क्या हो रहा है, हम कहाँ जा रहे हैं कुछ समझ में नहीं आता । हम केवल टी वी पर आँखें व कान लगाए यह देखते रहते हैं कि हमारे परिवार के लोग, हमारे मित्र सम्बन्धी सुरक्षित हैं और खैर मनाते हैं कि जो मरे या घायल हुए वे हमारे परिवार के नहीं हैं । जिस होटल में मेरा अपना है, वहाँ की कोई खबर नहीं आ रही और यही अच्छा है । परन्तु जो खून बह रहा है वह हमारे भारतीयों का ही है । वे भी किसी के अपने हैं । कोई परिवार बर्बाद हो गया केवल इसलिए कि उनका अभागा सम्बन्धी गलत समय पर गलत जगह पर था ।
आइए अब हम झगड़ें कि ये किसके आतंकवादी हैं, इस धर्म के या उस धर्म के ? क्या मरने वाले को इससे कोई अन्तर पड़ेगा? कोई लोगों से पूछे कि वे किस ब्रांड के आतंकवादी के हाथ मरना पसंद करेंगे ?
कुछ दिन पहले जब कोई इस बात से खुश हो रहे थे कि अब तुम्हारे धर्म के आतंकवादी भी पकड़े जा रहे हैं, मैंने यह टिप्पणी की थी जिसे उन्होंने दिखाने लायक नहीं समझा और बहुत दिन तक तो दिखाई नहीं दी । यह रही वह टिप्पणी ....
जैसे पहले कुछ लोगों के हाथ एक खिलौना लगा था जिसे हाथ में लेकर वे आपको मुँह चिढ़ा रहे थे और आप चिढ़ रहे थे, वैसे ही, लगभग वैसा ही खिलौना आपके हाथ भी लग गया है । बधाई ! अब दोनों एक दूसरे को चिढ़ा सकते हैं । खेल बढ़िया है चालू रहे । सच क्या है, अदालत क्या निर्णय करती है, इससे हमें क्या लेना देना ? हम तो 'तू डाल डाल मैं पात पात' के अन्दाज में यह खेल खेलते रहेंगे । समाज का ढाँचा भरभराकर गिरता है तो गिरे । महाराष्ट्र बिखरे, बिहार जले, पूरा भारत जल उठे, हम तो हाथ तापेंगे, तब तक जब तक हाथ जल ना जाएँ।
लगे रहें, खेल मजेदार है, हर हाल पर चलता रहना चाहिए । हमें तो तब भी लज्जा नहीं आती जब हम इस खेल में पहले भी पिट चुके हों । हमें तो अभियोग लगते ही सब जगह अपराधी ही नजर आते हैं, चाहे वह एक बेगुनाह या गुनहगार पिता हो जिसे गुनाह साबित होने से पहले ही गुनहगार साबित कर दिया गया हो या फिर कोई धार्मिक छोटा बड़ा स्वघोषित नेता हो । हम यह तो कह ही नहीं सकते कि 'यदि' साध्वी, पिता या मौलवी ने ऐसा किया तो बुरा किया । हमें तो पता है कि किया ही है । हम हर हाल में अपने व्यक्तिगत आनन्द से वंचित नहीं रह सकते । मजा तो चाहिए ही चाहिए । यह भूल जाते हैं कि जो घर जल रहा है वह हमारा ही है ।
वैसे अभी कई आतंकवाद शेष हैं, वे भी पंक्तिबद्ध आगे आने को लालायित हैं, क से ज्ञ तक सभी सामने आने चाहिए और यदि अभी पैदा नहीं हुए तो पैदा किए जाने चाहिए । कोई भी किसी से पीछे क्यों रहे ? वैसे भी क्या अंतर पड़ता है कि किस धर्म के बम से हमारे व हमारे बच्चों के परखच्चे उड़ें, बस उड़ने चाहिए। हमारे पास आग में डालने को बहुत घी है, रोटी (यदि वह हो तो)में लगाने को भले ही न हो। भविष्य में भी नए नए आतंकवाद के सबूत जुटते रहें और मजा आता रहे इस कामना के साथ,
किसी धर्म में विशेष विश्वास न रखने वाली,
घुघूती बासूती
आज मन बहुत विचलित व खिन्न है । ऐसे समय में भी हम तेरा मेरा का खेल खेल रहे हैं । हम और कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम आपस में स्नेह व सौहार्द तो बढ़ा ही सकते हैं । एक दूसरे के आँसू बिना उनका धर्म जाति देखे तो पोछ ही सकते हैं ।
आम जनता मर रही है,पुलिस के जवान व वरिष्ठ अधिकारी मारे जा रहे हैं। डी आइ जी मारे जा रहे हैं। और ये सब हमारे अपने ही हैं । अशोक काम्टे भी हमारे ही थे,हेमन्त करकरे,सालस्कर भी और सारे मरने व घायल होने वाले नागरिक भी ।
कल तक यह सब आतंक दूर का समाचार था । मरने व घायल होने वाले केवल एक संख्या ही थे । धीरे धीरे यह सब हमारे निकट आता जा रहा है । दिल्ली में शहीद होने वाला पुलिस अधिकारी हमारी सोसायटी की एक महिला का भाई था । आज मुम्बई में जहाँ यह सब हो रहा है उसी इलाके के एक होटल में मेरे पति ठहरे हैं । बस यही कामना करती हूँ कि जिस होटल में मेरे पति हैं वहाँ के समाचार आने न शुरू हो जाए । स्वास्थ्य लाभ के बाद कल पहली बार एक मीटिंग के लिए मुम्बई गए हैं । बस यही बात कुछ सांत्वना दे रही है कि वे पाँच सितारा होटल में नहीं रुके हैं । वे ठीक हैं,उन्हीं ने फोन करके मुझे टी वी देखने को कहा । परन्तु बहुत से लोग जो होटलों में फंसे हैं वे ठीक नहीं हैं और वे सब भी हमारे ही हैं । किन्हीं ८० मृत व्यक्तियों के परिवारों का जीवन बदल गया है ।
घुघूती बासूती
Thursday, November 27, 2008
Monday, November 24, 2008
इक और विष का प्याला
अपने जीवन में इतना कुछ
इन आँखों ने देखा परखा है,
होता है अन्याय स्त्री पर
बचपन से देखा समझा है।
इतना कि वह सब बहता है
रग रग में बन कर हाला,
कमी है तो आओ ले आओ
इक और विष का प्याला !
घुघूती बासूती
इन आँखों ने देखा परखा है,
होता है अन्याय स्त्री पर
बचपन से देखा समझा है।
इतना कि वह सब बहता है
रग रग में बन कर हाला,
कमी है तो आओ ले आओ
इक और विष का प्याला !
घुघूती बासूती
Saturday, November 22, 2008
वोट हमारे हाथ में है, रिमोट हमारे हाथ में है !
बहुत से चिट्ठों में सरकार के प्रति क्रोध है, व्यवस्था के प्रति क्रोध है । यह क्रोध बहुत सीमा तक सही भी हो सकता है । परन्तु अपना क्रोध दर्शाने का सबसे सरल व अचूक तरीका, वोट भी तो हमारे हाथ में है । हम उसका उपयोग क्यों नहीं करते ? इसी तरह न्यूज़ चैनल्स पर हमारा गुस्सा निकल रहा है जो बहुत सीमा तक सही भी हो सकता है । परन्तु हमारे पास इसके लिए भी अचूक इलाज है रिमोट, हम उसका उपयोग क्यों नहीं करते ?
अब वह जमाना तो रहा नहीं कि राजा के पुत्र को झेलना ही हमारी नियति हो । फिर क्यों राजा कि पत्नी, पुत्र ,पुत्रियों, पुत्रवधुओं, नाती पोतों, पोतियों को झेलें ? बल्कि राजा को ही क्यों झेलें ? पाँच वर्ष का समय दो यदि काम पसन्द है तो फिर से चुनो अन्यथा रास्ता दिखा दो । परन्तु हम तो केवल क्रोध करते हैं । यदि कोई राजनीति की बात करे तो हम उसे तुच्छ महसूस कराते हैं । राजनैतिक लेख हम पढ़ते नहीं, राजनीति की बात हमारे लिए गाली सी बन जाती है । न हम स्वयं राजनीति में जाएंगे, न अपने बच्चों को जाने देंगे, न हम किसी राजनैतिक दल के विचार जानने का यत्न करते, न जानकर यदि सही लगें तो न चन्दा देकर, न साथ देकर उसकी सहायता करते, हम केवल किसी मसीहे की प्रतीक्षारत रहते हैं कि वह आए और हमारा उद्धार करे । मसीहे कहीं से टपकेंगे नहीं, वे हमारे बीच में ही हमारे सहयोग व प्रोत्साहन से हमारे बीच पनपेंगे। उन्हें भी खाद पानी की आवश्यकता है और पनपने के लिए उपयुक्त वातावरण की।
जीवन के प्रत्येक पहलू में दंड या पुरुस्कार की भूमिका होती है । यदि आप सही व्यक्ति को अपना वोट देकर पुरुस्कृत करेंगे और गलत को न देकर दंडित करेंगे तो अपने आप सही लोग सामने आएंगे व गलत लोग बाहर हो जाएंगे । शायद गलत व्यक्ति गलत इसीलिए होता है कि गल्तियाँ करने पर भी हम उसे दंडित नहीं करते । फिर फिर लाकर सिंहासन पर बैठा देते हैं । सही की बात हम सुनते नहीं । या यह कहें कि उससे हम बहसकर अपनी राय बताने का ही कष्ट नहीं करते । राजनीति के पचड़े में कौन पड़े जैसी बात कहने में अपना बड़प्पन दर्शाते हैं । यहाँ पर यह बात भी साफ कर दूँ कि इस हम में 'मैं' भी शामिल हूँ । आपकी तरह ही मैं भी वह पा रही हूँ जिसकी मैं अधिकारी हूँ । यथा राजा तथा प्रजा का जमाना निकल गया, अब यथा प्रजा तथा राजा का जमाना है । हम जैसा नेता, सरकार पाने के लायक स्वयं को सिद्ध करते हैं वैसा ही पाते हैं ।
सो आवश्यकता है जागने की । हममें से कितने लोग किसी दल के चुनावी घोषणापत्र को पढ़ते हैं ? हम कहेंगे कि उनका मूल्य जिस कागज पर वे लिखे गए हैं उससे भी कम है । तो क्यों नहीं हम जब उसी दल का प्रत्याशी हमारे सामने वोट माँगने आता तो उससे पूछते कि भाई/बहन, यह था तुम्हारा घोषणा पत्र इसमें से क्या तुमने किया और क्या करने की दिशा में कदम उठाया ? क्यों नहीं पूछते कि आपके दल में प्रजातंत्र कहाँ है ? क्या आपके दल में अंदरूनी चुनाव होते हैं ? मानती हूँ कि मुझमें भी यह प्रश्न करने की हिम्मत नहीं है तो फिर वोट न देकर तो हम उसे अवगत करा सकते हैं कि यदि जो कहा वह करोगे नहीं तो और अवसर नहीं मिलेंगे ।
वैसे काफी लोग निर्भय होकर लिख रहे हैं, वे भी सही दल के प्रचार प्रसार में आगे आ सकते हैं । परन्तु राजनैतिक लेखों में उनकी भी रुचि हो यह नहीं दिखता । क्या अधिक लोग जानकारीप्रद लेख नहीं लिख सकते या लिखे जाएं तो वहाँ जाकर अपनी राय नहीं दे सकते?
न्यूज़ चैनल्स पर हम भड़क रहे हैं । बहुत सीमा तक सही भड़क रहे हैं । ऐसा लगता ही नहीं कि वे निर्पेक्ष समाचार बता रहे हैं । लगता है कि सनसनी फैला रहे हैं । इन्हें हम वोट नहीं, रिमोट के जरिए बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं । एक बार देखो, दो बार देखो, दस बार जब देख लो कि ये निर्पेक्ष नहीं हैं कि ये समाचार नहीं तमाशा दिखा रहे हैं या फिर कि इनका स्तर गिर गया है तो रिमोट हाथ में लो और इनकी टी आर पी गिरा दो । अब वह समय तो रहा नहीं कि एक ही चैनल हो जो समाचार दिखाती हो । और यदि सबका स्तर गिरा हुआ लगे तो सबका बहिष्कार कर दो । रेडियो का उपयोग समाचार सुनने के लिए करो, समाचार पत्र पढ़ो, ऐसी चैनल्स को मत सुनो । देखिए कैसे सब सही राह पर आ जाएंगी ।
आज के युग में सारा जादू वोट और रिमोट का है। वोट हमारे हाथ में है, रिमोट हमारे हाथ में है तो क्यों न हम यह जादू कर डालें !
घुघूती बासूती
अब वह जमाना तो रहा नहीं कि राजा के पुत्र को झेलना ही हमारी नियति हो । फिर क्यों राजा कि पत्नी, पुत्र ,पुत्रियों, पुत्रवधुओं, नाती पोतों, पोतियों को झेलें ? बल्कि राजा को ही क्यों झेलें ? पाँच वर्ष का समय दो यदि काम पसन्द है तो फिर से चुनो अन्यथा रास्ता दिखा दो । परन्तु हम तो केवल क्रोध करते हैं । यदि कोई राजनीति की बात करे तो हम उसे तुच्छ महसूस कराते हैं । राजनैतिक लेख हम पढ़ते नहीं, राजनीति की बात हमारे लिए गाली सी बन जाती है । न हम स्वयं राजनीति में जाएंगे, न अपने बच्चों को जाने देंगे, न हम किसी राजनैतिक दल के विचार जानने का यत्न करते, न जानकर यदि सही लगें तो न चन्दा देकर, न साथ देकर उसकी सहायता करते, हम केवल किसी मसीहे की प्रतीक्षारत रहते हैं कि वह आए और हमारा उद्धार करे । मसीहे कहीं से टपकेंगे नहीं, वे हमारे बीच में ही हमारे सहयोग व प्रोत्साहन से हमारे बीच पनपेंगे। उन्हें भी खाद पानी की आवश्यकता है और पनपने के लिए उपयुक्त वातावरण की।
जीवन के प्रत्येक पहलू में दंड या पुरुस्कार की भूमिका होती है । यदि आप सही व्यक्ति को अपना वोट देकर पुरुस्कृत करेंगे और गलत को न देकर दंडित करेंगे तो अपने आप सही लोग सामने आएंगे व गलत लोग बाहर हो जाएंगे । शायद गलत व्यक्ति गलत इसीलिए होता है कि गल्तियाँ करने पर भी हम उसे दंडित नहीं करते । फिर फिर लाकर सिंहासन पर बैठा देते हैं । सही की बात हम सुनते नहीं । या यह कहें कि उससे हम बहसकर अपनी राय बताने का ही कष्ट नहीं करते । राजनीति के पचड़े में कौन पड़े जैसी बात कहने में अपना बड़प्पन दर्शाते हैं । यहाँ पर यह बात भी साफ कर दूँ कि इस हम में 'मैं' भी शामिल हूँ । आपकी तरह ही मैं भी वह पा रही हूँ जिसकी मैं अधिकारी हूँ । यथा राजा तथा प्रजा का जमाना निकल गया, अब यथा प्रजा तथा राजा का जमाना है । हम जैसा नेता, सरकार पाने के लायक स्वयं को सिद्ध करते हैं वैसा ही पाते हैं ।
सो आवश्यकता है जागने की । हममें से कितने लोग किसी दल के चुनावी घोषणापत्र को पढ़ते हैं ? हम कहेंगे कि उनका मूल्य जिस कागज पर वे लिखे गए हैं उससे भी कम है । तो क्यों नहीं हम जब उसी दल का प्रत्याशी हमारे सामने वोट माँगने आता तो उससे पूछते कि भाई/बहन, यह था तुम्हारा घोषणा पत्र इसमें से क्या तुमने किया और क्या करने की दिशा में कदम उठाया ? क्यों नहीं पूछते कि आपके दल में प्रजातंत्र कहाँ है ? क्या आपके दल में अंदरूनी चुनाव होते हैं ? मानती हूँ कि मुझमें भी यह प्रश्न करने की हिम्मत नहीं है तो फिर वोट न देकर तो हम उसे अवगत करा सकते हैं कि यदि जो कहा वह करोगे नहीं तो और अवसर नहीं मिलेंगे ।
वैसे काफी लोग निर्भय होकर लिख रहे हैं, वे भी सही दल के प्रचार प्रसार में आगे आ सकते हैं । परन्तु राजनैतिक लेखों में उनकी भी रुचि हो यह नहीं दिखता । क्या अधिक लोग जानकारीप्रद लेख नहीं लिख सकते या लिखे जाएं तो वहाँ जाकर अपनी राय नहीं दे सकते?
न्यूज़ चैनल्स पर हम भड़क रहे हैं । बहुत सीमा तक सही भड़क रहे हैं । ऐसा लगता ही नहीं कि वे निर्पेक्ष समाचार बता रहे हैं । लगता है कि सनसनी फैला रहे हैं । इन्हें हम वोट नहीं, रिमोट के जरिए बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं । एक बार देखो, दो बार देखो, दस बार जब देख लो कि ये निर्पेक्ष नहीं हैं कि ये समाचार नहीं तमाशा दिखा रहे हैं या फिर कि इनका स्तर गिर गया है तो रिमोट हाथ में लो और इनकी टी आर पी गिरा दो । अब वह समय तो रहा नहीं कि एक ही चैनल हो जो समाचार दिखाती हो । और यदि सबका स्तर गिरा हुआ लगे तो सबका बहिष्कार कर दो । रेडियो का उपयोग समाचार सुनने के लिए करो, समाचार पत्र पढ़ो, ऐसी चैनल्स को मत सुनो । देखिए कैसे सब सही राह पर आ जाएंगी ।
आज के युग में सारा जादू वोट और रिमोट का है। वोट हमारे हाथ में है, रिमोट हमारे हाथ में है तो क्यों न हम यह जादू कर डालें !
घुघूती बासूती
Wednesday, November 12, 2008
ओ पहाड़, मेरे पहाड़ !
ओ पहाड़, मेरे पहाड़,
बुला ले वापिस पहाड़
मन व्याकुल है पाने को
तेरी ठंडी बयार ।
तेरे चीड़ और देवदार
दाड़िम,काफल और हिसालू
आड़ू,किलमोड़े और स्ट्रॉबेरी
मन होता है खाने को बारबार ।
तेरी साँपों सी वे सड़कें
शेर के मुँह वाले वे नलके
वे चश्मे और वे नौले
वह स्वाद ठंडे मीठे पानी का ।
ऊबड़ खाबड़ वे रस्ते
वे चीड़ के पत्तों की फिसलन
वे सीढ़ीदार खेत तेरे
वे खुशबू वाले धान तेरे ।
नाक से बालों तक जाते
लम्बे और शुभ टीके
वे गोरी सुन्दर शाहनियाँ
वे सुन्दर भोली सैणियाँ ।
स्वस्थ पवन का जोर जहाँ
घुघुती का मार्मिक गीत जहाँ
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो
की होती गूँज जहाँ ।
हर पक्षी कितना अपना है
हर पेड़ जहाँ पर अपना है
कभी शान्त तो कभी चट्टानें
बहा लाने वाली तेरी नदियाँ ।
वे रंग बिरंगे पत्थर
मन चाहे समेटूँ मैं उनको
हीरे भी मुझे न मोह सकें
पर तेरे पत्थरों पर मोहित हूँ ।
वह छोटा सा शिवाला है
वह गोल द्याप्त का मन्दिर है
हर शुभ काम में साथ मेरे
वे गोल देव जो द्याप्त तेरे ।
वह चावल पीस एँपण देना
वह गेरू से लीपा द्वार मेरा
चूड़े अखरोट का नाश्ता
वे सिंहल और वे पुए ।
पयो भात के संग पालक कापा,
और रसीला रसभात तेरा
बाल मिठाई और चॉकलेट
अब और कहूँगी तो रो दूँगी ।
ओ पहाड़, मेरे पहाड़,
सुन ले तू पुकार
मेरे मन की पुकार
ओ पहाड़, मेरे पहाड़ !
घुघूती बासूती
शब्दार्थः
शाहनियाँ= शाह स्त्रियाँ, शाह कुमाँऊ(उत्तराखंड का पूर्वी भाग ) के साहूकार लोग होते हैं शायद।
सैणियाँ= स्त्रियाँ
घुघुती = एक पक्षी, देखिए घुघूती बासूती क्या है कौन है?
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो = काफल ( एक फल) पक गया है , तूने नहीं चखा है। पहाड़ में एक पक्षी काफल पाक्यो बोलता है और बच्चे उसको चिढ़ाने को कहते हैं कि तूने नहीं चखा है ।
गोल द्याप्त = गोल देवता, हमारे इष्ट देव।
एँपण = कुँमाऊ में फर्श पर दी जाने वाली रंगोली
चूड़ा= घर में पूरे पकने से पहले कूटकर धान से बनाया हुआ स्वादिष्ट पोहा
सिंहल=पुए जैसा एक कुँमाऊनी पकवान जो हर शुभ काम में बनता है ।
पयो= कुमाँऊनी कढ़ी
कापा= पालक पीस कर बनाई एक विशेष सब्जी
रसभात =भट्ट (काले सोयाबीन )पीसकर एक विशेष तरह का व्यंजन
बाल मिठाई= खोये की बनी एक कुमाँउनी मिठाई
चॉकलेट = एक मिठाई जो बाल मिठाई जैसी ही होती है । बाल मिठाई के बाहर होम्योपैथिक गोलियों जैसे मीठे दाने लगे होते हैं चॉकलेट के नहीं ।
यह सब मैं अपनी सीमित यादों में धुँधलाई जानकारी के अनुसार बता रही हूँ । बहुत सी गल्तियाँ भी हो सकती हैं । कुमाँऊनी पाठकों से अनुरोध है कि वे भूलों का सुधार अवश्य कर दें । धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
बुला ले वापिस पहाड़
मन व्याकुल है पाने को
तेरी ठंडी बयार ।
तेरे चीड़ और देवदार
दाड़िम,काफल और हिसालू
आड़ू,किलमोड़े और स्ट्रॉबेरी
मन होता है खाने को बारबार ।
तेरी साँपों सी वे सड़कें
शेर के मुँह वाले वे नलके
वे चश्मे और वे नौले
वह स्वाद ठंडे मीठे पानी का ।
ऊबड़ खाबड़ वे रस्ते
वे चीड़ के पत्तों की फिसलन
वे सीढ़ीदार खेत तेरे
वे खुशबू वाले धान तेरे ।
नाक से बालों तक जाते
लम्बे और शुभ टीके
वे गोरी सुन्दर शाहनियाँ
वे सुन्दर भोली सैणियाँ ।
स्वस्थ पवन का जोर जहाँ
घुघुती का मार्मिक गीत जहाँ
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो
की होती गूँज जहाँ ।
हर पक्षी कितना अपना है
हर पेड़ जहाँ पर अपना है
कभी शान्त तो कभी चट्टानें
बहा लाने वाली तेरी नदियाँ ।
वे रंग बिरंगे पत्थर
मन चाहे समेटूँ मैं उनको
हीरे भी मुझे न मोह सकें
पर तेरे पत्थरों पर मोहित हूँ ।
वह छोटा सा शिवाला है
वह गोल द्याप्त का मन्दिर है
हर शुभ काम में साथ मेरे
वे गोल देव जो द्याप्त तेरे ।
वह चावल पीस एँपण देना
वह गेरू से लीपा द्वार मेरा
चूड़े अखरोट का नाश्ता
वे सिंहल और वे पुए ।
पयो भात के संग पालक कापा,
और रसीला रसभात तेरा
बाल मिठाई और चॉकलेट
अब और कहूँगी तो रो दूँगी ।
ओ पहाड़, मेरे पहाड़,
सुन ले तू पुकार
मेरे मन की पुकार
ओ पहाड़, मेरे पहाड़ !
घुघूती बासूती
शब्दार्थः
शाहनियाँ= शाह स्त्रियाँ, शाह कुमाँऊ(उत्तराखंड का पूर्वी भाग ) के साहूकार लोग होते हैं शायद।
सैणियाँ= स्त्रियाँ
घुघुती = एक पक्षी, देखिए घुघूती बासूती क्या है कौन है?
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो = काफल ( एक फल) पक गया है , तूने नहीं चखा है। पहाड़ में एक पक्षी काफल पाक्यो बोलता है और बच्चे उसको चिढ़ाने को कहते हैं कि तूने नहीं चखा है ।
गोल द्याप्त = गोल देवता, हमारे इष्ट देव।
एँपण = कुँमाऊ में फर्श पर दी जाने वाली रंगोली
चूड़ा= घर में पूरे पकने से पहले कूटकर धान से बनाया हुआ स्वादिष्ट पोहा
सिंहल=पुए जैसा एक कुँमाऊनी पकवान जो हर शुभ काम में बनता है ।
पयो= कुमाँऊनी कढ़ी
कापा= पालक पीस कर बनाई एक विशेष सब्जी
रसभात =भट्ट (काले सोयाबीन )पीसकर एक विशेष तरह का व्यंजन
बाल मिठाई= खोये की बनी एक कुमाँउनी मिठाई
चॉकलेट = एक मिठाई जो बाल मिठाई जैसी ही होती है । बाल मिठाई के बाहर होम्योपैथिक गोलियों जैसे मीठे दाने लगे होते हैं चॉकलेट के नहीं ।
यह सब मैं अपनी सीमित यादों में धुँधलाई जानकारी के अनुसार बता रही हूँ । बहुत सी गल्तियाँ भी हो सकती हैं । कुमाँऊनी पाठकों से अनुरोध है कि वे भूलों का सुधार अवश्य कर दें । धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
Monday, November 10, 2008
स्पर्श
ऐसा क्या होता है
त्वचा के स्पर्श में
जो न करके भी
मन को छू जाता है
जिसकी कर कल्पना
रोमांच हो जाता है ?
स्पर्श, त्वचा का
या मन का
सहला जाता है
कैसा भी हो विपरीत समय
मन के कोमल कोनों को
बहला जाता है ।
कभी निःशब्द रात में
व्याकुल साये सी
गहराती, स्याह आत्मा को
बन उषा किरण
एक आत्मिक स्पर्श
जगमगा जाता है ।
कभी आत्म मंथन के
आत्मघाती कमजोर क्षणों में
बन ओस के कण
झुलसी आत्मा को
जीवन अमृत से
नहला जाता है ।
घुघूती बासूती
त्वचा के स्पर्श में
जो न करके भी
मन को छू जाता है
जिसकी कर कल्पना
रोमांच हो जाता है ?
स्पर्श, त्वचा का
या मन का
सहला जाता है
कैसा भी हो विपरीत समय
मन के कोमल कोनों को
बहला जाता है ।
कभी निःशब्द रात में
व्याकुल साये सी
गहराती, स्याह आत्मा को
बन उषा किरण
एक आत्मिक स्पर्श
जगमगा जाता है ।
कभी आत्म मंथन के
आत्मघाती कमजोर क्षणों में
बन ओस के कण
झुलसी आत्मा को
जीवन अमृत से
नहला जाता है ।
घुघूती बासूती
Wednesday, November 05, 2008
अमेरिका की जनता, तुझे सलाम !
केवल पाँच दशक से कम समय पहले अमेरिका में अफ्रीकी मूल के लोगों (अश्वेत कहें या काले ? ) को अन्य निवासियों के समान मताधिकार आदि प्राप्त हुए । परन्तु इतने कम समय में आज एक अफ्रीकी मूल का व्यक्ति वहाँ का राष्ट्रपति चुन लिया गया है । वे अपने को काला व अमेरिका में कालों पर हुए अत्याचारों की दुहाई देकर या काले, पीलों, भूरों या कुछ ऐसों का गठजोड़ बनाकर नहीं जीते । सबको साथ लेकर अपने स्वयं के बल पर अपने करिश्मे के बल पर जीते ।
क्या ऐसा हमारे देश में नहीं हो सकता ? क्यों हमारे देश में दलितों को अलग दल बनाकर अपने को आगे लाना पड़ता है ? क्यों किसी धर्म या जाति विशेष के लोगों को अपने से जोड़ना पड़ता है ? इसका उत्तर हमारे मुख्य धारा के राजनीतिक दलों को देना होगा । क्यों स्वाभाविक रूप से किसी भी जाति,धर्म के लोग दलों में अपना स्थान बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं आ पाते ? शायद उदाहरण के तौर पर बाबू जगजीवनराम का नाम लिया जा सकता है । यदि ऐसा होता तो काँशीराम को अलग दल नहीं बनाना पड़ता । मायावती शायद किसी मुख्यधारा के दल में अपना स्वाभाविक स्थान पा चुकी होतीं या पाने वाली होतीं । किसी पी ए संगमा या शरद पवार को अलग होकर NCP का गठन नहीं करना पड़ता ।
जब तक राजनैतिक दलों के नेता राजसी अंदाज में अपनी गद्दी अपने बच्चों को उत्तराधिकार में देते रहेंगे हमारे यहाँ कोई ओबामा मुख्यधारा के दल में पैदा नहीं हो पाएगा, पैदा होगा भी तो पनप नहीं पाएगा । शायद यही भारत व अमेरिका में अन्तर है और यही उसे विकसित व हमें चिर विकासशील देश बनाता है । अमेरिका और किसी बात के लिए महान हो या न हो परन्तु इस बात के लिए तो है। बाराक ओबामा अच्छे राष्ट्रपति साबित हों या न हों परन्तु इस बात के लिए अमेरिका की जनता तुझे सलाम !
घुघूती बासूती
पुनश्चः राजनीति की जानकारी नहीं है परन्तु मानवीय मूल्यों की समझ के अनुसार यह लेख लिखा है ।
घुघूती बासूती
क्या ऐसा हमारे देश में नहीं हो सकता ? क्यों हमारे देश में दलितों को अलग दल बनाकर अपने को आगे लाना पड़ता है ? क्यों किसी धर्म या जाति विशेष के लोगों को अपने से जोड़ना पड़ता है ? इसका उत्तर हमारे मुख्य धारा के राजनीतिक दलों को देना होगा । क्यों स्वाभाविक रूप से किसी भी जाति,धर्म के लोग दलों में अपना स्थान बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं आ पाते ? शायद उदाहरण के तौर पर बाबू जगजीवनराम का नाम लिया जा सकता है । यदि ऐसा होता तो काँशीराम को अलग दल नहीं बनाना पड़ता । मायावती शायद किसी मुख्यधारा के दल में अपना स्वाभाविक स्थान पा चुकी होतीं या पाने वाली होतीं । किसी पी ए संगमा या शरद पवार को अलग होकर NCP का गठन नहीं करना पड़ता ।
जब तक राजनैतिक दलों के नेता राजसी अंदाज में अपनी गद्दी अपने बच्चों को उत्तराधिकार में देते रहेंगे हमारे यहाँ कोई ओबामा मुख्यधारा के दल में पैदा नहीं हो पाएगा, पैदा होगा भी तो पनप नहीं पाएगा । शायद यही भारत व अमेरिका में अन्तर है और यही उसे विकसित व हमें चिर विकासशील देश बनाता है । अमेरिका और किसी बात के लिए महान हो या न हो परन्तु इस बात के लिए तो है। बाराक ओबामा अच्छे राष्ट्रपति साबित हों या न हों परन्तु इस बात के लिए अमेरिका की जनता तुझे सलाम !
घुघूती बासूती
पुनश्चः राजनीति की जानकारी नहीं है परन्तु मानवीय मूल्यों की समझ के अनुसार यह लेख लिखा है ।
घुघूती बासूती
धन्यवाद के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं।
मैंने पिछले मंगलवार २८ अक्तूबर को एक पोस्ट में घुघूत जी के स्वास्थ्य के बारे में लिखा था । यह पोस्ट मैंने तब लिखी जब मुझे एहसास हुआ कि ब्लॉगजगत के मित्र मेरी अनुपस्थिति को महसूस कर रहे हैं व कुछ मित्र तो चिंता भी कर रहे हैं । पल्लवी त्रिवेदी जी ने बकायदा एक पोस्ट घुघूती जी कहाँ हैं आजकल? लिखकर यह पता लगाने की कोशिश भी की । मैं तब नेट पर नहीं आ पा रही थी । मानसिक स्थिति भी इस लायक नहीं थी कि कुछ लिख पाती । जब स्थिति में कुछ सुधार हुआ तो मुझे महसूस हुआ कि मुझे अपने मित्रों को सूचित करना चाहिए और इसी प्रयास में मैंने अपनी पिछली पोस्ट घुघूत जी का स्वास्थ्य समाचार लिखी । एक मित्र, संजीत त्रिपाठी जी ने एक पोस्ट सूचना लिखकर सबको घुघूत जी के औपरेशन के बारे में सूचित किया ।
मुझे यह देखकर बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि ५३ साथियों ने मेरी उस पोस्ट पर टिप्पणी की और घुघूत जी के स्वास्थ्य के लिए अपनी शुभकामनाएं भेजीं । क्या ऐसा कहीं और हो सकता है ? यह हमारे ब्लॉगजगत में ही हो सकता है । मुझे तब लगा कि सच में यह आभासी संसार भी मानवीय संवेदनाओं व एहसासों से भरा हमारा एक वृहत् परिवार ही है । घुघूत जी को मैंने आप सबके संदेश दे दिए हैं व वे भी मेरी तरह आप सब साथियों का तहेदिल से धन्यवाद कर रहे हैं । आपके स्नेह व अपनेपन का यह एहसास हमें आने वाले दिनों की सभी चुनौतियों का सामना करने का साहस देगा । चुनौतियाँ तो सच में बहुत हैं, पास आती सेवानिवृत्ति का समय, जीवनशैली में बदलाव, एकबार फिर से अपना काम स्वयं करने व आत्मनिर्भर होने की ओर बढ़ते उनके कदम, और इस सबमें मेरा छोटा सा सहयोग ! परन्तु यह सब तब काफी सरल हो जाता है जब मित्रों की शुभकामनाएं भी हमारे साथ होकर हमारे कदमों को ताकत देती हैं । सच में इनकी शक्ति का अनुमान तभी लगाया जा सकता है जब इनकी आवश्यकता आन पड़ती है ।
पल्लवी जी, संजीत जी व मुझे पढ़नेवाले, टिप्पणी करने वाले व घुघूत जी के लिए शुभकामनाएं भेजने वाले व मन ही मन एक पल को उनका शुभ चाहने वाले सभी साथियों को हमारा हार्दिक आभार ।
भविष्य में भी ऐसे ही आपका स्नेह बना रहे यह कामना करती हुई,
घुघूती बासूती
मुझे यह देखकर बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि ५३ साथियों ने मेरी उस पोस्ट पर टिप्पणी की और घुघूत जी के स्वास्थ्य के लिए अपनी शुभकामनाएं भेजीं । क्या ऐसा कहीं और हो सकता है ? यह हमारे ब्लॉगजगत में ही हो सकता है । मुझे तब लगा कि सच में यह आभासी संसार भी मानवीय संवेदनाओं व एहसासों से भरा हमारा एक वृहत् परिवार ही है । घुघूत जी को मैंने आप सबके संदेश दे दिए हैं व वे भी मेरी तरह आप सब साथियों का तहेदिल से धन्यवाद कर रहे हैं । आपके स्नेह व अपनेपन का यह एहसास हमें आने वाले दिनों की सभी चुनौतियों का सामना करने का साहस देगा । चुनौतियाँ तो सच में बहुत हैं, पास आती सेवानिवृत्ति का समय, जीवनशैली में बदलाव, एकबार फिर से अपना काम स्वयं करने व आत्मनिर्भर होने की ओर बढ़ते उनके कदम, और इस सबमें मेरा छोटा सा सहयोग ! परन्तु यह सब तब काफी सरल हो जाता है जब मित्रों की शुभकामनाएं भी हमारे साथ होकर हमारे कदमों को ताकत देती हैं । सच में इनकी शक्ति का अनुमान तभी लगाया जा सकता है जब इनकी आवश्यकता आन पड़ती है ।
पल्लवी जी, संजीत जी व मुझे पढ़नेवाले, टिप्पणी करने वाले व घुघूत जी के लिए शुभकामनाएं भेजने वाले व मन ही मन एक पल को उनका शुभ चाहने वाले सभी साथियों को हमारा हार्दिक आभार ।
भविष्य में भी ऐसे ही आपका स्नेह बना रहे यह कामना करती हुई,
घुघूती बासूती
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