Monday, July 28, 2008

आतंकवादी क्या चाहते हैं?

भारतीयों के लिए आतंकवाद नया नहीं है। वर्षों से हम इसे झेल रहे हैं। आज तक हम आतंकवाद से निपटने के लिए कोई नीति नहीं बना सके। आज हमारे गृहमंत्री कह रहे थे कि वे योजना बना रहे हैं। अधिक सही यह कहना होगा कि वे योजना बनाने की योजना बना रहे हैं। क्या हमारा जीवन इतना सस्ता है? कितने जीवन जाने के बाद योजना बनाने की योजना बनेगी? क्या यह बात मंत्रीजी मृतकों, आहतों व उनके परिवारों को कह सकते हैं? हमारे देश में मंत्रियों व बड़े दलों के नेताओं के सिवाय किसी की जान की कीमत नहीं है। मानती हूँ कि आतंकवादियों को अपना निशाना चुनने की छूट होती है और इतने बड़े देश की हर गली का पहरा देना कठिन है। पुलिस और गुप्तचर विभाग का काम कठिन होता है, विशेषकर तब जब हमारे अपने कुछ देशवासी आतंकवादियों का साथ दे रहे हैं। जबतक आतंकवाद बाहर से ही आता था वे कभी भी भारत के कोने कोने में अपने अड्डे नहीं बना सके। अब जब यह हमारा अपना घरेलू उत्पाद बनता जा रहा है तो उनकी पहुँच भी हमारे आपके घर तक हो गई है। पुलिस का एक बड़ा हिस्सा नेताओं की सुरक्षा में लगा रहता है। पुलिस बल बढ़ाना तो दूर की बात है यहाँ तो ढेरों पद खाली पड़े रह जाते हैं। पुलिसकर्मी बहुत कम वेतन व सुविधाओं के साथ लम्बी पारी में काम करते हैं। न ही आतंकवाद पर कोई पारदर्शी नीति ही बनी है। परन्तु यह सब कारण तब समझ में आते यदि सोलह में से आधे बम भी बरामद कर निष्क्रिय कर दिये जाते।

कब तक हम सरकार के जागने की प्रतीक्षा करते रहेंगे? क्या हम स्वयं सचेत व जागृत नहीं हो सकते? क्या यह सम्भव नहीं है कि हमारे समाज के ही किन्हीं सम्मानित लोगों के अन्तर्गत हम सुरक्षा समितियाँ बनाएँ? किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या गतिविधि की सूचना पुलिस को दी जाए। बस कानून को अपने हाथ में न लेने का ध्यान रखा जाए।

किसी समुदाय को दोष देना सबसे सरल होता है। यह गल्ती हम अक्सर कर देते हैं। हमें सबसे पहले यह सोचना होगा कि क्या विस्फोटक पदार्थ केवल हमारे समुदाय की जान लेता है। क्या सच में आतंकवादी को किसी धर्म या समुदाय से कोई वास्ता होता है? वह तो केवल अपने गुट में लोगों की संख्या बढ़ाना चाहता है। जब हम किसी समुदाय विशेष को दोषी मानते हैं तो हम उन्हें अपने से अलग कर देते हैं। आतंकवादी क्या चाहते हैं? क्या उनका उद्देश्य केवल यहाँ वहाँ सौ पचास लोगों को मारना व घायल करना होता है? क्या ऐसे वे हमें समाप्त करने की आशा करते हैं? क्या वे कुछ इमारतें ध्वस्त करके भारत को नष्ट कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। उनका उद्देश्य तो केवल घृणा फैलाना है, दंगे करवाना है। ताकि वे हमें बाँट सकें। हममें आपसी संदेह पैदा कर सकें। दंगे ही वे तरीका हैं जिससे उन्हें नए साथी अपने दल के लिए मिलते हैं। हर दंगे से हममें से कुछ लोग समाज से दूर हो जाते हैं। यदि हम अपने देश, अपने समाज को बचाना चाहते हैं तो हमारा कर्त्तव्य है कि हम उन्हें अपने उद्देश्य में सफल न होने दें। समाज के हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि आतंकवादियों को शह न दें, उन्हें किसी प्रकार की सहायता न दें अपितु पुलिस को उनकी खबर दें, चाहे वह हमारा कितना भी अपना ही क्यों न हो। यही एक तरीका है जिससे हम अपने समाज को सुरक्षित बना सकते हैं।

यह आतंक केवल हमें क्रोधित कर घृणा व दंगे फैलाने के लिए किया जा रहा है। याद रहे कि यदि हम बँट गए तो इसका कोई अंत नहीं है। आज हम धर्म के आधार पर बँटेंगे, कल जाति, भाषा, प्रदेश के नाम पर। फिर कुछ भी नहीं बचेगा, न देश न हम। यही तो आतंकवादियों का उद्देश्य है। क्या हम उन्हें सफल देखना चाहते हैं?

घुघूती बासूती

Wednesday, July 23, 2008

मृत्यु

पिछले लगभग दो तीन महीने से अधिक समय से ब्लॉग कम ही पढ़ पा रही थी। आज समय मिला और बहुत से नए पुराने ब्लॉग पढ़े। उनमें ही श्री सुरेश चिपलूनकर जी के लेख 'अन्तिम संस्कार के विषय में शवयात्रा, श्मसान व शवदाह( भाग१, भाग२ , भाग३ )' के बारे में तीन भागों में पढ़ा। उनके विचार व इस विषय पर जिसपर कोई भी बात करने से हिचकिचाता है, लिखना अच्छा लगा। उन्होंने इन लेखों को एक पुरुष के नजरिये से बहुत भली भाँति लिखा है। मृत्यु से जुड़ी सारी आवश्यक बातों के बारे में बात की है। यहाँ तक कि शरीर दान, नेत्र दान आदि के विषय में भी और पर्यावरण की दृ्ष्टि से विद्युत दाहघरों की भी बात की है। ये तीनों लेख सहेजने लायक हैं। परन्तु मृत्यु के साथ और भी बहुत सी भावनात्मक बातें जुड़ी हैं। मैं इन पर बात करना चाह रही हूँ। विषय कठिन व गंभीर है , सो यदि कोई भी बात कहीं गलत या हृदय को दुखाने वाली हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ।

मृत्यु से मेरा नाता बहुत पुराना है। बचपन में ही ११ वर्ष की आयु में पहली बार इस त्रासदी को जिया था। मृत्यु क्योंकि अपनी की थी पर अपने घर में नहीं हुई इसलिए शव नहीं देखा, केवल दुख झेला। उस समय की याद करने पर यही सोचती हूँ कि आस पड़ोस के लोग आमतौर पर वयस्कों को ही संभालते रह जाते हैं व बच्चों को भूल जाते हैं। घर के वयस्क भी अपने दुख से इतने त्रस्त होते हैं कि बाल हृदय पर क्या बीत रही होगी, सोचने की सामर्थ्य खो बैठते हैं। बड़े रो लेते हैं, चीख लेते हैं, उन्हें सम्भालने को उनके मित्रों व सम्बन्धियों की पंक्ति खड़ी होती है, परन्तु बच्चे यदि रो नहीं रहे होते तो अपने हाल पर छोड़ दिए जाते हैं। आमतौर पर बच्चे सन्न रह जाते हैं, वे रो नहीं पाते। जो हो रहा होता है उसका उनको कोई पूर्व अनुभव नहीं होता। वे नहीं जानते कि उनसे कैसे व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। माँ को वे चुप नहीं करा पाते क्योंकि माँ लोगों से घिरी होती है। यदि मृत्यु किसी अन्य शहर में हुई होती है तो पिता सूचना मिलते ही किसी के आँसू पोछने की बजाय वहाँ का रुख कर लेते हैं। घर में रह जाते हैं बिलखती माँ व नासमझ बच्चे।

जब पिताजी मृत्यु का तार लेकर आए तो मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो बाल बना रही थी। माँ दहाड़ें मारकर रोने लगीं व 'यह सच नहीं हो सकता, कह दो कि यह झूठ है' कह रही थीं। मैं चुपचाप स्कूल के लिए चली गई। दो तीन पीरियड स्कूल में बैठी माँ के रोने को याद करती रही। यह सोचती रही कि माँ अब भी रो रही होंगी। ना जाने उनका क्या हाल होगा। दीदी मर नहीं सकती। यह सब गलत है, सोचती रही। फिर माँ को देखने की इच्छा बलवती हुई। अध्यापक से घर जाने की अनुमति माँग घर वापिस चली गई। परन्तु तब तक तो वहाँ स्त्रियों का जमावड़ा लग गया था। मेरी माँ मेरी नहीं रही थीं। वे मेरी ओर नहीं देख रहीं थीं। वे उस पल केवल मृत दीदी की माँ रह गईं थीं। वे मुझे यह सब क्या हो गया नहीं समझा रहीं थीं। मेरी वह माँ, जो हमसे मित्रों सा व्यवहार करती थीं, मुझे कुछ भी समझाने की स्थिति में नहीं थीं। मैं केवल अपने बल पर उस स्थिति से निपट सकती थी। उस उम्र में उस स्थिति से निपटने की कला व समझ मुझमें बिल्कुल नहीं थी। मैं केवल दीदी की बच्ची के बारे में सोच रही थी। सोच रही थी कि वह तो केवल डेढ़ वर्ष की है। सोच रही थी कि दीदी तो भगवान की अनन्य भक्त थीं। मृत्यु के दिन भी तो उन्होंने भगवान के लिए ही व्रत रखा हुआ था। पिताजी भगवान के इतने बड़े भक्त थे कि भगवान तो मेरी नजरों में सदा उनके मित्र ही रहे। जब भी मैं भगवान के बारे में सोचती थी या आज भी सोचती हूँ तो पिताजी की याद आ जाती है। बस अपना गुस्सा निकालने को मुझे भगवान ही मिले। और किससे कुछ कहती या पूछती ? सो बगीचे में जो भगवान की नकली पत्थर की प्रतिमा रख हम बच्चे पूजा का स्वांग करते थे उसे उठाकर बगीचे से बाहर फेंक दिया।

अब क्या किया जाए ? सुना था कि मृत व्यक्ति की आत्मा भगवान के पास जाती है। भगवान आकाश में निवास करते हैं । सो सारा दिन आकाश की ओर देखती रही कि शायद दीदी की आत्मा उड़ती हुई जाती नजर आ जाए। वे तो मुझे संसार में सबसे अधिक प्यार करती थीं, शायद वे कुछ पल मेरे पास भी आ जाएँ। ऐसे ही ना जाने कैसे शाम हुई। भाई व दूसरी दीदी का स्कूल कॉलेज से घर आने का समय हुआ। दोनों पास के शहर में पढ़ने जाते थे। मैं उन्हें यह समाचार देने सड़क पर चली गई। भाई को कुछ कहती इससे पहले ही उसके गालों पर आँसुओं की धार देखी। पूछा 'तुम्हें कैसे पता'तो उन्होंने बताया कि अमुक आँटी ने उन्हें जब दोस्तों के साथ हँसता हुआ आते देखा तो कहा कि,'तू ताँ एन्ना हँसदा हुआ आ रिया है, तेन्नू पता नहीं तेरी वड्डी पेण मर गई है।'उस उम्र में भी मन हुआ उस आँटी को पीट दूँ। रोते भाई व दीदी के साथ घर आई। परन्तु मेरी आँखें? उन्होंने तो अभी तक रोना ही नहीं सीखा था। बचपन से वीरांगना रही मैं दोनों को चुप करा रही थी। परन्तु वे मेरी ओर देख ही कहाँ रहे थे? वे घर आकर मेज पर बस्ते पटक उनके ही ऊपर सिर रख जो रोना शुरू हुए तो रोते ही जा रहे थे। रात हो रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। माँ की स्थिति पागलों की सी थी। भाई व दीदी जिनपर मैं निर्भर कर सकती थी, रोए जा रहे थे। मैं रसोई में गई व आलू की सब्जी व रोटी बनाकर तीनों से खाने का अनुरोध करती रही।

वह काली रात जैसे तैसे बीती। फिर वही रोना धोना। स्त्रियों का घर आकर अफ़सोस करना व घर से निकलते ही दीदी की मृत्यु के विषय में कयास लगाना। मैंने अपनी आँखों से छाती पीटती स्त्रियों को सड़क पर जाकर हँसी मजाक करते देखा। वे दृष्य मेरी आँखें कभी नहीं भूल सकतीं। तीसरे दिन वह मैं ही थी जो डाकघर जाकर दीदी की मृत्यु के वृतांत वाला पत्र लेकर घर आई। रास्ते भर पढ़ती जा रही थी व सो्च रही थी कि क्या मुझे भी किसी ट्रक के नीचे आकर मर नहीं जाना चाहिए। उनके बिना कैसे जिऊँगी। बचपन से सुनती आई थी कि मेरे जन्म के पीछे उनका हाथ था। उनकी किसी सहेली के घर जब छोटी बहन पैदा हुई तो उन्होंने भी 'मुझे एक छोटी सी बहन चाहिए' कहकर घर में तूफान मचा दिया था। मेरा बचपन मुख्यतः उनकी गोद में ही बीता था। मैं ही उनकी सबसे प्रिय थी। विवाह के बाद भी मुझे ही वे अपने साथ ले जाना चाहती थीं। जीजाजी तो चाहते ही थे कि मैं भी उनके साथ रहूँ।

अब सोचती हूँ तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचती हूँ कि जिस भी परिवार में किसी की मृत्यु हो,उस परिवार के मित्रों को बच्चों को नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए। वे रो नहीं सकते तो क्या,वे अन्दर ही अन्दर घुट रहे होते हैं। उनसे बात करनी चाहिए,उन्हें रोने का अवसर देना चाहिए। और कुछ नहीं तो माँ का ध्यान उनकी ओर आकर्षित करना चाहिए। मैंने तो इस बात को गाँठ बाँध लिया है।

मेरा मृत्यु से दूसरा सामना विवाह के बाद हुआ। पास में ही पति के कारखाने में ही काम करने वाले एक सज्जन की कारखाने मे दुर्घटना हो गई। मैं पड़ोस में अपनी एक सहेली के घर चकली(एक तरह की नमकीन) बनाने गई थी। हम मिलकर ही कुछ भी लम्बा काम हाथ में लेते थे। जब घर लौटी तो पति की खून से भीगी कमीज देखी। उसे हाथ में लेकर कुछ समझने की कोशिश ही कर रही थी कि पति का फोन आया। पूछा कि तुमने कमीज देख ली। कखग की दुर्घटना हो गई है। वह खून मेरा नहीं है उनका है। मैं उन्हें सीढ़ियों से कन्धे पर उठाकर एम्ब्यूलेंस तक ले गया था इसलिए खून से मेरी कमीज भर गई। वह खून मेरे पति का न होकर किसी और के पति का था, जानकर जो राहत मुझे हुई, आज भी सोचती हूँ तो मन ग्लानि व अपने स्वार्थीपन पर लज्जित होता है। परन्तु मृतकों की सूची में आपके अपनों का नाम नहीं है जानकर कौन खुश नहीं होता होगा। खैर, उस मृत्यु में मैंने यह ध्यान रखा कि उनकी नन्हीं सी बेटी का ध्यान अवश्य रखा जाए।

मृत्यु ने हमारे घर की राह देख ली थी,सो उसने पीछा नहीं छोड़ा। घर में और भी मृत्यु हुई। मैं दूर देश में थी। असहाय सी बस उसके ताँडव को अपनी मन की नजरों से देखती रही,महसूस करती रही। वह जो मुझे जान से भी अधिक प्रिय थी,मेरी बड़ी भी थी, सखी भी थी, जिससे मन की हर बात कर लेती थी,अपने प्यार से लेकर उसके प्यार तक की, हर बात कर लेती थी, चली गई थी। और मैं, सूखी आँखें लिए बस बैठी रही।

जब हम दक्षिण भारत में थे तो एक और मृत्यु को बहुत करीब से देखा व जाना। हमारे घर के पास रहने वाले एक वरिष्ठ मैनेजर की अकाल मृत्यु हुई। मुझे पति के एक सहयोगी की पत्नी ने फोन पर सूचना दी। पति जो की वहाँ वरिष्ठतम पद पर थे बाहर गए हुए थे। मृत व्यक्ति का बड़ा बच्चा मेरी छोटी बेटी का सहपाठी था। दोनों बेटियों को लेकर उनके घर भागी। रास्ते में समझाती गई कि तुम दोनों बच्चों का ध्यान रखना। उन्हें सम्भाल लेना।

मृत व्यक्ति पति से कनिष्ठ थे। पत्नी मुझसे उम्र में दो चार साल कम। अकाल मृत्यु थी। वह व्यक्ति घर लौटे ही थे,पत्नी पानी ला ही रही थी कि वे बिस्तर पर गिरकर मर गए थे। पत्नी को अभी भी विश्वास नहीं था कि वे मर गए थे। मैंने एकबार फिर दो डॉक्टरों को बुलाया कि उन्हें विश्वास हो जाए। शाम से रात हो गई। उनका हम पड़ोसियों के अलावा वहाँ कोई अपना ना था। रात होने पर सब अपने अपने घर लौट गए। हिन्दी भाषी कम ही लोग थे। वह महिला मृत पति के साथ अकेले रात बिताने की बात सोचकर ही घबरा रही थी। उनके बच्चों को अपनी बच्चियों के हाथ सौंप मैंने वहाँ रात बिताई। हम दो स्त्रियाँ व एक मृत शरीर ! आज भी सोचकर ही झुरझुरी होने लगती है। मृतक के शरीर के बचाव के लिए बर्फ का जुगाड़ करवाया। अपने घर के ए सी निकलवाकर उसके शरीर को ठंडा रखने के लिए लगवाए। उनका अपना घर इतना दूर था कि उनकी बहन ही अगली शाम तक पहुँच पाईं व बोली, 'दीदी आप रुक जाओ मुझे डर लगता है।' सो अगली रात भी वहाँ ही गुजारी। तीसरे दिन मृतक का परिवार वहाँ पहुँच पाया। तब जाकर अन्तिम संस्कार हो पाया। इस बीच उनके बेटों व मेरी बेटियों की वार्षिक परिक्षाएँ भी हुईं। जो बच्चों ने मिलकर दीं व सफल भी हुए। बस मन में यही विचार था कि उनका कष्ट जितना बाँट सकूँ बाँट लूँ। मृत्यु से एक ना एक दिन हम सबको जूझना ही पड़ेगा। यदि मिलकर यह करेंगे तो थोड़ी सी सरलता होगी।

फिर पिताजी गए। मुझे सेवा का पूरा अवसर देकर। परन्तु जब गए तो मैं वहाँ नहीं थी। भगवान के भक्त थे। अपनी मृत्यु का दिन भी मुझे बता गए थे। जैन मुनियों की तरह भोजन, दवा का त्याग कर केवल राम नाम जपते थे। 'हे राम' कहकर चले गए। भाई ने खबर दी, साथ ही यह कहा कि वे मेरे पहुँचने की प्रतीक्षा नहीं करेंगे। ठीक भी था। क्यों शरीर रखकर किसी मृत की मिट्टी पलीत करना! मैं रात भर अपने बगीचे में स्थित बैडमिंटन कोर्ट के एक बेंच पर अकेली बैठी आँसुओं की प्रतीक्षा करती रही। परन्तु वे अपना पूरा जीवन जीकर अपने प्रिय भगवान के पास गए थे, रोना गलत होता।

अब प्रश्न मृत्यु उपरांत के संस्कारों का आता है। सदा यही सोचती थी कि ये सब ढकोसलें हैं। परन्तु जब घर में एक और अकाल मृत्यु से सामना हुआ तो समझ आया कि ये ही सब हमें दुख के उन पलों में पागल होने से बचाते हैं। दुख इतना होता है कि मनुष्य बर्दाश्त न कर पाए। परन्तु जब सारी की सारी क्रियाएँ की जाती हैं तो हम इतने अधिक व्यस्त हो जाते हैं कि एक मशीन की तरह काम करते जाते हैं। उनका शव घर लाया जाना। बर्फ सा ठंडा वह शव जिससे एक महीने पहले ही मैं गले लगी थी, जिसकी गर्माहट इतनी थी कि अपनी बिटिया उन्हें सौंप आई थी, जिसे मैं अपने हाथों से श्रृंगारकर दुलहन बना अपने घर लाई थी, उस ही का एक बार फिर श्रृंगार करने को मुझे कहा गया। स्नान करवाना, नई लाल साड़ी पहनाना, सिन्दूर व बिंदी लगाना,कुछ सोना नाक या मुँह में डालना बताया जाना, मेरा अपनी चेन उतारकर देना, लोगों का 'नहीं नहीं इसके चरयो (मंगलसूत्र) का सोना ही डालो' कहना,फिर इसका रंगवाली पिछौड़ (एक तरह की कुमाऊँनी ओढ़नी जो शादी आदि शुभ कामों में पहनी जाती है) तो लाओ की पुकार! घर छोड़े हुए २३ साल हो गए थे सो मुझे क्या पता कि क्या कहाँ है। न मिलने पर इनकी एक घरजोड़ा जैसी कुछ कहलाने वाली गुजराती साड़ी, जो शुभ अवसरों पर पहनी जाती है, वही लाकर उन्हें ओढ़ा देना। उन्हें विदा करना। वे इन्जिनिरिंग के छात्रों को पढ़ाती थीं, उनके छात्रों, सहकर्मियों के साथ बैठ उनकी बातें याद करना। सुनार का फोन आना कि मैडम ने लक्ष्मी की मूर्ति और्डर की थी वह तैयार है, बंगाली साड़ी वाले का साड़ी लेकर आना कि मैडम हर बार लेती थीं, उन सबको बताना कि मैडम अब नहीं रही।

पूजा पाठ,पंडित जी की न जाने कितनी आवश्यकताएँ होती हैं। (पंडित जी भी ऐसे जिन्हें हम क्या देने की हैसियत रखते! लाखों के फार्म हाउस के मालिक, बेटे विदेश में, पेसमेकर लगाकर जी रहे,हमारे घर में अनुष्ठान करवाने केवल इसलिए आ रहे क्योंकि उनके पिता के हाथों मेरी व मृतक की शादी संपन्न हुई। यहाँ परदेस में कोई और कुमाऊँनी पंडित कहाँ मिलता!) जिन्हें पूरा करते करते होशोहवास खो बैठते हैं। दिन भर अफसोस करने वालों का जमघट। रात होते होते शरीर इतना पस्त हो जाता है कि मस्तिष्क भी काम करने की शक्ति खो बैठता है। मुझे याद है, अफसोस करने आने वालों को तीन जगह अलग अलग बिठाया जाता था। कुछ मित्र इसके तो कुछ उसके, कुछ मृतक के सहपाठी तो कुछ उनके छात्र, तो कोई उनके पिताजी के छात्र, कोई उनके पति के सहकर्मी, कोई रिश्तेदार! उन्हें पानी देना,चाय पिलाना,क्या हुआ,क्यों हुआ बताते बताते शरीर व मन जड़ हो जाते थे। यदि यह सब ना होता तो शायद दुख सहा नहीं जाता। इन्हीं सब बातों में तेरहवी बीत गई। तब तक मन व शरीर दोनों थक हारकर सबकुछ स्वीकार चुके थे।

मृत्यु ही अन्तिम सत्य है, सदा जाना था, परन्तु जब मृत्यु को झेल लो, वह भी बारबार, तो मृत्यु का महत्व समझ आता है और समझ आता है कि मृत्यु को झेलना या किसी और के घर की मृत्यु को थोड़ा सहज बनाना भी एक कला है, जो हमारे बुजुर्गों को भली भांति आती थी। सुख के समय पड़ोसी से कोई मतलब न रखो, परन्तु मृत्यु झेलने की कठिन घड़ियों में उन्हें कभी अकेला न छोड़ो, विशेषकर उनके बच्चों को। मैंने तो मृत्यु की बारबार अपने दरवाजे पर होती दस्तकों से यही सीखा है। शेष तो आप श्री सुरेश चिपलूनकर जी के लेख से समझ गए होंगे।

घुघूती बासूती

Monday, July 21, 2008

पैन्ड्युलम

एक बहुत लम्बे समय से
पैन्ड्युलम का सिरा
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
इस छोर से उस छोर तक
उस छोर से इस छोर तक
आता और जाता,जाता और आता
अधिक समय बीच में रहता
कम समय छोरों पर जाता।
दोनों छोर हैं अतिरंजित
एक छोर रंगा उमंगों से
दूजा रंगा है काला मातम सा
बीच का हिस्सा है शेष जीवन
नकारा सा, रंगविहीन
ना काला, ना रंगीन।
क्या नहीं होगा बेहतर
किसी एक सिरे पर रहना?
चाहे काले या रंगीन
क्योंकि वहाँ जीवन है
भावनाएँ हैं,
या तो है घोर निराशा
या फिर रंगों की मादकता
पंखों की उड़ान
हिरणी सी चंचलता
बिजली की सी चपलता
प्यार की महक
विरह की हूक
कोयल की कूक
या फिर घुघुति की घूर घूर
उदास और व्यथापूर्ण
व्यग्र और व्याकुल।
वहाँ नहीं है
बीच की धरती का ठंडापन
मौत सा सन्नाटा।
करुण चीख
मृत्यु की सह्य है
परन्तु नहीं उसका सन्नाटा
उसके ठंडे हा्थ आकर
पलपल लपेटते हुए।
मृत्यु ग्राह्य है परन्तु
पलपल मरना और मरकर जीना
नहीं कभी होता रुचिकर।
अकाल काल का आना
आकर ले जाना
सहा जा सकता है
परन्तु यूँ अधमरा
जीना पर न जीना
मरना पर न मरना।
क्यों नहीं पैन्ड्युलम जाकर
एकबार अन्तिम छोर पर ले जाता
और वहीं सदा के लिए अटकाता?
परम सुख या परम दुख
खौलना या हिम सा जमना
क्या नहीं बेहतर है यूँ
बस केवल गुनगुने पानी सा
बना रहने से?
ऐसा पानी
ना जिसमें कभी उबाल आए
ऐसा पानी
ना जिसमें कभी जमाव आए।
हाँ, पहुँचना है
अनुभूति के शिखर पर
पैन्ड्युलम के अन्तिम सिरे पर।

घुघूत बासूती

Saturday, July 19, 2008

मृतकों के लिए

आज उसकी बहुत याद आ रही है। आएगी भी, उसका जन्मदिन जो है। होती तो आज ५८ वर्ष की हो गई होती। समझ नहीं आ रहा कैसे याद करूँ। उसे अपने से बड़ी के रूप में या छोटी के रूप में। होती तो बड़ी ही होती। परन्तु अब जब नहीं है तो वह तो उसी उम्र में छूट गई जिस उम्र में मरी थी। तो मुझसे बड़ी नहीं, ३५ की उम्र में ही अटककर रह गई। क्या वह ३५ की है और मैं ५३ की बस होने ही वाली हूँ? ३५ और ५३! एक दूसरे का उल्टा! मुझसे छोटी है या बड़ी? बहुत उलझ रही हूँ। शायद कम्प्यूटर का कोई प्रोग्राम होगा जो उन्हें ५८ वर्ष में कैसी दिखती बता सकता है। तो शायद बड़ी बन जाती। परन्तु उसका मन कैसा होता इस उम्र में? क्या उतना ही टूटा जितना जाते समय था या अब तक कुछ जुड़ चुका होता। क्या कम उम्र में मरने वाली हमारी यादों में चिरयौवना रह जाती हैं?
वह तो है ही नहीं , है तो केवल याद है। मैं अपनी बेटियों से कहती थी उन्हें सदा याद रखना। याद रखोगी तो वे जीवित रहेंगी। आज भी मन हो रहा है कहने का। परन्तु आज नहीं कह रही। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं व उनका अपना एक अलग जीवन हो जाता है तो उनसे इस तरह की भावुक बातें करने से मन कतराता है, जब तक वे पहल न करें। जब तक मैं हूँ तब तक तो वह है ही! फिर मेरे जाने के बाद, हम्म, तब न भी रहे तो क्या है।

परन्तु मैं किस किस को यादों में जीवित रखूँ? यदि उसे ३५ में ही अटकाकर रखूँ तो उनका क्या करूँ जो २१ की भी नहीं थीं? उनकी तो बेटी भी ४२ की हो गई है। २१ और ४२ ! उनकी बेटी उनसे आयु में दुगुनी हो गई है। मैं अंकों से क्यों खेलना पसंद करती हूँ? क्योंकि अंक मुझे सदा सजीव लगते रहे हैं। अंक बहुत से लोगों के शब्दों से भी अधिक सजीव व अर्थपूर्ण होते हैं। समय के साथ अंकों के अर्थ बदलते नहीं। अंक शाश्वत हैं। मैं मृतकों से क्यों बात करती हूँ? मैं क्यों मृतकों को याद करती हूँ? क्या मुझे मृत भी जीवितों से अधिक सजीव लगती हैं? शायद हाँ। वे मेरे साथ जीवितों से भी अधिक रहती हैं। वे मुझे जीवितों से भी अधिक याद आती हैं। शायद उनकी यादें जीवित लोगों से भी अधिक अर्थपूर्ण व शाश्वत हैं। ये यादें समय के साथ बदलेंगी नहीं। न वे ही मेरी यादों में बदलेंगी।

मुझे उनकी यादों से मिलने के लिए अपने को दर्पण में देखना नहीं पड़ता। उनके आने के लिए कोई दरवाजा नहीं खोलना पड़ता। वे बस आ जाती हैं और हौले से मेरे पास, बहुत पास बैठ जाती हैं। वे मुझे (क्या बेटियों को फोन करूँ? क्या उन्हें जानने दूँ कि माँ उदास है, कि माँ को याद आ रही है, उनकी जिनकी उन्हें कोई याद नहीं। क्या उनसे उनकी बात करूँ? ) बहुत याद आती हैं। क्या वे उनकी बेटियों को भी याद हैं? मैंने २१ वर्ष से कम में मरने वाली की बेटी को उनकी १८ वर्ष में खींची एक फोटो दी थी। उसने कभी अपनी माँ की फोटो तक नहीं देखी थी। क्या उसे वह अपनी माँ दिखी थीं या ३३ वर्ष की आयु में देखी एक १८ वर्ष की उम्र की लड़की की फोटो उसे मातृत्व का आभास करवाती थी? अपनी माँ के प्रति मातृत्व? क्या यह सही है? आज ४२ वर्ष की आयु में अपनी २१ वर्ष की उम्र में इस संसार से जाने वाली माँ के प्रति उसके मन में क्या भाव उठते हैं?
मैं स्वयं विचलित हूँ,भ्रमित हूँ....

घुघूती बासूती

Friday, July 18, 2008

पढ़ाई, बदलाव व लड़कियाँ

हाल ही में एक चिट्ठे 'औरत के हक में' में एक लेख 'लड़कियाँ फेल क्यों हो गईं' पढ़ रही थी। वहाँ एक टिप्पणी में लिखा था कि कोई भी पढ़ा लिखा पिता अपनी बेटी को पढ़ाई से वंचित नहीं रखता। आमतौर पर यह सही है परन्तु सदा नहीं। पढ़ाई मानसिकता बदलने में सहायता अवश्य करती है परन्तु मानसिकता बदलने की गारंटी कदापि नहीं है। यदि ऐसा होता तो समाज तेजी से बदल गया होता, कमसे कम पढ़े लिखे लोगों का समाज तो बदल ही गया होता।

मुझे अपने बचपन में देखे गए कुछ लोग याद आते हैं। एक तो थे हमारे पूर्व स्कूल के प्रधानाचार्य जी। अपने पद के कारण उन्हें हमारी प्रेरणा होना चाहिए था। परन्तु मैं तो यही जानती थी कि जैसे वे हैं वैसा न मुझे होना है ना ही वैसे किसी व्यक्ति से सम्बन्ध रखना है। वे नए नए हमारे पड़ोस में रहने आए थे। वह स्कूल आँठवीं तक का था और सौभाग्य से मैं तब नौंवी में पढ़ती थी। उनकी तीन बेटियाँ थीं व एक पुत्र। पुत्र इंजीनियरिंग पढ़ रहा था। बेटियाँ, विभिन्न आयु वर्ग की घर में रहती थीं। माँ के पूछने पर कि वे क्यों नहीं पढ़ रहीं, उनका उत्तर था कि उन्हें जितना पढ़ाना था (दसवीं तक ) पढ़ा लिया। अब उन्हें उनके घर भेजना है। घर में तीन जवान स्वस्थ बेटियाँ, एक स्वस्थ पत्नी और एक प्रधानाचार्य जी। अब घर का कितना काम वे चार स्त्रियाँ ढूँढ ढूँढ कर कर सकती थीं। बहुत सा समय खाली रहतीं। माँ को पढ़ने में रुचि थी। पास में ही एक चार भाषाओं की पुस्तकों वाला समृद्ध पुस्तकालय भी था। हमारे घर में लगातार पुस्तकें आती रहतीं। वैसे भी घर में बहुत सी पुस्तकें थीं। माँ ने सुझाया कि पुस्तकें ही पढ़ लिया करें तो उनके पिताजी को उनका पुस्तकें पढ़ना भी रुचिकर नहीं लगता था। हमारे घर में भांति भांति की पत्रिकाएँ भी आती थीं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग,कादम्बिनी आदि और धार्मिक पत्रिका कल्याण भी। कोई भी वे पढ़ सकती थीं, परन्तु घर के स्वामी को यह पसन्द नहीं था। घर से बाहर निकलना भी मना था सो हरियाणा में रहते हुए भी पंजाबी, हरियाणवी महिलाओं, जो कढ़ाई, सिलाई में में प्रवीण होती थीं, से कढ़ाई सिलाई भी नहीं सीखतीं थीं।

मैं उन्हें देखती थी। मेरा जीवन पूरी तरह से भरा, व्यस्त था। स्कूल, पढ़ाई, शाम को रोज टेबल टैनिस खेलना, टेस्ट, टुर्नामेन्ट, समाचारपत्र, उपन्यास,पत्रिकाएँ, खाली समय ही नहीं था। तब सोचती कि ये बहनें जिनमें से सबसे छोटी मुझसे दो या तीन वर्ष ही बड़ी थी कैसे रहतीं होंगी। क्या केवल इसी आस में जीती होंगी कि कोई आए और उन्हें 'उनके' घर ले जाए।

एक और पड़ोसी थे। जब वे आए तो उनकी छोटी बेटी दसवीं पास कर चुकी है, बताया गया। मैं तब मात्र ५ या ६ वर्ष की रही होउँगी। दोनों बहनें साथ में कॉलेज नहीं जा सकती थीं क्योंकि घर में काम में हा्थ बटाना होता था। सो बारी बारी करके वे बी ए व एम ए भी कर गईं। उनसे छोटे बड़े सभी ४ भाई पढ़ाई में तेज थे व बारी बारी नहीं, सभी साथ साथ पढ़ने के लिए कॉलेज, छात्रावास गए। न इन लड़कियों ने कभी नौकरी करी न उनकी शादी हुई। लगभग २५ वर्ष बाद जब मैं अपनी बेटियों को लेकर वापिस उसी जगह रहने गई, तब तक भी वे घर के काम में हाथ बटा रही थीं। ये अनपढ़ लोग नहीं थे। पिता एक कारखाने में औफिसर थे।

सो पढ़ाई बदलाव के लिए एक उत्प्रेरक ( catalyst) हो सकती है परन्तु असली तत्व जो बदलाव ला सकते हैं वे तो हमें अपने भीतर या समाज में से ही लाने होंगे। असली तत्व हम स्वयं हैं, उससे जब हमारी मेहनत, लगन, इच्छाशक्ति मिल जाएँ तो पढ़ाई व हमारे आस पास की परिस्थितियाँ catalyst का काम करके बदलाव की प्रतिक्रिया को तेज कर देती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि मनुष्य स्वार्थी होता है। जिस भी काम से उसे स्वयं संतुष्टि या कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ या अपने जीवन मूल्यों की तुष्टि नहीं मिलेगी वह नहीं करेगा। जो माता पिता अपने बच्चों को मेहनत करके या स्वयं आधा पेट रहकर पढ़ाते हैं, वे भी केवल इसलिए ऐसा कर पाते हैं क्योंकि उनके कष्ट से बड़ा उनका बच्चों को आगे बढ़ाने का जीवन मूल्य होता है। सो वे इस जीवन मूल्य को पाने के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं। जिनका जीवन मूल्य केवल सामाजिक परम्पराओं को जीवित रखना ही या अपना अंकुश परिवार में बनाए रखना होता है जैसा कि माननीय प्रधानाचार्य जी का था वे सारी सुविधाएँ होते हुए भी, पढ़ेलिखे होते हुए भी बदलाव के लिए कुछ नहीं करेंगे अपितु वह सब करेंगे जिससे बदलाव की बाढ़ को रोका जा सके। यह भी हो सकता है कि जिस बदलाव की बात हम कर रहे हैं वह उन्हें प्रगतिशील न लगकर पतनशील लगता हो। तो उनके अनुसार वे सही ही कर रहे थे। जिनका जीवन मूल्य केवल अपनी सुविधा हो, जैसा उन बारी बारी कॉलेज जाने वाली बेटियों के माता पिता का शायद था,वे अपनी सुविधा के लिए कुछ भी कर सकते हैं,समाज में निकृष्ट माने जाना भी उन्हें स्वीकार्य है।

ऐसी स्थिति में शायद मनुष्य के अंदर का जुझारूपन ही व्यक्ति की नैया पार लगा सकता है जैसे मेरे एक चिट्ठे 'कैसे कैसे लोग' की 'जाई' ने कर दिखाया। मेरी कई अन्य महरियों में भी मैंने यह देखा है। कई पड़ोसिनों में नहीं देखा है। प्रधानाचार्य जी की पत्नी दीनहीन थीं। उनसे जुझारू होने की अपेक्षा करना हाथी से उड़ने की अपेक्षा करने समान था। परन्तु मुझे दुख इस बात का है कि प्रकृति ने हर अन्य प्राणी में माता पिता उन्हीं को बनाने का प्रावधान रखा है जो इस योग्य हों। बहुत से प्राणियों में पिता का बच्चों के लालन पालन में कोई सहयोग नहीं होता। पक्षियों आदि में होता है। परन्तु मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है कि कितना भी निकृष्ट, नालायक क्यों न हो, माता पिता बन सकता है। मादा पशु अपने बच्चों की रक्षा में प्राणों की बाजी लगा देती है। कमजोर से कमजोर पशु माता भी जी जान से अपने बच्चों की रक्षा करती है। केवल मानव स्त्री ही गृहस्वामी के मन के अनुसार अपने बच्चों को बड़ा करती है। क्यों प्रधानाचार्य जी की पत्नी माँ बनने पर उनके गलत निर्णयों का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाईं? सो लगभग सब प्राणी माता पिता अच्छे माता पिता होते हैं सिवाय मनुष्य के,जो अच्छा या बुरा होने का चुनाव कर सकते हैं। शायद प्रकृति का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने का यही मूल्य हम चुकाते हैं।

क्या मानव स्त्री का बच्चे अपने मन मुताबिक बड़े करने के अधिकार से वंचित रह जाने के पीछे मानव सभ्यता का हाथ है? बहुत कम प्राणी बच्चे अपने पिता के बच्चे कहलाते हैं। वे सदा ही अपनी माँ के बच्चे के रूप में जाने जाते हैं। मनुष्य में बच्चे माँ के नहीं कहलाते, न ही वे माँ की जीवन शैली, भाषा, धर्म, जाति या नाम से जाने जाते हैं। वे अपने पिता के बच्चे होते हैं। माँ भले ही बच्चे की माँ, जैसे 'रामू की माँ' के नाम से जानी जाए ! शायद इसी विडंबना के कारण माँ यह तय नहीं कर पाती कि उसके बच्चे के लिए क्या सही है। आज कानून शायद बदला हो परन्तु भारत में बच्चे का स्वाभाविक संरक्षक भी पिता ही माना जाता रहा है। इस स्थिति के लिए हमारी सभ्यता जिम्मेदार है। मनुष्यों में नर व स्त्री दोनों ही बच्चे की परवरिश में भाग लेते रहे हैं, चाहे वह खाना जुटाना रहा हो या सुरक्षा प्रदान करना या लालन पालन करना। शायद इसीलिए मानव बच्चे का विकास अन्य प्राणी बच्चों के विकास से अधिक होता है और अधिक समय लेता है। और यह विकास जीवन पर्यन्त चलता रहता है। ऐसी स्थिति में यदि माता पिता में से एक या दोनों ही अपने दायित्व को सही ढंग से नहीं निभाते तो बच्चों का सर्वांगीण विकास अवरुद्ध हो जाता है। तभी दुख होता है कि काश, प्रकृति केवल अपना दायित्व समझने वालों को बच्चों का वरदान देती।

बहुत से परिवारों में तो पुत्री की उपस्थिति को लगभग नकार ही दिया जाता है। किसी भी अच्छे स्कूल में लगभग सदा लड़कों की संख्या अधिक होती है। महंगे स्कूलों में पुत्रों को भेजा जाता है। जिस स्कूल से मैं जुड़ी हूँ वह शहर के नापदंडों से महंगा तो नहीं कहलाएगा परन्तु मुफ्त मिलती सरकारी शिक्षा से तो स्कूल फीस, बस का किराया आदि मिलाकर निश्चय ही महंगा है।

मेरी कक्षा में कन्हैया नाम का एक लड़का पढ़ता था। पढ़ाई करना तो दूर की बात वह मैले कपड़े पहने, बिना स्नान किये स्कूल आता था। कोई भी किताब निकालने को कहो तो कन्हैया बैठा रहता था। उसे अलग से कहना पड़ता। तब वह बस्ते मे ढूँढाई आरम्भ करता। यदि उसकी प्रतीक्षा करो तो न जाने कितना समय निकल जाता। इसलिए मैं ही बहुत बार बस्ता लेकर किताब ढूँढती। अधिकतर किताबें या तो खो गई होंती या फिर फटी होतीं। उसका बस्ता किताबों व कॉपियों के पन्नों से बनी नाव, गेंद, हवाईजहाज आदि से पटा पड़ा रहता। शायद ही कभी वह कोई गृहकार्य करके लाया हो। दूसरी कक्षा तक सभी बच्चे पास कर दिए जाने के कारण वह तीसरी में आकर अटक गया था।

तरह तरह से कन्हैया को पढ़ाने का यत्न किया जाता। अगली कक्षा के किसी बच्चे से माँगकर उसकी खोई किताबों की जगह नई दी जाती। प्यार, समझाने, क्या समस्या है पूछने से कोई विशेष अन्तर न पड़ता। उसे आगे बैठाया गया, अलग बैठाया गया, अपने पास बैठाया गया। उसके पिता को बुलाया गया। उनसे बात की तो पता चला कि आजकल उसकी माँ उसका ध्यान नहीं रख पाती है। कारण कि बहुत साल से कन्हैया घर में अकेला बच्चा था अब उसका भाई पैदा हो गया है तो माँ का ध्यान बंट जाता है। मैंने कहा अरे, बहुत सालों का अंतर हो गया। इतने सालों से अकेले रहकर भाई आने से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा होगा। उसकी माँ से कहो इसपर भी ध्यान दें। आप भी इसपर ध्यान दें, नहला धुलाकर भेंजे। रोज डायरी देखें कि क्या गृहकार्य दिया गया है। उसका पिता बोले, 'अंतर तो नहीं रखा था। बीच में दो बहनें आ गईं इसी से अंतर हो गया। अब छोटे को भी देखना होता है। और मैं तो नौकरी पर जाता हूँ, बच्चों को कैसे देखूँ ?' मैं दंग ! इसकी दो बहनें हैं ? स्कूल क्यों नहीं आतीं ? वे बोले, 'लड़कियाँ हैं सो सरकारी स्कूल में कभी चली जाती हैं बाकि तो 'बच्चों' की देखभाल में माँ का हाथ बटाती हैं! 'बच्चों' का भविष्य सुधारने को ही तो इसे अंग्रेजी स्कूल में डाला था।'

सो ये एक पिता आज के समय के हैं, उन दो माता पिता के किस्से से लगभग ४० या ४५ वर्ष बाद के पिता। जो बेटियों की उपस्थिति को ही लगभग नकार रहे थे। वे हैं तो केवल माँ का हाथ बटाने को। उन माँओं का क्या होता है जिनके केवल बेटे होते हैं? क्या उनके हाथ को बटवाने की आवश्यकता नहीं पड़ती?
उस बच्चे कन्हैया का भी भविष्य क्या होगा जिसे दो बहनों के होते हुए भी घर का इकलौता बच्चा जान बिगाड़ा जाता रहा है। कल कन्हैया की बहनों व स्त्रियों के प्रति क्या विचारधारा होगी? क्या हम आज से २० वर्ष बाद वाले कन्हैया से अपेक्षा कर सकेंगे कि वह अपनी पत्नी और बेटियों को अपने व बेटों के समान माने? सो एक और पीढ़ी यह पक्षपात व अन्याय चलाने को तैयार की जा रही है। कन्हैया कहने को शिक्षा पा रहा है, पा क्या रहा है बस स्कूल आ रहा है। शायद कभी स्कूल पासकर समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा, ऐसा हिस्सा जिससे अधिक अपेक्षा नहीं की जा सकती। सो आज से २० या २५ वर्ष बाद की भी कुछ लड़कियों को 'पढ़े लिखे' पिता के दकियानूसी विचारों में जीना पड़ेगा।

घुघूती बासूती

Saturday, July 12, 2008

यदि एक शब्द 'यदि' या 'शायद' का उपयोग कर लिया गया होता !

यदि डॉ तलवार वास्तव में निर्दोष हैं तो क्या हममें से बहुत सारों का सिर शर्म से झुक नहीं जाना चाहिए? हममें से बहुत सारों ने बिना किसी सबूत के एक पिता, एक ऐसा पिता जो यदि निर्दोष है तो पुत्री की हत्या का असह्य कष्ट भोग रहा था, को दोषी घोषित कर दिया। न्यायालय, पुलिस या सी बी आइ के पास शंका का कारण हो सकता था, परन्तु हम कैसे न्यायाधी बन गए ? किसने हमें यह अधिकार दे दिया ? एक मृत बच्ची, वह भी ऐसी बच्ची जिसकी हत्या हुई, का हमने चरित्र हनन किया। एक माँ जिसकी बेटी की हत्या हो गई, वह अपनी बच्ची की मृत्यु पर पति के साथ रो भी नहीं सकी। डॉ तलवार यदि निर्दोष हैं, तो उन्हें अपनी बच्ची की मृत्यु पर क्या कभी रोने का अवसर मिलेगा? क्या अपनी पत्नी प्रियजनों के साथ अपना दुख बाँटना भी उनके भाग्य में था ? माना कानून भावुक होकर यह सब नहीं सोच सकता परन्तु हमारी संवेदना कहाँ गई थी ? क्या सारी संवेदना उनपर लांछन लगाने में चूक गई थी ? हमें कम से कम उन्हें संदेह का लाभ देना चाहिए था या जब तक कुछ साबित नहीं होता तब तक के लिए तो रुक जाना चाहिए था। हो सकता है कि कल जब मामला आगे बढ़ेगा तो कुछ नए तथ्य सामने आएँगे। हम यह भी नहीं कह सकते कि वे निरपराध माने जाएँगे। परन्तु तब तक तो हमें उस दुखी पिता पर लाँछन लगाने से रुकना चाहिए था। उनका, एक अन्य स्त्री बच्ची का चरित्र हनन करने से बचना चाहिए था। यदि सब साबित हो जाता तो मजे से चटखारे लेकर यह सब कह सकते थे। क्या कुछ समय रुकने में हमारे आनन्द में इतनी बाधा पड़ती ? क्या इस चरित्र हनन की भूख इतनी तेज थी कि कुछ समय बाद मिटने तक हम रुक ना सके ?

हम, हमारा मीडिया, एक बहुत बड़ी गल्ती पहले ही कर चुके थे। सबसे पहले जब हत्या की खबर आई तो एक ऐसे व्यक्ति, हेमराज को हत्यारा माना गया जिसकी स्वयं हत्या हो चुकी थी। इस पर भी हमें अपने हड़बड़ी में निकाले गए निष्कर्ष पर लज्जा नहीं आई, लज्जा छोड़िए, हमने सीख तक नहीं ली, अपितु अब हम पिता, बेटी, पारिवारिक मित्रों के चरित्र पर उँगली उठाने लगे। क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि दो परिवारों के दुख पर हमदर्दी छोड़िए हम उनके लिए ऐसी स्थितियाँ पैदा करते हैं कि उनका समाज से विश्वास ही उठ जाए ? हेमराज के परिवार की सोचिए। उसका चेहरा टी वी पर हत्यारे के रूप में दिखाया जा रहा था। उसके परिवार वालों पर क्या बीती होगी इन खबरों को देखकर और फिर अगले दिन यह सुनकर कि वह तो मर चुका था ?

हमारी उँगली तैयार बैठी थी कि कब अवसर मिले और किसी की जीवन शैली, जीवन मूल्यों, धन दौलत, स्त्री पुरुष की मित्रता या दो परिवारों की ऐसी मित्रता जिसमें स्त्री पुरुष परस्पर बात करते हैं, फोन करते हैं, पर वह उठ जाए। क्या पल भर को भी हम अपने आप को उनके स्थान पर रखकर नहीं सोच सकते थे ? यह बच्ची मेरी आपकी किसी की भी हो सकती थी। यह घटना किसी भी घर में घट सकती थी। हमें माता पिता का सोते रहना, कोई आवाज सुनना हास्यास्पद लगा। यह सच है कि अलग अलग कमरों में सी चलाकर दरवाजा बंदकर सोने तो क्या बैठने वालों को भी दूसरे कमरे से आवाज नहीं सुनाई देती है। दरवाजे की घंटी सुनाई नहीं देती है। क्या सी का होना, अलग अलग कमरों में सोना, ऐसा जघन्य अपराध है ? जिनके घरों में नौकर रहते हैं उन्हें दरवाजे की घंटी पर ध्यान देने की आदत नहीं होती। यह गलत तो हो सकता है, विलासिता भी हो सकता है, समाजवाद के विरुद्ध हो सकता है परन्तु अक्षम्य अपराध तो कदापि नहीं हो सकता।

दोनों माता पिता नौकरी करते थे, सो हमारी कल्पना की लम्बी उड़ान ने बच्ची को माता पिता से प्यार मिलना , नौकर से प्यार चाहना पाना, जाने क्या क्या सोच लिया। हमने बच्ची उसके माता पिता का पूरा मनोविग्यान तक जान लिया। आश्चर्य, कि हम जो स्वयं को नहीं जान पाएँ हैं, एक अनजान परिवार के मन को जान गए।

अमेरिका में एक संस्था बड़े अपराधों के सजा पाए लोगों के केस फिर से खुलवा रही है। सौ से अधिक सजा पाए अभियुक्तों को उन्होंने निर्दोष साबित कर दिया है। उनमें एक युवती भी है जिसने अपने शिशु की हत्या के अपराध में दस से अधिक वर्ष की जेल काटी। अन्त में पाया गया कि वह निर्दोष थी। एक ऐसा पुरुष भी है जिसने जीवन के दसियों वर्ष सलाखों के पीछे बलात्कार के तथाकथित अपराध के सिद्ध हो जाने के कारण जिये। दोबारा केस खोलने पर उसे निर्दोष पाया गया। उसे रिहा कर दिया गया है। परन्तु क्या निर्दोष लोगों को सजा मिलने पर उनकी पीड़ा का हम अनुमान लगा सकते हैं ? ये गलतियाँ न्यायालयों में हुईं। यह न्याय का पेशा ही ऐसा है कि गलत सजा की कुछ गुँजाइश सदा रहती है। इस कारण से ही वे इस पेशे से मुँह भी नहीं मोड़ सकते। परन्तु हम आम लोग ! हमें क्या हो गया है ? क्यों हम लोगों को दोषी सिद्ध करने में जुटे हैं ? मीडिया का पेशा भी है खबरें पहुँचाने का। यदि वह यह नहीं करेंगे तो समाज के दोषी हैं। परन्तु यदि वे केवल समाचार दें और लोगों पर मीडिया न्याय थोपते तो बेहतर होता। यह हो गया, इन पर शंका की जा रही है, भी खबर हो सकता है।

यदि हम केवल इतना ध्यान रखते कि डॉक्टर तलवार पर कुछ भी कहने से पहले 'यदि' लगा देते ( 'यदि' उन्होंने ऐसा किया तो वे निकृष्ट प्राणी हैं। 'यदि' उन्होंने यह अपराध किया है तो उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, समाज की भर्त्सना मिलनी चाहिए। या फिर कि 'शायद' ऐसा हुआ हो। 'शायद' माता पिता के व्यस्त रहने से ऐसा हुआ हो या वैसा हुआ हो। ) तो आज हमें अपराध बोध होता।

घुघूती बासूती