोलनी नहीं आती जितनी समझ आती थी वह भी बचपन व घर छूटने के साथ भूल गई हूँ, सो बहुत सी गल्तियाँ होंगी परन्तु भाव गलत नहीं हैं । क्यूँल तो निश्चित रूप से गलत है । परन्तु कुमाऊँनी की धातु तो याद नहीं ! कौ, कौल दोनों ही गलत लग रहे हैं सो क्यूँल ही लिख दिया था । रात को सोए में याद आया यह कुणीं हो सकता है सो अब वह कर दिया । )
घुघूती बासूती
माँ बताती थीं कि जैसा कि पहाड़ों में होता था, एक लड़की की बहुत छोटी उम्र में शादी हो गई । बच्ची थी सो गौना नहीं हुआ । वह शादी के खेल व दूल्हे को भूल भाल गई और अपने मायके में ही बड़ी होने लगी ।
पहाड़ों में मकानों के बड़े बड़े आँगन होते हैं । जिनके चारों तरफ पत्थरों से बनी दीवार होती है । उसके ऊपर स्लेट या ऐसे ही सपाट पत्थर लगाए होते हैं । ऊँचाई चौड़ाई भी ऐसी होती है कि आराम से बैठा जा सकता है । मकान आमतौर पर दुमंजिले होते हैं और नीचे की मंजिल में गाय भैंसें बाँधी जाती हैं । सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर रहने वाले कमरों में जाया जाता है । अन्दर की ओर से छत लकड़ी की होती है । बाहर से स्लेट के पत्थर होते हैं । दरवाजे बेहद नीचे होते हैं जिनको पार करने में मुझ जैसे छोटे कद वालों का सिर भी टकरा जाता था और कका से सुनने को मिलता था 'चेलियाँ की चौड़ नजर' या कुछ ऐसा ही जिसका अर्थ होता है कि लड़कियों को सिर झुकाकर रहना चाहिए ।
अब मेरी कल्पना में माँ वाली कहानी जीवन्त हो उठती है । लड़की जो अब किशोरी हो गई है दीवार पर बैठी है। शायद हिसालू या किलमोड़े या काफल ( तीनों पहाड़ी जंगली फल हैं ) या अखरोट व चूड़ा खा रही है। (अहा वह स्वाद !) या शायद दीवार पर बैठी धूप तापती हुई चौलाई का साग साफ कर रही है । या फिर आँगन में बनी ओखली में धान कूटकर चावल या चूड़ा बना रही है । एक अजनबी उनके घर आया व सीधे अन्दर ही आता गया । आँगन में आने से पहले कोई पुकार नहीं लगाई, न खाँसा ही, न किससे मिलना है ही कहा, न लड़की से उसके पिता जोशज्यू के बारे में ही पूछा । सो लड़की अपना काम या खाना छोड़कर अजनबी को सम्बोधित करके कहती है, " को छू रे तू भागवान, न पूछणीं न गाछणीं लमालम भीतरी उणीँ ?" अर्थात "कौन है रे तू भाग्यवान, न पूछ रहा है न पता कर रहा है और सीधे घर में ही घुसा आ रहा है ?"
इससे पहले कि अजनबी कोई उत्तर देता लड़की की इजा(माँ) घर से बाहर आती है और लड़की से बोलती है," ना चेली यस नी कुणीं, यो तो तेर पाण्डेज्यूँ छन ।"( न बेटी ऐसा नहीं कहते, ये तो तेरे पाण्डेजी हैं, (पाण्डे पति का सरनेम है) ।) लड़की अपने उस अजनबी पति को सिर से पैर तक निहारती है और घर के अन्दर चली जाती है।
आज भी यह किस्सा मुझे रोज याद आता है । जब भी दरवाजे पर मेरे पति आते हैं तो मैं यही शब्द " को छू रे तू भागवान, न पूछणीं न गाछणीं लमालम भीतरी उणीँ ?" कहकर उनका स्वागत करती हूँ । परन्तु दुख इस बात का होता है कि मुझे टोकने को कोई इजा नहीं होती ।
घुघूती बासूती
( कुमाँऊनी बन्धु क्षमा करें, मुझे कुमाँऊनी बोलनी नहीं आती जितनी समझ आती थी वह भी बचपन व घर छूटने के साथ भूल गई हूँ, सो बहुत सी गल्तियाँ होंगी परन्तु भाव गलत नहीं हैं । क्यूँल तो निश्चित रूप से गलत है । परन्तु कुमाऊँनी की धातु तो याद नहीं ! कौ, कौल दोनों ही गलत लग रहे हैं सो क्यूँल ही लिख दिया था । रात को सोए में याद आया यह कुणीं हो सकता है सो अब वह कर दिया । )
घुघूती बासूती
Friday, December 12, 2008
इन्हें चाँद चाहिए !!!
हाँ, चाहिए ही चाहिए। चाँद ही क्या तारे भी चाहिए । बहुधा ऐसा होता है कि लगता है कि हमें चाँद या कुछ और इसलिए चाहिए क्योंकि तुम्हारे पास है या क्योंकि तुम्हें चाहिए तो हमें भी चाहिए । परन्तु मुझे तो चाहिए, तब भी जब तुम्हें इसकी चाहत हो या न हो, तुम्हारे पास हो या न हो । मुझे अपने लिए चाहिए, तुमसे बिल्कुल पृथक और स्वतंत्र । यदि मिल गया तो मेरा मन होगा तो तुमसे भी बाँटूगी या नहीं बाँटूगी । चाँद या किसी और की चाहत मेरा नितान्त निजी मामला है । इसमें किसी और की अनुमति या पसन्द नापसन्द का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । मिल गया तो खुशी भी मेरी होगी, नहीं मिला तो दुख भी मेरा । इससे किसी अन्य को क्या लेना देना है ? हाँ यदि इसे पाने के लिए मैं कोई गैरकानूनी काम करूँ तो अवश्य शिकायत करना । और यदि मेरी इस चाहत का कोई अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करे तो उसे रोकना भी होगा और यदि कोई मेरी इस चाहत का मूल्य परिश्रम से अधिक या इसके अतिरिक्त माँगे या जबरदस्ती ले तो उसे सजा भी मिलनी ही होगी ।
'एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता।' यह बात कही जा रही है 'इन्हें चांद चाहिए' में ! एक और बात भी तय है, एक ही क्या बहुत सी बातें तय हैं, किसी की सहमति के बिना उसकी हत्या नहीं हो सकती, चोरी या जेब कतरना नहीं हो सकता, डाका नहीं डल सकता, यहाँ तक कि कोई आतंकवादी उसे आतंकित नहीं कर सकता । यह तथ्य यदि पहले ही पता होते तो इतने सारे न्यायालय बनाकर क्यों पैसा डुबाया जाता ? वकीलों से कहो कोई और धंधा अपनाएँ । यह तथ्य जानने के बाद अब मैं पहले से काफी अधिक सुरक्षित अनुभव कर रही हूँ । मैं तो सोच रही हूँ कि 'मैं असहमत हूँ' की एक तख्ती लटकाकर निश्चिन्त हो कभी भी, कहीं भी घूमने निकल जाऊँ । पुरुष नामक जीव जब यह तख्ती पढ़ेगा तो मुझे कभी कोई हानि न पहुँचाकर एक अच्छे बच्चे सा अपने रास्ते या फिर सहमत स्त्रियों, पुरुषों की खोज में किसी अन्य रास्ते चला जाएगा। यह बात यदि पहले पता होती तो ताज, औबेरॉय आदि में भी बड़े बड़े अक्षरों में यह लिखकर टांग दिया जाता ।
कुछ अति तो मैं कर रही हूँ, लेख काफी अच्छा है, परन्तु सफलता यदि इन्हीं कारणों से मिलती तो हर सफल पुरुष या हर वह सफल पुरुष जो किसी पुरुष के अधीन काम कर रहा है, समलैंगिक होता । हर सफल स्त्री जो किसी स्त्री के अधीन काम कर रही है, भी समलैंगिक होती । एक मछली सारे तालाब के जल को गंदा तो करती ही है परन्तु इन अपवादों को इतना तूल देकर सफलता और सफल व्यक्ति पर ही प्रश्नचिन्ह लगाकर हम जल के नाम को ही गंदा कर रहे हैं । क्या यह असफल लोगों की 'खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे'वाली मानसिकता को इंगित नहीं करती ?
जहाँ भी शक्ति, विशेषकर अकूत शक्ति बिना किसी उत्तरदायित्व के केन्द्रित होगी उसका दुरुपयोग होने की संभावना भी होगी, विशेषकर तब जब शक्ति किसी कुपात्र के हाथ में होगी । यहाँ कुपात्र से भी अधिक दोष उसका है जिसने उस कुपात्र को ऐसी शक्ति पकड़ाई ।
शक्ति का दुरुपयोग होता है,मानवीय कमजोरियों का लाभ कुछ लोग अवश्य उठाते हैं, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री ! इसमें चाँद की चाहत का दोष नहीं है, दोष है तो केवल गलत मार्ग का, यदि उसका उपयोग हुआ हो । बहुधा जब हम कुछ नहीं पा पाते तो हमारा अहम् हमें पाने वालों की योग्यता को स्वीकार नहीं करने देता । क्योंकि यदि हम यह स्वीकारेंगे तो हमें अपनी अयोग्यता भी स्वीकारनी होगी ।
घुघूती बासूती
'एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता।' यह बात कही जा रही है 'इन्हें चांद चाहिए' में ! एक और बात भी तय है, एक ही क्या बहुत सी बातें तय हैं, किसी की सहमति के बिना उसकी हत्या नहीं हो सकती, चोरी या जेब कतरना नहीं हो सकता, डाका नहीं डल सकता, यहाँ तक कि कोई आतंकवादी उसे आतंकित नहीं कर सकता । यह तथ्य यदि पहले ही पता होते तो इतने सारे न्यायालय बनाकर क्यों पैसा डुबाया जाता ? वकीलों से कहो कोई और धंधा अपनाएँ । यह तथ्य जानने के बाद अब मैं पहले से काफी अधिक सुरक्षित अनुभव कर रही हूँ । मैं तो सोच रही हूँ कि 'मैं असहमत हूँ' की एक तख्ती लटकाकर निश्चिन्त हो कभी भी, कहीं भी घूमने निकल जाऊँ । पुरुष नामक जीव जब यह तख्ती पढ़ेगा तो मुझे कभी कोई हानि न पहुँचाकर एक अच्छे बच्चे सा अपने रास्ते या फिर सहमत स्त्रियों, पुरुषों की खोज में किसी अन्य रास्ते चला जाएगा। यह बात यदि पहले पता होती तो ताज, औबेरॉय आदि में भी बड़े बड़े अक्षरों में यह लिखकर टांग दिया जाता ।
कुछ अति तो मैं कर रही हूँ, लेख काफी अच्छा है, परन्तु सफलता यदि इन्हीं कारणों से मिलती तो हर सफल पुरुष या हर वह सफल पुरुष जो किसी पुरुष के अधीन काम कर रहा है, समलैंगिक होता । हर सफल स्त्री जो किसी स्त्री के अधीन काम कर रही है, भी समलैंगिक होती । एक मछली सारे तालाब के जल को गंदा तो करती ही है परन्तु इन अपवादों को इतना तूल देकर सफलता और सफल व्यक्ति पर ही प्रश्नचिन्ह लगाकर हम जल के नाम को ही गंदा कर रहे हैं । क्या यह असफल लोगों की 'खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे'वाली मानसिकता को इंगित नहीं करती ?
जहाँ भी शक्ति, विशेषकर अकूत शक्ति बिना किसी उत्तरदायित्व के केन्द्रित होगी उसका दुरुपयोग होने की संभावना भी होगी, विशेषकर तब जब शक्ति किसी कुपात्र के हाथ में होगी । यहाँ कुपात्र से भी अधिक दोष उसका है जिसने उस कुपात्र को ऐसी शक्ति पकड़ाई ।
शक्ति का दुरुपयोग होता है,मानवीय कमजोरियों का लाभ कुछ लोग अवश्य उठाते हैं, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री ! इसमें चाँद की चाहत का दोष नहीं है, दोष है तो केवल गलत मार्ग का, यदि उसका उपयोग हुआ हो । बहुधा जब हम कुछ नहीं पा पाते तो हमारा अहम् हमें पाने वालों की योग्यता को स्वीकार नहीं करने देता । क्योंकि यदि हम यह स्वीकारेंगे तो हमें अपनी अयोग्यता भी स्वीकारनी होगी ।
घुघूती बासूती
Thursday, December 11, 2008
आज शाम छत पर
आज शाम लेटकर छत पर
मैं तारों को देख रही थी और
आकाश में बहते हुए बादल को
हिलती हुई पेड़ों की फुनगियों को
कल से अधिक बढ़े हुए चाँद को
कल से घटी हुई कालिमा को
टिमटिमाते हुए तारे सी
हवाईजहाज की बत्ती को।
गहरे अंधियारे में चमकते हुए
अक्षत तारों की पंक्तियों के बीच
टूटते हुए तारे को देख
ठंडी बहती हवा के बीच
अपनी झुलसती देह को देख
मैं यादों की ऊबड़खाबड़ राहों में
इक सूखे पेड़ सी खड़ी तेरी
भूली हुई यादों को याद कर रही थी।
मैं हर चमकते तारे में
तुझे खोज रही थी
परन्तु तू मिला मुझे
उस टूटे तारे में
मैं पक्षियों के कलरव में
तुझे सुनना चाह रही थी
परन्तु तुझे सुना मैंने
चीखते सन्नाटे में।
मैं शाम के झुरमुटों में
पाना चाह रही थी तुझे
मैं बहती पवन में तेरा
स्पर्श पाना चाह रही थी
मैं मोंगरे की सुगन्ध में
तेरी गन्ध सूँघ रही थी
मैं लिपटते सायों में
तेरी अनुभूति ढूँढ रही थी ।
मैं जीवन के गुजरे पलों में
तेरे मेरे अर्थ खोज रही थी
मैं तुझमें अपना मैं और
मुझमें तू खोज रही थी
मैं सपनों में यथार्थ
और यथार्थ में स्वप्न
जुगुनू में राह दिखाता प्रकाश
चाँद में अंधकार खोज रही थी ।
आज शाम लेटकर छत पर
मैं एक युग जी रही थी
जड़ को चेतन और
चेतन को जड़ कर रही थी
आज शाम लेटकर छत पर
मैं मूँद आँखें तुझे देख रही थी
रोकें साँसें तेरी राह देख रही थी
खुली आँख स्वप्न देख रही थी ।
घुघूती बासूती
मैं तारों को देख रही थी और
आकाश में बहते हुए बादल को
हिलती हुई पेड़ों की फुनगियों को
कल से अधिक बढ़े हुए चाँद को
कल से घटी हुई कालिमा को
टिमटिमाते हुए तारे सी
हवाईजहाज की बत्ती को।
गहरे अंधियारे में चमकते हुए
अक्षत तारों की पंक्तियों के बीच
टूटते हुए तारे को देख
ठंडी बहती हवा के बीच
अपनी झुलसती देह को देख
मैं यादों की ऊबड़खाबड़ राहों में
इक सूखे पेड़ सी खड़ी तेरी
भूली हुई यादों को याद कर रही थी।
मैं हर चमकते तारे में
तुझे खोज रही थी
परन्तु तू मिला मुझे
उस टूटे तारे में
मैं पक्षियों के कलरव में
तुझे सुनना चाह रही थी
परन्तु तुझे सुना मैंने
चीखते सन्नाटे में।
मैं शाम के झुरमुटों में
पाना चाह रही थी तुझे
मैं बहती पवन में तेरा
स्पर्श पाना चाह रही थी
मैं मोंगरे की सुगन्ध में
तेरी गन्ध सूँघ रही थी
मैं लिपटते सायों में
तेरी अनुभूति ढूँढ रही थी ।
मैं जीवन के गुजरे पलों में
तेरे मेरे अर्थ खोज रही थी
मैं तुझमें अपना मैं और
मुझमें तू खोज रही थी
मैं सपनों में यथार्थ
और यथार्थ में स्वप्न
जुगुनू में राह दिखाता प्रकाश
चाँद में अंधकार खोज रही थी ।
आज शाम लेटकर छत पर
मैं एक युग जी रही थी
जड़ को चेतन और
चेतन को जड़ कर रही थी
आज शाम लेटकर छत पर
मैं मूँद आँखें तुझे देख रही थी
रोकें साँसें तेरी राह देख रही थी
खुली आँख स्वप्न देख रही थी ।
घुघूती बासूती
Tuesday, December 09, 2008
पाँच साल के बच्चे की फीस पाँच हजार और दो साल के बच्चे की सोलह हजार !
हाल ही में मैं एक महानगर गई थी । वहाँ बात ही बात में पता चला कि हमारे पाँच वर्ष के एक प्रिय बच्चे की स्कूल की फीस पाँच हजार रूपए मासिक है । बस का किराया अलग है । बच्चा वास्तव में बहुत प्रतिभाशाली, बुद्धिमान व सुसंस्कृत है । अविभावक की आमदनी भी कम नहीं है । मुझे फीस अधिक तो लगी परन्तु फिर सोचा कि यदि आय का १/१० या १/२० फीस में जा भी रहा है तो भी उनके लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं है । ऐसे अच्छे स्कूल में भेजने के कारण ही माता पिता निश्चिन्त हो नौकरी पर जा पाते हैं । सबकुछ स्कूल में ही सिखाया जाता है । गृहकार्य नाममात्र का होता है । तैराकी, घुड़सवारी, नृत्य, खेल सबकुछ तो स्कूल सिखाता है । यहाँ तक कि बच्चों को सही आहार के बारे में भी सिखाता है । एक रिसेस में तो बच्चों को केवल फल ही खाने को कहा जाता है । बच्चा कहीं से भी बिगड़ा नहीं लगता । सुबह सात बजे घर से जाता है और प्रसन्नचित्त तीन बजे घर लौटता है । इतने लम्बे समय बाहर रहने पर भी थका या चिड़चिड़ा नहीं दिखता । ऐसा लगता है कि परिवार व स्कूल उस हीरे को बढ़िया तराश रहे हैं ।
खैर, जो भी हो, अभी मैं इस पाँच हजार की फीस को ठीक से पचा भी नहीं पाई थी कि हमें एक अन्य परिवार के घर रात्रि भोज पर जाने का निमन्त्रण मिला । वहाँ मैं एक परिचित से उनकी बिटिया व नाती का हालचाल पूछने लगी । नाती दो वर्ष का तो हो गया है या अधिक का ही । उसके बारे में बातें होने लगीं । पता चला कि बोलता तो बहुत है परन्तु अस्पष्ट । बात घूमते फिरते स्कूल पर आई । फिर स्कूल की फीस पर । जब उन्हें पाँच हजार की फीस के बारे में बताया गया तो वे बोले, 'अरे, हमारे नाती के स्कूल की तो सोलह हजार प्रति मास है ।' हम्म, एक बच्चा जो अभी स्पष्ट बोलता भी नहीं है उसकी फीस सोलह हजार रुपये प्रति मास !
मैं अपने यहाँ के स्कूल की फीस के बारे में सोच रही थी । शायद सौ, सवा सौ रुपये है । और हमारा स्कूल वातानुकूलित भी नहीं है । और हम तैराकी, घुड़सवारी, नृत्य भी नहीं सिखाते । स्कूल में खेल का मैदान, झूले आदि अवश्य हैं । खेल के घंटे या रिसेस में बच्चे बहते पसीने की परवाह किए बिना खूब खेलते हैं । साधन चाहे सीमित हैं परन्तु वे उसका उपयोग खूब करते हैं । हमारे पूरे स्कूल में शायद ही दस बच्चे मोटे होंगे और शायद चार ही अति मोटे । हमारे स्कूल में अधिकतर बच्चे गाँवों से आते हैं । हमारी अपनी कॉलोनी के बच्चे अनुपात में शायद एक चौथाई भी नहीं हैं । अधिकतर बच्चों के माता पिता अंग्रेजी नहीं जानते परन्तु बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाना चाहते हैं । बहुत से बच्चों के माता पिता अनपढ़ भी हैं । बोर्ड की परीक्षा में लगभग हर वर्ष शत प्रतिशत परिणाम आता है । हमारे छात्रों का एक बहुत बड़ा प्रतिशत हर वर्ष इन्जीनियरिंग कॉलेज में दाखिला पा जाता है । छठी सातवीं तक पहुँचते पहुँचते लगभग सब बच्चे अच्छी बातचीत कर लेते हैं । केवल उनकी सादगी व मासूमियत ही उन्हें शहर के बच्चों से अलग कर पाती है ।
मुझे समझ नहीं आ रहा कि सोलह हजार की फीस वाले स्कूल गलत हैं या सही । मैं उनपर अपने विचार कैसे थोप सकती हूँ ? यदि मुझे वे बेहद मंहगे लगते हैं और इसलिए गलत तो मेरी कामवाली को मेरे कम्प्यूटर का दाम व मेरे टेलिफोन व नेट का खर्चा गलत लगता होगा । सामाजिक न्याय, वे बच्चे जिन्हें स्कूल जाने का सौभाग्य नहीं मिलता आदि के बारे में सोचती हूँ । परन्तु ऐसे में क्यों नहीं मैं उनके बारे में सोचती जिन्हें सर छिपाने को छत नहीं मिलती ? जितनी जगह मेरा कम्प्यूटर, प्रिंटर व टी वी घेरे है उतनी जगह में तो किसी का बिस्तरा लग जाए । कितनी विलासिता सही है और कितनी गलत ? फिर विलासिता की परिभाषा भी तो व्यक्तिगत है। जो मुझे आवश्यक लगता है वह किसी के लिए विलासिता है।
शायद बिना किसी के पैसे खर्च करने का अधिकार छीने हम सामाजिक न्याय भी कर सकते हैं । क्या यह संभव नहीं है कि स्कूल की फीस पर दस या एक प्रतिशत ही सही कर लगाया जाए जो सरकार के खजाने में व्यर्थ जाकर या किसी सरकारी स्कूल में व्यर्थ करने की बजाए किसी प्रतिष्ठित संस्था को उसी स्कूल में स्कूल की छु्ट्टी के बाद जरुरतमंद बच्चों के लिए स्कूल चलाने को दिया जाए ? क्या इन जरूरतमंद बच्चों को भी स्कूल के फर्नीचर,कमरों, बाथरूम, पुस्तकालय आदि का सही उपयोग करना सिखाना असंभव है ? यदि सारे निजी स्कूलों का छुट्टी के बाद ऐसा सदुपयोग किया जाए तो बहुत से बच्चे शिक्षा पा सकेंगे । शिक्षा देना सरकार का काम अवश्य है परन्तु यह तो हमें पता है वह इसमें अक्षम है, तो क्या समाज स्वयं ही ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकता ?
घुघूती बासूती
खैर, जो भी हो, अभी मैं इस पाँच हजार की फीस को ठीक से पचा भी नहीं पाई थी कि हमें एक अन्य परिवार के घर रात्रि भोज पर जाने का निमन्त्रण मिला । वहाँ मैं एक परिचित से उनकी बिटिया व नाती का हालचाल पूछने लगी । नाती दो वर्ष का तो हो गया है या अधिक का ही । उसके बारे में बातें होने लगीं । पता चला कि बोलता तो बहुत है परन्तु अस्पष्ट । बात घूमते फिरते स्कूल पर आई । फिर स्कूल की फीस पर । जब उन्हें पाँच हजार की फीस के बारे में बताया गया तो वे बोले, 'अरे, हमारे नाती के स्कूल की तो सोलह हजार प्रति मास है ।' हम्म, एक बच्चा जो अभी स्पष्ट बोलता भी नहीं है उसकी फीस सोलह हजार रुपये प्रति मास !
मैं अपने यहाँ के स्कूल की फीस के बारे में सोच रही थी । शायद सौ, सवा सौ रुपये है । और हमारा स्कूल वातानुकूलित भी नहीं है । और हम तैराकी, घुड़सवारी, नृत्य भी नहीं सिखाते । स्कूल में खेल का मैदान, झूले आदि अवश्य हैं । खेल के घंटे या रिसेस में बच्चे बहते पसीने की परवाह किए बिना खूब खेलते हैं । साधन चाहे सीमित हैं परन्तु वे उसका उपयोग खूब करते हैं । हमारे पूरे स्कूल में शायद ही दस बच्चे मोटे होंगे और शायद चार ही अति मोटे । हमारे स्कूल में अधिकतर बच्चे गाँवों से आते हैं । हमारी अपनी कॉलोनी के बच्चे अनुपात में शायद एक चौथाई भी नहीं हैं । अधिकतर बच्चों के माता पिता अंग्रेजी नहीं जानते परन्तु बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाना चाहते हैं । बहुत से बच्चों के माता पिता अनपढ़ भी हैं । बोर्ड की परीक्षा में लगभग हर वर्ष शत प्रतिशत परिणाम आता है । हमारे छात्रों का एक बहुत बड़ा प्रतिशत हर वर्ष इन्जीनियरिंग कॉलेज में दाखिला पा जाता है । छठी सातवीं तक पहुँचते पहुँचते लगभग सब बच्चे अच्छी बातचीत कर लेते हैं । केवल उनकी सादगी व मासूमियत ही उन्हें शहर के बच्चों से अलग कर पाती है ।
मुझे समझ नहीं आ रहा कि सोलह हजार की फीस वाले स्कूल गलत हैं या सही । मैं उनपर अपने विचार कैसे थोप सकती हूँ ? यदि मुझे वे बेहद मंहगे लगते हैं और इसलिए गलत तो मेरी कामवाली को मेरे कम्प्यूटर का दाम व मेरे टेलिफोन व नेट का खर्चा गलत लगता होगा । सामाजिक न्याय, वे बच्चे जिन्हें स्कूल जाने का सौभाग्य नहीं मिलता आदि के बारे में सोचती हूँ । परन्तु ऐसे में क्यों नहीं मैं उनके बारे में सोचती जिन्हें सर छिपाने को छत नहीं मिलती ? जितनी जगह मेरा कम्प्यूटर, प्रिंटर व टी वी घेरे है उतनी जगह में तो किसी का बिस्तरा लग जाए । कितनी विलासिता सही है और कितनी गलत ? फिर विलासिता की परिभाषा भी तो व्यक्तिगत है। जो मुझे आवश्यक लगता है वह किसी के लिए विलासिता है।
शायद बिना किसी के पैसे खर्च करने का अधिकार छीने हम सामाजिक न्याय भी कर सकते हैं । क्या यह संभव नहीं है कि स्कूल की फीस पर दस या एक प्रतिशत ही सही कर लगाया जाए जो सरकार के खजाने में व्यर्थ जाकर या किसी सरकारी स्कूल में व्यर्थ करने की बजाए किसी प्रतिष्ठित संस्था को उसी स्कूल में स्कूल की छु्ट्टी के बाद जरुरतमंद बच्चों के लिए स्कूल चलाने को दिया जाए ? क्या इन जरूरतमंद बच्चों को भी स्कूल के फर्नीचर,कमरों, बाथरूम, पुस्तकालय आदि का सही उपयोग करना सिखाना असंभव है ? यदि सारे निजी स्कूलों का छुट्टी के बाद ऐसा सदुपयोग किया जाए तो बहुत से बच्चे शिक्षा पा सकेंगे । शिक्षा देना सरकार का काम अवश्य है परन्तु यह तो हमें पता है वह इसमें अक्षम है, तो क्या समाज स्वयं ही ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकता ?
घुघूती बासूती
Monday, December 01, 2008
छोटी समस्या का छोटा हल तो बड़ी समस्या का बड़ा हल भी होगा ही !
आज हर व्यक्ति उत्तर माँग रहा है। हमें उत्तर देने कोई नहीं आएगा । उत्तर हमें स्वयं खोजने होंगे । परन्तु बने बनाए फिल्मी उत्तर नहीं । हमें कुछ आत्म मंथन करना होगा । न ही भावनाओं में बहकर शोक और ग्लानि में डूबना है । ये बहुत ही विलासिता की चीजें हैं, फुरसत में सुखी सुरक्षित लोग ऐसा कर सकते हैं, हम नहीं । १०० करोड़ से अधिक लोग सदा के लिए आतंकवाद के बंधक नहीं बनाए जा सकते ।
यह घटना सम्बन्धित नहीं है और बहुत छोटी सी समस्या का एक सफल हल थी इसलिए यहाँ बता रही हूँ । यह केवल यह दर्शाती है कि हम भी अग्रसक्रिय हो सकते हैं बजाए हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के ।
मुझे याद आता है वह समय जब मैं विवाह के बाद पहली बार बिहार(आज के झारखंड)गई थी । एक महीने पहले ही हमारे से एक घर छोड़कर एक घर में डाका पड़ा था । सड़क पर कुछ कुछ दूरी पर डाकू खड़े थे । उस घर के पड़ोस के दरवाजे खिड़कियों पर भी पहरा दे रहे थे ताकि कोई सहायता करने बाहर न निकले । तीन दरवाजे तोड़कर घर के पुरुष पर कुल्हाड़ी से वार किया गया । जो सौभाग्य से उसने हाथों से रोक लिया और घर का सारा कीमती सामान लेकर डाकू चले गए । पुलिस में रपट तो लिखाई ही गई होगी । जो पड़ोसी सहायता के लिए नहीं जा पाए थे लज्जित थे । परन्तु क्योंकि वह एक छोटा सा समाज था अतः मिलकर विचार किया गया कि भविष्य में अपने समाज को कैसे सुरक्षित किया जाए । निर्णय लिया गया कि रात को पहरा दिया जाए । सारे पुरुष कारखाने में इन्जिनियर, केमिस्ट आदि पद पर थे । संख्या भी बहुत अधिक नहीं थी । दूसरी कॉलोनी में कामगार व दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी थे । संख्या भी अधिक थी । सो निश्चय हुआ कि चार चार लोगों का दल बनाकर १० से १२ और १२ से चार तक की दो पारियों में पहरा दिया जाए । एक दल हमारी तरफ और एक उनकी तरफ । हमारी कॉलोनी में हर व्यक्ति को सप्ताह में एक एक बार दोनों पारियों में पहरा देना था । उनकी में सप्ताह में केवल एक बार एक ही पारी में । कई स्थानों पर बिजली के खंबों पर भौंपू (सायरन, जैसे कारखाने में काम पर जाने के समय पर बजाए जाते हैं) काफी ऊँचाई पर लगाए गए । सब पुरुषों को एक एक लाठी दी गई जिसका उपयोग भौंपू बजाने व आत्म रक्षा के लिए किया जाना था ।
साथ में यह भी निर्णय लिया गया कि यदि कभी चोर या डाकू मिलें तो भौंपू बजाया जाएगा और कारखाने से चौकीदार व बहुत से कर्मचारी शीघ्र ही ट्रक व बस में बैठकर आ जाएँगे । किसी भी स्थिति में कानून अपने हा्थ में नहीं लिया जाएगा । मारपीट नहीं की जाएगी अर्थात कंगारू कोर्ट(स्वयंभू अदालत ) सजा नहीं देगा । केवल पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा ।
मैं वहाँ तीन साल तक रही । एक बार चोर या कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखे जो पहरेदारों को देखकर भाग गए । परन्तु चोरी या डाका फिर कभी नहीं पड़ा। हमारी कॉलोनी में लगातार पहरा दिया जाता रहा । लोग ऊब ना जाएँ इसलिए बारी बारी से पहरे देने वाले के घर से चाय नाश्ता आदि दिया जाता था जो वे बाहर बैठकर ही लेते थे । समय हर बार बदल लेते थे । यदि कोई पहरे के लिए न आए तो अगले दिन सारी कॉलोनी के पुरुष मिलकर उसके घर चाय के लिए पहुँच जाते थे और यह सजा लोगों को आलस से दूर रखती थी । दूसरी कॉलोनी के लोग कुछ दिन का पहरा करके थक गए और पहरा देना छोड़ दिया और वहाँ दो तीन चोरियाँ हुईं । पड़ोस के कारखाने में तो होती ही रहती थीं । चोरियाँ क्या डाका भी कह सकते हैं क्योंकि वे आते थे और सारे गहने पैसे ले जाते थे । यहाँ तक कि स्त्रियों से पूछते थे कि अमुक दिन जो हार पहना था वह भी निकालो ।
यदि आज हम भी शहरों में नागरिक सुरक्षा समितियाँ बनाएँ जो किसी भी हाल में कानून को अपने हाथ में न लें परन्तु संदिग्ध व्यक्ति को पुलिस के हवाले करें तो बहुत सीमा तक आतंकवाद व अपराध से छुटकारा पा सकते हें । बस मंत्र यह होना चाहिए कि वे ही व्यक्ति ऐसे काम से जोड़े जाएँ जो कानून का आदर करते हों । मुम्बई में भी एक व्यक्ति ने आतंककारियों को नाव से उतरकर आते देखा था । यदि नागरिक व पुलिस के सम्बन्ध बेहतर होते तो शायद वह यह खबर पुलिस को दे देता । अवश्यकता है तो नागरिक व पुलिस के बीच एक विश्वास जगाने की । यह तभी हो सकता है जब दोनों एक दूसरे का आदर करें । इसके लिए यह भी आवश्यक है कि पुलिसकर्मी का वेतन व स्तर ऐसा होना चाहिए कि वे सम्मानपूर्ण जीवन यापन कर सकें । पुलिस में खाली पड़े सभी पदों को भरा जा सके ताकि पुलिस की संख्या की कमी कभी भी हमारी असुरक्षा का कारण न बने । जब हम अपने वेतन बढ़ाने के लिए आन्दोलन कर सकते हैं तो उनके लिए क्यों नहीं ? क्यों न हम सरकार से पूछें कि कैसे हमारी लाठीधारी पुलिस इन आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित बढ़िया प्रशिक्षण पाए आतंकवादिओं से निपटेगी । कुछ दिन पहले मैंने समाचार पढ़ा था कि नक्सलवाद से निपटने के लिए बने सुरक्षादल में केवल वरिष्ठ अधिकारियों को ही हैल्मेट दी जाएगी । क्या शेष जवानों के सिर फौलाद के बने हैं ?
सभी लोगों को अपने मताधिकार का उपयोग करना चाहिए ताकि राजनैतिक दल हमें गम्भीरता से लें । सरकार से जवाबदेही होनी चाहिए ताकि वह अपने उत्तरदायित्व को समझे और यदि उसे निभाने में अक्षम है तो त्यागपत्र दे दे ।
घुघूती बासूती
यह घटना सम्बन्धित नहीं है और बहुत छोटी सी समस्या का एक सफल हल थी इसलिए यहाँ बता रही हूँ । यह केवल यह दर्शाती है कि हम भी अग्रसक्रिय हो सकते हैं बजाए हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के ।
मुझे याद आता है वह समय जब मैं विवाह के बाद पहली बार बिहार(आज के झारखंड)गई थी । एक महीने पहले ही हमारे से एक घर छोड़कर एक घर में डाका पड़ा था । सड़क पर कुछ कुछ दूरी पर डाकू खड़े थे । उस घर के पड़ोस के दरवाजे खिड़कियों पर भी पहरा दे रहे थे ताकि कोई सहायता करने बाहर न निकले । तीन दरवाजे तोड़कर घर के पुरुष पर कुल्हाड़ी से वार किया गया । जो सौभाग्य से उसने हाथों से रोक लिया और घर का सारा कीमती सामान लेकर डाकू चले गए । पुलिस में रपट तो लिखाई ही गई होगी । जो पड़ोसी सहायता के लिए नहीं जा पाए थे लज्जित थे । परन्तु क्योंकि वह एक छोटा सा समाज था अतः मिलकर विचार किया गया कि भविष्य में अपने समाज को कैसे सुरक्षित किया जाए । निर्णय लिया गया कि रात को पहरा दिया जाए । सारे पुरुष कारखाने में इन्जिनियर, केमिस्ट आदि पद पर थे । संख्या भी बहुत अधिक नहीं थी । दूसरी कॉलोनी में कामगार व दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी थे । संख्या भी अधिक थी । सो निश्चय हुआ कि चार चार लोगों का दल बनाकर १० से १२ और १२ से चार तक की दो पारियों में पहरा दिया जाए । एक दल हमारी तरफ और एक उनकी तरफ । हमारी कॉलोनी में हर व्यक्ति को सप्ताह में एक एक बार दोनों पारियों में पहरा देना था । उनकी में सप्ताह में केवल एक बार एक ही पारी में । कई स्थानों पर बिजली के खंबों पर भौंपू (सायरन, जैसे कारखाने में काम पर जाने के समय पर बजाए जाते हैं) काफी ऊँचाई पर लगाए गए । सब पुरुषों को एक एक लाठी दी गई जिसका उपयोग भौंपू बजाने व आत्म रक्षा के लिए किया जाना था ।
साथ में यह भी निर्णय लिया गया कि यदि कभी चोर या डाकू मिलें तो भौंपू बजाया जाएगा और कारखाने से चौकीदार व बहुत से कर्मचारी शीघ्र ही ट्रक व बस में बैठकर आ जाएँगे । किसी भी स्थिति में कानून अपने हा्थ में नहीं लिया जाएगा । मारपीट नहीं की जाएगी अर्थात कंगारू कोर्ट(स्वयंभू अदालत ) सजा नहीं देगा । केवल पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा ।
मैं वहाँ तीन साल तक रही । एक बार चोर या कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखे जो पहरेदारों को देखकर भाग गए । परन्तु चोरी या डाका फिर कभी नहीं पड़ा। हमारी कॉलोनी में लगातार पहरा दिया जाता रहा । लोग ऊब ना जाएँ इसलिए बारी बारी से पहरे देने वाले के घर से चाय नाश्ता आदि दिया जाता था जो वे बाहर बैठकर ही लेते थे । समय हर बार बदल लेते थे । यदि कोई पहरे के लिए न आए तो अगले दिन सारी कॉलोनी के पुरुष मिलकर उसके घर चाय के लिए पहुँच जाते थे और यह सजा लोगों को आलस से दूर रखती थी । दूसरी कॉलोनी के लोग कुछ दिन का पहरा करके थक गए और पहरा देना छोड़ दिया और वहाँ दो तीन चोरियाँ हुईं । पड़ोस के कारखाने में तो होती ही रहती थीं । चोरियाँ क्या डाका भी कह सकते हैं क्योंकि वे आते थे और सारे गहने पैसे ले जाते थे । यहाँ तक कि स्त्रियों से पूछते थे कि अमुक दिन जो हार पहना था वह भी निकालो ।
यदि आज हम भी शहरों में नागरिक सुरक्षा समितियाँ बनाएँ जो किसी भी हाल में कानून को अपने हाथ में न लें परन्तु संदिग्ध व्यक्ति को पुलिस के हवाले करें तो बहुत सीमा तक आतंकवाद व अपराध से छुटकारा पा सकते हें । बस मंत्र यह होना चाहिए कि वे ही व्यक्ति ऐसे काम से जोड़े जाएँ जो कानून का आदर करते हों । मुम्बई में भी एक व्यक्ति ने आतंककारियों को नाव से उतरकर आते देखा था । यदि नागरिक व पुलिस के सम्बन्ध बेहतर होते तो शायद वह यह खबर पुलिस को दे देता । अवश्यकता है तो नागरिक व पुलिस के बीच एक विश्वास जगाने की । यह तभी हो सकता है जब दोनों एक दूसरे का आदर करें । इसके लिए यह भी आवश्यक है कि पुलिसकर्मी का वेतन व स्तर ऐसा होना चाहिए कि वे सम्मानपूर्ण जीवन यापन कर सकें । पुलिस में खाली पड़े सभी पदों को भरा जा सके ताकि पुलिस की संख्या की कमी कभी भी हमारी असुरक्षा का कारण न बने । जब हम अपने वेतन बढ़ाने के लिए आन्दोलन कर सकते हैं तो उनके लिए क्यों नहीं ? क्यों न हम सरकार से पूछें कि कैसे हमारी लाठीधारी पुलिस इन आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित बढ़िया प्रशिक्षण पाए आतंकवादिओं से निपटेगी । कुछ दिन पहले मैंने समाचार पढ़ा था कि नक्सलवाद से निपटने के लिए बने सुरक्षादल में केवल वरिष्ठ अधिकारियों को ही हैल्मेट दी जाएगी । क्या शेष जवानों के सिर फौलाद के बने हैं ?
सभी लोगों को अपने मताधिकार का उपयोग करना चाहिए ताकि राजनैतिक दल हमें गम्भीरता से लें । सरकार से जवाबदेही होनी चाहिए ताकि वह अपने उत्तरदायित्व को समझे और यदि उसे निभाने में अक्षम है तो त्यागपत्र दे दे ।
घुघूती बासूती
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