Wednesday, April 30, 2008

मेरे घर के सामने







मेरे घर के आसपास हरियाली का साम्राज्य है। तरह तरह के पेड़ पौधे, कुछ मालियों द्वारा लगाए गए तो कुछ स्वयं उगे हुए, जहाँ तहाँ अपना सौन्दर्य बिखेरते हैं। यहाँ पर दी हुई फोटो साल के अलग अलग समय पर ली गईं हैं। कुछ मैंने भी ली हैं।


यहाँ फैन पाम, नारियल, गुलमोहर (मे फ्लावर), केज़्युरिना की फोटो हैं ।


मेरी पिछली पोस्ट बिटिया के कैमरे से पर दी टिप्पणियों के लिए धन्यवाद व पाठकों का भी धन्यवाद ।
लावण्या जी, दिनेश जी, समीर जी, डॉ चोपड़ा जी, नितिन जी, हर्षवर्धन जी, पाण्डेय जी, डॉ अजीत जी, पारुल जी, अभय जी, अफ़लातून जी, ममता जी, अभिषेक जी, पी डी जी, प्रियंकर जी, कुश जी, नीरज जी, अजित जी , डॉ आर्य व इला जी, फोटो देखने व सराहने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
समीर जी, बिटिया दिल्ली में अपनी पी एच डी की थीसिस देकर लगभग ८ माह अमेरिका रहकर वाइवा के लिए वापिस भारत आई व अब अपने पति के वापिस लौटने की प्रतीक्षा में है । दोनों का भारत में ही रहना लगभग निश्चित है । सो अमेरिका घूमना फिर कभी ।

अफ़लातून जी, रबर-प्लान्ट(नया हेडर) भी मेरे बगीचे का है। यह मेरे कमरे के पास ही लगा है व मेरे कमरे को अपनी छाया देकर ठंडा रखता है । फोटो शाम के समय छत से ली गई है । आपके व डॉ चोपड़ा जी को गीत याद आने की खुशी है । आशा है ये गीत मेरे जीवन के भी यथार्थ बने रहेंगे।

पी डी जी, हाँ मेरी बिटिया को भी फोटोग्राफी का शौक है। बहुत पुराना नहीं, लगभग नया नया ही है, या यूँ कहिये कि पूरा करने का समय अब मिल रहा है। पढ़ाई के दौरान तो लैब व गाइड के अलावा सोचने का समय बहुत कम ही मिलता था। आशा है, आपकी खींची फोटो देखने का भी अवसर मिलेगा ।

अभय जी, मेरे आस-पास बड़ा सौन्दर्य ही है और लगभग कुछ नहीं । केवल एक दुकान, एक बैंक की शाखा, एक विद्यालय, एक क्लब और कॉलोनी में ठीक उतने मकान जितने दिल्ली में हमारी एक सोसायटी में हैं याने लगभग एक सौ बीस !

घुघूती बासूती

Tuesday, April 29, 2008

बिटिया के कैमरे से







आजकल घर पर मेरी बड़ी बिटिया आई हुई है । बहुत वर्षों बाद वह दो या चार दिन के लिए नहीं बल्कि कुछ समय के लिए रहने आई है। माँ बेटी की बातचीत है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। घर की ढेरों चीजें ऐसीं हैं जो उसने कभी नहीं देखीं थी। सो सारा दिन बतियाते व यह देख, वह दिखा, बीतता है। सारे घर की काया पलट हो रही है । मेरी भी ! मैं हूँ निशाचर और वह दिनचर । सो रात को मेरे कारण वह जागती है और सुबह सवेरे वह मुझे उठा देती है । सुबह सुबह बगीचे के चक्कर , सैर, फूलदान सजाना आदि होता है ।
इसबार वह अपना लैपटॉप भी साथ लाई है तो पिछले कई सारे वर्षों की फोटो देखते रहते हैं । कभी दिल्ली कीं तो कभी उसकी मॉरिशस, लन्दन यात्रा की तो कभी उसके अमेरिका के आवास की ।
मुझे लेखन के लिए बिल्कुल समय नहीं मिलता, ना ही मैं ऐस॓ समय की चाहना कर रही हूँ । समय न मिलना भी तो एक बहुत बड़ा सौभाग्य है । तो ऐसे समय में मैं आपके साथ अपनी बिटिया के कैमरे से हमारे बगीचे, आसपास व उसकी यात्राओं की कुछ फोटो साँझा करना चाहती हूँ ।
इसबार कुछ फोटो मेरे बगीचे के फूलों कीं ......
ये हैं एडेनियम, गुलाब, गोल्डन रॉड व रजनी गंधा ।

Monday, April 21, 2008

आह, दिल्ली का वसन्त ! दिल्ली में दूसरा दिन ।










जन्म उत्तर भारत में हुआ व अधिक बचपन व विद्यार्थी जीवन भी वहाँ ही बीता । वहाँ के फूलों, पौधों व पेड़ों का जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है । जबसे आँखें खोलीं स्वयं को प्रकृति के बीच ही पाया । वे फूल जीवन का एक हिस्सा बन गए । हर मौसम के साथ नए फूल अपने नए रूप रंग लेकर आ जाते थे । कभी सोचा ही नहीं था कि कभी ये नहीं होंगे । विवाह के बाद उत्तर भारत से नाता टूट ही गया । कभी कभार दिल्ली आना भी हुआ तो शायद गलत मौसम में, व घर से बाहर निकल फूलों की बहार देखने का अवसर नहीं मिला ।


इस बार जब दिल्ली की सड़कों पर जाना हुआ या फिर अपनी ही सोसायटी के बगीचे में तो अपने बचपन के फूलों को देख ऐसा लगा जैसे बचपन के बिछुड़े साथी फिर से मिल गए । मैं मोहित सी कार की खिड़की से नजरें बाहर टिकाए उन्हें देखते ना थकती थी । हुआ भी कुछ ऐसा कि लगभग हर दिन घर से बाहर जाना हुआ और रास्ते में कुछ ऐसे स्थान आते थे जहाँ फुटपाथ खत्म होते से ही क्यारियों में फूल बिखरे हुए थे । मन तो बस यही करता था कि वहीं रूक जाऊँ और एक एक फूल को सहलाऊँ । पूछूँ कि इतने बरस कहाँ थे । जैसे कोई बिछुड़े दोस्तों के नाम याद करता है वैसे ही मैं भी एक एक को देखकर उसका नाम याद कर रही थी । यदि कोई नाम याद ना आए तो स्वयं से नाराजगी होती थी कि कैसे भूल गई ।


रविवार को लोटस मंदिर जाना हुआ । बिटिया व उसके पति, मेरे पुत्रीवर ने कार्यक्रम बनाया कि मिम्मा (माँ )बाबा ( पिता ) को दिल्ली घुमाई जाए । सो सबसे पहले लोटस मंदिर की ओर चल पड़े । हमारे दिल्ली पहुँचने के साथ ही आँधी आ गई थी । बादल घिर आए थे व मौसम बेहद सुहावना हो गया था । सो धूप की कोई चिन्ता नहीं थी ।
मंदिर पहुँचते से ही मुझे यूँ लगा कि मैं अपने बचपन में आ गई हुँ । अब ना मुझे मंदिर की इमारत दिख रही थी ना साथ चलता परिवार ! मुझे बस और बस फूल ही दिख रहे थे । मस्तिष्क में बस यही खयाल था कि कैसे इन फूलों के बीज प्राप्त करूँ । यहाँ से वहाँ तक सब जगह क्यारियाँ ही क्यारियाँ थीं । उन पर फूल तो बस बिछे हुए थे । मुझे तो यही लग रहा था कि वे मेरे लिए ही खिले थे । मुझे हाथ पकड़कर खींचा भी जा रहा था , कि मंदिर बंद होने का समय हो रहा है । परन्तु मुझे उससे क्या ? होता है तो हो जाए , बस फूल खुले रहें । संसार का कौन सा मंदिर उनसे प्यारा हो सकता है ? बेटी बोली कि मंदिर के लिए सीढ़ियाँ हैं, तुम शायद ना चढ़ सको । मैंने खुशी खुशी हाँ में सिर हिलाया और वापिस फूलों में खो गई । घुघूता जी भी मेरे साथ एक क्यारी से दूसरी क्यारी की ओर भटकते रहे । उस समय यदि कोई मुझे तितली बना देता तो मैं हर फूल को छू पाती ।


प्रकृति ने अपनी खोई बेटी के स्वागत के लिए जैसे रंगों को उडेल उससे होली खेलनी चाही थी । बेटी तब कैसे ना उन रंगों में खोती , रंगती ? हर फूल पौधे में मुझे अपने पिताजी के कोमल परन्तु शक्तिशाली हाथों का छुअन महसूस हो रहा था । मुझे याद आ रहा था , उनका पौधे उगाना, उन्हें बड़ा करना , सूखे फूलों को हटाना व बीज बनाने के लिए संजोना । इस काम में हमारा उनकी सहायता कर बीजों के पैकेट बना उन पर नाम लिखना व सहेजना । इस बसंत पूजा के बाद उन्होंने मेरा रूमाल तो बसन्ती नहीं रंगा था परन्तु मेरा हृदय बसन्ती हो गया था ।


कॉर्नफ्लावर अपने विविध सफेद , गुलाबी व नीले रंगों में अजब छटा बिखार रहे थे । इन्हें देखे तो ३१ बरस बीत गए थे । पैंज़ी बहुत कम नजर आ रहे थे । शायद मेरी राह देखते देखते थककर व रूठकर चले गए थे। या फिर अभी उनके आने का समय ही नहीं हुआ था । बस कुछ हड़बड़ी वाले सिपाही आकर बगीचे का निरीक्षण कर रहे थे । बचपन में हम इनके चेहरे जैसे रूप के कारण इन्हें डाइन भी कहते थे । फ्लॉक्स अपने रंग बिरंगे गुच्छों में झूम रहे थे । पिटूनिया हिल हिल कर अपनी निःशब्द घंटियाँ बजाने में व्यस्त थे । मुझे लगा मैं उनमें अपने बचपन की आवाजें सुन सकती हूँ । हर क्यारी में अलग फूल थे और मुझे वे यूँ रिझा रहे थे कि मैं तय नहीं कर पा रही थी कि किस पर नजरें टिकाऊँ । मेरे अति प्रिय कार्नेशन्स व डायन्थस तो मुझे मंत्र मुग्ध कर दे रहे थे ।


दूर प्रहरी की तरह हॉलीहॉक्स के पौधे खड़े थे व अपने फूलों को अपने शरीर पर तमगों की तरह लगाए तनकर खड़े थे । फूलों की पंखुड़ियों को छोड़ इनका सारा शरीर हल्के काँटों जैसे रोयों से भरा होता है । ये दूर से ही पंगा ना लेने की चेतावनी दे रहे थे । नारंगी गार्डन नैस्टरशियम्स तो सबको लुभाने के लिए धरती पर ही बिछे जा रहे थे । उनके कमल से गोल पत्ते व अजीब सा घंटी सा आकार ना जाने कितनी यादें ताजा कर जा रहा था । लार्कस्पर भी पीछे रहने वाले नहीं थे । चाहे मुझे उनका नाम याद करने मे् काफी समय लगा परन्तु एक बार जब नाम मेरे मन की जबान पर आया तो वे मुझपर मुस्कुरा दिये। कॉक्सकूम्ब अपने मुर्गे सी कलगी पर गर्व से इतरा रहे थे । लगा जैसे कह रहे हों देखो , 'हमें वहाँ दूर उगा तो लेती हो पर जरा यहाँ हमारे अपने देश में हमारी शान तो देखो । क्या कभी वहाँ हमारी ऐसी बड़ी बड़ी कलगी देखी है ? ' वे सायद रैनेन्क्युलस ही थे जो बार बार मुझसे पूछ रहे थे कि पहचाना । परन्तु मैं मूर्ख उन्हें पहचान ही नहीं पा रही थी । शायद लोग आमतौर पर उन्हें पहचान नहीं पाते , इसीलिए रूठे व दुखी ये सकुचाए से रहते हैं व अपनी पंखुड़ियाँ पूरी नहीं खोलते हैं ।


मुझे दिल्ली पहुँचने में देर हुई थी परन्तु कुछ आखिरी गुलदाउदी (क्राइसेन्थेमम)मेरी प्रतीक्षा में जैसे रुके हुए थे । कुछ डहलिया भी अधखिले से मुझे ललचा रहे थे । एस्टर तो मुझे बचपन से ही बेहद प्यारे लगते हैं, विशेषकर सफेद एस्टर !अपने गुलाबी व नीले बैंगनी भाई बहनों के साथ ये भी खिले हुए थे । एक सड़क से गुजरते हुए कैना भी देखे । मैं तो इन्हें भूल ही गई थी । कोरल फाउन्टेन भी देखे जो हमारे गुजरात में भी लगे हुए हैं । ये फूल कुछ ही दिन के जीवन में इस तरह से इतनी खुशी कैसे लुटा सकते हैं ? साल्विया शान्त से खड़े थे जानते थे कि इतने रंगीन फूलों में वे लाल रंग के होते हुए भी प्लेन जेन ही नजर आ रहे थे । सड़क से ही मैंने किसी बाग बगीचे में नहीं, यूँ ही सड़क के किनारे के अनाम पेड़ों पर चढ़ती हुईं मॉर्निंग ग्लोरी मेरे मनभावन हल्के जामुनी रंग में अपनी पूरी ग्लोरी में खिलते और और से और ऊपर चढ़ते देखी । लगता था कि जैसे वह पर्वतारोही हो । आवारा से बोगनविलिया की बेलों में जो बहार देखी वह रोपे हुए बोगनविलिया में भी कभी नहीं देखी । वह शायद इसलिए कि यह बेल बिना पानी के ही अधिक फूलती है ।


मुझे अपने बचपन की वह आदत याद आ रही थी जब मैं पौधों को उनकी गन्ध से पहचानने का यत्न करती थी । आँख बन्द करके भी यदि किसी पत्ते को तोड़ा जाए तो उसकी गन्ध उसके नाम की चुगली कर देती थी । अब दूर से भी देखकर मेरी नाक में सब फूलों व उनके पत्तों की विशेष महक महसूस हो रही थी । अब तो बस यह पागलपन सवार था कि कहीं से सारे के सारे बीज खरीद लूँ व जाकर अपने छोटे से बगीचे में लगा दूँ । परन्तु क्या उत्तर भारत की शरद, शिशीर व वसन्त ॠतु भी किसी दुकान से पैकेट में खरीदकर ले जा पाऊँगी ?


मैंने कुछ फूलों के चित्र नेट से ढूँढकर यहाँ लगाने की चेष्टा की है । ये सब चित्र <http://www.flowerpictures.net/> के सौजन्य से हैं ।

http://www.flowerpictures.net/flower_database/h_flowers/holyhock.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/h_flowers/horned_violet.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/mn_flowers/morning_glory.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/mn_flowers/morning_glory_shrub.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/pansy.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/petunia.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/phlox_creeping.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/phlox_garden.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/rq_flowers/ranunculus.html

घुघूती बासूती

Wednesday, April 16, 2008

डॉक्टरों को क्षमा प्रार्थना सहित मेरा उत्तर

मेरे पिछले चिट्ठे 'दिल्ली में पहला दिन' http://ghughutibasuti.blogspot.com/2008/04/blog-post_15.htmlपर बहुत सी टिप्पणियाँ आईं । दो डॉक्टरों की भी थीं । यहाँ मैं उन्हें उत्तर दे रही हूँ । शीघ्र ही ऐसे डॉक्टरों का जिक्र भी करूँगी जिन्होंने मेरा मन जीता है । यदि कोई उद्दडंतता हुई है तो डॉक्टर वर्ग से क्षमाप्रार्थी हूँ ।

अजित जी व महक जी,

यह लेख डॉक्टरों के विरुद्ध नहीं लिखा गया है । प्रवीर कुछ ऐसा बना कि चाहकर भी डॉक्टरों से मेरा नाता छूटता ही नहीं । डॉक्टर मनुष्य है, यह तो हम सब जानते हैं,वैसे ना होता तो शायद बेहतर होता । तब जब उनका व मरीजों का अनुपात गड़बड़ाता दिखता तो कुछ और मॉडेल बना लिए जाते ! खैर यह तो मजाक है परन्तु ऐसी भी क्या कठिनाई है कि स्वतंत्रता के ६० वर्ष बाद भी हम अधिक मेडिकल कॉलेज नहीं बना पा रहे ? क्यों जीवन से पिटे हुए लोगों को अधिक सुविधाएँ नहीं दिला पा रहे ? क्यों दवाइयों पर कर लगाते हैं ? कैसा होता होगा उस मरीज का दुख जो जानता है कि उसके इलाज में उसका घरबार गिरवी रख दिया गया है ? कैसी वितृष्णा स्वयं के जीवन से होती होगी जब जानते हैं कि उनके इलाज ने उनकी आने वाली पीढ़ियों से उनकी कमाई का एकमात्र साधन उनकी जमीन छीन ली है ? क्यों मेडिकल बीमा हमें हमारी बीमारी के समय बिना हेराफैरी के सहायता नहीं दे सकता? क्यों २४ घंटे हस्पताल में रहना आवश्यक है ?

जहाँ तक डॉक्टर की थकान की बात हे तो फिर वही प्रश्न उठता है कि एक व्यक्ति जिसके हाथ में किसी का जीवन है, उसकी मुस्कान है, उससे इतने लम्बे घंटे काम ही क्यों करवाया जाता है ? क्या कभी कोई एयरलाइन एक थके पायलट को विमान थमा देती है ? फिर एक थके डॉक्टर को मरीज क्यों थमाए जाते हैं ? क्या भारत में छात्रों का ऐसा अकाल पड़ गया है कि कोई भी डॉक्टर बनने के लिए तैयार नहीं है ? हम सब जानते हैं कि डॉक्टरों की कमी है, कि हस्पतालों की कमी है । तभी तो मैं भी उपायों की भी बात कर रही हूँ । क्यों नहीं AIIMS जैसे दो चार और हस्पताल नहीं खुलते ? क्यों नहीं AIIMS जैसे हस्पताल जाने से पहले ही मरीजों को फिल्टर कर केवल वे मरीज वहाँ नहीं भेजे जाते जिनका इलाज एक साधारण या कुछ कम विशिष्ट हस्पताल में नहीं हो सकता है ? क्या किसी बढ़िया मैनेजर से हस्पताल मैनेज नहीं करवाए जा सकते ? क्या मरीज को एक ऐसा समय नहीं दिया जा सकता जिसमें केवल एक या दो घंटे की प्रतीक्षा हो? जैसी एमर्जैन्सी हस्पताल में आ पड़ती हैं वैसी ही जीवन के हर क्षेत्र में शायद छोटे पैमाने पर आ पड़ती हैं । कारखानों में भी मशीनें रूकती हैं टूटती हैं, दुर्घटनाएँ घटती हैं । इन्जीनियर रात दिन भागते हैं कारखाने को चलाने को ।

हम शुक्रवार को दिल्ली पहुँचे, शनिवार को AIIMS में ही फोन आया कि एक बहुत बड़ी दुर्घटना कारखाने में हो गई है । ऐसी जो पति ने छत्तीस वर्ष के कार्यकाल में नहीं देखी । किसी को चोट तो नहीं लगी या कोई दबा तो नहीं जानने के बाद पति ने चैन की सांस ली । सौभाग्य से कम्पनी के डायरेक्टर वहीं पर थे सो तीन दिन उन्होंने सम्भाल लिया और बुधवार की सुबह सुबह मुझे हस्पताल में दाखिल छोड़कर ही पति वापिस लौट गए । ये सब लोग भी थकते हैं । अन्तर केवल इतना है कि इनकी गल्तियों से नौकरी जाती है,या कोई दुर्घटना घटती है,या उत्पादन रूकता है । सीधे सीधे किसी की जान इन लोगों के हाथों में नहीं होती । परन्तु हर घाटे में चलता कारखाना देर सबेर बंद होता है और इसके साथ ही जाती हैं सैकड़ों नौकरियाँ व सैकड़ों अन्य लोगों का रोजगार हो अप्रत्यक्ष रूप से कामगारों व कारखाने से जुड़े होते हैं ।

प्रश्न डॉक्टर बनाम मरीज नहीं है प्रश्न केवल मनुष्य बनाम कष्ट है और हमें कुछ ऐसा करना होगा कि जहाँ भी कष्ट है उसके निवारण के उपाय सोचे जाएँ । विशेषकर जो समाज अपने बच्चों को कष्ट में जीने दे सकता है वह समाज समाज ही नहीं है ।

घुघूती बासूती

Tuesday, April 15, 2008

दिल्ली में पहला दिन

घर से निकले तो तीन दिन हो गए परन्तु कल ही दिल्ली पहुँचे । उस आधे बचे दिन को ना गिनकर आज को ही पहला मान रही हूँ । आज ही AIIMS में डॉक्टर से मिलना था । फोनकर लिया था घर से चलने से पहले भी और दिल्ली से भी । नौ बजे पहुँचने को कहा था । सो दौड़ते भागते पौने नौ बजे ही पहुँच गए । अन्य डिपार्टमेन्ट्स की अपेक्षा यहाँ कम भीड़ है । परन्तु जो भीड़ है वह हृदय को विचलित कर रही है । छोटे छोटे बच्चे इलाज के लिए पहुँचे हैं । माता पिता न जाने कैसे अपने बच्चों के दुख के साथ जी रहे हैं । फिर न जाने दिल्ली या भारत के किस हिस्से से किस आस के साथ इन्हें लेकर यहाँ आए हैं । कुछ भाग्यवान कार से आए होंगे, शेष बस या रिक्शे से । एक माँ अपनी सुन्दर व शरीर से बेहद स्वस्थ दिखने वाली बच्ची के साथ है । वह बच्ची कभी भी कोई भी आवाज निकालती है । मुझ जैसों के लिए केवल निरर्थक हृदय दहला देने वाली चीख परन्तु शायद माता पिता के लिए कुछ अर्थपूर्ण। धीरे धीरे देखती हूँ कि वे भी उसकी आवाजों को समझ नहीं पाते । उसकी गति विधियों से लगता है कि शायद autestic हो । वह बार बार अपनी हरकतों को दोहराती है । किसी का छूना या बात करना उसे पसन्द नहीं । कभी कभार किसी अन्य बच्चे पर थोड़ा सा आक्रामक हो जाती है ।

एक अन्य बच्चा है बेहद दुबला पतला व शान्त । पिता उसे व्यस्त रखने को उसे पैन व कागज देते हैं । वह कागज पर बहुत अधिक झुककर लिखता है । आँखें कागज से लगभग चिपकी हुईं । मुझे स्कूल में अपने बच्चों को ऐसा करने पर टोकना व उन्हें आँखें चैक करवाने को कहना और बहुत बार उनका चश्मा लगवाना याद आ रहा है । इन बच्चों में भी मुझे अपने स्कूल के बच्चे दिख रहे हैं । मन करता है कि उनसे बोलूँ और खेलूँ और उनकी डॉ की प्रतीक्षा को थोड़ा सहनीय बना दूँ । नहीं जानती कि प्रतीक्षा तो अभी शुरू ही हुई है ।

एक अन्य बच्चा है जिसकी आँखें पलटी सी हुईं हैं । शरीर का एक भाग ठीक से काम नहीं करता । पिता और चाचा उसे बहला रहे हैं । वे उसे बंगलौर और बनारस भी दिखा लाए हैं । कुछ ऐसे ही दो और बच्चे हैं । एक बेहद बेचैन २४ वर्षीय बच्चा, हाँ बच्चा ही है । अपनी माँ को हैरान परेशान किये हुए है । ग्यारह बज रहे हैं अभी तक डॉक्टर नहीं आईं हैं । साढ़े ग्यारह पर अभी भी नहीं । लगभग पौने बारह बजे लम्बे लम्बे डग भरती व थकी सी डॉक्टर आतीं हैं । बड़ी आशा से लोग एक दूसरे का नम्बर पूछ रहे थे । परन्तु डॉक्टर नए मरीजों से शुरू करती हैं । समझ नहीं आता कि क्यों । मुझे तो लाभ ही होगा परन्तु नए मरीज का पूरा इतिहास जानने व पहले कराए इलाज की फाइल देखने में बहुत समय लगता है । जबकि पुराने मरीज से हाल चाल पूछकर दवाई बदलकर या जो भी चिकित्सा चल रही है उसे चालू रखने को कहने में कम समय लगेगा । पहला नया मरीज अन्दर है । आधे घंटे से अधिक हो गया है । २४ वर्षीय बेचैन बच्चा बार बार पूछ रहा है कि उसकी बारी कब आएगी । माँ ने उसकी ओर से मुँह मोड़कर दूसरी तरफ कर लिया है । पिता यहाँ वहाँ घूमकर मन बहला रहा है । आखिरकार मरीज बाहर आता है, अगला मरीज अन्दर जाता है । उसे भी अन्दर गए ४० मिनट हो जाते हैं । २४ वर्षीय जाकर कमरे के अन्दर झाँक आता है । यह मरीज बाहर आता है तो अन्दर से पुकार आती है कि मरीजों के रिश्तेदार अन्दर जाएँ उनसे कुछ प्रश्न पूछे जाने हैं । शायद कोई मेडिकल छात्र अपनी रिसर्च के लिए उनसे प्रश्न पूछना चाहता है । छोटे से कमरे में रिश्तेदार चले जाते हैं । बेचैन बालक एक बार फिर अन्दर का चक्कर लगाने जाता है और वहीं बैठ जाता है । पिता किसी तरह से उसे बाहर लाता है ।

कई मरीजों के रिश्तेदार अपना दुख एक दूसरे को सुनाकर बाँट रहे हैं । कुछ मेरे कानों में भी पड़ता है । बेचैन बच्चा अपनी माँ द्वारा बताई बातों को सुन रहा है, कहीं कहीं वह माँ द्वारा बताए वृतांत को सही कर सुनाता है । 'नहीं मम्मी, मैं तब १२ साल का था जब बीमार पड़ा था । ग्यारह का नहीं । अब मैं २४ का हो गया हूँ । पर जाने क्यों ठीक ही नहीं होता। तब से तो इलाज चल रहा है ।'उसके पीछे बैठी महिला किसी मन्दिर में जाने की सलाह देती है । 'वहाँ का पुजारी हर पूर्णिमा को इलाज करता है । काफी अन्तर पड़ जाता है उसके इलाज से । मैं अपने लड़के को भी लेकर गई थी अब देखो कितने आराम से बैठा है। यहाँ का इलाज रोको मत पर वहाँ का भी शुरु कर दो ।' बेचैन बच्चे का पिता पता नोट करता है ।

रिश्तेदार बाहर निकलते हैं ,एक और मरीज अन्दर जाता है। उसे भीतर गए भी लगता है युग बीत गए हैं। बेचैन बहुत बेचैन हो गया है । वह कहता है, 'घर चलो । फिर कभी आएँगे ।'माँ के घर जाने से इन्कार से वह बहुत परेशान हो जाता है । कहता है,'जबसे मैं पैदा हुआ हूँ यहीं बैठा हूँ ।' कोई भी मुस्करा नहीं पाता । सब एक दूसरे की पीड़ा को समझते हैं । कुछ भी हास्यास्पद नहीं लगता । शायद सिवाय अपने मनुष्य व बीमार होने के !

दो बजे मेरी बारी आती है । मैं लज्जित हूँ क्योंकि बहुत से बच्चे अब भी बाहर बैठे हैं । बेचैन अन्दर आकर बैठ जाता है । मैं कहना चाहती हूँ कि आप पुराने मरीजों को देख लीजिये, ये जल्दी निबट जाएँगे । तब तक बेचैन सलाह देता है,'आन्टी, डॉक्टर आन्टी, पहले बच्चों को देख लो ना !' डॉक्टर मुस्कुराकर कहती है,'सबको बारी बारी देखूँगी । पहले नए मरीज देख रही हूँ ।'मेरे कहने को कुछ नहीं बचता । बेमन से अपने बारे में व अपने कष्टों को बताकर वहाँ से भागना चाहती हूँ । परन्तु वे विस्तार से जानना चाहती हैं सो बताती हूँ । ऐसा लगता है कि मैं कोई गुनहगार हूँ । वे एक टेस्ट कराने को कहती हैं जिसके लिए मुझे अगस्त में तारीख मिलती है । मैं वहाँ से छूटकर छोटे बच्चों पर नजर नहीं डाल पाती और गुनहगार सी वहाँ से सिर झुकाए निकल जाती हूँ ।

मुझे अपने गुजरात के डॉक्टर पर आश्चर्य होता है कि वे मुझे यहाँ ना भेजकर किसी निजी हस्पताल में क्यों नहीं भेज सकते थे । केवल इसलिए मुझे वहाँ भेजकर वहाँ की भीड़ और बढ़ाई क्योंकि उन्हें इस डॉक्टर पर विश्वास है । बाद में पता चलता है कि गंगाराम में इन सबकी शिक्षिका काम कर रही हैं व वही टेस्ट तुरन्त हो सकता है । सोचती हूँ कि AIIMS में केवल उन्हें जाना चाहिये जिनका इलाज और कहीं ना हो सके या जो निजी हस्पतालों का बिल ना दे सकें । ऐसे में भी पहले एक अन्य सरकारी हस्पताल होना चाहिये ताकि केवल बहुत कठिन व असाध्य रोग वाले ही वहाँ से AIIMS भेजे जाएँ । परन्तु वे क्या करें जिनके डॉक्टर उन्हें वहाँ ही भेज दें ? मैं बच्चों में इतनी उलझी थी कि इतने सारे अन्य वयस्कों व वृद्धों की ओर ध्यान ही नहीं दिया । ना ही इस ओर ध्यान गया कि कहीं कोई खाली पेट टेस्ट ना कराने हों सो चार बजे तक मैंने कुछ खाया पीया भी नहीं था । अब कुछ खाने का मन भी नहीं हो रहा था । सोचती हूँ कि अपने बच्चों या किसी प्रिय के बीमार पड़ने से स्वयं का बीमार पड़ना कितना कम कष्टप्रद है ।

घुघूती बासूती

Monday, April 14, 2008

मैं स्वप्न बेचने आऊँगा

बन स्वप्न बेचने वाला मैं
तेरे घर पर आऊँगा,
बन जोगी मैं तेरे द्वारे
दान तुझे ले जाऊँगा ।

मैं लेकर चूड़ी रंग बिरंगी
तेरे घर पर आऊँगा,
लगा गुहार, गाकर मैं
तेरा दिल ले जाऊँगा ।

मैं बन वन का सुन्दर मोर
तेरे आँगन में नाचूँगा,
नाच नाच कर मन विभोर
मैं चैन तेरा ले जाऊँगा ।

गीत निराले, प्रेम प्यार के
मैं इकतारा लेकर गाऊँगा,
बन बंजारा, प्यार बाँटता
मैं तेरे मन बस जाऊँगा ।

मैं बन नटराज तेरे संग
थिरक थिरक कर नाचूँगा,
कर अविभूत, लगा भभूत
मैं तुझे कैलाश ले जाऊँगा ।

तेरी बगिया के सुन्दर फूलों में
मैं भी इक फूल बन महकूँगा,
या बन तेरा साथी पक्षी
मैं संग तेरे ही चहकूँगा ।

मैं बन घनघोर मेघराज
करके निनाद यूँ कड़कूँगा,
प्रेमरस में तुझे भिगोने
फाड़ हृदय मैं बरसूँगा ।

मैं मस्त पवन का झोंका बन
उड़ता हुआ यूँ आऊँगा,
सहलाकर तेरे आँचल को
ले तेरी खुशबू उड़ जाऊँगा ।

घुघूती बासूती