Tuesday, October 28, 2008

घुघूत जी का स्वास्थ्य समाचार

घुघूत जी का स्वास्थ्य समाचार

सभी बलॉगर साथियों व उनके परिवारों को दीपावली की शुभकामनाएं ।

आज से ठीक दो महीने पहले बुधवार को बड़ी बिटिया और मैंने घुघूत जी को हृदय की बायपास सर्जरी के लिए दिल्ली के एक हस्पताल में भर्ती करवाया था । भर्ती करवाते समय उनके दादा (भाई)भी हमारे साथ थे । थोड़ा सा भय तो था परन्तु बहुत नामी सर्जन के पास जाने से थोड़ी संतुष्टि भी थी । शाम तक उनके दूसरे भाई भी जो दो साल पहले स्वयं यह सर्जरी करवा चुके हैं अपने विदेश प्रवास से लौटकर मिलने आए । अगले दिन सुबह ६ बजे उन्हें औपरेशन थिएटर ले जाया गया । सर्जरी किए जाने वाले मरीजों के घरवालों में से केवल एक को एक प्रतीक्षा कक्ष में बैठाया गया । जिसकी भी सर्जरी हो जाती उसका नाम पुकारकर सम्बन्धी को सूचित किया जाता । फिर वह आइ सी यू में टोपी, दस्ताने व जूतों के ऊपर कवर पहनकर व हाथों को किटाणुमुक्त कर एक नजर अपने मरीज को देख सकता था । डॉक्टर से दो एक प्रश्न पूछ सकता था । लगभग पौने बारह बजे हमें सूचना दी गई कि औपरेशन हो गया है । मैं जाकर देख आई । उस समय आपका अपना व्यक्ति इतना असहाय, कमजोर व पराश्रित लगता है कि मन काँप जाता है । विभिन्न उपकरणों पर उसका जीवन निर्भर होता है । साँस तक स्वयं नहीं ले रहा होता है ।

फिर आइ सी यू के मरीजों के सम्बन्धियों के लिए बने प्रतीक्षा कक्ष में जाकर प्रतीक्षा करनी होती है। वहाँ भी जब किसी सम्बन्धी को डॉक्टर या मरीज बुलाता तो घोषणा की जाती । बड़ी बिटिया और मैं वहाँ बैठे घुघूत जी के होश में आने की प्रतीक्षा करने लगे । हमें बताया गया था कि लगभग आठ घंटों में होश आ जाएगा । लगभग साढ़े पाँच बजे उनका नाम पुकारा गया । पास पर हस्ताक्षर करवाकर मैं यह सोचकर मिलने गई कि शायद होश आ गया है । आइ सी यू में गई तो मुझे एक फॉर्म पर हस्ताक्षर करने को कहा गया । बताया गया कि अधिक रक्तस्राव के कारण दोबारा औपरेशन थिएटर ले जाना पड़ेगा और रक्तस्राव का कारण देखना व निदान करना होगा । मैंने हस्ताक्षर कर दिए । बताया गया कि अभी कुछ देर रक्तस्राव कम होने की प्रतीक्षा करेंगे । मुझे कहा गया कि औपरेशन थिएटर ले जाते समय मुझे बता दिया जाएगा । मैं वापिस प्रतीक्षा कक्ष में आ गई । बीच बीच में स्थिति का फोन पर पता लगाती रही। बताया गया कि रक्तस्राव कम हो गया है, शायद औपरेशन की आवश्यता नहीं पड़ेगी । दादा को फोन पर बताया तो उन्होंने भी जान पहचान के डॉक्टरों से बात की । घुघूत जी का भतीजा भी हमारे साथ था । रात को लगभग एक बजे जब फोन पर पूछा तो कहा गया कि आप यहाँ आ जाइए । बिटिया और मैं भागे भागे गए तो पता चला कि घुघूत जी को औपरेशन थिएटर ले जा चुके हैं । एक बजे से तीन बजे तक हम वहीं बाहर प्रतीक्षा करते रहे । नई नौकरी होने के कारण मैंने अपनी छोटी बेटी को शनिवार की सुबह को हवाईजहाज से दिल्ली पहुँचने को कहा हुआ था । अब स्थिति ठीक नहीं लग रही थी सो उसे फोन करके शुक्रवार याने उस सुबह को ही निकलने को कहा । तीन बजे एक सर्जन हाथ में एक खून के थक्कों से भरा जार लेकर बाहर निकलीं । उन्होंने बताया कि रक्तस्राव बिल्कुल ही बंद हो गया था, जो भी ठीक नहीं था । रक्तस्राव निकालने को जो ट्यूब डाली हुईं थीं वे पूरी तरह से थक्कों से भर गईं थीं । खैर, हमने फिर कुछ क्षण को घुघूत जी को देखा और वापिस प्रतीक्षा कक्ष में जाकर प्रतीक्षा करने लगे ।

सुबह छोटी बेटी भी पहुँच गई और हम उनके होश में आने की प्रतीक्षा करने लगे । लगभग ३० घंटों बाद दोपहर बारह के बाद उन्हें होश आया । वे अभी भी वैन्टिलेटर की सहायता से साँस ले रहे थे । वहाँ तीन आइ सी यू थे । मरीज की स्थिति में सुधार के अनुसार पहले से दूसरे फिर तीसरे में ले जाया जाता है । कहाँ कुल तीन दिन आइ सी यू में रहना था परन्तु वे तीन दिन पहले में व फिर दो दिन दूसरे व तीसरे में रहे । ये पाँच दिन हम लगभग हर समय प्रतीक्षा कक्ष में रहे । इसी बीच पता चला कि हस्पताल के एकदम पास एक धर्मशाला/गेस्टहाउस है, जो केवल मरीजों के परिचारकों के लिए बनी है । हमने वहाँ एक कमरा लिया और स्नानादि की सुविधा पास ही हो गई ।
छठे दिन घुघूत जी को उनके कमरे में ले जाया गया । अब मैं व एक बेटी उनके साथ रह सकते थे । हमें कहा गया था कि आठ दिन का पैकेज होता है और एक दो दिन अधिक लग सकते हैं । परन्तु घुघूत जी को कोई संक्रमण हो गया और हर दिन खून की जाँच की जाती और रिपोर्ट की प्रतीक्षा रहती । इस तरह दो सप्ताह निकल गए तब जाकर उन्हें घर ( दिल्ली में ही बिटिया के) ले जाया जा सका । सौभाग्य से घर लिवाने के समय तक हमारी बिटिया का पति जो विदेश गया हुआ था भी आ गया । हमने सोचा अब सब ठीक है परन्तु अभी भी समस्याएँ शेष थीं । हस्पताल ले जाकर टाँके कटवाए। दो दिन बाद ही देखा कि उनके एक घाव में संक्रमण हो गया है। फिर से हस्पताल जाकर दिखाया फिर से एन्टी बॉयेटिक्स शुरू किए गए । गुजरात वापिस जाने का समय आता जा रहा था । अब एक और घाव में संक्रमण हो गया । एक बार फिर हस्पताल गए । टिकट दो बार वापिस किए और अंत में डरते डरते १० अक्तूबर को वापिस गुजरात आ गए । पास के शहर के अपने डॉक्टर को फोन पर हाल सुनाया । वे अगले दिन अपने नर्सिंग होम में एक अन्य डॉक्टर को बैठा हमारे घर देखने आए । लगाने को नया मरहम बताया और तब से अब तक पूरी तरह से घाव भरने की प्रतीक्षा कर रही हूँ । आज कह सकती हूँ कि निन्यानवें प्रतिशत भर गए हैं ।

लगभग ढाई महीने के बाद घुघूत जी घंटे, दो घंटे के लिए दफ्तर गए हैं । (यह शाम को ४ बजे लिख रही हूँ ) कारखाने मत जाना कहकर भेजा है । सो आज यह रिपोर्ट आप सब तक पहुँचा रही हूँ । अभी भी पूरी तरह से स्वस्थ महसूस नहीं कर रहे हैं । डॉक्टरों ने कहा है कि पूरी तरह ठीक होने में तीन महीने लगते हैं । घुघूत जी को डाइबिटीज़ है सो शायद अधिक समय लग रहा है । मित्रों व प्रियजनों की शुभकामनाओं व सहयोग से यह विपरीत समय बीत ही गया है और आशा है कि तीन महीने बीतते बीतते वे पूर्ण रूप से स्वस्थ महसूस करेंगे ।

इन कठिन दिनों में हमें कुछ लोगों का बहुत सहयोग मिला । भर्ती करने से पहले ही चार बोतल खून का प्रबन्ध करने को कहा गया था । बिटिया ने जिस संस्थान से पी एच डी की थी वहाँ के छात्र छात्राएँ आकर खून दे गए । उम्र में कई वर्ष बड़े दादा हर समय सहायता को तत्पर रहते थे, जबकि उनका स्वास्थ्य भी कोई बहुत अच्छा नहीं चल रहा था । मेरे पति की कम्पनी के एक व्यक्ति दिल्ली में एक छोटा सा औफिस चलाते हैं । वे व कम्पनी भी सदा सहायता देते रहे । उन्हीं के द्वारा हम एक एजेंसी से कार किराये पर लेते थे। उसका ड्राइवर घर के सदस्य की तरह हर समय सहायता को तत्पर रहता था। जब खून देने की बात आई तब भी देने को तैयार था । बिटिया का घर हस्पताल से बहुत दूर था । वही जब तब उसे लेकर आता जाता । मैं तो दो सप्ताह घर ही नहीं गई । हवाईअड्डे से मेरी छोटी बेटी को भी वही लेकर आया । जिस धर्मशाला / गेस्टहाउस की मैं बात कर रही थी, वहाँ का मैनेजर भी बहुत भला था । हम लोग अवसर मिलते ही सेठ साहूकारों के विरुद्ध बोलते हैं । परन्तु यही वणिक जाति ही सबसे अधिक परोपकारी काम, जैसे धर्मशाला आदि बनवाने का काम करती है । यहाँ भी न्यूनतम किराए पर सभी सुविधाएँ प्रदान की गईं थीं । मेरी समझ में यह गेस्टहाऊस मारवाड़ी समाज के धनी लोगों ने बनवाया है । यह एक ऐसा इलाका में है जहाँ यदि वे होटल चलाएँ तो न जाने कितना पैसा कमा सकते हैं। परन्तु सबसे अधिक सहायता हस्पताल के चतुर्थ वर्ग के कर्मियों ने की । हमारे पास के शहर के डॉक्टर दिल्ली में भी फोन पर बराबर सम्पर्क में बने रहे व मुझे हिम्मत देते रहे । दो ब्लॉगर साथी जिन्हें हमारे वहाँ होने की खबर मिली हस्पताल में मुझसे मिलने भी आए ।

घुघूती बासूती

Friday, October 24, 2008

विसंगति

बगीचे में था
एक फलदार नींबू का पेड़
रसदार नींबुओं से लदा
एक विशाल वृक्ष,
परन्तु
उसकी बूढ़ी टहनियों को
अन्दर ही अन्दर से
दीमक खा रहे थे
बहुत इलाज कराए
एक डाली सूख ही गई ।

फिर जब आया वर्षा का मौसम
तेज हवाएँ उसे डगमगाने लगीं,
मैंने एक अनाम वृक्ष की
सूखी लकड़ी का टेका बना
दिया उसको सहारा ।

आधी वर्षा ‌ॠतु को
तो वह झेल गया
फल भी देता रहा,
दो महीने घर से बाहर रही
लौट कर आई तो देखा
नींबू का वृक्ष तो
सूखकर गिर चुका था
परन्तु उस अनाम वृक्ष की
वह सूखी टहनी
नींबू की टेका,
जड़ें जमाकर
हरे पत्तों से लदी
लहलहा रही थी।

विचित्र है प्रकृति का खेल
विसंगति तो देखो
बैसाखियाँ चल पड़ती हैं
पाँव जड़ हो जाते हैं ।

घुघूती बासूती

Saturday, October 18, 2008

उसका साथ

सुलगते तनमन पर
सावन की भीगी हवाओं सा,
तपती मरु पर
वर्षा की बूँदों सा,
पैरों पड़ी बेड़ियों के घावों पर
शीतल मरहम सा,
स्वाति नक्षत्र में
बोता सीप में मोती सा,
चिर प्रतीक्षा कराता
दिन २९ फरवरी सा ।

घुघूती बासूती

Monday, October 13, 2008

कहाँ जाएँ ?

जब सहारे ही कोमल बेल बन जाएँ
तो बेलें सहारे को कहाँ जाएँ ?
दूर रहने लगें जो मित्र थे अपने
तो मित्र खोजने कहाँ जाएँ ?
जब परछाई ही अपनी डराने लगे
तो निर्भय होने कहाँ जाएँ ?


जब रिसने लगें चट्टानें हीं
तो सिर टकराने कहाँ जाएँ ?
खिसकने लगे पैरों तले की धरती
तो पैर टिकाने कहाँ जाएँ ?
जब सरक जाएँ दीवारें ही अपनी जगह से
तो छत टिकाने को कहाँ जाएँ ?


जब टुकड़ा टुकड़ा आकाश टूटे
तो उन टुकड़ों को लगाने कहाँ जाएँ ?
जलाने लग जाए चाँद गगन का
तो जलन बुझाने कहाँ जाएँ ?
जब घायल कर जाएँ तितलियाँ भी
तो बचने को कहाँ जाएँ ?


जब रुलाने लगें कहकहे भी
तो मुस्कराने को कहाँ जाएँ ?
रूठने लगे जिन्दगी ही जब हमसे
तो जीने को कहाँ जाएँ ?
जब खो दें घर का पता अपना
तो खुद को ढूँढने कहाँ जाएँ ?


घुघूती बासूती