Tuesday, March 25, 2008

क्यों तुम डरते हो

क्यों मुक्त हो जाने से तुम डरते हो
पर बन्धन के नाम से बिदकते हो,
बान्धूँ या छोड़ूँ तुम्हें, ओ मीत मेरे
क्यों इस निर्णय से सिहरते हो ?

तुमने रच डाला है शब्दों का जाल
अब उसमें ही तुम आ फंसते हो,
जब फंस जाते हो तो तड़पते हो
कसूँ या छोड़ूँ तुम्हें तुम्हारे ही हाल ?

चाहत मेरी कोई ऐसी तो न थी कि
करना पड़ता तुम्हें सबकुछ ही वार,
कुछ शब्दों को ही था माँगा मैंने
फिर चलती क्यों यूँ दिल पर धार ?

ना चाहा था कुछ लेना देना
तेरे जग में ना माँगा मैंने स्थान,
फिर क्यों लगता कि चोर हूँ मैं
ले भागी तेरे हृदय को अपना मान ?


घुघूती बासूती

Friday, March 21, 2008

होली से नाराज मत होइये !

रियाज़ जी का होली के खिलाफ 'एक पर्चा' पढ़ा । बहुत विचित्र सा लगा कि वे प्रेम , मिलन व हर नाराजगी को भुला देने वाले इस त्यौहार के बारे में ऐसा लिख रहे हैं । मैं उनकी बातों को काट नहीं सकती क्योंकि जहाँ की वे बात कर रहे हैं, वे गाँव मैंने देखे नहीं हैं । न ही मैंने होली का ऐसा कुरूप रूप देखा है । यदि ऐसा हो रहा है तो इसे बदलने की भरपूर चेष्टा होनी चाहिये । परन्तु हर बार जब कोई वस्तु, समाज या प्रथा कुरूप हो जाए तो इलाज क्या उसे बैन कर देने में है ? क्या उसे सुधारने की आवश्यकता नहीं है ? मेरा देश गंदा है, जहाँ तहाँ कूड़ा पड़ा रहता है, कानून व्यवस्था चरमरा रही है, तो मैं देश को ही छोड़ दूँ ? मेरे धर्म का रूप कुछ बिगड़ रहा है, तो क्या मैं अपने धर्म को बदल लूँ ? मेरी भाषा पिछड़ी जा रही है, अंग्रेजी बहुत आगे निकल गई है, तो क्या मैं अंग्रेज बन जाऊँ ? क्या सुधार की कोई संभावना नहीं है ? किस किस से भागेगें हम ? क्या जो नया देश, धर्म, भाषा मैं अपनाऊँगी वे बिल्कुल साफ सुथरे, निर्दोष व आदर्श होंगे ? क्या किसी दिन इस कचरे, विष से भरी पृथ्वी को भी छोड़ भाग जाऊँगी मैं ?
नहीं , मैं पलायन नहीं करूँगी । मैं इसी समाज में रहकर इसे थोड़ा बदलूँगी । यदि मुझे ऐसे अवसर मिले हैं जिनमें मुझमें कुछ बदलने की सामर्थ्य आ गई है, तो मैं इनका अवश्य सदुपयोग करूँगी । मैं पूरे समाज का जिम्मा नहीं ले सकती । मैं कोई समाज सुधारक, राजनीतिग्य या विदुषी नहीं हूँ । मैं केवल और केवल एक संवेदनशील परन्तु आम मनुष्य हूँ । मुझमें कष्ट झेलकर गाँधी सी सेवा करने की हिम्मत नहीं है । मेरा चमित्कृत करने वाला व्यक्तित्व नहीं है । मैं शायद धर्म को नहीं मानती । परम्पराओं की लकीर को नहीं पीटती । परन्तु मैं जहाँ हूँ, उस स्थान व समाज को थोड़ा सहनीय, बेहतर व उत्सवपूर्ण बनाने का यत्न अवश्य कर सकती हूँ । जीवन इतना कठिन है कि यदि हम थोड़ा सा भी स्नेह बाँटें तो यह स्नेह व खुशी का एक बहुत सुन्दर सा चक्र चल पड़ता है । मैंने आपसे मुस्करा कर बात की आपने अगले से और उसने किसी अन्य से ।
खैर, बात होली की है । आपके शहरों , गाँवों में यह चाहे जितनी भी विकृत हो, हमारे यहाँ तो यह एक उत्साह व मस्ती का पर्व है । आप अकेले छप्पन भोग खा सकते हैं, गहने पहन सकते हैं , अमीर हो सकते हैं , परन्तु होली तो बिल्कुल नहीं मना सकते । मेरे विचार से होली जैसे पर्व मनाने के पीछे यही मिलकर मनाने की भावना रही होगी । हमारे यहाँ हर साल थोड़ा बहुत परिवर्तन व सुधार करके हम हर होली को यादगार बनाने का यत्न करते हैं । पहले होली व रावण एक बहुत छोटे से मैदान में जलते थे । पिछले साल से एक बड़े क्षेत्र को समतल कर दिया गया है ताकि होलिका दहन, रावण दहन वहाँ हो और फिर अपनी कॉलोनी के बच्चे वहाँ मजे से क्रिकेट आदि खेलें । हर साल होलिका दहन के बाद होली की परिक्रमा करते थे , प्रसाद खाते थे, थोड़ा रंगों से खेलते थे व हँसी मजाक कर घर लौट आते थे ।
हमारे यहाँ सबसे बड़ी समस्या पुरुषों को कारखाने से बाहर निकाल घर लाने या फिर कहीं एकत्रित करने की है । सो इस बार विचार हुआ कि जब होलिका दहन के लिए ये लोग घर लौट ही आएँगे तो क्यों ना आज ही अपने क्लब में एक खाने व खेलने का कर्यक्रम भी रख दिया जाए । कोशिश रहती है कि यह हर महीने हो परन्तु काम के चलते, या बच्चों की परीक्षा के कारण यह हर महीने हो नहीं पाता । सो आज होली जलाने के बाद हम सब क्लब में इकट्ठे होंगे । वहाँ तम्बोला होगा । हो सकता है एक दो गीत, चुटकुले भी हो जाएँ । फिर सब मिलकर छोले भटूरे खाएँगे । हँसी मजाक तो रहेगा ही । फिर हम सब घर लौट आएँगे ।
हमारी कॉलोनी दो भागों में विभक्त है । कल सुबह लोग ढोल लेकर एक दूसरे के घर जाएँगे, सबके घर रंग खेलेंगे कुछ खाएँगे और उस परिवार को भी साथ लेकर अगले घर निकल जाएँगे । इस तरह से यह समूह बढ़ता जाएगा । दूसरी तरफ की कॉलोनी वालों के लिए कम्पनी की बस खड़ी रहेगी जो इन्हें दो तीन चक्करों में गेस्ट हाउस ले आएगी । जो लोग हमारे घर आना चाहेंगे वे थोड़ा पहले हमारे घर के पास उतर यहाँ आ जाएँगे । हमारी तरफ की कॉलोनी वाले भी इसी प्रकार से एकत्रित होंगे व अन्त में हमारे घर पहुँचेंगे । एक दूसरे के गले मिलेंगे । कोई छोटा बच्चा भी कह देगा, "आँटी मुझे भी आपके गले मिलना है ।" फिर जमकर होली खेलेंगे । स्त्रियाँ आँगन में व पुरुष लॉन की घास पर डेरा डालेंगे । बच्चे तो भागते दौड़ते ही रहेंगे । यहाँ गरमागरम पकोड़े, कचौड़ी, मट्ठी, कुछ अन्य नमकीन, मिठाई व गरमागरम जलेबी का प्रबन्ध रहेगा । ठंडे पेय भी रहेंगे । कुछ खापीकर, रंग खेलकर हम सब भी गेस्ट हाउस पहुँच जाएँगे ।
वहाँ बाहर पेड़ों के नीचे कुर्सियाँ लगी रहती हैं । कुछ मस्ती करने वाले लोग जमीन पर ही लाउडस्पीकर के सामने ढोल आदि लेकर गाने का कार्यक्रम करेंगे । पिछले वर्ष तो स्त्रियों पुरुषों के बीच अन्ताक्षरी खेली गई थी । फूहड़ व भद्दे गीत ! नहीं मुझे ऐसी कोई याद नहीं है । यहाँ भी पकड़ पकड़ कर लोगों को रंगा जाएगा । कब किसकी बुरी तरह से रंगने की बारी आ जाए कहा नहीं जा सकता । कोई बचने के लिए भाग रहा होगा तो कोई रंगने को ! कुछ मित्र हर बार कुछ नया ही जुगाड़ करते हैं । किसी बार विशेष हिप पॉकेट्स में विशेष रंग तो किसी बार गले से लटकती रंगों की बोतलें । कोई छोटी सी बच्ची या बच्चा जब लाड़ से मुझे या किसी विशेष आँटी या अंकल को रंगना चाहेगा तो झुककर प्रेम से उसे रंग लगाने देंगे । हर बार कॉलोनी के किसी ना किसी बच्चे का होली का डर दूर होता है और वह भी बड़े बच्चों के बीच रंग खेलने लगता है । इस बार देखूँ कि क्या हमारी कॉलोनी में रहने वाली छोटी सी खुशी होली खेलेगी क्या ! कुछ गरमागरम खाने व ठंडा पीने के बाद एक बजे तक लोग अपने अपने घर वापिस जाएँगे ।
हमारी तरफ के लगभग १६ ‍‌या १८ परिवार स्नान कर तीन बजे तक मेरे घर के सामने वाले गोले में एक बार फिर दोपहर का भोजन मिलकर खाने के लिए इकट्ठे होंगे । तबतक लोग थके व उनींदे से होंगे । महिलाएँ खुश होंगी क्योंकि खाने की चिन्ता किये बिना मस्ती से होली खेल सकेंगी । पुरुष खाना खाकर शायद उसी समय या एक घंटे बाद फैक्टरी चले जाएँगे । सो इस तरह से एक और दिन हम अपने जंगल में मंगल मना कर बिता देंगे । ये ही सब दिन हम लोग यह जगह छोड़ने या रिटायर होने के बाद याद किया करेंगे । मेरे जीवन में ऐसी ही न जाने कितनी सुन्दर मीठी यादें भरी पड़ीं हैं । आशा है कि बचे हुए कुछ वर्षों में इनमें वृद्धि ही होती रहेगी ।
आप सब को भी हमारी ओर से होली मुबारक !
घुघूती बासूती

Tuesday, March 18, 2008

पहली स्मृति

कुछ दृष्य आँखों व स्मृतिपटल में कैद होकर रह जाते हैं। विचार करो तो उनके याद रहने का कोई कारण नहीं मिलता। क्यों और क्या से अलग इनका अपना ही अस्तित्व व स्थान होता है। कई यादें किन्हीं फोटो की बैसाखी के सहारे खड़ी होती हैं तो कई परिवार में होने वाली बातचीत, पुराने किस्सों को सुनने सुनाने के कारण। यही कारण है कि जो बच्चे अपने परिवार में रहते हैं, उन्हें बचपन की बातें याद रहती हैं क्योंकि वे बातें घर में बार बार दोहराई जाती हैं। परन्तु अनाथ या परिवार से बिछड़े बच्चे इन्हीं बातों को भूल जाते हैं।

परन्तु मेरी बचपन की सबसे पहली याद के पास कोई बैसाखी या किस्सा नहीं है। ना ही वह दृष्य कुछ विशेष या अनोखा है। उसमें घर में चर्चा करने लायक भी कुछ नहीं है। केवल एक स्पष्ट केमरे में बन्द किया एक दृष्य सा यादों में बहुत साफ - साफ है। जब भी बचपन शब्द के बारे में सोचती हूँ तो वह सामने आ जाता है। भाई व मैं हाथ पकड़े घर के पीछे बगीचे में खड़े हैं। भाई ने लाल रंग का आगे से खुला कार्डिगन पहना हुआ है। कार्डिगन में लाल रंग के एकदम सपाट लगभग १ या २ मि.मी. मोटे बटन हैं। बटन में गोल गोल उभरे हुए वृत्त हैं। बहुत सारे वृत्त। मुझे बटन का डायामीटर भी याद है, लगभग १.५ सै. मी.। बगीचे में बहुत सी क्यारियों के बाद एक छोटी सी पहाड़ी है । पहले की क्यारियों में सब्जियाँ लगी हुई हैं । बाद की क्यारियों में पंक्तियों में तीन तीन पपीते के पेड़ लगे हुए हैं ।पपीतों के बाईं तरफ एक बहुत बड़ा खाद का गड्ढा है । पहाड़ी पर बगीचे की सीमा पर बाड़ लगी हुई है । बाड़ में एक बहुत बड़ा बेर का पेड़ है । हम दोनों सामने उस पेड़ को देख रहे हैं। क्यों देख रहे हैं यह पता नहीं , बस देख रहे हैं। उस पेड़ के बेर भी याद हैं । बड़े - बड़े स्वादिष्ट बेर ।


पिताजी को बगीचे का बहुत शौक था । सुबह ना जाने कितनी जल्दी उठकर वे सैर को जाते थे । प्राणायाम करते थे । फिर बगीचे में लग जाते थे । घंटे भर बगीचे में काम करके ही स्नान, पूजा व नाश्ता कर दफ्तर जाते थे । उस बगीचे जैसा बगीचा मैंने कभी नहीं देखा । जबकि विवाह के बाद कई जगहों पर हमारे बगीचे उस बगीचे से बहुत बड़े थे । माली भी थे । मुझे स्वयं को बागवानी का बहुत शौक भी था । परन्तु पिताजी जैसी green fingers मेरी या मेरे मालियों की नहीं थीं ।


उस मकान में जाने के लिए एक गेट था । गेट के बाद ऊपर को जाती सीढ़िया और रैम्प । एक रास्ता जाता था जिसके एक तरफ हमारा बगीचा, दूसरी तरफ पड़ोसियों का । कुछ आगे जाने पर दोनों तरफ गेट, एक हमारा एक पड़ोसियों का । रास्ता और ऊपर जाता था, सीढ़ियों से होकर । फिर एक और पड़ोसियों का बगीचा व मकान ।


हमारे गेट की एक तरफ एक बहुत पुराना व बड़ा बरगद का पेड़ था । उसका जितना मोटा तना मैंने कभी नहीं देखा । बगीचे के हर कोने के लिए पिताजी की कोई योजना होती थी । कोई भी जगह बर्बाद नहीं जाती थी, परन्तु इस सदुपयोग में सौन्दर्य होता था । सो बरगद के पेड़ के नीचे की भूमि को कुछ ऊँचा बना, उसे पत्थरों से बाँध, वहाँ तरह तरह के कैक्टस लगा रखे थे । सामने लॉन था जिसके चारों ओर तरह तरह के फूलों के पौधे थे। गुलाब की इतनी किस्में थीं कि सिवाय चन्डीगढ़ के रोज गार्डन के मैंने कहीं नहीं देखीं।


क्यारियाँ जहाँ खत्म होती थीं और बगीचे की दीवार के बीच में एक ढलान था । वहाँ एक कलमी आम का पेड़, दो आड़ू के पेड़ और कोने में घना केलों का जंगल था । मकान के पीछे जाने के रास्ते पर लंगड़े आम का पिताजी के हाथों लगाया पेड़ , इलाहाबादी अमरूद का पेड़ व अंगूरों की बेल थी । थोड़ा पीछे जाने पर कलमी आड़ू का नैनीताल से लाया हुआ पेड़ , गलगल (बड़े नींबू का पेड़), लाल अमरूद का पेड़, व लुकाट का पेड़ था। बीच में क्यारियों मे सब तरह की सब्जियाँ। फिर गन्ने की दो बड़ी क्यारियाँ थीं। उसके बाद दो संतरे के पेड़, व बहुत सारे तीन तीन की पंक्ति में लगे पपीते के पेड़ । हर बच्चे के नाम की अलग पंक्ति । एक अनार का पेड़ फिर सब्जियों की क्यारियाँ थीं । उनके ऊपर पहाड़ी पर बनी आलू की क्यारियाँ, एक मीठे व बड़े अंजीरों का पेड़ । हमारे खाने के कमरे व खाद के गड्ढे के बीच गायों के रहने के लिये एक कमरा बना हुआ था । हम खिड़की से झाँककर गायों को देख सकते थे । परन्तु मेरे पैदा होने के कुछ समय बाद ही गायें किसी को दे दीं थीं । पिताजी कोई बड़ी पोस्ट पर नहीं थे, परन्तु भाग्य से जिस निजि कंपनी में वे काम करते थे वहाँ घरों के साथ बड़े से बगीचे भी दिये गए थे । यही बगीचा उनके हाथों संवरकर और भी बड़ा लगता था ।


ये सब क्यों याद आ रहा हे पता नहीं । कोई कारण नहीं है, परन्तु याद आ रहा है । और याद आ रहा है वह लाल स्वैटर, लाल बटन व भाई का हाथ पकड़े हुए बेर के पेड़ को देखती मैं ।

घुघूती बासूती

Friday, March 14, 2008

मैंने बेटियों को खाना बनाना नहीं सिखाया

मैंने अपनी बेटियों को खाना बनाना नहीं सिखाया । कारण जो भी रहे हों परन्तु यह तो सच है कि नहीं सिखाया । अब मुझे जैसी भी माँ कहा जाए परन्तु मैं तो बस ऐसी ही हूँ ।
बड़ी बिटिया को कभी रसोई में रुचि नहीं थी । उसकी रुचि केवल छोटी बहन को खड़े - खड़े निर्देश देने भर व फिर उसके बनाए खाने को चखने भर में थी । छोटी बिटिया को भी मैंने खाना बनाना नहीं सिखाया । उसे बहुत कम उम्र में स्वयं ही यह शौक चर्राया । जब वह कुछ बनाना शुरू करती तो मैं भी पहुँच जाती कि कुछ बताने की आवश्कता हुई तो बता दूँगी । परन्तु वह सदा से स्वावलंबी रही है लगभग हर बात में । सो यहाँ भी वह अपने प्रयास से ही सीखी और बहुत बढ़िया सीखी ।
बड़ी बेटी को शादी के दो वर्ष बाद खाना बनाना सीखने व बनाने का अवसर मिला । तब तक वह और उसका पति बिटिया के हॉस्टेल में ही रहे व मैस में खाना खाते रहे । कभी - कभार माइक्रोवेव में उसका पति पोहा आदि बनाता जो उसने भी सीख लिया । पिछले वर्ष पति के साथ अमेरिका गई तो यह उनका पहला घर व रसोई थी । अब पति से सीख वह भी खाना बनाती है । अभी मुझे उसके हाथ का खाना खाना शेष है । कल वह बहना के पास जाएगी । मैंने कहा है इस बार उसे पकाकर खिलाना । १९ वर्ष की आयु से खाना बनाते - बनाते वह अब थक गई होगी ।
खाना बनाना भी एक पारिवारिक गतिविधि हो सकती है जिसे जब सब मिलकर करें तो आनन्द आ सकता है । मुझे इसका ग्यान नहीं था । घुघूता जी से सुना था कि रविवार को जब उनकी माताजी या पिताजी या दोनों मिलकर खाना बनाते तो सारा घर उत्साहित होता था । कभी सब मिलकर मटर छीलते तो कभी पिताजी कुछ नया बनाते । एक विशेष खिचड़ी को उनके पिताजी ने अंत्येष्टि क्रिया खिचड़ी नाम दे रखा था । उस जमाने में कामकाजी महिलाओं को महाराज/रसोइये मिल जाते थे, सो सप्ताह भर वह ही खाना बनाता था । मुझे इसका आनन्द अपनी छोटी बिटिया के साथ मिला । कई बार हमने मिलकर खाना बनाया है, विशेषकर उसके घर में। हमारा घर तो वह १४ वर्ष की उम्र में ही छोड़कर हॉस्टेल चली गई थी। जब घर आती थी तो कभी कभी हम मिलकर तरह तरह का भोजन आदि बनाते थे । एक बार फिर यह आनन्द मुझे जब उसकी परीक्षाएँ हो रही थीं, तब उसके पति के साथ मिलकर मैथी के पराठे बनाने में मिला। मैं बेलती जाती और वह सेकता जाता था । उतने स्वादिष्ट पराठे मैंने कभी नहीं खाए । बातें करते करते पराठे बनाने का जो मजा था वह शायद होटल में खाना खाने में भी नहीं मिलता । अब भी सुनती हूँ कि वे अकसर रोटी मिलकर बनाते हैं । उसके शब्दों में, "आप रोटी बेलो, मैं रोटी जलाता हूँ ।" परन्तु स्वयं खाना बनाना सीखने की हानि यह हुई कि शेष सब खाना लगभग वही बनाती है ।
आज सोचती हूँ कि किसी जमाने में बेटियों को खाना बनाना ना सिखाना कितना बड़ा अपराध माना जाता । परन्तु मुझे कोई भय, कोई संशय नहीं था । बचपन व किशोरावस्था में वैसे ही सीखने को बहुत कुछ होता है । यह ऐसा समय होता है कि बहुत कम समय में बहुत कुछ सीखना होता है । स्कूली पढ़ाई तो उसका केवल एक भाग है । सबसे मुख्य तो जीवन मूल्य बनाना,जीवन दर्शन सीखना व खोजना, अपना मानसिक,शारीरिक विकास करना,संसार को समझना और यह समझना कि हर सरल रास्ता सही नहीं होता,अन्य मनुष्यों व प्राणियों के लिए संवेदनाशील होना, न जाने कितना कुछ केवल उन कुछ वर्षों में सीखना होता है । इन सबके अतिरिक्त भावनाओं व हॉर्मॉन्स का विस्फोट किसी भी किशोर को व्यस्त रखने के लिए बहुत है । यही वह समय है जब वह तरह तरह के संगी साथी बनाता है और मनुष्य को परखना सीखता है । सो कई बार खाना बनाना गौढ़ हो जाता है ।
वैसे मैं मानती हूँ कि जिसका भी पेट हो उसे खाना बनाना आना ही चाहिये, चाहे सादा दाल, भात, रोटी सब्जी ही सही । खाना बनाना आवश्यकता पड़ने पर कोई भी सीख सकता है । बहुत से पुरुषों को अवश्य यह लगता है कि खाना बनाना रॉकेट साइंस सा कठिन है । बहुत सी स्त्रियाँ चाहती भी नहीं कि उनके पति खाना बनाना सीखें । शायद यह पुराने जमाने के ऋषियों की तरह अपना ग्यान केवल अपने तक सीमित रखने व इस तरह स्वयं को किसी मामले में तो श्रेष्ठ रखने की कोशिश हो ।

बेटियों को लेकर माता पिता के मन में जो संशय व भय होते हैं वे हम उनमें भी डाल देते हैं । बच्चे हमारा डर,हमारे हाव भाव बहुत सरलता से पढ़ लेते हैं व आत्मसात भी कर लेते हैं । जब हमें अपनी बेटियों के लिए उपयुक्त वर की चिन्ता सताती है तो वही चिन्ता बेटियों में एक हीन भावना सी बनकर प्रकट होती है। मेरी छोटी बिटिया को दमा है व किशोरावस्था में हॉस्टेल में रहने के कारण वह अपने शिखर पर था । मैं बात बात में यह बात लोगों से कह देती थी । माँ को यह पसन्द नहीं आता था । वे कहती लड़की की बीमारी सबको नहीं बताते । यह वही भय माँ में शेष था जो पुत्रियों के लिए वर ढूढने वाली माँओं में होता है । उन्हें लगता कि मेरी बेटी से कौन विवाह करेगा । वे भूल जातीं कि जब उनकी बेटी ने अपनी पसन्द से विवाह किया तो बेटी की बेटी के लिए कौनसा नाक पर दीया रख वर ढूँढने जाना पड़ेगा । मेरा यह कहना कि जिससे वह विवाह करेगी उसे तो पता होना ही चाहिये और उसे यह भी आना चाहिये कि अटैक के समय कैसे सहायता करनी है, उन्हें विशेष पसन्द ना आता ।
आज उनकी चिन्ता बेहद हास्यास्पद लगती है । सोचती हूँ खाना पकाना न सिखाकर उन्हें अपने स्व की खोज के रास्ते पर चलने देना सही निर्णय था । हाँ, यदि खाना बनाने का समय मिलता तो वह प्रयोग करने को भी प्रोत्साहित ही करती । परन्तु यदि केवल खाने के चक्कर में पड़ती तो शायद कल बड़ी बेटी को उसकी पी।एच.डी.के वाइवा के लिए अपनी शुभकामनाएँ नहीं भेज रही होती । आज रात शायद मन भरकर छोटी बेटी से बात नहीं कर पाती । शायद उसके औफिस में किसी की मूल्य विहीनता पर वह, उसके पिता और मैं त्रिकोणीय संवाद ना कर रहे होते । ना ही शायद हर पाँच या सात मिनट पर उसका पति मुझे कुछ सुनाने, बताने को उससे फोन माँगता । ना ही वह उसे चिढ़ाते हुए वह कहती " दूसरों की माँ से क्यों बात करने के पीछे पड़े हो,सब अपनी अपनी माँ से बात करें ।" और वह यह ना कहता "मेरी मम्मी ब्लॉगिंग नहीं करती, मेरे ब्लॉग नहीं पढ़तीं । और, और मैंने अपनी मम्मी से शाम को बात भी कर ली है । अब तो मिम्मा से करनी है ।" सो मैं मिम्मा बन निहाल हूँ, पहले दो की थी अब चार की हूँ। कल क्या होगा, सबकुछ ऐसा ही रहेगा, कह नहीं सकती, परन्तु माँ के रूप में आज से मैं सन्तुष्ट हूँ ।

घुघूती बासूती

पुनश्च:तीन दिन के लिए बाहर जा रही हूँ । शायद ब्लॉगिंग नहीं हो पाएगी ।

घुघूती बासूती

Thursday, March 13, 2008

अकेली

खड़ी हूँ अकेली सुनसान बीहड़ में
ना किसी ओर कोई राह जाती है,
खोई हूँ ऐसे निःशब्द सन्नाटे में
ना कहीं से कोई आवाज आती है ।


पथराई आँखें ढूँढती घनघोर अंधेरे में
ना कहीं कोई प्रकाश किरण आती है,
जीवन बना है अंधा कूँआ जिसमें से
मेरी गूँज तक ना लौटकर आती है ।


सारा जीवन सजाया रेत के महल को
ना आज तो वहाँ कोई भी रहता है,
खो गए हैं महल के सारे निशान भी
यहाँ कभी कोई था, न कोई कहता है ।


अश्रुजल से भिगो भिगो सींचा जिस चमन को
आज वीरान है वह, ना कोई फल फूल लगता है,
प्रेम से बोया, संजोया जिस गुलाब के पौधे को
फूलों की क्या बात,उसमें इक काँटा ना लगता है ।


मन ने जाने कितने बुने थे स्वप्न सुन्दर से
पर आज पाया, यह तो मकड़ी का जाला है,
मन आत्मा का मंथन कर जो अमृत समझा
अब पीया तो जाना कि वह तो शुद्ध हाला है ।


प्यार के सागर में गोते खा खाकर चुने जो मोती
पिरो पिरो कर हारी पर बनती ना कोई माला है,
कामदेव का तीर समझ जिसे हँस वक्ष पर झेला
आँख खुली तो जाना वह तो विष बुझा भाला है ।


जिसे जीवन समझकर जीती रही पल पल मैं
आज जाना वह तो बस इक भ्रम ही पाला है,
सुधा समझ जिसे प्रेम से पीती रही थी अबतक
सदा से खाली ही तो रहा वह मेरा प्याला है ।


घुघूती बासूती

Wednesday, March 12, 2008

इस पल में कुछ नहीं रखा है

क्या कुछ भी नहीं बचा है
इस पल में कुछ नहीं रखा है,
मैं थी बैठी रही प्रतीक्षारत
तेरे पास ना इक शब्द बचा है ।

तेरे मेरे बीच अब आए हैं
रिश्तों के कितने बड़े चौराहे,
घूमघाम कर अबतक मेरी राहें
मीत अब दुरूह इन्हें पाए हैं।

कुछ कुछ मुझे भी बोध हुआ है
थक जाने से कुछ क्षोभ हुआ है,
व्यस्त जीवन जीना है अब तूने
हृदयों बीच अब अवरोध हुआ है ।

जाने को अब तू व्यग्र हुआ है
आगे इक कदम बढ़ा हुआ है,
जा, जा अब ओ मेरे मितवा
जाने को तू मुक्त हुआ है ।

घुघूती बासूती

Tuesday, March 11, 2008

तुम जुगनू बनकर आते हो

जीवन की अन्धियारी राहों में
तुम जुगनू बनकर आते हो,
जीवन की उजियारी राहों में
तुम नजर कभी नहीं आते हो ।

पल पल मेरी हर उलझन में
तुम साथ निभाए जाते हो,
पर मन की हर सुलझन में
अपना नाम नहीं लिखवाते हो।

मेरे दुःस्वप्नों में तुम आकर
झट बाहर मुझे ले आते हो,
मधुर स्वप्नों को तुम केवल
मेरे नाम ही कर जाते हो ।

जब भी पीना होता है हाला
तुम साथ मेरे आ पीते हो,
अमृत की जब आती बारी
मेरे हाथ थमा तुम जाते हो ।

चलती हैं जब भी काली आँधी
थामे हाथ मेरा तुम होते हो,
शीतल बयार जब भी बहती
तुम साथ मेरे ना होते हो ।

फँस जाती हूँ जब काँटों में
आँचल मेरा बचा ले आते हो,
होती जब फूलों भरी फुलवारी में
तुम जाने कहाँ चले जाते हो ।

घुघूती बासूती

Monday, March 10, 2008

सेही ने शेर पर साधा निशाना । घायल शेर भागा ।

लगभग पाँच दिन पहले एक समाचार पढ़ा था, कि एक शेर ने सेही (porcupine ) का शिकार करने की कोशिश की और सेही ने अपने बाण जैसे दो काँटे( quills ) उसपर दाग दिये और शेर बेचारा पीठ पर काँटे लगाये जान बचाकर भागा । अब वन्य अधिकारी उसको ढूँढ रहे हें ताकि ये काँटे निकाल कर उसका घाव ठीक किया जा सके । लगता है सेही का माँस कई जानवरों को इतना पसन्द है कि वे लालच में घायल होने का खतरा भी मोल ले लेते हैं ।


यह समाचार पढ़कर मुझे २० वर्ष पहले का समय याद आ गया । क्लब में कोई कार्यक्रम चल रहा था । अचानक जैकी नामक एक कुत्ता भागता हुआ आया और एक चक्कर लगाकर चला गया । मुझे उसके कान से कुछ पैन्सिल या तीर सा लटकता दिखा परन्तु इससे पहले कि कुछ समझ पाऊँ वह भाग गया था । जैकी कभी किसीका पालतू कुत्ता हुआ करता था । उसे पालने वाले की जब बदली हुई तो वह उसे वहीं छोड़कर चले गए थे । उसी मकान में जो रहने आए वे और उनका परिवार जैकी का ध्यान रखने लगे । उनका पालतू तो उसे नहीं कह सकते थे परन्तु वे उसे खाना खिलाते थे । जैकी कॉलॉनी भर का सांझा कुत्ता बन गया था ।


जैकी की विशेषता यह थी की वह हर स्कूटर व मोटरसायकल का पीछा करता था । अन्यथा वह बेहद निरापद प्राणी था । बच्चे उसके साथ निश्चिन्त खेलते थे ।
रात को क्लब का कार्यक्रम समाप्त होने पर जब हम लोग घर आकर सोने जा रहे थे तो जैकी का ध्यान रखने वाले परिवार की महिला का फोन आया । वे फोन पर रो रहीं थीं । उनके पति कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे । घर पर वे अपनी बेटियों के साथ थीं । क्लब से लौटकर उन्होंने जैकी को पीड़ा से रोते हुए पाया । उसके कान में सेही का काँटा चुभा हुआ था । उन्होंने बताया कि उनके बगीचे में एक सेही भी रहती थी । शायद जैकी ने उसे छेड़ दिया होगा । उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें । इतनी रात में कोई जानवरों का डॉक्टर मिलना भी सम्भव नहीं था । वैसे भी डॉक्टर वहाँ नहीं रहता था । हमें १२ कि.मी. दूर ले जाना पड़ता था । सबको हमारे परिवार का कुत्ता प्रेम पता था सो वे जानना चाह रहीं थीं कि क्या हम कुछ करेंगे । मैंने कहा कि पति से बात करती हूँ । पति बोले कि बस अभी पहुँचता हूँ ।


गाड़ी निकाल वे कुत्तों के घाव पर लगाने वाला मलहम लेकर वहाँ पहुँचे । जैकी किसी अनजान को तो हाथ नहीं लगवाने दे रहा था । आमतौर पर कुत्ते का इलाज करते समय उसका मुँह बाँध दिया जाता है । जैकी इसके लिए भी तैयार नहीं था । वैसे ही बेचारा बहुत कष्ट में था । पति ने सुझाया कि जैकी को बाड़ के पास ले आया जाए । वहाँ तारों के घेरे के एक तरफ उनके बगीचे में वे लोग जैकी को पकड़े रखें । तारों के बाहर से वे कोशिश करेंगे । वैसा ही किया गया । उसका सिर ऐसे पकड़ा गया कि काँटा तार के बाहर की तरफ आ गया । उन्होंने व उनकी बेटियों ने रोते रोते उसका सिर कस कर पकड़े रखा । दूसरी तरफ से पति ने खींचकर काँटा बाहर निकाला । जैकी जोर से चिल्लाया । वह अपने पैर से बार बार छूकर देख रहा था कि काँटा क्या सच में निकल गया है । उसके मलहम लगाया गया ।

जब वे घर आए तो मैंने जैकी का हाल पूछा । अनजाने कुत्ते से छेड़छाड़ करना अपने को कटवाने का खुला न्यौता तो था ही । सो मैं चिन्तित थी । पति ने पूरी बात बताई और कहा कि काँटा निकालने के बाद उसके चेहरे पर जो राहत दिखी वह देखने लायक थी । ऐसे में ही जानवरों के ऋाथ ना होने का दुख होता है । बेचारे बहुत असहाय हो जाते हैं ।

आशा है कि जैकी की तरह ही उस बेचारे शेर की पीठ से भी काँटे निकाल लिए गए होंगे ।

शेरों से सम्बन्धित दो और पोस्ट्स:

शेर,चरवाहे भारवाड़ और गोफेण


मुझे कल की छुट्टी चाहिये ।


घुघूती बासूती

Saturday, March 08, 2008

शेर, चरवाहे भारवाड़ और गोफेण



रास्ते में दो तीन लोग अकेले जाते दिखे । एक टॉर्च तक उनके हाथ में नहीं था । मैं अभी भी शेरों के बारे में सोच रही थी । वैसे ऐसा नहीं कि हम जंगली जानवरों से नहीं मिले हों । हम भी सौराष्ट्रा की ही एक और जगह में 'दीपड़े'को कुछ मीटर की दूरी से जाते हुए देख चुके हैं । दीपड़ा क्या होता है व उस घटना के विषय में और कभी ।
चलिये अपने ड्राइवर का नाम बता देते हैं । जब बात ड्राइवरों की निकली है तो अलग अलग जगह के अलग अलग ड्राइवरों की कभी ना कभी तो होगी ही । सो ये वाले हैं भ. सिंह । उम्र में काफी कम सो हम बहुत बार बेटा ही कहते हैं । कल हम जानकारी प्राप्त करने के मूड में थे । सो उससे पूछा..
"तुम कह रहे थे कि यदि गाँव में शेर आ जा तो गाय बैंस को अन्दर बान्ध देते हो । तुम्हें पता कैसे चलता है कि शेर आया है ?"
"गाय भैंसे असहज हो जाती हैं । बैचेन होकर यहाँ से वहाँ खूँटे से बन्धी चलने लगती हैं । यदि कोई शेर को देख ले तो शोर मचाकर अड़ोसी पड़ोसी को भी सावधान कर देता है ।"
"यदि दिन का समय हो और वे बाहर चर रह हों तो ?"
"भैंस तो अधिक डरती नहीं । यदि अधिक भैंसें हों तो एक घेरा बना लेती हैं । गायें भी उस घेरे के अन्दर सुरक्षित रहती हैं । शेर भैंस पर सामने से हमला नहीं करता । पीछे से ही करता है । सो वे मुकाबला करती हैं । गाय बेवकूफ व डरपोक होती है । वह भागने लगती हैं, इसीलिये मारी जाती हैं ।"
"
ये जो भेड़ चराने वाले होते हैं ये क्या कहीं भी डेरा डाल देते हैं ?"
"हाँ ।"
"रात भर बाहर खुले में सोने में उन्हें डर नहीं लगता ? अपनी भेड़ों व बकरियों की रक्षा कैसे करते हैं ?
वे दिन भर अकेले घूमते भले ही हैं परन्तु रात को अपने परिवार के पास चले जाते हैं ।"
"कैसे? कहाँ ?"
"वे अपने परिवार के साथ एक जगह से दूसरी जगह डेरा डालते हैं । आमतौर पर यदि किसी का खेत खाली हो तो वहाँ डेरा डाल देते हैं । वहीं उनका परिवार रुकता है और वे दिन भर भेड़ बकरियों को चराते हैं। रात को वे अपने डेरे में चले जाते हैं।"
"वहाँ सुरक्षा केसे होती है ?"
"वे चार लकड़ियाँ धरती पर गाड़ देते हैं । इनसे जार (मछली पकड़ने का जाल जैसा ) व रस्सी बाँध कर घेरा बनाते हें । भेड़ बकरियों को उसी घेरे में रात को बन्द कर देते हैं । पुरुष लोग इसके बाहर दो या अधिक कोनों में सोते हैं । आग भी जलाए रखते हैं । ये अधिकतर गाँवों में रुकते हैं तो शेर आदि कम ही आते हें ।"
"यदि आ जाए तो?"
"ये अपने पास गोफेण रखते हैं । गोफेण से ये पत्थर इतनी तेज गति से फेंक सकते हैं कि वह गोली की तरह जाता है । लगता भी बहुत जोर से है । सो आमतौर पर इन्हें जंगली जानवरों से कोई भय नहीं रहता । शेर आता है तो भेड़ बकरियाँ और ये दूर से ही बास पहचान जाते हैं और गोफेण से पत्थर फेंककर भगा देते हैं । इनका निशाना भी पक्का होता है ।( गोफेण का चित्र मेंने अपने महाराज भ. भाई से पूछकर बनाया है। यह एक कपड़ा होता है जिसकी दो तरफ बिल्कुल बराबर लम्बी रस्सी बन्धी होती है। एक तरफ की रस्सी के अन्त में एक गोल लूप बना होता है जिसके अन्दर सबसे छोटी उँगली जाती है। दूसरी तरफ की रस्सी के अन्त में गाँठ होती है । कपड़े में एक पत्थर रखते हैं । फिर लूप के अन्दर छोटी उँगली डालते हैं और गाँठ को भी उसी हाथ में पकड़ लेते हैं । रस्सी को जोर जोर से सिर के ऊपर घुमाया जाता है । फिर सही समय पर सही दिशा देख गाँठ को हाथ से छोड़ देते हैं। पत्थर छूटकर गोली की तरह जाता है।
किसान भी अपनी फसल की रखवाली में गोफेण का उपयोग करते हैं । चिड़िया भगाने के लिये वे पत्थर की जगह मिट्टी के ढेले का प्रयोग करते हें । मिट्टी का ढेला टूटकर बड़े क्षेत्र में तेजी से बरसता है और चिड़ियों को उड़ा देता है । इसे चला तो कोई भी सकता है परन्तु अनाड़ी से पत्थर किसी भी दिशा में चले जाता है क्योंकि उसे छोड़ने का समय एकदम सही होना चाहिये । यहाँ फ़िज़िक्स भी आ गया । )"

"क्या तुम भी इन चरवाहों को अपने खेत पर ठहराते हो?"
"हाँ । जब फसल कट जाती है तो सभी लोग इन्हें ठहराना पसन्द करते हैं । हम तो रुपये और बाजरा देकर इन्हें अपने खेत पर बुलाते हैं ।"
"क्यों?"
"जहाँ भेड़ बकरियाँ ठहरती हैं वहा खाद बहुत हो जाती है ।"
"कितना पैसा देते हो ?"
"एक रात रुकने का तीन सौ रुपये और पाँच किलो बाजरा तो देना ही होता है ।"
"वाह!"
"तभी तो जब फसल कटती है तो ये गाँवों में आ जाते हैं । इनके परिवार घोड़ों,गधों और ऊँटों पर सामान लादकर साथ चलते हैं ।"
घर आ गया था सो बात यहीं खत्म हो गई। आज सुबह भ. भाई से और पूछताछ की । जो जानकारी मिली वह यह है.....
""भैड़ का तो ऊन मिलता है, बकरियाँ क्यों पालते हैं ?"
भेड़ व बकरी का दूध बेच देते हैं । बकरों को कसाई को बेच देते हैं । आजकल तो बकरे के बहुत पैसे मिलते हैं ।"
"क्या वे मीट खाते हैं ?"
"ये लोग रबाड़ी या भारवाड़ जाति के होते हें । पहले तो शाकाहारी होते थे परन्तु आजकल कई लोग मीट खाने लगे हैं "।
सोचती हूँ कि नयी जानकारी मिल गई । गोफेण के बारे में सोचती हूँ व फ़िज़िक्स के बारे में सोचती हूँ । घुमाने पर क्या सेन्ट्री फ्यूगल फोर्स बना ? पत्थर सीधे टैन्जेन्ट पर जाता है । क्या यही सब शब्द थे ? मुझे किताब में बना चित्र भी याद आ रहा है । बहुत वर्ष हो गए पढ़ाई छूटे हुए । फिर भारवाड़ भी तो बिना पढ़े फ़िज़िक्स का इतना बढ़िया उपयोग कर रहे हैं । भैंस की वीरता से उसके प्रति आदर बढ़ गया । यह भी ध्यान आया कि लोग अपनी बिटिया के बारे में अच्छा बोलना चाहते थे तो कहते थे वह तो गाय है । हम्म, गाय सी सीधी ! तभी तो संसार के शेर उसे पचा जाते हैं । गाय से तो भैंस होना ही बेहतर है । मुकाबला तो करती है वह !
घुघूती बासूती

Thursday, March 06, 2008

मेरे मामा को शेर ने काट लिया है । मुझे कल की छुट्टी चाहिये ।

हम लोग तब नए नए यहाँ आए थे । यह तो पता था कि हम शेरों के इलाके के बहुत निकट हैं परन्तु कितना निकट हैं यह नहीं पता था । यह तब पता चला जब हमारा ड्राइवर बोला कि उसे अगले दिन की छुट्टी चाहिए, उसे अपने मामा को देखने जाना है । हमने पूछा कि मामा को क्या हो गया । जो उत्तर हमें मिला उसे सुनने की तो हमने बिल्कुल आशा नहीं थी । हम बहुत बड़ा सा 'क्या' कहकर आश्चर्यचकित रह गए । वह बोला, 'उसके मामा को शेर ने काट लिया है ।'
यदि वह बोला होता कि कुत्ते ने काट लिया है, या साँप ने तो मामा से सहानुभूति तो होती परन्तु बात समझ में तो आती । हमने सोचा शायद यह भाषा की गड़बड़ है , हमें उसकी बात समझ नहीं आ रही । हमने एक बार फिर पूछा, "मामा को शेर ने काफी घायल कर दिया होगा ।"
वह बोला, "हाँ, दो तीन दाँत लगा दिये हैं छाती पर ।"
"बस?"
"हाँ ।"
"ऐसा कैसे ?"
"शेर उन्हें पहचानता था ।"
यह तो एक और ही नई बात सुनने को मिल रही थी । हम तो बस केवल कुछ मानवों, कुत्ते, बिल्लियों द्वारा ही पहचाने जाते हैं और यहाँ इन मामाजी को शेर भी पहचानता था । हीन भावना तो हुई परन्तु पूरी बात जानने की उत्सुकता भी थी। आखिर रोज रोज शेर लोगों को काटता तो नहीं , मार भले ही देता हो।
"यह सब हुआ कैसे ? क्या वे जंगल में थे ?"
"नहीं वे तो गाँव में ही गायें चरा रहे थे ।"
"फिर?"
"शेर ने गाय पर हमला किया । गलती से मामा बीच में आ गए ।"
"शेर उन्हें कैसे पहचानता था ?"
"वह शेर तीन और शेरों के साथ बहुत दिनों से हमारे गाँव में घूम रहा है । कभी खेत में मिल जाता है तो कभी आते जाते रास्ते में ।"
"फिर तुम लोग क्या करते हो ?"
"कुछ नहीं, शाम को अपने जानवर घर के अंदर बाँध लेते हैं ।"
"ओह ! कहाँ इलाज हो रहा है ?"
"अभी तो जूनागढ़ के हस्पताल में भर्ती हैं । एक दो दिन में छुट्टी मिल जाएगी ।"
शेर का हमला, नहीं नहीं , काटना,शेर से जानपहचान,शायद शेर ने मामाजी से ओह सॉरी भी कहा हो , यह सब सुनकर हमें लग रहा था या तो हम स्वप्नलोक में थे या कार्टूनलोक में ।
आज यह सब बात इसलिए याद आ गई क्योंकि शहर से घर आते आते बहुत देर हो गई थी । रास्ते का एक बहुत बड़ा भाग सुनसान है । एक सूखी नदी को पार करते हैं । कई बार नदी के पास ठीक सड़क के किनारे चिता जल रही होती है और लोग उसके आसपास ऐसे बैठे होते हैं जैसे आग ताप रहे हों । सियारों की हूहू सुनाई दे रही होती है । ( अभी भी सुनाई दे रही है ।) कभी कोई लोमड़ी या सियार रास्ता काट जाता है ।
मैंने उससे पूछा," क्या कभी इस रास्ते पर शेर मिला है ।"
वह बोला "तीन बार तो कार से लौटते समय का उसे ध्यान में है । एक बार तो जब दीदी लोगों को अहमदाबाद छोड़कर आ रहा था तब ।"
"फिर क्या किया ?"
"कुछ नहीं , कार देखकर वह सड़क के किनारे खड़ा हो जाता है। हम कार दूसरी तरफ से निकाल लेते हैं।"
"जब तुम मोटरसायकल पर होते हो तब क्या करते हो ?"
"कुछ नहीं , किनारे से निकाल लेता हूँ ।"
"शेर क्या करता है ?"
"बस वह किनारे पर खड़ा हमारे गुजरने की प्रतीक्षा करता है । फिर चल पड़ता है ।"
"यदि पैदल हो तो ?"
"तब भी कुछ नहीं । एक किनारे से निकल जाते हैं ।"
"उसके पास से ? वापिस नहीं लौट जाते ? "
"नहीं शेर को छेड़ो नहीं तो कुछ नहीं कहता है ।"
देखिये शेर तक इतने भले होते हैं कि छेड़ो ना तो अपने रास्ते ही नहीं जाते अपितु आपके लिए रास्ता भी छोड़ देते हैं । आज अपने ड्राइवर से बहुत सी बाते हुईं । अधिकतर शेरों की । चर्चा कल या परसों या जब मन हुआ तो जारी रखूँगी ।
घुघूती बासूती

Wednesday, March 05, 2008

शिवरात्री के लिए फलाहारी व्यंजन

परसों शिवरात्री है और मुझे याद आए कुछ अपने बचपन में खाए व कुछ अपने बच्चों को बचपन में खिलाए विशेष उपवास के व्यंजन !
शिवरात्री के बारे में सोचकर बहुत सी यादें ताजा हो आईं हैं । मन लिखने को कर भी रहा है,परन्तु लगता है कि वह सब तो बाद में भी लिख सकती हूँ , पहले तो आपको हमारे घर में इस दिन से जुड़े व्यजंनों के बारे में व उन्हें बनाने की विधि बता दूँ ।
चौलाई (रामदाने,राजगीरे) के लड्डू
ये मेरी बच्चियों को बहुत प्रिय थे व अपने बचपन में मुझे व मेरी सहेलियों को भी । ये एक बार बना कर बहुत दिनों तक रखे जा सकते हैं ।
चौलाई एक हरी भाजी का बीज है । यह देखने में खसखस के दानों से थोड़ा बड़ा होता है ।
सामग्री
२५० ग्राम चौलाई
२५० ग्राम गुड़
चौलाई को छानकर व फटककर मिट्टी आदि निकाल लें फिर उसे बीन लें । एक कड़ाही आँच पर गरम करें । उसमें लगभग एक बड़ी चम्मच चौलाई डालें व एक बड़े पुराने साफ कपड़े को मोड़कर गद्दी सी बनाते हुए हाथों को जलने से बचाते हुए,कपड़े से चौलाई को लगातार चलाते जाइये । यह फूलकर फूटेगी व पॉपकॉर्न की तरह उड़ेगी अतः कपड़े से ही उड़ने से भी रोकते रहिये । जब लगभग सारे दानें फूट जाएँ तो कपड़े से ही इन्हें कड़ाही से बाहर निकाल लीजिये । फिर से एक चम्मच दानें भूनें । काम कठिन है, नया नया खाना बनाने वाले/वाली इसका प्रयास ना करें, केवल पुराने सिद्धहस्त ही करें । वैसे ओवन वाले दस्ताने पहन कर यदि कपड़े से फुला पाएँ तो हाथ नहीं जलेगा । और यदि गैस स्टोव के नीचे पेपर बिछा दें तो उड़े दाने भी पयोग में ला सकेंगे ।
सारे दानें भून जानें पर इन्हें एकबार फिर छलनी से छान लें । (मैं जो तरीका उपयोग करती हूँ उसमें पहले एक थोड़े मोटे छेद की छलनी से कच्चे दानों को छानकर कचरा ऊपर रहने देती हूँ व छने दानों को भूनती हूँ । फिर फूलने पर एक बार फिर उसी छलनी से छानती हूँ व केवल ऊपर रहे को रखती हूँ व नीचे छूटे को फेंक देती हूँ ।)
गुड़ को पानी में डालकर गरम करें । घुल जाने पर छान लें । फिर एक या आधे तार की चाशनी बनाएँ ।
एक परात या तसले में फूले दानें डाल दें व अन्दाज से थोड़ा ठंडी हुई चाशनी उसमें डालें व मिलाएँ । एक बड़ी कटोरी में पानी रखें व पानी से हाथ गीले कर बड़े बड़े लड्डू बनाएँ । यदि मिश्रण सूखने लगे या जब भी आवश्यकता लगे तो थोड़ी और चाशनी परात में डाल कर मिला लें । सारे दानों के लड्डू बना लें ।
नोटः ये लड्डू एक या दो से अधिक ना खाएँ अन्यथा पेट साफ करने का काम करेंगे ।
आलू के गुटके
आलुओं को छीलकर बड़ा बड़ा काट लें । थोड़ा अदरक बारीक पीस लें । थोड़े अदरक को कद्दूकस कर लें । कटे आलू में अदरक,धनिया पावडर, मिर्च व नमक डाल दें । अब इन्हें अच्छे से मिला लें । एक घंटे तक ऐसे ही रहने दें । आलू में मसाला अच्छे से मिल जाएगा । एक मोटे तले की कड़ाही या पतीले में बघार लायक तेल गरम करें । यदि हींग जीरा उपवास में खाते हैं तो वह डालें अन्यथा ऐसे ही आलू इसमें पलटकर अच्छे से मिला लें । हलकी आँच में नरम होने तक पकाएँ । (यदि आप कुमाऊनी हों और घर में जम्बू हो तो उसका छौंका लगाएँ, हो सके तो थोड़ा जम्बू मेरे लिए भी रखें । मैं इस माह के अन्त में दिल्ली आकर यह ले सकती हूँ । )
मखानों की खीर
मखानों को तोड़कर, ना टूटें तो चाकू से काटकर अन्दर से साफ कर लें । कभी कभी इनके बीच में जाला या कीड़ा हो सकता है । दूध को उबालकर कम आँच पर मखाने डालकर पकने दीजिये । जब दूध काफी गाढ़ा हो जाए तो किशमिश, कटे बादाम व शक्कर डाल दें । ठंडा होने पर यह खीर चौलाई के लड्डू के साथ बहुत अच्छी लगती है ।
समाँ के चावल (उपवास के चावल जो बहुत बारीक व छोटे होते हैं ) की खीर
दूध को उबाल लें । चावल बीनकर धो लें और दूध में डालकर पकने दें । जब यह चावल की खीर सा गाढ़ा हो जाए तो किशमिश, कटे बादाम व शक्कर डालकर ठंडा होने को रख दें ।
समाँ के चावल की फिरनी
चावल धोकर सुखा लैं । अब बारीक पीस लें । दूध उबालकर गाढ़ा होने दें । कस्टर्ड की तरह एक कटोरी में ठंडे दूध में चावल का पावडर मिला लें । अब इस मिश्रण को गरम दूध में डालकर पकाएँ । चावल अच्छे से मिल जाए व दानेदार कस्टर्ड सा बन जाए । चाहें तो अलग अलग कटोरी या मिट्टी के सकोरों में डालकर ठंडा करें । ऊपर से बारीक कटे बादाम डाल दें ।
साबूदाने की खिचड़ी
एक कटोरी साबूदाने को आधा कटोरी से थोड़े कम पानी में भिगोएँ । चार पाँच घंटे भीगने दें । एक कटोरी कच्ची मूँगफली को मोटे तले वाली कड़ाही में कम आँच में बराबर चलाते हुए भून लें । मूँगफली जलनी या काली नहीं होने देनी चाहिये । भुन जाने पर ठंडी होने दें । एक कपड़े पर रखकर इनपर बेलन चलाएँ । छिलके उतर जाने पर सूप या थाली में डाल फटककर छिलके हटा लें । अब इन्हें दरदरा पीस लें । जब साबूदाना भीगकर नरम हो जाए तो उसमें यह पावडर मिला लें । नमक ,मिर्च, अमचूर या चाटमसाला मिला लें । एक कड़ाही में तीन बड़े चम्मच तेल गरम करने रखें, दो तीन सूखी लाल मिर्च बीच में से दो टुकड़े कर तेल में डालकर भून लें । (साबुत मिर्च भूनने से फटकर उड़ती है व चाहरे पर आती है। ) इन्हें बाहर निकाल लें और गरम तेल में सरसों, हींग फोड़ें और साबूदाने का मिश्रण डालकर चलाएँ । बीच बीच में पलटते रहें । ढक्कन ना लगाएँ । करीब दस मिनट में पक जाने पर आग से उतार लें । खाने से पहले भूनी मिर्च डाल दें।
साबूदाने की वड़ियाँ
एक कटोरी साबूदाने का आधा कटोरी से थोड़े कम पानी में भिगोएँ । चार पाँच घंटे भीगने दें । आधा किलो आलू उबालें । गरम आलुओं को ही छील लें । अब इन्हें जब गरम हों तभी कांटे या मैशर से मैश कर लें । ध्यान रहे मैश करें ना कि कचूमर बनाएँ । (चाहे कटलेट के लिये हों या टिक्की या बोंडों के लिए, इन्हें कभी भी चिपचिपा नहीं होने देना चाहिये।) मैश किए आलू में छोटे छोटे से कण दिखने चाहिए। नमक मिर्च मिलाएँ । अब १/4 साबूदाना छोड़कर बाकी को आलू में मिलाएँ । हाथ से गोल गोल टिक्कियाँ बना लें । कड़ाही में तलने के लिए तेल गरम करें । बचे हुए साबूदाने को एक छोटी थाली में बिछा लें । अब हर टिक्की को हलके से बिछाए हुए साबूदाने पर दबाएँ । साबूदाने टिक्की की सतह पर चिपक जाएँगे । तेल गरम होने पर एक टिक्की डालें थोड़ी पक जाए तो दूसरी फिर तीसरी । एक साथ डालने से ये आपस में चिपक जाती हैं । सुनहरा होने पर पेपर नैपकिन पर निकालें । अलग से जो साबूदाना लगाया गया था वह फूलकर वड़ी के ऊपर कुरकुरा व सफेद दिखता है खाने में स्वाद व देखने में सुन्दर भी ।
कहने को ये सब उपवास का भोजन है परन्तु यह आम दिन के भोजन से अधिक गरिष्ठ व कैलोरी वाला हो जाता है । अतः केवल शिवरात्री, जन्माष्टमी जैसे त्यौहारों के लिए उपयुक्त हे आम उपवास के लिए नहीं।
नोटः मधुमेह,उच्च रक्तचाप व हृदय रोगी इस भोजन को ना ही खाएँ तो बेहतर है । खीर व फ़िरनी में शक्कर के स्थान पर पकने के बाद शुगर फ्री आदि का उपयोग किया जा सकता है ।
कम कैलोरी वाला भी कुछ ....
फलों की चाट...
सेब, केले, अमरूद, के छोटे छोटे टुकड़े कर लीजिये । सबको एक बर्तन में डालकर नमक, काला नमक, मिर्च,शक्कर (या शूगर फ्री )मिला दीजिये । नींबू का रस निचोड़ कर अच्छे से मिला लीजिये । अब चाहें तो संतरे का केसर और अंगूर पूरे या काटकर आधे करके डाल दीजिये । फ्रिज में रखिये । दो घंटे बाद काफी रसीला बन जाएगा तब खाइये ।
यदि कोई भी इनमें से कुछ भी बनाए व पसन्द आये तो मुझे बताना ना भूलियेगा ।
किसी दिन स्वास्थ्य के लिए,मधुमेह के लिए, उच्च रक्तचाप व हृदय रोग के लिए भोजन व घरेलू नुस्खे दूँगी । कब, पता नहीं । परन्तु यह मत कहियेगा 'औरों को तो राह बताए आप अंधेरे जाए !'
घुघूती बासूती

Monday, March 03, 2008

आज आई है मेरी बारी

फिर क्यों आज मुझे
लोगों की यह निष्ठुरता,
उनकी यह तटस्थता
बहुत खल रही है ?


कैसे हो सकता है
मनुष्य इतना निर्दयी
कैसे नहीं पिघलता
हृदय किसी का ?


कैसे ये जा रहे हैं
छोड़ मुझे यूँ जमीं पर
क्यों कोई नहीं है आता
करने मेरी सहायता ?


जानता हूँ मैं ये कि
कभी मैं न था रुका
न दी थी लिफ्ट मैंने
कहीं कभी किसी को ।


क्या अपराध मुझसे
हो गया है इतना बड़ा
कि आज गिर कर यहीं
जान मुझे है देनी ?


यूँ ही बहा रुधिर तो
क्या अब कभी भी
मुलाकात पत्नी, बच्चों
से फिर न होगी ?


कल ही की तो बात है
देखी थी एक दुर्घटना
कहती रही थी बिटिया
गाड़ी जल्दी रोको ।


मैंने कहा था उसको
हमें है जाने की जल्दी
कोई और रोक लेगा
चिन्ता मत करो तुम ।


शायद ये ही शब्द
दोहरा रहे हैं ये सब
आज भी है मुझे जल्दी
कोई आओ मुझे बचाओ।


हस्पताल मुझे ले जाओ
आज जो बच गया तो
तटस्थ न कभी रहूँगा
निष्ठुर न मैं बनूँगा ।


शायद कोई रुक रहा है
शायद ये मुझे बचा ले
शायद पत्नी, बच्चों से
ये सज्जन मुझे मिला दे ।


ये हस्पताल पहुँचा दे
कुछ और न भी हो तो
मृत्यु होने पर मेरी
घर मेरे खबर करा दे ।


घुघूती बासूती